दुर्गा पूजा विधि
दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुतेगिरिवरविन्ध्यशिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१॥
ayi girinandini nanditamedini viśvavinodini nandinute
girivaravindhyaśirodhinivāsini viṣṇuvilāsini jiṣṇunute |
bhagavati he śitikaṇṭhakuṭumbini bhūrikuṭumbini bhūrikṛte
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे पर्वतराज की पुत्री, पृथ्वी को आनंद देने वाली, सारे विश्व को प्रसन्न रखने वाली, नन्दी जिनकी स्तुति करते हैं; विन्ध्य पर्वत के शिखर पर रहने वाली, भगवान विष्णु को आनंद देने वाली, इन्द्र जिनकी स्तुति करते हैं; हे भगवती, नीलकण्ठ शिव की गृहिणी, विशाल परिवार वाली, बहुत कुछ रचने वाली! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली शैलसुता, तुम्हारी जय हो, जय हो।
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरतेत्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२॥
suravaravarṣiṇi durdharadharṣiṇi durmukhamarṣiṇi harṣarate
tribhuvanapoṣiṇi śaṅkaratoṣiṇi kilbiṣamoṣiṇi ghoṣarate |
danujaniroṣiṇi ditisutaroṣiṇi durmadaśoṣiṇi sindhusute
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: देवताओं पर वरदान बरसाने वाली, दुर्धर और दुर्मुख जैसे दैत्यों को दबाने वाली, आनंद में मग्न; तीनों लोकों का पोषण करने वाली, शंकर को प्रसन्न रखने वाली, पापों को हरने वाली, जय-घोष में प्रसन्न; दानवों और दिति के पुत्रों पर क्रोध करने वाली, घमंडियों का घमंड सुखा देने वाली समुद्र-पुत्री! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरतेशिखरिशिरोमणितुङ्गहिमालयशृङ्गनिजालयमध्यगते ।मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥३॥
ayi jagadamba madamba kadambavanapriyavāsini hāsarate
śikhariśiromaṇituṅgahimālayaśṛṅganijālayamadhyagate |
madhumadhure madhukaiṭabhagañjini kaiṭabhabhañjini rāsarate
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे जगदम्बा, मेरी माँ, कदम्ब के वन में प्रेम से रहने वाली, हँसी-विनोद में प्रसन्न; पर्वतों के शिरोमणि ऊँचे हिमालय की चोटी पर अपने घर में रहने वाली; मधु जैसी मधुर, मधु-कैटभ को पराजित करने वाली, कैटभ का संहार करने वाली, रास-क्रीड़ा में प्रसन्न! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
अयि शतखण्डविखण्डितरुण्डवितुण्डितशुण्डगजाधिपतेरिपुगजगण्डविदारणचण्डपराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।निजभुजदण्डनिपातितखण्डविपातितमुण्डभटाधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥४॥
ayi śatakhaṇḍavikhaṇḍitaruṇḍavituṇḍitaśuṇḍagajādhipate
ripugajagaṇḍavidāraṇacaṇḍaparākramaśuṇḍa mṛgādhipate |
nijabhujadaṇḍanipātitakhaṇḍavipātitamuṇḍabhaṭādhipate
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे देवी, जिन्होंने शत्रु-सेना के गजराजों के सौ-सौ टुकड़े करके उनके धड़ और सूँड़ काट डाले; जिनका सिंह शत्रु-हाथियों के गण्डस्थल फाड़ने में प्रचण्ड पराक्रमी है; जिन्होंने अपनी भुजाओं के दण्ड से योद्धाओं के सरदारों के सिर काटकर गिरा दिए! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
अयि रणदुर्मदशत्रुवधोदितदुर्धरनिर्जरशक्तिभृतेचतुरविचारधुरीणमहाशिवदूतकृतप्रमथाधिपते ।दुरितदुरीहदुराशयदुर्मतिदानवदूतकृतान्तमतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥५॥
ayi raṇadurmadaśatruvadhoditadurdharanirjaraśaktibhṛte
