दुर्गा

पूजा विधि · दुर्गा · रोज़ की पूजा

दुर्गा पूजा विधि

नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।

इस पेज पर
  1. परिचय
  2. एक नज़र में
  3. कब करें
  4. सामग्री
  5. तैयारी
  6. चित्र या मूर्ति
  7. संकल्प
  8. चरण-दर-चरण विधि
  9. पाठ
  10. भोग
  11. समापन
  12. छोटी विधि
  13. परंपराओं में अंतर
  14. ये भी पढ़ें
  15. स्रोत
  16. सवाल-जवाब
  17. सुधार सुझाएँ
रोज़ की पूजा

यह पन्ना नवरात्रि के नौ दिनों में घर में रोज़ होने वाली माँ दुर्गा की पूजा बताता है, जो साल के किसी और दिन, जैसे मंगलवार, शुक्रवार या दुर्गाष्टमी पर भी की जा सकती है। पहले दिन की घटस्थापना (कलश-स्थापना और जौ बोना) का अपना मुहूर्त और विधि है, जो इस पन्ने में विस्तार से नहीं है। दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ (कवच, अर्गला, कीलक और न्यास सहित), संधि पूजा, हवन, बंगाल की पंडाल वाली दुर्गा पूजा, और दीक्षा से जुड़ी शक्ति साधनाएँ भी अलग विधियाँ हैं, जिन्हें किसी जानकार आचार्य के साथ करना ठीक है।

परिचय

नवरात्रि के नौ दिन माँ दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित हैं: शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक। इन दिनों घर में रोज़ सुबह पूजा और सुबह-शाम आरती होती है। पहले दिन बहुत-से घरों में कलश और जौ स्थापित किए जाते हैं और कई घरों में नौ दिन अखंड ज्योति जलती है; उसके बाद हर दिन की पूजा लगभग एक जैसी रहती है, केवल उस दिन की देवी का स्मरण बदलता है।

यहाँ वही रोज़ की पूजा दी गई है, गीता प्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश की दुर्गा-पूजा के आधार पर, घर के लिए छोटी की हुई। माँ को लाल रंग प्रिय माना जाता है: लाल चुनरी, लाल फूल और कुमकुम। व्रत अपनी सेहत के अनुसार रखें; माँ की पूजा व्रत के बिना भी पूरी है, और एक दीपक के सामने सच्चे मन से लिया गया माँ का नाम भी पूरी पूजा है।

एक नज़र में

समय
नवरात्रि में रोज़ सुबह, और सुबह-शाम आरती; मंगलवार, शुक्रवार और अष्टमी को भी
अवधि
लगभग 20 से 30 मिनट; दुर्गा सप्तशती का पाठ करें तो अधिक
कौन कर सकता है
घर का कोई भी सदस्य; आरती में पूरा परिवार
मुख्य सामग्री
दीपक, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, अक्षत, सिंगार की चीज़ें, फल और मिठाई
आरती
जय अम्बे गौरी

पूजा कब करें

  • साल में दो बड़ी नवरात्रियाँ हैं: चैत्र नवरात्रि (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से) और शारदीय नवरात्रि (आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से)। यहीं के चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि वाले पन्नों पर हर साल की तारीख़ें हैं। माघ और आषाढ़ की गुप्त नवरात्रियाँ साधना-प्रधान मानी जाती हैं।
  • पूजा रोज़ सुबह स्नान के बाद, और आरती सुबह-शाम दोनों समय। जहाँ घटस्थापना हुई हो, वहाँ रोज़ की पूजा उसी कलश और ज्योति के सामने होती है।
  • हर दिन एक देवी का स्मरण: पहले दिन शैलपुत्री, फिर ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और नौवें दिन सिद्धिदात्री।
  • अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन करके कई घरों में नवरात्रि का व्रत पूरा किया जाता है; यहीं का दुर्गा अष्टमी वाला पन्ना इसकी तारीख़ बताता है। नवरात्रि के अलावा मंगलवार, शुक्रवार और हर महीने की दुर्गाष्टमी पर भी यही पूजा की जा सकती है।

