वक्रतुण्ड महाकाय
गणेश · श्लोक · संस्कृत
ध्यान में, और किसी भी काम की शुरुआत से पहले

पूजा विधि · गणेश · रोज़ की पूजा
घर में गणेश जी की सरल पूजा: बारह नामों से स्मरण, दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या लड्डू का भोग, आरती और तीन परिक्रमा। बुधवार, चतुर्थी और हर शुभ काम से पहले।
यह पन्ना घर में रोज़, बुधवार या चतुर्थी को की जाने वाली गणेश जी की सरल पूजा बताता है, और यह भी कि किसी नए काम की शुरुआत में उनका छोटा-सा स्मरण कैसे करें। गणेश चतुर्थी के दस दिन के उत्सव में नई मूर्ति की स्थापना, प्राण-प्रतिष्ठा और विसर्जन, गणपति अथर्वशीर्ष के वैदिक पाठ से अभिषेक, और मंदिर या दीक्षा से जुड़ी गणपति उपासना अलग विधियाँ हैं; इन्हें किसी जानकार आचार्य से समझकर करें।
हर शुभ काम की शुरुआत गणेश जी के स्मरण से होती है; इसीलिए उन्हें प्रथम पूज्य कहा जाता है। किसी भी देवता की पूजा, गृह प्रवेश, विवाह या पढ़ाई की शुरुआत में सबसे पहले "श्री गणेशाय नमः" कहने की परंपरा पूरे भारत में है।
गणेश जी की अपनी पूजा भी सरल है। उन्हें दूर्वा (दूब घास) सबसे प्रिय मानी जाती है, भोग में मोदक या लड्डू, और लाल फूल व सिंदूर। यहाँ घर की रोज़ की पूजा का क्रम है, जिसे बुधवार और चतुर्थी को थोड़ा विस्तार दिया जा सकता है। मूर्ति न हो तो एक सुपारी से भी पूजा होती है, और जो सामग्री न हो उसकी जगह भाव से किया गया नमन भी पूरी पूजा है।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| गणेश जी की मूर्ति या तस्वीर | पूजा का केंद्र | वैकल्पिक | न हो तो एक सुपारी पर मौली लपेटकर अक्षत की छोटी ढेरी पर रखें और उसे गणेश जी का प्रतीक मानकर पूजें; गीता प्रेस मूर्ति न होने पर यही बताती है। |
| दूर्वा (दूब घास) | गणेश जी को सबसे प्रिय; तीन या पाँच पत्तियों वाली फुनगी | वैकल्पिक | 21 दूर्वा चढ़ाने का चलन है, जिसे गीता प्रेस गणेश पुराण के हवाले से लिखती है; कम मिलें तो जितनी हों उतनी। एक गमले में दूब उगा लेना आसान उपाय है। |
| लाल फूल | गुड़हल, गुलाब या कनेर | वैकल्पिक | जो भी ताज़ा फूल मिले। तुलसी गणेश जी को नहीं चढ़ाई जाती। |
| सिंदूर या रोली | तिलक | वैकल्पिक | कुमकुम या लाल चंदन; न हो तो छोड़ दें। |
| चंदन और अक्षत | गंध और अर्पण | वैकल्पिक | न हों तो छोड़ दें। |
| शमी के पत्ते | कई परंपराओं में, ख़ासकर महाराष्ट्र में, गणेश जी को प्रिय | परंपरा-विशेष | न मिलें तो छोड़ दें। |
| मौली या जनेऊ | विस्तृत पूजा में वस्त्र और यज्ञोपवीत के रूप में | परंपरा-विशेष | मौली का एक धागा वस्त्र की जगह चढ़ाया जा सकता है। |
| दीपक और धूप | ज्योति और सुगंध | वैकल्पिक | घी या तेल, जो हो। |
| मोदक या लड्डू | गणेश जी का प्रिय भोग | वैकल्पिक | गुड़, बताशे, केला या कोई भी घर की मिठाई। |
| पान, सुपारी और नारियल | विस्तृत पूजा में ताम्बूल और फल | परंपरा-विशेष | रोज़ की पूजा में ज़रूरी नहीं। |
| कपूर | आरती | वैकल्पिक | घी के दीपक से भी आरती होती है। |
संकल्प का अर्थ है पूजा से पहले मन में साफ़ निश्चय करना। गणेश पूजा अक्सर किसी काम की शुरुआत से जुड़ी होती है, इसलिए संकल्प में उस काम का नाम भी लिया जा सकता है।
हे विघ्नहर्ता गणेश जी, आज [दिन] को मैं [अपना नाम] अपनी श्रद्धा के अनुसार आपकी पूजा कर रहा/रही हूँ। मेरे आज के कामों की रुकावटें दूर हों और मुझे सही समझ मिले।
किसी विशेष काम, जैसे परीक्षा, यात्रा या नए व्यापार, से पहले पूजा कर रहे हों तो संकल्प में उस काम का नाम ले लें। विस्तृत पूजा का संस्कृत संकल्प पुरोहित बोलते हैं; घर में अपनी भाषा का संकल्प काफ़ी है।
