गणेश

स्तोत्र · गणेश · स्तोत्र

गणेश पञ्चरत्नम्

"मुदाकरात्तमोदकं" से शुरू होने वाला गणेश जी का स्तोत्र, जिसे शंकराचार्य की रचना माना जाता है: पाँच श्लोक और एक फलश्रुति, अर्थ सहित।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

मुदाकरात्तमोदकं सदाविमुक्तिसाधकंकलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम् ।अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकंनताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम् ॥१॥

mudākarāttamodakaṃ sadāvimuktisādhakaṃ
kalādharāvataṃsakaṃ vilāsilokarakṣakam |
anāyakaikanāyakaṃ vināśitebhadaityakaṃ
natāśubhāśunāśakaṃ namāmi taṃ vināyakam ||

अर्थ: जिन्होंने आनंद से हाथ में मोदक लिया है, जो सदा मुक्ति के साधन हैं, जिनके मस्तक का आभूषण चंद्रमा है, जो आनंद में रहने वाले लोकों की रक्षा करते हैं; जिनका कोई स्वामी नहीं पर जो सबके एकमात्र स्वामी हैं, जिन्होंने गजासुर का नाश किया और जो प्रणाम करने वालों का अशुभ शीघ्र नष्ट करते हैं, उन विनायक को मैं नमस्कार करता हूँ।

मुदाकरात्तमोदकं
आनंद से हाथ में मोदक लिए
सदाविमुक्तिसाधकं
सदा मुक्ति के साधन
कलाधरावतंसकं
चंद्रमा जिनका शिरोभूषण है
अनायकैकनायकं
जिनका कोई स्वामी नहीं, पर जो सबके एक स्वामी हैं
विनाशितेभदैत्यकं
जिन्होंने गज रूपी दैत्य का नाश किया
नताशुभाशुनाशकं
प्रणाम करने वालों के अशुभ को शीघ्र मिटाने वाले

नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरंनमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम् ।सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरंमहेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥२॥

natetarātibhīkaraṃ navoditārkabhāsvaraṃ
namatsurārinirjaraṃ natādhikāpaduddharam |
sureśvaraṃ nidhīśvaraṃ gajeśvaraṃ gaṇeśvaraṃ
maheśvaraṃ tamāśraye parātparaṃ nirantaram ||

अर्थ: जो प्रणाम न करने वाले उद्दंडों के लिए बहुत भयानक हैं, जो उगते सूर्य की तरह चमकते हैं, जिन्हें असुर और देवता दोनों प्रणाम करते हैं, जो भक्तों को बड़ी विपत्तियों से उबारते हैं; जो देवताओं, निधियों, गजों और गणों के ईश्वर हैं, उन परात्पर महेश्वर (गणेश) का मैं निरंतर आश्रय लेता हूँ।

नतेतर
जो प्रणाम नहीं करते
अतिभीकरं
अत्यंत भयानक
नवोदितार्कभास्वरं
उगते सूर्य जैसे तेजस्वी
सुरारिनिर्जरं
असुर और देवता
आपदुद्धरम्
विपत्ति से उबारने वाले
परात्परं
श्रेष्ठों से भी श्रेष्ठ

समस्तलोकशङ्करं निरस्तदैत्यकुञ्जरंदरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम् ।कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करंमनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥३॥

samastalokaśaṅkaraṃ nirastadaityakuñjaraṃ
daretarodaraṃ varaṃ varebhavaktramakṣaram |
kṛpākaraṃ kṣamākaraṃ mudākaraṃ yaśaskaraṃ
manaskaraṃ namaskṛtāṃ namaskaromi bhāsvaram ||

अर्थ: जो सब लोकों का कल्याण करते हैं, जिन्होंने दैत्य रूपी हाथी को हटाया, जिनका उदर बड़ा है, जो श्रेष्ठ हैं, जिनका मुख श्रेष्ठ हाथी का है और जो अविनाशी हैं; जो कृपा, क्षमा, आनंद और यश देते हैं और नमस्कार करने वालों को सुबुद्धि देते हैं, उन तेजस्वी गणेश को मैं नमस्कार करता हूँ।

समस्तलोकशङ्करं
सब लोकों का कल्याण करने वाले
दरेतरोदरं
जिनका उदर छोटा नहीं, बड़ा है
वरेभवक्त्रम्
श्रेष्ठ हाथी के मुख वाले
अक्षरम्
अविनाशी
मनस्करं नमस्कृतां
नमस्कार करने वालों को सुबुद्धि देने वाले
भास्वरम्
तेजस्वी

अकिञ्चनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्तिभाजनंपुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम् ।प्रपञ्चनाशभीषणं धनञ्जयादिभूषणंकपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम् ॥४॥

akiñcanārtimārjanaṃ cirantanoktibhājanaṃ
purāripūrvanandanaṃ surārigarvacarvaṇam |
prapañcanāśabhīṣaṇaṃ dhanañjayādibhūṣaṇaṃ
kapoladānavāraṇaṃ bhaje purāṇavāraṇam ||