caturavicāradhurīṇamahāśivadūtakṛtapramathādhipate |
duritadurīhadurāśayadurmatidānavadūtakṛtāntamate
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे रणभूमि में उन्मत्त शत्रुओं के वध के लिए उठी, अजेय देव-शक्ति धारण करने वाली; चतुर विचार में अग्रणी महादेव शिव को अपना दूत बनाने वाली, प्रमथ-गणों की स्वामिनी; दुष्ट इच्छा, बुरे आशय और दुर्बुद्धि वाले दानव (शुम्भ) के दूत के लिए यमराज जैसी! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
अयि शरणागतवैरिवधूवरवीरवराभयदायकरेत्रिभुवनमस्तकशूलविरोधिशिरोधिकृतामलशूलकरे ।दुमिदुमितामरदुन्दुभिनादमहोमुखरीकृततिग्मकरेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥६॥
ayi śaraṇāgatavairivadhūvaravīravarābhayadāyakare
tribhuvanamastakaśūlavirodhiśirodhikṛtāmalaśūlakare |
dumidumitāmaradundubhinādamahomukharīkṛtatigmakare
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे शरण में आई शत्रु-पत्नियों के वीर पतियों को भी अभय देने वाले हाथ वाली; तीनों लोकों के लिए काँटा बने दैत्यों के सिरों पर अपना निर्मल त्रिशूल चलाने वाली; जिनके लिए बजते देव-दुन्दुभियों की 'दुमि-दुमि' ध्वनि से सूर्य तक गूँज उठता है! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
अयि निजहुङ्कृतिमात्र निराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशतेसमरविशोषितशोणितबीजसमुद्भवशोणितबीजलते ।शिवशिव शुम्भनिशुम्भमहाहवतर्पितभूतपिशाचरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥७॥
ayi nijahuṅkṛtimātra nirākṛta dhūmravilocana dhūmraśate
samaraviśoṣitaśoṇitabījasamudbhavaśoṇitabījalate |
śivaśiva śumbhaniśumbhamahāhavatarpitabhūtapiśācarate
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे देवी, जिन्होंने केवल अपने हुंकार से धूम्रलोचन और सैकड़ों धूम्र दैत्यों को नष्ट कर दिया; जिन्होंने युद्ध में रक्तबीज और उसके रक्त से उपजे रक्तबीजों की बेल को सुखा डाला; जो शुम्भ-निशुम्भ के महायुद्ध में शिव के भूत-पिशाच गणों को तृप्त करने वाली हैं! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
धनुरनुषङ्गरणक्षणसङ्गपरिस्फुरदङ्गनटत्कटकेकनकपिशङ्गपृषत्कनिषङ्गरसद्भटशृङ्गहतावटुके ।कृतचतुरङ्गबलक्षितिरङ्गघटद्बहुरङ्गरटद्बटुकेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥८॥
dhanuranuṣaṅgaraṇakṣaṇasaṅgaparisphuradaṅganaṭatkaṭake
kanakapiśaṅgapṛṣatkaniṣaṅgarasadbhaṭaśṛṅgahatāvaṭuke |
kṛtacaturaṅgabalakṣitiraṅgaghaṭadbahuraṅgaraṭadbaṭuke
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे देवी, युद्ध के क्षणों में धनुष चढ़ाते हुए जिनके अंग चमकते हैं और कंगन नाचते हैं; जिनके सुनहरे बाण और तरकश हैं और जो गरजते शत्रु-योद्धाओं को मार गिराती हैं; जिन्होंने चतुरंगिणी सेना को रणभूमि में धराशायी कर दिया! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरतेकृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।धुधुकुट धुक्कुट धिन्धिमित ध्वनि धीर मृदङ्ग निनादरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥९॥
suralalanā tatatheyi tatheyi kṛtābhinayodara nṛtyarate
kṛta kukuthaḥ kukutho gaḍadādikatāla kutūhala gānarate |
dhudhukuṭa dhukkuṭa dhindhimita dhvani dhīra mṛdaṅga ninādarate
