दुर्गा चालीसा
दुर्गा · चालीसा
रोज़ की पूजा में पाठ

पूजा विधि · दुर्गा · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।
यह पन्ना नवरात्रि के नौ दिनों में घर में रोज़ होने वाली माँ दुर्गा की पूजा बताता है, जो साल के किसी और दिन, जैसे मंगलवार, शुक्रवार या दुर्गाष्टमी पर भी की जा सकती है। पहले दिन की घटस्थापना (कलश-स्थापना और जौ बोना) का अपना मुहूर्त और विधि है, जो इस पन्ने में विस्तार से नहीं है। दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ (कवच, अर्गला, कीलक और न्यास सहित), संधि पूजा, हवन, बंगाल की पंडाल वाली दुर्गा पूजा, और दीक्षा से जुड़ी शक्ति साधनाएँ भी अलग विधियाँ हैं, जिन्हें किसी जानकार आचार्य के साथ करना ठीक है।
नवरात्रि के नौ दिन माँ दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित हैं: शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक। इन दिनों घर में रोज़ सुबह पूजा और सुबह-शाम आरती होती है। पहले दिन बहुत-से घरों में कलश और जौ स्थापित किए जाते हैं और कई घरों में नौ दिन अखंड ज्योति जलती है; उसके बाद हर दिन की पूजा लगभग एक जैसी रहती है, केवल उस दिन की देवी का स्मरण बदलता है।
यहाँ वही रोज़ की पूजा दी गई है, गीता प्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश की दुर्गा-पूजा के आधार पर, घर के लिए छोटी की हुई। माँ को लाल रंग प्रिय माना जाता है: लाल चुनरी, लाल फूल और कुमकुम। व्रत अपनी सेहत के अनुसार रखें; माँ की पूजा व्रत के बिना भी पूरी है, और एक दीपक के सामने सच्चे मन से लिया गया माँ का नाम भी पूरी पूजा है।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| माँ दुर्गा की तस्वीर या मूर्ति | पूजा का केंद्र | वैकल्पिक | न हो तो कलश या दीपक को माँ का रूप मानकर पूजा करें। |
| दीपक | रोज़ की पूजा और आरती | वैकल्पिक | घी या तेल, जो हो। |
| अखंड ज्योति | नौ दिन लगातार जलने वाला दीपक | परंपरा-विशेष | तभी जलाएँ जब नौ दिन देखभाल हो सके। बीच में बुझ जाए तो फिर से जला दें; घबराने की बात नहीं। |
| लाल चुनरी | माँ को ओढ़ाने के लिए | वैकल्पिक | कोई भी साफ़ लाल कपड़ा, या मौली का एक धागा। |
| लाल फूल | गुड़हल, गुलाब, कनेर; गीता प्रेस के अनुसार सभी लाल फूल और सुगंधित सफ़ेद फूल भगवती को प्रिय हैं | वैकल्पिक | जो ताज़े फूल मिलें। |
| कुमकुम, रोली या सिंदूर | तिलक और अर्पण | वैकल्पिक | न हो तो हल्दी। |
| अक्षत | कुमकुम में रँगे साबुत चावल | वैकल्पिक | न हों तो छोड़ दें। |
| बेलपत्र | गीता प्रेस और द्रिक पंचांग, दोनों की दुर्गा-पूजा में बेलपत्र चढ़ाया जाता है | वैकल्पिक | न मिले तो छोड़ दें। |
| सिंगार की चीज़ें: चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहँदी, काजल, आलता | माँ को सुहाग का सामान चढ़ाने की परंपरा | परंपरा-विशेष | कई सुहागिन महिलाएँ किसी एक दिन, अक्सर अष्टमी को, चढ़ाती हैं; ज़रूरी नहीं। |
| कलश और जौ (जवारे) | पहले दिन की घटस्थापना; रोज़ उस पर जल-फूल | परंपरा-विशेष | घटस्थापना न हुई हो तो यह हिस्सा छोड़ दें। |
| नारियल | कलश पर, या माँ को अर्पण | परंपरा-विशेष | ज़रूरी नहीं। |
| नैवेद्य | फल, मिश्री, खीर, और अष्टमी-नवमी को हलवा-पूरी-चना | वैकल्पिक | व्रत वाले घरों में फलाहारी भोग; थोड़ी मिश्री भी काफ़ी। |
| धूप और कपूर | सुगंध और आरती | वैकल्पिक | घी के दीपक से भी आरती होती है। |
| दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती की पुस्तक | पाठ | वैकल्पिक | याद हो तो बिना पुस्तक के। |
नवरात्रि में संकल्प आम तौर पर पहले दिन नौ दिनों के लिए एक साथ लिया जाता है: कितने दिन व्रत, कौन-सा पाठ, अखंड ज्योति या नहीं। रोज़ की पूजा में छोटा संकल्प दोहराया जाता है।
हे माँ दुर्गा, नवरात्रि के [पहले/दूसरे/...] दिन मैं [अपना नाम] अपने परिवार के साथ आपके [दिन की देवी का नाम] रूप की पूजा अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार कर रहा/रही हूँ। हमें भीतर का साहस, आपस में प्रेम और सही राह पर चलने की शक्ति दें।