पूजा सामग्री

  • आवश्यक इसके बिना यह विधि नहीं होती
  • वैकल्पिक हो तो अच्छा; न हो तो विकल्प दिया है
  • परंपरा-विशेष कुछ परंपराओं में ही
सामग्रीउपयोगस्थितिविकल्प / टिप्पणी
माँ दुर्गा की तस्वीर या मूर्तिपूजा का केंद्रवैकल्पिकन हो तो कलश या दीपक को माँ का रूप मानकर पूजा करें।
दीपकरोज़ की पूजा और आरतीवैकल्पिकघी या तेल, जो हो।
अखंड ज्योतिनौ दिन लगातार जलने वाला दीपकपरंपरा-विशेषतभी जलाएँ जब नौ दिन देखभाल हो सके। बीच में बुझ जाए तो फिर से जला दें; घबराने की बात नहीं।
लाल चुनरीमाँ को ओढ़ाने के लिएवैकल्पिककोई भी साफ़ लाल कपड़ा, या मौली का एक धागा।
लाल फूलगुड़हल, गुलाब, कनेर; गीता प्रेस के अनुसार सभी लाल फूल और सुगंधित सफ़ेद फूल भगवती को प्रिय हैंवैकल्पिकजो ताज़े फूल मिलें।
कुमकुम, रोली या सिंदूरतिलक और अर्पणवैकल्पिकन हो तो हल्दी।
अक्षतकुमकुम में रँगे साबुत चावलवैकल्पिकन हों तो छोड़ दें।
बेलपत्रगीता प्रेस और द्रिक पंचांग, दोनों की दुर्गा-पूजा में बेलपत्र चढ़ाया जाता हैवैकल्पिकन मिले तो छोड़ दें।
सिंगार की चीज़ें: चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहँदी, काजल, आलतामाँ को सुहाग का सामान चढ़ाने की परंपरापरंपरा-विशेषकई सुहागिन महिलाएँ किसी एक दिन, अक्सर अष्टमी को, चढ़ाती हैं; ज़रूरी नहीं।
कलश और जौ (जवारे)पहले दिन की घटस्थापना; रोज़ उस पर जल-फूलपरंपरा-विशेषघटस्थापना न हुई हो तो यह हिस्सा छोड़ दें।
नारियलकलश पर, या माँ को अर्पणपरंपरा-विशेषज़रूरी नहीं।
नैवेद्यफल, मिश्री, खीर, और अष्टमी-नवमी को हलवा-पूरी-चनावैकल्पिकव्रत वाले घरों में फलाहारी भोग; थोड़ी मिश्री भी काफ़ी।
धूप और कपूरसुगंध और आरतीवैकल्पिकघी के दीपक से भी आरती होती है।
दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती की पुस्तकपाठवैकल्पिकयाद हो तो बिना पुस्तक के।

स्थान और अपनी तैयारी

  • नवरात्रि से पहले घर और पूजा-स्थान की सफ़ाई कर लें। रोज़ स्नान के बाद साफ़ कपड़े पहनकर पूजा करें।
  • जहाँ अखंड ज्योति जल रही हो, वह जगह हवा, परदों और बच्चों की पहुँच से सुरक्षित रहे; रात में भी कोई एक बार देख ले।
  • व्रत रखने वाले दिन में सात्विक फलाहार लेते हैं; पूजा के लिए भूखा रहना ज़रूरी नहीं।
  • गीता प्रेस की दुर्गा-पूजा आसन पर पूर्व की ओर मुँह करके बैठने को कहती है; घर की जगह के अनुसार उत्तर की ओर बैठना भी ठीक है।

चित्र या मूर्ति कैसे रखें

  • चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माँ दुर्गा की तस्वीर या मूर्ति रखें और उन्हें लाल चुनरी ओढ़ा दें।
  • जहाँ घटस्थापना हुई हो, वहाँ कलश माँ की तस्वीर के सामने या पास, और जौ का पात्र कलश के पास रहता है।
  • गीता प्रेस का सामान्य नियम है कि घी का दीपक दाईं ओर और तेल का दीपक बाईं ओर रखा जाए; अखंड ज्योति भी इसी के अनुसार रखी जा सकती है।
  • भोग माँ के सामने। दुर्गा सप्तशती या चालीसा की पुस्तक साफ़ कपड़े या छोटी चौकी पर रखें, ज़मीन पर नहीं।

