गणेश

स्तोत्र · गणेश · श्लोक

वक्रतुण्ड महाकाय

हर शुभ काम से पहले बोला जाने वाला गणेश जी का श्लोक: हे टेढ़ी सूँड वाले, करोड़ों सूर्यों जैसे तेजस्वी देव, मेरे सब काम निर्विघ्न करें।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. कब पढ़ें
  5. विधि
  6. पाठ-भेद
  7. रचयिता और स्रोत
  8. ये भी पढ़ें
  9. सवाल-जवाब
  10. सुधार सुझाएँ

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ ।निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭisamaprabha |
nirvighnaṃ kuru me deva sarvakāryeṣu sarvadā ||

अर्थ: हे टेढ़ी सूँड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले देव! मेरे सब कामों को सदा विघ्न से रहित कीजिए।

वक्रतुण्ड
हे टेढ़ी सूँड वाले
महाकाय
हे विशाल शरीर वाले
सूर्यकोटिसमप्रभ
करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले
निर्विघ्नं
विघ्न से रहित
कुरु मे
मेरे (काम) कीजिए
सर्वकार्येषु
सब कामों में
सर्वदा
हमेशा

परिचय

"वक्रतुण्ड महाकाय" गणेश जी का सबसे अधिक बोला जाने वाला श्लोक है। पूजा, पढ़ाई, यात्रा या किसी भी नए काम से पहले लोग इसे बोलते हैं और गणेश जी से प्रार्थना करते हैं कि काम में कोई विघ्न न आए।

यह एक ही श्लोक है, जिसे लोग प्रायः "गणेश मंत्र" कह देते हैं। यह पूजा-पद्धतियों और स्तोत्र-संग्रहों में मंगलाचरण के रूप में छपा मिलता है, पर इसका मूल ग्रंथ निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है।

भावार्थ

इस छोटे-से श्लोक में दो बातें हैं: पहले गणेश जी के रूप का स्मरण, फिर एक सीधी प्रार्थना। टेढ़ी सूँड, विशाल शरीर और करोड़ों सूर्यों जैसा तेज, ये उनके रूप की पहचान हैं। फिर भक्त कहता है कि मेरे सब कामों को सदा निर्विघ्न कीजिए।

गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, इसलिए हर शुभ काम उनके स्मरण से शुरू होता है। यह श्लोक उसी भाव का सबसे छोटा रूप है: काम छोटा हो या बड़ा, शुरुआत गणेश जी को याद करके हो।

यह श्लोक कब पढ़ा जाता है

  • किसी भी पूजा की शुरुआत में
  • पढ़ाई, परीक्षा, यात्रा या नया काम शुरू करने से पहले
  • रोज़ सुबह के स्मरण में
  • गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी और बुधवार को

पढ़ने की विधि

  • गणेश जी का स्मरण करते हुए हाथ जोड़ें और श्लोक धीरे-धीरे बोलें।
  • एक बार बोलना काफ़ी है; मन एकाग्र करने के लिए तीन बार भी बोल सकते हैं।
  • बोलते समय उस काम का ध्यान करें जिसके लिए आप गणेश जी से निर्विघ्नता माँग रहे हैं।
पूरी विधिगणेश पूजा विधिघर में गणेश जी की सरल पूजा: बारह नामों से स्मरण, दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या लड्डू का भोग, आरती और तीन परिक्रमा। बुधवार, चतुर्थी और हर शुभ काम से पहले।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
पहला चरणवक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभबृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) के वेदपादस्तव और संस्काररत्नमाला, दोनों में "कोटिसूर्यसमप्रभ" है। अर्थ वही है: करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले।
दूसरा चरणअविघ्नं कुरु मे देवसंस्काररत्नमाला (गणपति-पूजन की प्रार्थना) का पाठ। "अविघ्नं" और "निर्विघ्नं" दोनों का अर्थ है विघ्न से रहित।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
ग्रंथ / स्रोत
मूल ग्रंथ अज्ञात; पूजा-पद्धतियों और स्तोत्र-संग्रहों में मंगलाचरण के रूप में
भाषा
संस्कृत

यह श्लोक कई जगह छपा मिलता है: sanskritdocuments.org पर "गणेशप्रातःस्मरणम्" संग्रह में; बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) में वेदपादस्तव के पहले श्लोक के रूप में; और भट्ट गोपीनाथ दीक्षित की संस्काररत्नमाला में गणपति-पूजन के अंत की प्रार्थना के रूप में। किसी पुराण या पुराने ग्रंथ में इसका निश्चित स्थान हमें नहीं मिला, इसलिए मूल ग्रंथ और रचयिता अज्ञात रखे गए हैं।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): श्लोक sanskritdocuments.org के गणेशप्रातःस्मरणम् से लिया गया और विकिस्रोत पर बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) तथा संस्काररत्नमाला के स्कैन किए पृष्ठों के पाठ से मिलाया गया। प्रचलित पाठ ("सूर्यकोटिसमप्रभ", "निर्विघ्नं") sanskritdocuments.org का है; दोनों छपे ग्रंथों के पाठ पाठ-भेद में हैं। किसी पुराण में इसका स्थान नहीं मिला, इसलिए मूल ग्रंथ और रचयिता अज्ञात लिखे गए।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

"वक्रतुण्ड महाकाय" किस ग्रंथ से है?

इसका मूल ग्रंथ निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। यह पूजा-पद्धतियों (जैसे संस्काररत्नमाला) और स्तोत्र-संग्रहों (जैसे बृहत्स्तोत्ररत्नाकर) में मंगलाचरण के रूप में छपा मिलता है।

यह मंत्र है या श्लोक?

यह अनुष्टुप् छंद का एक श्लोक है, जिसे लोग प्रायः "गणेश मंत्र" कह देते हैं। इसमें कोई बीज-मंत्र नहीं है; यह सीधी प्रार्थना है।

"सूर्यकोटिसमप्रभ" और "कोटिसूर्यसमप्रभ" में कौन-सा सही है?

दोनों छपे मिलते हैं और दोनों का अर्थ एक ही है: करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले। आम बोलचाल में "सूर्यकोटिसमप्रभ" अधिक प्रचलित है।

इसे कितनी बार बोलना चाहिए?

इसका कोई नियम नहीं है। एक बार श्रद्धा से बोलना काफ़ी है; कुछ लोग तीन बार बोलते हैं।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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