दुर्गा

स्तोत्र · दुर्गा · स्तोत्र

अर्गला स्तोत्रम्

दुर्गा सप्तशती से पहले पढ़ा जाने वाला अर्गला स्तोत्र: "जयन्ती मङ्गला काली" से शुरू होने वाले पच्चीस श्लोक, "रूपं देहि जयं देहि" की टेक के साथ।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतयेसप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ॥ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

oṃ asya śrīargalāstotramantrasya viṣṇurṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ,
śrīmahālakṣmīrdevatā, śrījagadambāprītaye
saptaśatīpāṭhāṅgatvena jape viniyogaḥ ||
oṃ namaścaṇḍikāyai ||

अर्थ: इस अर्गला स्तोत्र रूपी मन्त्र के ऋषि विष्णु हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता श्री महालक्ष्मी हैं। जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसका जप किया जाता है। ॐ, चण्डिका देवी को नमस्कार।

ऋषिः
जिस ऋषि ने मन्त्र देखा
छन्दः
जिस छन्द में मन्त्र है
देवता
मन्त्र के देवता
जगदम्बाप्रीतये
जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए
विनियोगः
उपयोग का संकल्प

मार्कण्डेय उवाच

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥१॥

oṃ jayantī maṅgalā kālī bhadrakālī kapālinī |
durgā kṣamā śivā dhātrī svāhā svadhā namo’stu te ||

अर्थ: मार्कण्डेय जी कहते हैं: जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा, इन नामों वाली हे देवी, तुम्हें नमस्कार है।

जयन्ती
सबसे उत्कृष्ट, विजयी
मङ्गला
मंगल करने वाली
भद्रकाली
कल्याण करने वाली काली
कपालिनी
कपाल धारण करने वाली
क्षमा
क्षमा करने वाली
धात्री
धारण और पोषण करने वाली
स्वाहा
देवताओं तक आहुति पहुँचाने वाली शक्ति
स्वधा
पितरों तक अर्पण पहुँचाने वाली शक्ति

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि ।जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥२॥

jaya tvaṃ devi cāmuṇḍe jaya bhūtārtihāriṇi |
jaya sarvagate devi kālarātri namo’stu te ||

अर्थ: हे देवी चामुण्डा, तुम्हारी जय हो। प्राणियों की पीड़ा हरने वाली, तुम्हारी जय हो। हे सब जगह व्याप्त देवी, तुम्हारी जय हो। हे कालरात्रि, तुम्हें नमस्कार है।

चामुण्डे
हे चामुण्डा
भूतार्तिहारिणि
प्राणियों की पीड़ा हरने वाली
सर्वगते
सब जगह व्याप्त
कालरात्रि
हे कालरात्रि

मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥३॥

madhukaiṭabhavidrāvividhātṛvarade namaḥ |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: मधु और कैटभ को मार भगाने वाली और ब्रह्मा जी को वर देने वाली देवी, तुम्हें नमस्कार है। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

मधुकैटभविद्रावि
मधु और कैटभ को मार भगाने वाली
विधातृवरदे
ब्रह्मा को वर देने वाली
रूपं
रूप, सौंदर्य
जयं
विजय
यशः
यश
द्विषः
शत्रुओं को
जहि
नष्ट करो

महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥४॥

mahiṣāsuranirṇāśi bhaktānāṃ sukhade namaḥ |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: महिषासुर का नाश करने वाली, भक्तों को सुख देने वाली देवी, तुम्हें नमस्कार है। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

महिषासुरनिर्णाशि
महिषासुर का नाश करने वाली
भक्तानाम्
भक्तों को
सुखदे
सुख देने वाली

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥५॥

raktabījavadhe devi caṇḍamuṇḍavināśini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: रक्तबीज का वध करने वाली और चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली देवी, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

रक्तबीजवधे
रक्तबीज का वध करने वाली
चण्डमुण्डविनाशिनि
चण्ड और मुण्ड का विनाश करने वाली