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
अर्थ: सुमुख (सुंदर मुख वाले), एकदंत, कपिल, गजकर्ण (हाथी जैसे कान वाले), लम्बोदर, विकट, विघ्ननाश (विघ्न मिटाने वाले), विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष (गणों के स्वामी), भालचंद्र (मस्तक पर चंद्रमा वाले) और गजानन: ये गणेश जी के बारह नाम हैं।
स्रोत: गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, पञ्चदेव-पूजन-विधि का "गणेश-स्मरण" (बारह नामों वाला श्लोक)।
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
अर्थ: हे टेढ़ी सूँड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों जैसी आभा वाले देव, मेरे सब कामों को सदा बिना विघ्न पूरा करें।
ॐ श्रीगणेशाय नमः। स्नानीयं जलं समर्पयामि॥
ॐ श्रीगणेशाय नमः। वस्त्रं समर्पयामि॥
अर्थ: श्री गणेश जी को नमन; मैं स्नान के लिए जल अर्पित करता/करती हूँ। श्री गणेश जी को नमन; मैं वस्त्र अर्पित करता/करती हूँ।
स्रोत: हर उपचार को देवता के नाम-मंत्र के साथ "समर्पयामि" कहकर अर्पित करने का प्रचलित ढंग। गीता प्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश कहती है कि जो श्लोक न पढ़ सकें वे नाम-मंत्र से पूजा करें; उसकी पञ्चदेव-पूजा में गणेश जी का नाम-मंत्र "ॐ श्रीगणेशाय नमः" है।
ॐ श्रीगणेशाय नमः। सिन्दूरं समर्पयामि॥
ॐ श्रीगणेशाय नमः। अक्षतान् समर्पयामि॥
अर्थ: श्री गणेश जी को नमन; मैं सिंदूर अर्पित करता/करती हूँ। श्री गणेश जी को नमन; मैं अक्षत अर्पित करता/करती हूँ।
स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; उपचार-वाक्य द्रिक पंचांग की गणेश पूजा विधि और गीता प्रेस के अनुसार।
दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्।
आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक॥
अर्थ: हे गणनायक, आपकी पूजा के लिए लाए गए ये हरे-भरे, अमृत जैसे, मंगल देने वाले दूर्वा के अंकुर स्वीकार करें।
स्रोत: द्रिक पंचांग की गणेश चतुर्थी पूजा विधि का दूर्वाङ्कुर मंत्र। गीता प्रेस की पूजा-विधियों में भी यही श्लोक मिलता है, जहाँ अंत में "गृहाण परमेश्वर" है।
ॐ श्रीगणेशाय नमः। पुष्पाणि समर्पयामि॥
अर्थ: श्री गणेश जी को नमन; मैं फूल अर्पित करता/करती हूँ।
स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के अनुसार।
ॐ श्रीगणेशाय नमः। धूपमाघ्रापयामि॥
ॐ श्रीगणेशाय नमः। दीपं दर्शयामि॥
अर्थ: श्री गणेश जी को नमन; मैं धूप की सुगंध अर्पित करता/करती हूँ। श्री गणेश जी को नमन; मैं दीपक की ज्योति दिखाता/दिखाती हूँ।
स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के अनुसार।
ॐ श्रीगणेशाय नमः। नैवेद्यं निवेदयामि॥
अर्थ: श्री गणेश जी को नमन; मैं यह भोग निवेदन करता/करती हूँ।
स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के अनुसार।
गणेश · श्लोक · संस्कृत
ध्यान में, और किसी भी काम की शुरुआत से पहले
गणेश · चालीसा
मंत्र जाप के बाद, ख़ासकर बुधवार को
गणेश · स्तोत्र · संस्कृत
चतुर्थी की पूजा में जाप के बाद
गणेश · स्तोत्र · संस्कृत
आरती से पहले
गणेश · आरती · मराठी
महाराष्ट्र की परंपरा में आरती
गीता प्रेस गणेश जी को लड्डू प्रिय बताती है; महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में मोदक सबसे प्रचलित भोग है। घर में जो सात्विक मिठाई बनी हो, वही भोग बन सकती है। भोग बाद में परिवार और बच्चों में बाँटें।
हे गणपति, आपने आज की शुरुआत अपने नाम से करने दी, इसके लिए आभार। मेरे कामों से किसी का अहित न हो, मेरी बुद्धि साफ़ रहे और जो भी काम हाथ में लूँ, उसे धीरज से पूरा कर सकूँ। पूजा में जो कमी रही हो, उसे क्षमा करें।
आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व गणेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अर्थ: हे गणेश्वर, न मैं आपको बुलाना जानता हूँ, न आपकी अर्चना करना, न पूजा की विधि; मुझे क्षमा करें। हे देवों के ईश्वर, मेरी पूजा मंत्र, विधि और भक्ति में अधूरी है; फिर भी मैंने जो पूजा की है, वह आपकी कृपा से पूरी हो।
स्रोत: द्रिक पंचांग की गणेश चतुर्थी पूजा विधि में विसर्जन से पहले पढ़े जाने वाले क्षमा-श्लोक; "मन्त्रहीनं क्रियाहीनं" वाला श्लोक गीता प्रेस की पूजा-विधियों की क्षमा-याचना में भी है।
गणेश · आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): Upachara order and name-mantra rule from Gita Press Nityakarma-Pujaprakash; twelve-names verse from its Panchadeva-pujan Ganesh-smaran (first three lines quoted, the phala lines left out); Vakratunda quoted in the main reading of the vakratunda-mahakaya work ("सूर्यकोटिसमप्रभ"); the Gita Press reading "कोटिसूर्यसमप्रभ" is noted in the alt, as the work also records it. Ganesh's flower rules (no tulsi, durva with 3 or 5 leaves, 21 durva from Ganesha Purana, laddu) and supari-as-Ganesh checked in the cleaner archive.org OCR copy. Durva verse, sindoor/shami upacharas and kshama verses from Drik Panchang's Ganesh Chaturthi puja vidhi. Three pradakshinas from the Gita Press rule "तिस्रः कार्या विनायके". Mantra from the site's mantra page; its beej note repeated in the alt.
गीता प्रेस बताती है कि मूर्ति न हो तो सुपारी पर मौली लपेटकर अक्षत की ढेरी पर रखें और उसकी गणेश जी के रूप में पूजा करें। गणेश जी की तस्वीर या कोई साफ़ छपा चित्र भी चल जाता है। कुछ न हो तो दीपक के सामने बैठकर बारह नामों का स्मरण भी पूरी पूजा है।
गीता प्रेस पद्म पुराण और कार्तिक-माहात्म्य के हवाले से लिखती है कि तुलसी से गणेश जी की पूजा नहीं की जाती; इसके पीछे पुराणों में कथाएँ कही जाती हैं। तुलसी की जगह दूर्वा चढ़ाएँ। अनजाने में तुलसी चढ़ गई हो तो चिंता न करें; उसे आदर से हटा दें।
21 दूर्वा का चलन गणेश पुराण से आया है, पर यह कोई कठोर नियम नहीं। जितनी दूर्वा मिलें, उतनी श्रद्धा से चढ़ाएँ। फुनगी में तीन या पाँच पत्तियाँ हों और दूर्वा साफ़ धुली हो, इतना काफ़ी है।
हाथ जोड़कर "वक्रतुण्ड महाकाय" श्लोक पढ़ें, या केवल "श्री गणेशाय नमः" कहें। परीक्षा, यात्रा, नया काम, गृह प्रवेश, हर बार यही काफ़ी है। चाहें तो उस दिन गणेश जी के सामने एक दीपक जला दें।
हाँ, गणेश पूजा बच्चों के लिए पूजा सीखने की सबसे आसान शुरुआत है। वे दूर्वा गिन सकते हैं, फूल चढ़ा सकते हैं, आरती में घंटी बजा सकते हैं और "वक्रतुण्ड महाकाय" याद कर सकते हैं। परीक्षा से पहले बच्चे के साथ बैठकर दो मिनट का गणेश स्मरण उसे शांत भी करता है।
घरों में बाईं ओर मुड़ी सूँड़ वाली मूर्ति ज़्यादा रखी जाती है, और दाईं ओर सूँड़ वाली मूर्ति के लिए कई जगह विशेष नियमों की मान्यता है। यह परंपरा की बात है; इसे लेकर डरने की ज़रूरत नहीं। जो मूर्ति आपके घर में है, उसकी श्रद्धा से नियमित पूजा करें।
नहीं, पूजा व्रत के बिना भी पूरी है। गणेश जी के मासिक व्रत चतुर्थी के हैं: विनायक चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी। व्रत रखें तो अपनी सेहत के अनुसार; बीमारी, गर्भावस्था या नियमित दवा में कठोर व्रत न रखें।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।