संकल्प

नवरात्रि में संकल्प आम तौर पर पहले दिन नौ दिनों के लिए एक साथ लिया जाता है: कितने दिन व्रत, कौन-सा पाठ, अखंड ज्योति या नहीं। रोज़ की पूजा में छोटा संकल्प दोहराया जाता है।

हे माँ दुर्गा, नवरात्रि के [पहले/दूसरे/...] दिन मैं [अपना नाम] अपने परिवार के साथ आपके [दिन की देवी का नाम] रूप की पूजा अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार कर रहा/रही हूँ। हमें भीतर का साहस, आपस में प्रेम और सही राह पर चलने की शक्ति दें।

पहले दिन का संकल्प सोच-समझकर लें; उतना ही लें जितना सेहत और घर के कामों के साथ निभ सके। विस्तृत पूजा का संस्कृत संकल्प पुरोहित बोलते हैं।

पूजा की विधि, चरण-दर-चरण

  1. १दीपक या अखंड ज्योति

    क्या करें
    पूजा की शुरुआत दीपक जलाकर करें; अखंड ज्योति हो तो उसमें घी या तेल और बाती देख लें।
    कैसे करें
    रोज़ की पूजा का दीपक माँ की तस्वीर के सामने जलाएँ। अखंड ज्योति में ज़रूरत हो तो सावधानी से घी या तेल डालें, ताकि लौ न बुझे।
    भाव
    माँ की ज्योति घर में जलती रहे, मन में भी।
    विकल्प
    अखंड ज्योति न हो तो रोज़ पूजा के समय एक दीपक काफ़ी है।
  2. २आचमन, संकल्प और गणेश स्मरण

    क्या करें
    आचमन करें, संकल्प लें और गणेश जी को प्रणाम करें।
    कैसे करें
    दाहिनी हथेली में थोड़ा जल लेकर तीन बार पिएँ और हाथ धो लें। हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प बोलें। फिर "श्री गणेशाय नमः" कहकर प्रणाम करें।
    भाव
    माँ की पूजा से पहले उनके पुत्र का स्मरण।
    विकल्प
    जल्दी हो तो मन में संकल्प कर लें।
  3. ३कलश पूजन

    क्या करें
    घटस्थापना हुई हो तो कलश को प्रणाम करके उस पर जल के छींटे, रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएँ।
    कैसे करें
    कलश पर रोली-अक्षत लगाएँ, एक फूल चढ़ाएँ, और जौ के पात्र में ज़रूरत भर थोड़ा जल डालें, ताकि जवारे सूखें नहीं।
    भाव
    कलश में सब तीर्थ और माँ की शक्ति का वास माना जाता है।
    विकल्प
    कलश न हो तो यह चरण छोड़ दें।
  4. ४ध्यान और आवाहन

    क्या करें
    हाथ में फूल लेकर माँ दुर्गा का ध्यान करें और उन्हें पूजा में आने की प्रार्थना करें।
    कैसे करें
    आँखें बंद करके सिंह पर बैठी, हाथों में शंख, चक्र और आयुध लिए, प्रसन्न मुख वाली माँ का रूप मन में लाएँ। नीचे का श्लोक पढ़कर फूल माँ के चरणों में चढ़ा दें। गीता प्रेस के अनुसार प्रतिष्ठित मूर्ति हो तो आवाहन की जगह पुष्पांजलि दी जाती है।
    भाव
    माँ, आप सबका मंगल करने वाली हैं; मेरे घर पधारिए।
    पाठ

    सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
    शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

    अर्थ: हे नारायणी, आप सब मंगलों में भी मंगल हैं, कल्याण करने वाली शिवा हैं, सब कामों को पूरा करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं; आपको नमस्कार।