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥६॥

śumbhasyaiva niśumbhasya dhūmrākṣasya ca mardini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: शुम्भ, निशुम्भ और धूम्राक्ष (धूम्रलोचन) का मर्दन करने वाली देवी, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

शुम्भस्य
शुम्भ का
निशुम्भस्य
निशुम्भ का
धूम्राक्षस्य
धूम्रलोचन असुर का
मर्दिनि
मर्दन करने वाली

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥७॥

vanditāṅghriyuge devi sarvasaubhāgyadāyini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: जिनके दोनों चरणों की सब वन्दना करते हैं, सब सौभाग्य देने वाली देवी, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

वन्दिताङ्घ्रियुगे
जिनके दोनों चरण वन्दित हैं
सर्वसौभाग्यदायिनि
सब सौभाग्य देने वाली

अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥८॥

acintyarūpacarite sarvaśatruvināśini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: जिनका रूप और चरित्र सोच से परे है, सब शत्रुओं का नाश करने वाली देवी, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

अचिन्त्य
जिसकी कल्पना न हो सके
रूपचरिते
रूप और चरित्र वाली
सर्वशत्रुविनाशिनि
सब शत्रुओं का नाश करने वाली

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥९॥

natebhyaḥ sarvadā bhaktyā caṇḍike duritāpahe |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: जो भक्ति से सदा तुम्हें प्रणाम करते हैं, उनके पाप हरने वाली चण्डिके, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

नतेभ्यः
प्रणाम करने वालों के
सर्वदा
सदा
दुरितापहे
पाप हरने वाली

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१०॥

stuvadbhyo bhaktipūrvaṃ tvāṃ caṇḍike vyādhināśini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: जो भक्ति से तुम्हारी स्तुति करते हैं, उनके रोग नष्ट करने वाली चण्डिके, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

स्तुवद्भ्यः
स्तुति करने वालों के
भक्तिपूर्वम्
भक्ति के साथ
व्याधिनाशिनि
रोग नष्ट करने वाली

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥११॥

caṇḍike satataṃ ye tvāmarcayantīha bhaktitaḥ |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: हे चण्डिके, जो इस संसार में भक्ति से सदा तुम्हारी पूजा करते हैं, (उनमें से एक) मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

सततम्
सदा
अर्चयन्ति
पूजा करते हैं
इह
यहाँ, इस संसार में
भक्तितः
भक्ति से

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१२॥

dehi saubhāgyamārogyaṃ dehi me paramaṃ sukham |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: मुझे सौभाग्य और आरोग्य दो, परम सुख दो। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

सौभाग्यम्
सौभाग्य
आरोग्यम्
स्वास्थ्य
परमं सुखम्
सबसे बड़ा सुख

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१३॥

vidhehi dviṣatāṃ nāśaṃ vidhehi balamuccakaiḥ |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: जो मुझसे द्वेष करते हैं उनका नाश करो, और मुझे बहुत बल दो। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

विधेहि
करो, दो
द्विषताम्
द्वेष करने वालों का
बलम्
बल
उच्चकैः
बहुत अधिक

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम् ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१४॥

vidhehi devi kalyāṇaṃ vidhehi paramāṃ śriyam |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: हे देवी, मेरा कल्याण करो और मुझे परम श्री (संपत्ति और शोभा) दो। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

कल्याणम्
कल्याण, भलाई
परमाम्
सबसे श्रेष्ठ
श्रियम्
श्री, संपत्ति और शोभा

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१५॥

surāsuraśiroratnanighṛṣṭacaraṇe’mbike |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: हे अम्बिके, देवता और असुर दोनों प्रणाम करते हुए अपने मुकुटों के रत्न तुम्हारे चरणों से छुआते हैं। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

सुरासुर
देवता और असुर
शिरोरत्न
मुकुट के रत्न
निघृष्टचरणे
जिनके चरणों से रगड़े गए हैं
अम्बिके
हे माँ