पहले दिन का संकल्प सोच-समझकर लें; उतना ही लें जितना सेहत और घर के कामों के साथ निभ सके। विस्तृत पूजा का संस्कृत संकल्प पुरोहित बोलते हैं।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
अर्थ: हे नारायणी, आप सब मंगलों में भी मंगल हैं, कल्याण करने वाली शिवा हैं, सब कामों को पूरा करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं; आपको नमस्कार।
स्रोत: दुर्गा सप्तशती (अध्याय 11) का श्लोक; द्रिक पंचांग की दुर्गा पूजा विधि इसी से ध्यान और आवाहन करती है।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
अर्थ: पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्मांडा, पाँचवीं स्कंदमाता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी और नौवीं सिद्धिदात्री: ये नवदुर्गा कही गई हैं।
ॐ श्रीदुर्गायै नमः। स्नानार्थं जलं समर्पयामि॥
ॐ श्रीदुर्गायै नमः। वस्त्रं समर्पयामि॥
अर्थ: श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं स्नान के लिए जल अर्पित करता/करती हूँ। श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं वस्त्र अर्पित करता/करती हूँ।
स्रोत: हर उपचार को देवता के नाम-मंत्र के साथ "समर्पयामि" कहकर अर्पित करने का प्रचलित ढंग। गीता प्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश कहती है कि जो श्लोक न पढ़ सकें वे नाम-मंत्र से पूजा करें; उसकी पञ्चदेव-पूजा में दुर्गा जी का नाम-मंत्र "ॐ श्रीदुर्गायै नमः" है, और उपचार-वाक्य उसकी दुर्गा-पूजा और द्रिक पंचांग की दुर्गा पूजा विधि के अनुसार हैं।
ॐ श्रीदुर्गायै नमः। कुङ्कुमं समर्पयामि॥
ॐ श्रीदुर्गायै नमः। अक्षतान् समर्पयामि॥
अर्थ: श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं कुमकुम अर्पित करता/करती हूँ। श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं अक्षत अर्पित करता/करती हूँ।
स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; उपचार-वाक्य द्रिक पंचांग की दुर्गा पूजा विधि के अनुसार।
ॐ श्रीदुर्गायै नमः। पुष्पाणि समर्पयामि॥
ॐ श्रीदुर्गायै नमः। बिल्वपत्राणि समर्पयामि॥
अर्थ: श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं फूल अर्पित करता/करती हूँ। श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं बेलपत्र अर्पित करता/करती हूँ।
स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस और द्रिक पंचांग, दोनों की दुर्गा-पूजा में बेलपत्र का उपचार है।
ॐ श्रीदुर्गायै नमः। धूपमाघ्रापयामि॥
ॐ श्रीदुर्गायै नमः। दीपं दर्शयामि॥
ॐ श्रीदुर्गायै नमः। नैवेद्यं निवेदयामि॥
अर्थ: श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं धूप की सुगंध अर्पित करता/करती हूँ, दीपक की ज्योति दिखाता/दिखाती हूँ, और यह भोग निवेदन करता/करती हूँ।
स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश और द्रिक पंचांग की दुर्गा पूजा विधि के उपचार-वाक्य।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थ: जो देवी सब प्राणियों में माँ के रूप में स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, नमस्कार, बार-बार नमस्कार।
दुर्गा · चालीसा
रोज़ की पूजा में पाठ
दुर्गा · स्तुति · संस्कृत
पाठ और नमस्कार में
नवदुर्गा, दुर्गा · श्लोक · संस्कृत
दिन की देवी के स्मरण में
दुर्गा · स्तोत्र · संस्कृत
अष्टमी और नवमी की पूजा में
दुर्गा · स्तोत्र · संस्कृत
नवरात्रि के अंत में क्षमा-प्रार्थना के साथ
कुछ परंपराओं में नौ दिनों के लिए अलग-अलग भोग बताए जाते हैं; घर में जो सात्विक भोग बने, वही माँ को अर्पित करें। भोग प्याज़-लहसुन के बिना बनाया जाता है। कन्या पूजन का भोजन भी यही प्रसाद है।
हे माँ दुर्गा, इन नौ दिनों में आपने अपने घर बुलाया, इसके लिए आभार। हमें भीतर के डर, आलस और क्रोध से लड़ने की शक्ति दें। घर की हर स्त्री और हर बच्ची का सम्मान बना रहे, और हम दूसरों की रक्षा कर सकें। पूजा में जो कमी रही हो, उसे क्षमा करें।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि॥
अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम्।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि॥
अर्थ: हे परमेश्वरी, न मैं आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न पूजा की विधि; मुझे क्षमा करें। अनजाने में, भूल से या भ्रम से पूजा में जो कुछ कम या ज़्यादा हुआ हो, हे देवी, वह सब क्षमा करें और प्रसन्न हों।
स्रोत: दुर्गा सप्तशती के अंत की क्षमा-प्रार्थना के श्लोक 2 और 6, द्रिक पंचांग के पाठ के अनुसार।
दुर्गा · आरती
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
दुर्गा · स्तोत्र · संस्कृत
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्
दुर्गा · स्तोत्र · संस्कृत
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): Daily Navratri puja built on the Gita Press Nityakarma-Pujaprakash Durga-puja-vidhan (east-facing seat, pushpanjali in place of avahan for an installed image, upachara order) with the Panchadeva name-mantra "ॐ श्रीदुर्गायै नमः"; the "मातृरूपेण" namaskar verse as printed there. Devi's flowers (all red, fragrant white), the durva contradiction, one pradakshina and lamp placement from the same book (two OCR copies). Dhyana verse "सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये" and the kumkum/bilva/vastra upacharas from Drik Panchang's Durga puja vidhi; kshama verses 2 and 6 from Drik's Durga Saptashati kshama-prarthana, quoted verbatim. Navdurga lines quoted from the navdurga-shloka work as it stands. Ghatasthapana is left to the festival pages; Saptashati path, sandhi puja and havan are named as separate practices. Kanya pujan written with consent and comfort of the girls in mind.
हाँ। बहुत-से घर कलश स्थापित नहीं करते और रोज़ केवल माँ की तस्वीर के सामने दीपक, फूल, पाठ और आरती करते हैं। यह पूरी तरह मान्य है। घटस्थापना करनी हो तो पहले दिन के मुहूर्त में करें; यहीं के नवरात्रि वाले पन्ने तारीख़ बताते हैं।
शांत मन से उसे फिर से जला दें और माँ से प्रार्थना कर लें। हवा, कम घी या बाती की वजह से ऐसा हो जाता है; इसे अपशकुन मानकर डरने की ज़रूरत नहीं। आगे के लिए दीपक को हवा से बचाकर रखें और बाती-घी समय पर देखते रहें।
व्रत पूजा का ज़रूरी हिस्सा नहीं है। कई लोग केवल पहले और आख़िरी दिन व्रत रखते हैं, कई एक समय भोजन करते हैं, और कई बिना व्रत के रोज़ पूजा करते हैं। बीमारी, गर्भावस्था, नियमित दवा या बुढ़ापे में कठोर व्रत न रखें; माँ की पूजा और नाम-स्मरण पूरे हैं।
इस पर परिवारों की रीतियाँ अलग हैं। कई घरों में इन दिनों मूर्ति और कलश छूने से विराम लिया जाता है और रोज़ की पूजा, ज्योति और भोग कोई और सदस्य संभालता है; कई घर ऐसा नहीं मानते। मन में माँ का नाम, प्रार्थना और आरती सुनना आम तौर पर हर स्थिति में होता है। अपने घर की रीति और अपनी सुविधा के अनुसार चलें; इसमें अपराध-बोध की कोई बात नहीं।
नहीं। दुर्गा सप्तशती का पाठ एक बड़ी साधना है जिसकी अपनी विधि है, और जो इसे सीखकर करते हैं वे नौ दिनों में इसे पूरा करते हैं। घर की रोज़ की पूजा के लिए दुर्गा चालीसा, "या देवी सर्वभूतेषु" या केवल आरती भी पूरी है।
नौ कन्याओं का चलन सबसे प्रचलित है, और कई घरों में साथ में एक बालक भी। पर संख्या से ज़्यादा ज़रूरी आदर है: एक, दो या तीन कन्याएँ भी काफ़ी हैं। कन्याएँ न मिलें तो घर की बेटियों के साथ, या किसी ज़रूरतमंद बच्ची की मदद करके भी यही भाव पूरा होता है।
कलश या केवल एक दीपक को माँ का रूप मानकर उसके सामने यही क्रम रखें। मंदिर जाकर दर्शन करना और घर में आरती गाना भी इसी पूजा का रूप है।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।