    स्रोत: दुर्गा सप्तशती (अध्याय 11) का श्लोक; द्रिक पंचांग की दुर्गा पूजा विधि इसी से ध्यान और आवाहन करती है।

    विकल्प
    श्लोक कठिन लगे तो "जय माता दी" या "ॐ श्रीदुर्गायै नमः" कहकर फूल चढ़ाएँ।
  5. ५दिन की देवी का स्मरण

    क्या करें
    आज नवरात्रि का जो दिन है, उस दिन की देवी का नाम लेकर प्रणाम करें।
    कैसे करें
    नौ रूपों के नाम वाला श्लोक पढ़ें और आज की देवी पर रुककर उनका ध्यान करें: पहले दिन शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, और इसी क्रम में नौवें दिन सिद्धिदात्री। चाहें तो उस दिन की देवी की कथा पढ़ें।
    भाव
    माँ एक हैं, रूप अनेक; आज इस रूप में।
    पाठ

    प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
    तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
    पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
    सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
    नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।

    अर्थ: पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्मांडा, पाँचवीं स्कंदमाता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी और नौवीं सिद्धिदात्री: ये नवदुर्गा कही गई हैं।

    प्रथमं शैलपुत्री च (नवदुर्गा के नौ नाम): पूरा पाठ और अर्थ

    विकल्प
    श्लोक न पढ़ सकें तो केवल उस दिन की देवी का नाम लेकर "माँ, आपको प्रणाम" कहें।
  6. ६जल, चुनरी और सिंगार

    क्या करें
    माँ को जल अर्पित करें, लाल चुनरी ओढ़ाएँ, और चाहें तो सिंगार की चीज़ें चढ़ाएँ।
    कैसे करें
    धातु की मूर्ति हो तो जल से स्नान कराकर पोंछ दें; तस्वीर हो तो जल के छींटे दें। फिर चुनरी ओढ़ाएँ। सिंगार चढ़ाना हो तो चूड़ी, बिंदी, सिंदूर आदि एक छोटी थाली में माँ के सामने रख दें।
    भाव
    माँ को सजाना, जैसे घर की बेटी को सजाते हैं।
    पाठ

    ॐ श्रीदुर्गायै नमः। स्नानार्थं जलं समर्पयामि॥
    ॐ श्रीदुर्गायै नमः। वस्त्रं समर्पयामि॥

    अर्थ: श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं स्नान के लिए जल अर्पित करता/करती हूँ। श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं वस्त्र अर्पित करता/करती हूँ।

    स्रोत: हर उपचार को देवता के नाम-मंत्र के साथ "समर्पयामि" कहकर अर्पित करने का प्रचलित ढंग। गीता प्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश कहती है कि जो श्लोक न पढ़ सकें वे नाम-मंत्र से पूजा करें; उसकी पञ्चदेव-पूजा में दुर्गा जी का नाम-मंत्र "ॐ श्रीदुर्गायै नमः" है, और उपचार-वाक्य उसकी दुर्गा-पूजा और द्रिक पंचांग की दुर्गा पूजा विधि के अनुसार हैं।

    विकल्प
    चुनरी न हो तो मौली का धागा; सिंगार रोज़ ज़रूरी नहीं।
  7. ७कुमकुम, सिंदूर और अक्षत

    क्या करें
    माँ को कुमकुम या सिंदूर का तिलक लगाएँ और कुमकुम में रँगे अक्षत चढ़ाएँ।
    कैसे करें
    अनामिका उंगली से तिलक लगाएँ। कलश पर भी एक तिलक लगा दें। फिर थोड़े अक्षत चढ़ाएँ।
    भाव
    माँ के मस्तक पर मंगल का रंग।
    पाठ

    ॐ श्रीदुर्गायै नमः। कुङ्कुमं समर्पयामि॥
    ॐ श्रीदुर्गायै नमः। अक्षतान् समर्पयामि॥

    अर्थ: श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं कुमकुम अर्पित करता/करती हूँ। श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं अक्षत अर्पित करता/करती हूँ।

    स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; उपचार-वाक्य द्रिक पंचांग की दुर्गा पूजा विधि के अनुसार।

