गणेश पूजा विधि
गणेश · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में गणेश जी की सरल पूजा: बारह नामों से स्मरण, दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या लड्डू का भोग, आरती और तीन परिक्रमा। बुधवार, चतुर्थी और हर शुभ काम से पहले।

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ ।निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭisamaprabha |
nirvighnaṃ kuru me deva sarvakāryeṣu sarvadā ||
अर्थ: हे टेढ़ी सूँड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले देव! मेरे सब कामों को सदा विघ्न से रहित कीजिए।
"वक्रतुण्ड महाकाय" गणेश जी का सबसे अधिक बोला जाने वाला श्लोक है। पूजा, पढ़ाई, यात्रा या किसी भी नए काम से पहले लोग इसे बोलते हैं और गणेश जी से प्रार्थना करते हैं कि काम में कोई विघ्न न आए।
यह एक ही श्लोक है, जिसे लोग प्रायः "गणेश मंत्र" कह देते हैं। यह पूजा-पद्धतियों और स्तोत्र-संग्रहों में मंगलाचरण के रूप में छपा मिलता है, पर इसका मूल ग्रंथ निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है।
इस छोटे-से श्लोक में दो बातें हैं: पहले गणेश जी के रूप का स्मरण, फिर एक सीधी प्रार्थना। टेढ़ी सूँड, विशाल शरीर और करोड़ों सूर्यों जैसा तेज, ये उनके रूप की पहचान हैं। फिर भक्त कहता है कि मेरे सब कामों को सदा निर्विघ्न कीजिए।
गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, इसलिए हर शुभ काम उनके स्मरण से शुरू होता है। यह श्लोक उसी भाव का सबसे छोटा रूप है: काम छोटा हो या बड़ा, शुरुआत गणेश जी को याद करके हो।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| पहला चरण | वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ | बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) के वेदपादस्तव और संस्काररत्नमाला, दोनों में "कोटिसूर्यसमप्रभ" है। अर्थ वही है: करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले। |
| दूसरा चरण | अविघ्नं कुरु मे देव | संस्काररत्नमाला (गणपति-पूजन की प्रार्थना) का पाठ। "अविघ्नं" और "निर्विघ्नं" दोनों का अर्थ है विघ्न से रहित। |
यह श्लोक कई जगह छपा मिलता है: sanskritdocuments.org पर "गणेशप्रातःस्मरणम्" संग्रह में; बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) में वेदपादस्तव के पहले श्लोक के रूप में; और भट्ट गोपीनाथ दीक्षित की संस्काररत्नमाला में गणपति-पूजन के अंत की प्रार्थना के रूप में। किसी पुराण या पुराने ग्रंथ में इसका निश्चित स्थान हमें नहीं मिला, इसलिए मूल ग्रंथ और रचयिता अज्ञात रखे गए हैं।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): श्लोक sanskritdocuments.org के गणेशप्रातःस्मरणम् से लिया गया और विकिस्रोत पर बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) तथा संस्काररत्नमाला के स्कैन किए पृष्ठों के पाठ से मिलाया गया। प्रचलित पाठ ("सूर्यकोटिसमप्रभ", "निर्विघ्नं") sanskritdocuments.org का है; दोनों छपे ग्रंथों के पाठ पाठ-भेद में हैं। किसी पुराण में इसका स्थान नहीं मिला, इसलिए मूल ग्रंथ और रचयिता अज्ञात लिखे गए।
गणेश · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में गणेश जी की सरल पूजा: बारह नामों से स्मरण, दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या लड्डू का भोग, आरती और तीन परिक्रमा। बुधवार, चतुर्थी और हर शुभ काम से पहले।
गणेश · आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
गणेश · चालीसा
जय गणपति सद्गुणसदन, कविवर बदन कृपाल
गणेश · स्तोत्र · संस्कृत
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्
गणेश · आरती · मराठी
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची
गणेश · स्तोत्र · संस्कृत
मुदाकरात्तमोदकं सदाविमुक्तिसाधकं
इसका मूल ग्रंथ निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। यह पूजा-पद्धतियों (जैसे संस्काररत्नमाला) और स्तोत्र-संग्रहों (जैसे बृहत्स्तोत्ररत्नाकर) में मंगलाचरण के रूप में छपा मिलता है।
यह अनुष्टुप् छंद का एक श्लोक है, जिसे लोग प्रायः "गणेश मंत्र" कह देते हैं। इसमें कोई बीज-मंत्र नहीं है; यह सीधी प्रार्थना है।
दोनों छपे मिलते हैं और दोनों का अर्थ एक ही है: करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले। आम बोलचाल में "सूर्यकोटिसमप्रभ" अधिक प्रचलित है।
इसका कोई नियम नहीं है। एक बार श्रद्धा से बोलना काफ़ी है; कुछ लोग तीन बार बोलते हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।