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१६॥

vidyāvantaṃ yaśasvantaṃ lakṣmīvantaṃ janaṃ kuru |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: अपने भक्त जन को विद्यावान, यशस्वी और लक्ष्मीवान बनाओ। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

विद्यावन्तम्
विद्या वाला
यशस्वन्तम्
यशस्वी
लक्ष्मीवन्तम्
संपत्ति वाला
जनम्
(अपने) भक्त जन को
कुरु
बनाओ

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१७॥

pracaṇḍadaityadarpaghne caṇḍike praṇatāya me |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: प्रचण्ड दैत्यों का घमंड चूर करने वाली चण्डिके, तुम्हारे सामने झुके हुए मुझको रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

प्रचण्डदैत्य
प्रचण्ड दैत्य
दर्पघ्ने
घमंड का नाश करने वाली
प्रणताय मे
प्रणाम करते हुए मुझको

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१८॥

caturbhuje caturvaktrasaṃstute parameśvari |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: हे चार भुजाओं वाली, चार मुख वाले ब्रह्मा जी से स्तुत परमेश्वरी, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

चतुर्भुजे
हे चार भुजाओं वाली
चतुर्वक्त्र
चार मुख वाले ब्रह्मा
संस्तुते
जिनकी स्तुति की गई
परमेश्वरि
हे परमेश्वरी

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१९॥

kṛṣṇena saṃstute devi śaśvadbhaktyā sadāmbike |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: हे अम्बिके, भगवान कृष्ण (विष्णु) सदा भक्ति से जिनकी स्तुति करते हैं, ऐसी देवी, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

कृष्णेन
भगवान कृष्ण (विष्णु) द्वारा
संस्तुते
स्तुत
शश्वत्
निरंतर
सदा
हमेशा

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२०॥

himācalasutānāthasaṃstute parameśvari |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: हिमालय की पुत्री के स्वामी भगवान शिव जिनकी स्तुति करते हैं, ऐसी परमेश्वरी, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

हिमाचलसुता
हिमालय की पुत्री (पार्वती)
नाथ
स्वामी (शिव)
संस्तुते
जिनकी स्तुति की गई

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२१॥

indrāṇīpatisadbhāvapūjite parameśvari |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: इन्द्राणी के पति इन्द्र जिनकी सच्चे भाव से पूजा करते हैं, ऐसी परमेश्वरी, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

इन्द्राणीपति
इन्द्राणी के पति, इन्द्र
सद्भाव
सच्चा भाव
पूजिते
जिनकी पूजा की गई

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२२॥

devi pracaṇḍadordaṇḍadaityadarpavināśini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: प्रचण्ड भुजाओं वाले दैत्यों का घमंड नष्ट करने वाली देवी, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

प्रचण्डदोर्दण्ड
प्रचण्ड भुजदण्डों वाले
दैत्यदर्प
दैत्यों का घमंड
विनाशिनि
नष्ट करने वाली

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२३॥

devi bhaktajanoddāmadattānandodaye’mbike |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ||

अर्थ: हे देवी अम्बिके, अपने भक्तजनों को असीम आनंद का उदय देने वाली, मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

भक्तजन
भक्त लोग
उद्दाम
असीम, बहुत बड़ा
दत्तानन्दोदये
आनंद का उदय देने वाली

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥२४॥

patnīṃ manoramāṃ dehi manovṛttānusāriṇīm |
tāriṇīṃ durgasaṃsārasāgarasya kulodbhavām ||

अर्थ: मुझे मन के अनुसार चलने वाली सुंदर पत्नी दो, जो दुर्गम संसार-सागर से पार उतारने वाली और उत्तम कुल में जन्मी हो।

मनोरमाम्
मन को अच्छी लगने वाली
मनोवृत्तानुसारिणीम्
मन के भाव के अनुसार चलने वाली
तारिणीम्
पार उतारने वाली
दुर्गसंसारसागरस्य
दुर्गम संसार-सागर से
कुलोद्भवाम्
अच्छे कुल में जन्मी