    विकल्प
    कुमकुम न हो तो हल्दी।
  8. ८लाल फूल और बेलपत्र

    क्या करें
    लाल फूल, माला और बेलपत्र चढ़ाएँ।
    कैसे करें
    फूल ऊपर मुख करके चढ़ाएँ। गुड़हल माँ को विशेष प्रिय माना जाता है। गीता प्रेस के अनुसार जितने लाल फूल हैं, वे सब भगवती को प्रिय हैं, और सुगंधित सफ़ेद फूल भी।
    भाव
    मन का प्रेम, फूलों के रंग में।
    पाठ

    ॐ श्रीदुर्गायै नमः। पुष्पाणि समर्पयामि॥
    ॐ श्रीदुर्गायै नमः। बिल्वपत्राणि समर्पयामि॥

    अर्थ: श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं फूल अर्पित करता/करती हूँ। श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं बेलपत्र अर्पित करता/करती हूँ।

    स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस और द्रिक पंचांग, दोनों की दुर्गा-पूजा में बेलपत्र का उपचार है।

    विकल्प
    फूल न हों तो अक्षत, या मन से फूल।
  9. ९धूप, दीप और नैवेद्य

    क्या करें
    धूप दिखाएँ, दीपक की ज्योति अर्पित करें और भोग लगाएँ।
    कैसे करें
    धूप घुमाकर रख दें, फिर दीपक दिखाएँ और हाथ धो लें। भोग माँ के सामने रखकर उसके चारों ओर जल घुमाएँ और निवेदन करें, फिर आचमन के लिए एक बार जल चढ़ाएँ।
    भाव
    माँ पहले खाएँ, फिर बच्चे।
    पाठ

    ॐ श्रीदुर्गायै नमः। धूपमाघ्रापयामि॥
    ॐ श्रीदुर्गायै नमः। दीपं दर्शयामि॥
    ॐ श्रीदुर्गायै नमः। नैवेद्यं निवेदयामि॥

    अर्थ: श्री दुर्गा माँ को नमन; मैं धूप की सुगंध अर्पित करता/करती हूँ, दीपक की ज्योति दिखाता/दिखाती हूँ, और यह भोग निवेदन करता/करती हूँ।

    स्रोत: नाम-मंत्र के साथ उपचार अर्पित करने का प्रचलित ढंग; गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश और द्रिक पंचांग की दुर्गा पूजा विधि के उपचार-वाक्य।

    विकल्प
    भोग में थोड़ी मिश्री या एक फल भी काफ़ी है।
  10. १०पाठ

    क्या करें
    समय के अनुसार दुर्गा चालीसा, या दुर्गा सप्तशती से "या देवी सर्वभूतेषु" वाली स्तुति पढ़ें।
    कैसे करें
    दुर्गा चालीसा दस मिनट में हो जाती है। जो दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ करते हैं, वे उसकी अपनी विधि (कवच, अर्गला, कीलक) अलग से सीखकर करें। गीता प्रेस की दुर्गा-पूजा में नमस्कार नीचे के श्लोक से किया जाता है।
    भाव
    जो माँ सब प्राणियों में माँ बनकर बसी हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम।
    पाठ

    या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

    अर्थ: जो देवी सब प्राणियों में माँ के रूप में स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

    या देवी सर्वभूतेषु: पूरा पाठ और अर्थ

    विकल्प
    पाठ का समय न हो तो "ॐ दुं दुर्गायै नमः" या दुर्गा गायत्री मंत्र का कुछ देर जाप करें; कई परंपराओं में बीज मंत्र गुरु से लेकर जपे जाते हैं।
  11. ११आरती

    क्या करें
    सुबह और शाम "जय अम्बे गौरी" गाकर आरती करें।
    कैसे करें
    कपूर या घी के दीपक से आरती की थाली माँ के सामने घड़ी की सुई की दिशा में घुमाएँ, घंटी बजाएँ, परिवार साथ गाए।
    भाव
    नौ दिन, एक स्वर: जय माता दी।
    विकल्प
    आरती न आती हो तो दीपक घुमाते हुए "जय माता दी" बोलें।
    आरतीजय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरीपूरी माँ दुर्गा की आरती पढ़ें
  12. १२परिक्रमा, प्रणाम और क्षमा