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे देवी, जो देवांगनाओं के 'तत-थेयि तथेयि' बोलों पर भाव-भरे नृत्य में आनंद लेती हैं; जो 'कुकुथः' आदि तालों पर कौतूहल-भरे गान में रमती हैं; और जो 'धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित' जैसी मृदंग की गम्भीर ध्वनि में प्रसन्न रहती हैं! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
जय जय जप्यजये जयशब्दपरस्तुतितत्परविश्वनुतेझणझणझिञ्झिमिझिङ्कृतनूपुरसिञ्जितमोहितभूतपते ।नटितनटार्धनटीनटनायकनाटितनाट्यसुगानरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१०॥
jaya jaya japyajaye jayaśabdaparastutitatparaviśvanute
jhaṇajhaṇajhiñjhimijhiṅkṛtanūpurasiñjitamohitabhūtapate |
naṭitanaṭārdhanaṭīnaṭanāyakanāṭitanāṭyasugānarate
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे जपने योग्य, विजयिनी, जय-जय शब्द से स्तुति में लगा सारा विश्व जिनको नमन करता है; जिनके नूपुरों की 'झण-झण झिंझिमि' झनकार से भूतपति शिव मोहित हो जाते हैं; जो आधे नट और आधी नटी वाले (अर्धनारीश्वर) नायक के नाट्य और सुंदर गान में आनंद लेती हैं! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
अयि सुमनःसुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहरकान्तियुतेश्रितरजनीरजनीरजनीरजनीरजनीकरवक्त्रवृते ।सुनयनविभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमराधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥११॥
ayi sumanaḥsumanaḥ sumanaḥ sumanaḥ sumanoharakāntiyute
śritarajanīrajanīrajanīrajanīrajanīkaravaktravṛte |
sunayanavibhramarabhramarabhramarabhramarabhramarādhipate
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे सुंदर मन वाली, फूलों जैसी कोमल, मनोहर कान्ति से युक्त; रात के स्वामी चन्द्रमा जैसे मुख से शोभित; सुंदर नेत्रों वाली, जिनकी चंचल आँखें भौंरों जैसी हैं और जो भौंरों की स्वामिनी (भ्रामरी) हैं! इस श्लोक में शब्दों को बार-बार दोहराकर कई अर्थ बुने गए हैं। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
सहितमहाहवमल्लमतल्लिकमल्लितरल्लकमल्लरतेविरचितवल्लिकपल्लिकमल्लिकझिल्लिकभिल्लिकवर्गवृते ।सितकृतफुल्लसमुल्लसितारुणतल्लजपल्लवसल्ललितेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१२॥
sahitamahāhavamallamatallikamallitarallakamallarate
viracitavallikapallikamallikajhillikabhillikavargavṛte |
sitakṛtaphullasamullasitāruṇatallajapallavasallalite
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे महायुद्ध में श्रेष्ठ योद्धाओं के साथ मल्ल-युद्ध में रमने वाली; लताओं और फूलों से सजे वनवासी भील स्त्रियों के समूह से घिरी; उजले, खिले हुए, उल्लसित और लाल-लाल श्रेष्ठ कोंपलों जैसी सुंदर! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
अविरलगण्डगलन्मदमेदुरमत्तमतङ्गजराजपतेत्रिभुवनभूषणभूतकलानिधिरूपपयोनिधिराजसुते ।अयि सुदतीजनलालसमानसमोहनमन्मथराजसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१३॥
aviralagaṇḍagalanmadameduramattamataṅgajarājapate
tribhuvanabhūṣaṇabhūtakalānidhirūpapayonidhirājasute |
ayi sudatījanalālasamānasamohanamanmatharājasute
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे गण्डस्थल से लगातार बहते मद वाले मतवाले गजराज जैसी गरिमा वाली; तीनों लोकों की आभूषण, चन्द्रमा जैसे रूप वाली, समुद्र-राज की पुत्री; सुंदर स्त्रियों के मन को मोहने वाले कामदेव को भी मोहित करने वाली राजकुमारी! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