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः ।स तु सप्तशतीसङ्ख्यावरमाप्नोति सम्पदाम् ॥२५॥

idaṃ stotraṃ paṭhitvā tu mahāstotraṃ paṭhennaraḥ |
sa tu saptaśatīsaṅkhyāvaramāpnoti sampadām ||

अर्थ: यह श्लोक कहता है: मनुष्य इस स्तोत्र को पढ़कर फिर महास्तोत्र (सप्तशती) का पाठ करे; वह सप्तशती के पाठ की संख्या के अनुसार श्रेष्ठ फल और संपत्तियाँ पाता है।

पठित्वा
पढ़कर
महास्तोत्रम्
महान स्तोत्र, सप्तशती
पठेत्
पढ़े
सप्तशतीसङ्ख्या
सप्तशती पाठ की संख्या
वरम्
श्रेष्ठ फल
सम्पदाम्
संपत्तियों का

॥ इति देव्या अर्गलास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

|| iti devyā argalāstotraṃ sampūrṇam ||

अर्थ: इस प्रकार देवी का अर्गला स्तोत्र पूरा हुआ।

परिचय

अर्गला स्तोत्र दुर्गा सप्तशती के आरम्भिक अंगों में से है। इसकी शुरुआत देवी के प्रसिद्ध नामों से होती है: "जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी"। फिर इक्कीस श्लोकों तक देवी के किसी एक पराक्रम या गुण को याद करके हर बार एक ही प्रार्थना दोहराई जाती है: "रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि", मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

"अर्गला" का अर्थ है दरवाज़े की साँकल या अवरोध। परंपरा में माना जाता है कि यह स्तोत्र सप्तशती पाठ के रास्ते की रुकावट हटाता है। यहाँ उत्तर भारत में प्रचलित पच्चीस श्लोकों वाला पाठ दिया गया है; सत्ताईस श्लोकों वाला एक और पाठ भी मिलता है, जिसके भेद नीचे पाठ-भेद में हैं।

भावार्थ

अर्गला स्तोत्र दुर्गा सप्तशती की कथा का छोटा-सा सार है। पहले श्लोक में देवी के ग्यारह नाम हैं; यह श्लोक देवी-पूजा में अलग से भी बहुत पढ़ा जाता है। फिर स्तोत्र उन पराक्रमों को याद करता है जिनकी कथा सप्तशती में है: मधु-कैटभ, महिषासुर, रक्तबीज, चण्ड-मुण्ड, धूम्रलोचन, शुम्भ और निशुम्भ का अंत। इसके बाद देवी को ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र जैसे देवताओं से स्तुत बताया गया है।

हर श्लोक की टेक "रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि" में भक्त चार चीज़ें माँगता है: रूप, जय, यश और शत्रुओं का नाश। बहुत-से भक्त "शत्रु" को केवल बाहर के विरोधी नहीं, भीतर के काम, क्रोध, लोभ जैसे दोष भी मानकर यह प्रार्थना करते हैं। बीच के श्लोकों में सौभाग्य, आरोग्य, सुख, बल, कल्याण, विद्या और यश की प्रार्थना भी है।

चौबीसवें श्लोक में घर-गृहस्थी की प्रार्थना है, और अंतिम श्लोक बताता है कि यह स्तोत्र पढ़कर फिर सप्तशती का पाठ किया जाए। इस तरह अर्गला सप्तशती पाठ का द्वार खोलने वाला स्तोत्र है।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 25) कहती है कि जो इसे पढ़कर फिर सप्तशती का पाठ करता है, वह सप्तशती पाठ की संख्या के अनुसार श्रेष्ठ फल और संपत्ति पाता है। यह स्तोत्र की अपनी बात है, जो इसे सप्तशती पाठ से जोड़ती है।

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः ।
स तु सप्तशतीसङ्ख्यावरमाप्नोति सम्पदाम् ॥