    क्या करें
    माँ की एक परिक्रमा करें, प्रणाम करें और क्षमा-प्रार्थना पढ़ें।
    कैसे करें
    गीता प्रेस के अनुसार देवी की एक परिक्रमा की जाती है। जगह न हो तो अपने आसन पर ही घूमकर प्रणाम करें। फिर नीचे दी क्षमा-प्रार्थना पढ़ें।
    भाव
    माँ, बच्चे से भूल हो तो माँ ही क्षमा करती है।
    विकल्प
    बैठे-बैठे सिर झुकाकर प्रणाम करना भी पूरा प्रणाम है।
  13. १३अष्टमी या नवमी: कन्या पूजन

    क्या करें
    नवरात्रि के अंत में छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर आदर से भोजन कराएँ।
    कैसे करें
    कन्याओं के पैर धोकर आसन पर बिठाएँ, तिलक लगाएँ, हलवा-पूरी-चने का भोजन कराएँ, कोई छोटा उपहार दें और प्रणाम करें। कई घरों में नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भी बिठाया जाता है। बच्चियों की सुविधा का ध्यान रखें: ज़बरदस्ती बहुत न खिलाएँ, और उनके माता-पिता की सहमति से ही बुलाएँ।
    भाव
    हर बच्ची में माँ का रूप देखना।
    विकल्प
    पड़ोस में कन्याएँ न मिलें तो घर की बेटियों के साथ करें, या किसी ज़रूरतमंद बच्ची की पढ़ाई या भोजन में मदद करें।

पूजा में पढ़े जाने वाले पाठ

भोग

  • फल और मिश्री
  • खीर या दूध की मिठाई
  • हलवा, पूरी और काले चने, ख़ासकर अष्टमी-नवमी को
  • नारियल
  • व्रत वालों के लिए कुट्टू या सिंघाड़े के आटे का फलाहारी भोग

कुछ परंपराओं में नौ दिनों के लिए अलग-अलग भोग बताए जाते हैं; घर में जो सात्विक भोग बने, वही माँ को अर्पित करें। भोग प्याज़-लहसुन के बिना बनाया जाता है। कन्या पूजन का भोजन भी यही प्रसाद है।

प्रार्थना और समापन

हे माँ दुर्गा, इन नौ दिनों में आपने अपने घर बुलाया, इसके लिए आभार। हमें भीतर के डर, आलस और क्रोध से लड़ने की शक्ति दें। घर की हर स्त्री और हर बच्ची का सम्मान बना रहे, और हम दूसरों की रक्षा कर सकें। पूजा में जो कमी रही हो, उसे क्षमा करें।

क्षमा प्रार्थना

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि॥
अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम्।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि॥

अर्थ: हे परमेश्वरी, न मैं आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न पूजा की विधि; मुझे क्षमा करें। अनजाने में, भूल से या भ्रम से पूजा में जो कुछ कम या ज़्यादा हुआ हो, हे देवी, वह सब क्षमा करें और प्रसन्न हों।

स्रोत: दुर्गा सप्तशती के अंत की क्षमा-प्रार्थना के श्लोक 2 और 6, द्रिक पंचांग के पाठ के अनुसार।

पूजा के बाद

  • आरती के बाद सबको आरती दें और प्रसाद बाँटें।
  • रोज़ के फूल अगली सुबह उतारकर मिट्टी में डाल दें; अखंड ज्योति वाली जगह साफ़ रखें।
  • परंपरा में दीपक को फूँककर नहीं बुझाया जाता; नवरात्रि के बाद अखंड ज्योति को अपने-आप शांत होने दें।
  • नवमी या दशमी को जवारे आदर से उठाएँ; कई घरों में उन्हें सिर पर रखकर विसर्जित किया जाता है। उन्हें गमलों या बगीचे में डालें, और कलश का जल घर में छिड़ककर बाकी पौधों में डाल दें।
  • माँ की चुनरी पूजा-स्थान पर रख सकते हैं, या किसी सुहागिन या कन्या को आदर से दे सकते हैं।