कमलदलामलकोमलकान्तिकलाकलितामलभाललतेसकलविलासकलानिलयक्रमकेलिचलत्कलहंसकुले ।अलिकुलसङ्कुलकुवलयमण्डलमौलिमिलद्बकुलालिकुलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१४॥
kamaladalāmalakomalakāntikalākalitāmalabhālalate
sakalavilāsakalānilayakramakelicalatkalahaṃsakule |
alikulasaṅkulakuvalayamaṇḍalamaulimiladbakulālikule
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे कमल-दल जैसे निर्मल, कोमल और कान्तिमय ललाट वाली; सब विलासों और कलाओं का घर, हंसों की तरह चलती हुई क्रीड़ा करने वाली; जिनके केशों के मुकुट पर भौंरों से घिरे नील कमल और बकुल के फूल सजे हैं! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
करमुरलीरववीजितकूजितलज्जितकोकिलमञ्जुमतेमिलित पुलिन्द मनोहर गुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।निजगुणभूतमहाशबरीगणसद्गुणसम्भृतकेलितलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१५॥
karamuralīravavījitakūjitalajjitakokilamañjumate
milita pulinda manohara guñjita rañjitaśaila nikuñjagate |
nijaguṇabhūtamahāśabarīgaṇasadguṇasambhṛtakelitale
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे जिनके हाथ की मुरली की ध्वनि से लज्जित होकर कोयल की कूक भी फीकी पड़ जाती है, ऐसी मधुर स्वभाव वाली; पुलिन्दों (वनवासियों) के मनोहर गुंजन से सजे पर्वत-कुंजों में विचरने वाली; अपने गुणों से भरी महाशबरियों (वनवासी स्त्रियों) के साथ क्रीड़ा करने वाली! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
कटितटपीतदुकूलविचित्रमयूखतिरस्कृतचन्द्ररुचेप्रणतसुरासुरमौलिमणिस्फुरदंशुलसन्नखचन्द्ररुचे ।जितकनकाचल मौलिपदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१६॥
kaṭitaṭapītadukūlavicitramayūkhatiraskṛtacandraruce
praṇatasurāsuramaulimaṇisphuradaṃśulasannakhacandraruce |
jitakanakācala maulipadorjita nirbharakuñjara kumbhakuce
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे कमर पर पहने पीले रेशमी वस्त्र की विचित्र चमक से चन्द्रमा की कान्ति को भी फीका करने वाली; प्रणाम करते देवताओं और असुरों के मुकुट-मणियों की चमक से जिनके चन्द्रमा जैसे नख और चमक उठते हैं; जिनका वक्ष सोने के पर्वत के शिखर और गजराज के कुम्भस्थल जैसा उन्नत है! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
विजितसहस्रकरैकसहस्रकरैकसहस्रकरैकनुतेकृतसुरतारकसङ्गरतारकसङ्गरतारकसूनुसुते ।सुरथसमाधिसमानसमाधिसमाधिसमाधिसुजातरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१७॥
vijitasahasrakaraikasahasrakaraikasahasrakaraikanute
kṛtasuratārakasaṅgaratārakasaṅgaratārakasūnusute |
surathasamādhisamānasamādhisamādhisamādhisujātarate
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे सहस्र किरणों वाले सूर्य को भी जीतने वाली, जिनकी स्तुति सहस्र हाथों वाले (सहस्रार्जुन) ने की; जो देवताओं को तारने वाले और तारकासुर से युद्ध करने वाले पुत्र (कार्तिकेय) की माता हैं; जो राजा सुरथ और वैश्य समाधि की एक-सी समाधि (भक्ति) से प्रसन्न हुईं! इस श्लोक में भी शब्दों के दोहराव से कई अर्थ बनते हैं। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवेअयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१८॥
padakamalaṃ karuṇānilaye varivasyati yo’nudinaṃ suśive
ayi kamale kamalānilaye kamalānilayaḥ sa kathaṃ na bhavet |
tava padameva parampadamityanuśīlayato mama kiṃ na śive