अर्थ: जो दीन-अकिंचन लोगों के दुःख पोंछ देते हैं, जिनकी स्तुति प्राचीन वचनों (वेदों) में है, जो त्रिपुरारि शिव के पहले पुत्र हैं, जो देवताओं के शत्रुओं का घमंड चूर करते हैं; जो प्रलय के समय भयंकर हैं, धनञ्जय आदि नाग जिनके आभूषण हैं और जिनके कपोलों से मद बहता है, उन पुरातन गजराज गणेश को मैं भजता हूँ।

अकिञ्चनार्तिमार्जनं
दीनों के दुःख मिटाने वाले
चिरन्तनोक्तिभाजनं
प्राचीन वचनों के पात्र
पुरारिपूर्वनन्दनं
शिव के ज्येष्ठ पुत्र
सुरारिगर्वचर्वणम्
असुरों का घमंड चूर करने वाले
धनञ्जयादिभूषणं
धनञ्जय आदि नाग जिनके आभूषण हैं
पुराणवारणम्
पुरातन गजराज

नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजंअचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम् ।हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनांतमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥५॥

nitāntakāntadantakāntimantakāntakātmajaṃ
acintyarūpamantahīnamantarāyakṛntanam |
hṛdantare nirantaraṃ vasantameva yogināṃ
tamekadantameva taṃ vicintayāmi santatam ||

अर्थ: जिनके दाँत की कांति अत्यंत सुंदर है, जो यम का भी अंत करने वाले शिव के पुत्र हैं, जिनका रूप अचिंत्य और अनंत है, जो विघ्नों को काट देते हैं, और जो योगियों के हृदय में सदा निवास करते हैं, उन्हीं एकदन्त का मैं निरंतर चिंतन करता हूँ।

नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तं
अत्यंत सुंदर दाँत की कांति वाले
अन्तकान्तकात्मजं
अंतक (यम) का अंत करने वाले शिव के पुत्र
अचिन्त्यरूपम्
जिनके रूप की कल्पना न हो सके
अन्तरायकृन्तनम्
विघ्नों को काटने वाले
हृदन्तरे
हृदय के भीतर
विचिन्तयामि सन्ततम्
निरंतर चिंतन करता हूँ

महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहंप्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतांसमाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात् ॥६॥

mahāgaṇeśapañcaratnamādareṇa yo’nvahaṃ
prajalpati prabhātake hṛdi smaran gaṇeśvaram |
arogatāmadoṣatāṃ susāhitīṃ suputratāṃ
samāhitāyuraṣṭabhūtimabhyupaiti so’cirāt ||

अर्थ: जो हर दिन सुबह हृदय में गणेश जी का स्मरण करते हुए इस महागणेश पञ्चरत्न को आदर से पढ़ता है, वह शीघ्र ही निरोगता, निर्दोषता, अच्छी विद्या-वाणी, अच्छी संतान, लंबी आयु और आठ प्रकार के ऐश्वर्य पाता है, ऐसा यह श्लोक कहता है।

आदरेण
आदर से
अन्वहं
हर दिन
प्रभातके
सुबह
अरोगताम्
निरोगता
सुसाहितीं
अच्छी विद्या और वाणी
अष्टभूतिम्
आठ प्रकार के ऐश्वर्य
अचिरात्
शीघ्र

इति श्रीशङ्करभगवतः कृतौ श्रीगणेशपञ्चरत्नस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

iti śrīśaṅkarabhagavataḥ kṛtau śrīgaṇeśapañcaratnastotraṃ sampūrṇam ||

अर्थ: इस प्रकार श्री शंकर भगवत्पाद की रचना श्री गणेश पञ्चरत्न स्तोत्र पूरा हुआ।

कृतौ
रचना में
सम्पूर्णम्
पूरा हुआ

परिचय

गणेश पञ्चरत्नम् "मुदाकरात्तमोदकं सदाविमुक्तिसाधकं" से शुरू होता है। "पञ्चरत्न" यानी पाँच रत्न: इसके पाँच श्लोक गणेश जी की स्तुति हैं और छठा श्लोक फलश्रुति है।

इसकी हर पंक्ति छोटे-बड़े अक्षरों की एक बराबर लय (पञ्चचामर छंद) में चलती है, इसलिए यह गाने में बहुत मधुर लगता है। परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है और स्तोत्र स्वयं सुबह पढ़ने की बात कहता है।

भावार्थ

पाँचों श्लोकों में गणेश जी के अलग-अलग पहलू हैं। पहले में उनका प्यारा रूप है: हाथ में मोदक, माथे पर चंद्रमा, और भक्तों का अशुभ मिटाने वाला स्वभाव। दूसरे और तीसरे में उनकी महिमा है: वे देवताओं और गणों के ईश्वर हैं, कृपा और क्षमा देते हैं, और नमस्कार करने वाले को सुबुद्धि देते हैं।