समय कम हो तो: छोटी विधि

  1. स्नान करके दीपक या अखंड ज्योति देखें, संकल्प लें और गणेश जी को प्रणाम करें।
  2. कलश हो तो उस पर जल, रोली और फूल चढ़ाएँ।
  3. माँ का ध्यान करें और आज की नवदुर्गा का नाम लें।
  4. जल, लाल चुनरी, कुमकुम, अक्षत, लाल फूल और बेलपत्र अर्पित करें।
  5. धूप-दीप दिखाएँ और भोग लगाएँ।
  6. दुर्गा चालीसा या "या देवी सर्वभूतेषु" पढ़ें, फिर "जय अम्बे गौरी" से आरती।
  7. एक परिक्रमा, प्रणाम और क्षमा-प्रार्थना; अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन।

परंपराओं में अंतर

  • बंगाल, असम और ओडिशा में शारदीय नवरात्रि की षष्ठी से दशमी तक दुर्गा पूजा मुख्य रूप से पंडालों में होती है, जिसमें माँ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश जी और कार्तिकेय जी के साथ पूजी जाती हैं।
  • गुजरात में गरबा, उत्तर भारत में जवारे और रामलीला, दक्षिण भारत में गुड़ियों की सजावट (गोलू या बोम्मई कोलु), और कर्नाटक व दक्षिण के कई हिस्सों में नवमी को आयुध पूजा नवरात्रि का हिस्सा हैं।
  • कुछ घरों में अष्टमी को और कुछ में नवमी को कन्या पूजन होता है; कन्याओं की संख्या और उम्र की रीतियाँ भी अलग हैं।
  • दूर्वा: गीता प्रेस कार्तिक-माहात्म्य के हवाले से लिखती है कि दुर्गा जी की दूर्वा से पूजा न करें, फिर भी उसकी अपनी दुर्गा-पूजा विधि में दूर्वा चढ़ाने का उपचार है; घरों की रीतियाँ भी दोनों तरह की हैं।
  • परिक्रमा: गीता प्रेस के अनुसार देवी की एक परिक्रमा की जाती है, जबकि गणेश जी की तीन और शिव जी की आधी।
  • नवरात्रि के हर दिन के अलग रंग के कपड़े पहनने का चलन हाल के वर्षों में फैला है; यह शास्त्र का नियम नहीं, एक नई रीति है।

ये भी पढ़ें

माँ दुर्गा के लिए और

स्रोत और समीक्षा

  • गीता प्रेस, गोरखपुर: नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, दुर्गापूजा-विधान: पूर्व मुख बैठना; प्रतिष्ठित मूर्ति पर आवाहन की जगह पुष्पांजलि; उपचारों का क्रम; पञ्चदेव-पूजा का नाम-मंत्र "ॐ श्रीदुर्गायै नमः"; नाम-मंत्र से पूजा; "या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण" से नमस्कार; देवी के प्रिय लाल और सुगंधित सफ़ेद फूल; दूर्वा पर दोनों मत; देवी की एक परिक्रमा; घी और तेल के दीपक का स्थान।
  • गीता प्रेस: नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (दूसरी प्रति): देवी के फूलों के नियम इस साफ़ प्रति से मिलाए गए।
  • द्रिक पंचांग: दुर्गा पूजा विधि: "सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये" से ध्यान-आवाहन; कुमकुम, बेलपत्र और वस्त्र के उपचार-वाक्य।
  • द्रिक पंचांग: दुर्गा सप्तशती, क्षमा-प्रार्थना: क्षमा-प्रार्थना के श्लोक 2 और 6 का पाठ।
  • दैनिक भक्ति: नवरात्रि और माँ दुर्गा के मंत्र: नवरात्रि और दुर्गा अष्टमी की तारीख़ें; दुर्गा मंत्रों का पाठ यहीं के मंत्र पन्नों से।

समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): Daily Navratri puja built on the Gita Press Nityakarma-Pujaprakash Durga-puja-vidhan (east-facing seat, pushpanjali in place of avahan for an installed image, upachara order) with the Panchadeva name-mantra "ॐ श्रीदुर्गायै नमः"; the "मातृरूपेण" namaskar verse as printed there. Devi's flowers (all red, fragrant white), the durva contradiction, one pradakshina and lamp placement from the same book (two OCR copies). Dhyana verse "सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये" and the kumkum/bilva/vastra upacharas from Drik Panchang's Durga puja vidhi; kshama verses 2 and 6 from Drik's Durga Saptashati kshama-prarthana, quoted verbatim. Navdurga lines quoted from the navdurga-shloka work as it stands. Ghatasthapana is left to the festival pages; Saptashati path, sandhi puja and havan are named as separate practices. Kanya pujan written with consent and comfort of the girls in mind.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या घटस्थापना के बिना नवरात्रि की पूजा हो सकती है?

हाँ। बहुत-से घर कलश स्थापित नहीं करते और रोज़ केवल माँ की तस्वीर के सामने दीपक, फूल, पाठ और आरती करते हैं। यह पूरी तरह मान्य है। घटस्थापना करनी हो तो पहले दिन के मुहूर्त में करें; यहीं के नवरात्रि वाले पन्ने तारीख़ बताते हैं।

अखंड ज्योति बुझ जाए तो क्या करें?

शांत मन से उसे फिर से जला दें और माँ से प्रार्थना कर लें। हवा, कम घी या बाती की वजह से ऐसा हो जाता है; इसे अपशकुन मानकर डरने की ज़रूरत नहीं। आगे के लिए दीपक को हवा से बचाकर रखें और बाती-घी समय पर देखते रहें।

नौ दिन का व्रत न रख सकें तो?

व्रत पूजा का ज़रूरी हिस्सा नहीं है। कई लोग केवल पहले और आख़िरी दिन व्रत रखते हैं, कई एक समय भोजन करते हैं, और कई बिना व्रत के रोज़ पूजा करते हैं। बीमारी, गर्भावस्था, नियमित दवा या बुढ़ापे में कठोर व्रत न रखें; माँ की पूजा और नाम-स्मरण पूरे हैं।

मासिक धर्म के दिनों में नवरात्रि की पूजा कैसे करें?

इस पर परिवारों की रीतियाँ अलग हैं। कई घरों में इन दिनों मूर्ति और कलश छूने से विराम लिया जाता है और रोज़ की पूजा, ज्योति और भोग कोई और सदस्य संभालता है; कई घर ऐसा नहीं मानते। मन में माँ का नाम, प्रार्थना और आरती सुनना आम तौर पर हर स्थिति में होता है। अपने घर की रीति और अपनी सुविधा के अनुसार चलें; इसमें अपराध-बोध की कोई बात नहीं।

क्या दुर्गा सप्तशती का पाठ ज़रूरी है?

नहीं। दुर्गा सप्तशती का पाठ एक बड़ी साधना है जिसकी अपनी विधि है, और जो इसे सीखकर करते हैं वे नौ दिनों में इसे पूरा करते हैं। घर की रोज़ की पूजा के लिए दुर्गा चालीसा, "या देवी सर्वभूतेषु" या केवल आरती भी पूरी है।

कन्या पूजन में कितनी कन्याएँ बुलाएँ?

नौ कन्याओं का चलन सबसे प्रचलित है, और कई घरों में साथ में एक बालक भी। पर संख्या से ज़्यादा ज़रूरी आदर है: एक, दो या तीन कन्याएँ भी काफ़ी हैं। कन्याएँ न मिलें तो घर की बेटियों के साथ, या किसी ज़रूरतमंद बच्ची की मदद करके भी यही भाव पूरा होता है।

माँ की मूर्ति या तस्वीर न हो तो पूजा कैसे करें?

कलश या केवल एक दीपक को माँ का रूप मानकर उसके सामने यही क्रम रखें। मंदिर जाकर दर्शन करना और घर में आरती गाना भी इसी पूजा का रूप है।

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इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।

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