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे करुणा की निधि, कल्याणमयी! जो प्रतिदिन तुम्हारे चरण-कमलों की सेवा करता है, हे कमला, कमल में रहने वाली, वह लक्ष्मी का निवास (धनवान) क्यों न होगा? तुम्हारे चरण ही परम पद हैं, ऐसा मनन करने वाले मुझे हे शिवे, क्या नहीं मिलेगा? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुसिञ्चिनुते गुण रङ्गभुवंभजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणिनिवासि शिवंजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१९॥
kanakalasatkalasindhujalairanusiñcinute guṇa raṅgabhuvaṃ
bhajati sa kiṃ na śacīkucakumbhataṭīparirambhasukhānubhavam |
tava caraṇaṃ śaraṇaṃ karavāṇi natāmaravāṇinivāsi śivaṃ
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: जो सोने-सी चमकती नदी के जल से तुम्हारे गुणों की रंगभूमि (तुम्हारे पूजा-स्थान) को सींचता है, क्या वह इन्द्र जैसा स्वर्ग का सुख नहीं पाता? हे देवताओं द्वारा नमित, वाणी में बसने वाली, मैं तुम्हारे कल्याणकारी चरणों की शरण लूँ। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयतेकिमु पुरुहूतपुरीन्दुमुखीसुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।मम तु मतं शिवनामधने भवतीकृपया किमुत क्रियतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२०॥
tava vimalendukulaṃ vadanendumalaṃ sakalaṃ nanu kūlayate
kimu puruhūtapurīndumukhīsumukhībhirasau vimukhīkriyate |
mama tu mataṃ śivanāmadhane bhavatīkṛpayā kimuta kriyate
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: तुम्हारा निर्मल चन्द्रमा जैसा मुख-चन्द्र सारी मलिनता को दूर कर देता है; क्या इन्द्रपुरी की चन्द्रमुखी सुंदरियाँ भी (तुम्हारे भक्त को) उससे विमुख कर सकती हैं? मेरा तो यही मत है कि हे शिव-नाम रूपी धन वाली, तुम्हारी कृपा से क्या नहीं हो सकता? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमेअयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथाऽनुमितासि रते ।यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२१॥
ayi mayi dīnadayālutayā kṛpayaiva tvayā bhavitavyamume
ayi jagato jananī kṛpayāsi yathāsi tathā’numitāsi rate |
yaducitamatra bhavatyurarīkurutādurutāpamapākurute
jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute ||
अर्थ: हे उमा, मुझ दीन पर दया के कारण तुम्हें कृपा करनी ही चाहिए। हे जगत की माता, तुम जैसी कृपामयी हो, वैसी ही जानी जाती हो। यहाँ जो उचित हो, वह स्वीकार करो और मेरा बड़ा कष्ट दूर करो। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
"अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि" से शुरू होने वाला यह स्तोत्र माँ दुर्गा की सबसे लोकप्रिय स्तुतियों में से है। हर श्लोक इसी टेक पर समाप्त होता है: "जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते", यानी हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो।
स्तोत्र की लय नृत्य जैसी है और शब्दों की ध्वनि पर इसका बहुत ज़ोर है। इसमें दुर्गा सप्तशती की कथाओं (मधु-कैटभ, महिषासुर, धूम्रलोचन, रक्तबीज, शुम्भ-निशुम्भ) की याद है, देवी के सौंदर्य और नृत्य का वर्णन है, और अंत में शरण की प्रार्थना। प्रचलित स्तोत्र के ये इक्कीस श्लोक तीस श्लोकों वाले "भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलि" स्तोत्र का भाग हैं।