चौथे श्लोक में वे शिव के ज्येष्ठ पुत्र और दीनों के दुःख मिटाने वाले हैं, और पाँचवें में वे अचिंत्य, अनंत और विघ्नों को काटने वाले एकदन्त हैं, जो योगियों के हृदय में बसते हैं। स्तोत्र बाहर के रूप से शुरू होकर भीतर के ध्यान तक ले जाता है: अंत में भक्त कहता है कि मैं उन्हीं का निरंतर चिंतन करता हूँ।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि जो रोज़ सुबह गणेश जी का स्मरण करते हुए इसे आदर से पढ़ता है, उसे निरोगता, निर्दोषता, विद्या, अच्छी संतान, लंबी आयु और आठ प्रकार के ऐश्वर्य मिलते हैं। यह स्तोत्र का अपना वचन है।

महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं
प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां
समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात् ॥

जो हर दिन सुबह हृदय में गणेश जी का स्मरण करते हुए इस महागणेश पञ्चरत्न को आदर से पढ़ता है, वह शीघ्र ही निरोगता, निर्दोषता, अच्छी विद्या-वाणी, अच्छी संतान, लंबी आयु और आठ प्रकार के ऐश्वर्य पाता है, ऐसा यह श्लोक कहता है।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • रोज़ सुबह, जैसा स्तोत्र की फलश्रुति कहती है
  • गणेश चतुर्थी और विनायक चतुर्थी पर
  • बुधवार और संकष्टी चतुर्थी को
  • किसी शुभ काम की शुरुआत में

पढ़ने की विधि

  • सुबह स्नान के बाद गणेश जी के सामने दीप जलाकर बैठें।
  • हर पंक्ति की लय छोटे-बड़े अक्षरों के बदलने से बनती है; धीरे-धीरे, साफ़ उच्चारण से पढ़ें या गाएँ।
  • पाँचों श्लोक पढ़कर अंत में फलश्रुति का श्लोक पढ़ें और गणेश जी को प्रणाम करें।
पूरी विधिगणेश पूजा विधिघर में गणेश जी की सरल पूजा: बारह नामों से स्मरण, दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या लड्डू का भोग, आरती और तीन परिक्रमा। बुधवार, चतुर्थी और हर शुभ काम से पहले।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
श्लोक 1विलासिलोकरञ्जकम्sanskritdocuments.org कोष्ठक में यह दूसरा पाठ देता है: "आनंद में रहने वाले लोकों को प्रसन्न करने वाले"।
श्लोक 1विलासलोकरक्षकम्sa.wikisource.org का पाठ।
श्लोक 6प्रगायति प्रभातकेsanskritdocuments.org कोष्ठक में यह दूसरा पाठ देता है: "सुबह गाता है"।
श्लोक 6समीहितायुरष्टभूतिम्sa.wikisource.org का पाठ: "मनचाही आयु और आठ ऐश्वर्य"।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
आदि शंकराचार्य (परंपरा के अनुसार)
भाषा
संस्कृत

स्तोत्र का अंतिम वाक्य इसे "श्रीशङ्करभगवतः कृतौ" यानी शंकर भगवत्पाद की रचना बताता है और sa.wikisource.org भी इसे शंकराचार्य के नाम से देता है। यह परंपरा की मान्यता है, इसका स्वतंत्र प्रमाण नहीं मिलता।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और sa.wikisource.org तथा vignanam.org से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया। तीनों स्रोत लगभग एक-से हैं। sanskritdocuments.org के कोष्ठक वाले पाठ और sa.wikisource.org के दो अलग शब्द पाठ-भेद में दिए गए हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गणेश पञ्चरत्नम् किसकी रचना है?

स्तोत्र का अंतिम वाक्य इसे शंकर भगवत्पाद की रचना बताता है और परंपरा इसे आदि शंकराचार्य का मानती है। इसका कोई स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता।

इसे "पञ्चरत्न" क्यों कहते हैं?

इसमें स्तुति के पाँच श्लोक हैं, जिन्हें पाँच रत्न कहा गया है। छठा श्लोक फलश्रुति है।

इसे कब पढ़ें?

स्तोत्र स्वयं सुबह (प्रभातके) पढ़ने की बात कहता है। गणेश चतुर्थी, बुधवार या किसी भी दिन श्रद्धा से पढ़ सकते हैं।

"विनाशितेभदैत्यकं" का क्या अर्थ है?

इभ यानी हाथी। जिन्होंने हाथी रूपी दैत्य (गजासुर) का नाश किया, वे विनाशितेभदैत्यक हैं।

इसकी लय इतनी अलग क्यों लगती है?

यह पञ्चचामर छंद में है, जिसमें हर पंक्ति में छोटे और बड़े अक्षर बारी-बारी से आते हैं। इसी से इसकी चलती हुई, संगीत जैसी लय बनती है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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