पहले तीन श्लोक देवी का परिचय देते हैं: वे हिमालय की पुत्री हैं, विन्ध्य पर्वत पर रहती हैं, शिव की गृहिणी हैं, सारी पृथ्वी को आनंद देती हैं, और वही समुद्र-पुत्री लक्ष्मी भी हैं। चौथे से आठवें श्लोक तक युद्ध का वर्णन है: शत्रु-सेना के हाथियों का संहार, शिव को दूत बनाकर भेजना, केवल हुंकार से धूम्रलोचन का अंत, रक्तबीज के रक्त से उपजे दैत्यों को सुखा देना और शुम्भ-निशुम्भ का महायुद्ध।
नौवें से सत्रहवें श्लोक तक देवी का दूसरा रूप सामने आता है: विजय के बाद देवांगनाओं के साथ नृत्य, मृदंग और नूपुरों की ध्वनि, मुरली की तान, कमल जैसा ललाट, भौंरों से घिरे फूलों का मुकुट। एक ही देवी युद्ध में भयानक और उत्सव में अत्यंत सुंदर हैं। इन श्लोकों में शब्दों के दोहराव (सुमनः सुमनः, रजनी रजनी, भ्रमर भ्रमर) से कई-कई अर्थ बुने गए हैं।
अंतिम चार श्लोकों में भक्त अपनी बात कहता है: जो तुम्हारे चरणों की सेवा करता है, वह धनवान क्यों न होगा; मैं तुम्हारे चरणों की शरण लूँ; तुम्हारी कृपा से क्या नहीं हो सकता। अंतिम श्लोक में वह उमा से सीधी विनती करता है कि मुझ दीन पर दया करो और जो उचित हो वह करके मेरा कष्ट दूर करो।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 1 | विश्वविनोदिनि नन्दनुते | sanskritdocuments.org के मुख्य पाठ और sa.wikisource.org का पाठ; ऊपर stotranidhi.com और drikpanchang.com का "नन्दिनुते" है, जिसे sanskritdocuments.org भी दूसरे पाठ के रूप में देता है। |
| श्लोक 2 | कल्मषमोषिणि घोररते | stotranidhi.com का पाठ। |
| श्लोक 6 | धिमिधिमितामर … मुहुर्मुखरीकृतदिङ्निकरे | sanskritdocuments.org पर दिया दूसरा पाठ। |
| श्लोक 8 | धनुरनुसङ्ग … हताबटुके | stotranidhi.com और sa.wikisource.org पर "अनुसङ्ग", तथा drikpanchang.com और sa.wikisource.org पर "हताबटुके"। |
| श्लोक 9 | सुरललनाततथेयितथेयितथाभिनयोत्तरनृत्यरते । हासविलासहुलासमयि प्रणतार्तजनेऽमितप्रेमभरे । धिमिकिटधिक्कटधिकटधिमिध्वनिधीरमृदङ्गनिनादरते | sanskritdocuments.org के मुख्य पाठ में यह श्लोक इस रूप में है; ऊपर का पाठ बाकी तीनों स्रोतों का है, जिसे sanskritdocuments.org भी कोष्ठक में देता है। |
| श्लोक 10 | झणझणझिञ्झिमिझङ्कृतनूपुर | sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ; stotranidhi.com पर "भण भण भिञ्जिमि भिङ्कृत"। |
| श्लोक 12 | मल्लिक भिल्लिक भिल्लिक वर्गवृते | stotranidhi.com और sa.wikisource.org का पाठ। |
| श्लोक 15 | मिलितमिलिन्दमनोहरगुञ्जित … निजगणभूत | sanskritdocuments.org के मुख्य पाठ में "मिलितमिलिन्द" (भौंरों का गुंजन); drikpanchang.com पर "निजगणभूत"। |
| श्लोक 16 | निर्जरकुञ्जर … मौलिमदोर्जित | sanskritdocuments.org पर "निर्जरकुञ्जर" (देवताओं का हाथी, ऐरावत); drikpanchang.com पर "मौलिमदोर्जित"। |
| श्लोक 18 | योऽनुदिनं स शिवे … परम्पदमेवनुशीलयतो | stotranidhi.com और sa.wikisource.org पर "स शिवे"; sanskritdocuments.org के मुख्य पाठ में "परम्पदमेवनुशीलयतो"। |
| श्लोक 19 | सिन्धुजलैरनुषिञ्चति ते गुणरङ्गभुवम् … मृडानि सदा मयि देहि शिवं | पहला drikpanchang.com का पाठ है, दूसरा sanskritdocuments.org पर तीसरी पंक्ति का दूसरा पाठ। |
| श्लोक 21 | उरुतापमपाकुरु मे | stotranidhi.com और sanskritdocuments.org पर दिया दूसरा पाठ (मेरा बड़ा कष्ट दूर करो)। |
| श्लोक 21 के बाद | स्तुतिमिमां स्तिमितः सुसमाधिना नियमतो यमतोऽनुदिनं पठेत् … | sa.wikisource.org और sanskritdocuments.org (पूरे स्तोत्र का श्लोक 28, थोड़े भेद के साथ) में एक फल-श्लोक है; stotranidhi.com और drikpanchang.com का पाठ इक्कीसवें श्लोक पर पूरा होता है, इसलिए यहाँ वह नहीं जोड़ा गया। |
sanskritdocuments.org के अनुसार ये इक्कीस श्लोक "भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलि" नाम के तीस श्लोकों वाले स्तोत्र का भाग हैं, जिसके अंतिम श्लोक कवि का नाम रामकृष्ण और उसे श्रीपति का पुत्र बताते हैं। बहुत-सी पुस्तकें इसे आदि शंकराचार्य का बताती हैं, पर उसी स्रोत के अनुसार यह उनकी रचनाओं के संग्रह में नहीं मिलता। इसलिए रचयिता निश्चित नहीं है।
sanskritdocuments.org के अनुसार इस स्तोत्र का एक अंश शिवरहस्य (भाग 1, अध्याय 53) में भी मिलता है। यह दुर्गा सप्तशती का भाग नहीं है, यद्यपि उसकी कथाओं को याद करता है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): इक्कीसों श्लोक चार स्रोतों से पंक्ति-पंक्ति मिलाए गए: sanskritdocuments.org (पूरा भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलि स्तोत्र), stotranidhi.com, drikpanchang.com और sa.wikisource.org। हर पंक्ति में वह पाठ रखा गया जो अधिकतर स्रोतों में मिलता है; दूसरे पाठ पाठ-भेद में दिए गए। श्लोक 9 में sanskritdocuments.org का मुख्य पाठ बाकी तीनों स्रोतों से अलग है; ऊपर तीनों का साझा पाठ है। श्लोक 10 की दूसरी पंक्ति चारों स्रोतों में थोड़ी अलग छपी है; यहाँ "झिङ्कृत" और "सिञ्जित" वाला रूप रखा गया, जो sa.wikisource.org में ज्यों का त्यों है और जिसके शब्द sanskritdocuments.org (दूसरे पाठ में) और drikpanchang.com में भी हैं।
दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।
दुर्गा · आरती
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
दुर्गा · चालीसा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी
दुर्गा · स्तोत्र · संस्कृत
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्
दुर्गा · स्तुति · संस्कृत
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः
दुर्गा · स्तोत्र · संस्कृत
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी
यह निश्चित नहीं है। पूरे स्तोत्र के अंतिम श्लोकों के अनुसार यह रामकृष्ण कवि के "भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलि" स्तोत्र का भाग है; बहुत-सी पुस्तकें इसे आदि शंकराचार्य का बताती हैं, पर यह उनकी रचनाओं के संग्रह में नहीं मिलता।
प्रचलित स्तोत्र में इक्कीस श्लोक हैं। ये तीस श्लोकों वाले भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलि स्तोत्र के श्लोक 7 से 27 हैं; कुछ पुस्तकें अंत में एक फल-श्लोक भी जोड़ती हैं।
"रम्यकपर्दिनि" यानी सुंदर जटाओं वाली, और "शैलसुते" यानी हे पर्वत की पुत्री। पूरी टेक का अर्थ है: हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, सुंदर जटाओं वाली पर्वत-पुत्री, तुम्हारी जय हो, जय हो।
नहीं, यह अलग स्तोत्र है। पर इसमें सप्तशती की कथाओं की याद है: मधु-कैटभ, महिषासुर, धूम्रलोचन, रक्तबीज, चण्ड-मुण्ड और शुम्भ-निशुम्भ का अंत, और राजा सुरथ तथा वैश्य समाधि।
कवि ने ध्वनि और लय पर बहुत ज़ोर दिया है: लम्बे समास, एक ही शब्द का बार-बार दोहराव, और नृत्य के बोल जैसे "ततथेयि"। धीरे-धीरे पढ़ने और अर्थ साथ रखने से उच्चारण सरल हो जाता है।
नवरात्रि, दुर्गाष्टमी, महानवमी और दुर्गा पूजा में यह विशेष रूप से पढ़ा और गाया जाता है। बहुत-से भक्त इसे रोज़ की पूजा में भी पढ़ते हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।