यह श्लोक कहता है: मनुष्य इस स्तोत्र को पढ़कर फिर महास्तोत्र (सप्तशती) का पाठ करे; वह सप्तशती के पाठ की संख्या के अनुसार श्रेष्ठ फल और संपत्तियाँ पाता है।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले, देवी कवच के बाद
  • जब भी सप्तशती का पाठ किया जाए, उसके आरम्भ में
  • अलग से भी, माँ दुर्गा की रोज़ की पूजा में

पढ़ने की विधि

  • उत्तर भारत की प्रचलित परंपरा में अर्गला देवी कवच के बाद और कीलक से पहले पढ़ा जाता है। कुछ परंपराओं में क्रम अलग है; अपनी पारिवारिक या गुरु-परंपरा का क्रम मानें।
  • पहले विनियोग पढ़ें, फिर "ॐ नमश्चण्डिकायै" कहकर स्तोत्र आरम्भ करें।
  • "रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि" वाली पंक्ति हर श्लोक में आती है; इसे हर बार मन लगाकर, जल्दबाज़ी के बिना कहें।
  • अलग से पढ़ते समय भी पूरा स्तोत्र एक बार में पढ़ें; यह लगभग दस मिनट का पाठ है।
पूरी विधिदुर्गा पूजा विधिनवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
पूरा स्तोत्रसत्ताईस श्लोकों वाला पाठsanskritdocuments.org (और उसी की प्रति sa.wikisource.org) पर अर्गला का एक दूसरा पाठ है: उसमें आरम्भ में चण्डिका का ध्यान है, पहला श्लोक "जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि" है और कुल सत्ताईस श्लोक हैं। मुख्य भेद नीचे हैं।
श्लोक 6 की जगहधूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि … निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रिलोक्यशुभदे नमःsanskritdocuments.org का पाठ, जहाँ ये दो अलग श्लोक हैं।
श्लोक 9नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहेsanskritdocuments.org का पाठ।
श्लोक 11चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनिsanskritdocuments.org का पाठ।
श्लोक 12 और 14देहि देवि परं सुखम् … विधेहि विपुलां श्रियम्sanskritdocuments.org का पाठ।
श्लोक 16लक्ष्मीवन्तं च मां कुरुsanskritdocuments.org और stotranidhi.com का पाठ।
श्लोक 24भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ तारिणि दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे …sanskritdocuments.org का पाठ, जहाँ ये दो अलग श्लोक हैं और दोनों में टेक है।
श्लोक 23 के बादपुत्रान् देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मेstotranidhi.com पर यह एक अतिरिक्त श्लोक है।
श्लोक 25सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम्sanskritdocuments.org का पाठ (सप्तशती की आराधना करके दुर्लभ वर पाता है)।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
ग्रंथ / स्रोत
दुर्गा सप्तशती के आरम्भिक अंग (कवच, अर्गला, कीलक)
भाषा
संस्कृत

sanskritdocuments.org वाले पाठ की अंतिम पंक्ति इसे मार्कण्डेय पुराण का बताती है; drikpanchang.com वाले पाठ में ग्रंथ का नाम नहीं है। यह मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य (सप्तशती के तेरह अध्याय) से बाहर का अंग है, जो परंपरा से सप्तशती के साथ पढ़ा जाता है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पच्चीस श्लोकों वाला पाठ drikpanchang.com से लिया गया और bhaktibharat.com के पच्चीस श्लोकों वाले पाठ तथा stotranidhi.com के छब्बीस श्लोकों वाले पाठ से, जो उसी परंपरा के हैं, पंक्ति-पंक्ति मिलाया गया; sanskritdocuments.org का सत्ताईस श्लोकों वाला दूसरा पाठ भी पूरा मिलाया गया और उसके भेद पाठ-भेद में दिए गए। यह उत्तर भारत की प्रचलित सप्तशती (जैसे गीता प्रेस वाली परंपरा) का पाठ है; किसी छपी गीता प्रेस प्रति से सीधे नहीं मिलाया गया। sanskritdocuments.org वाले पाठ के आरम्भ का चण्डिका-ध्यान इस परंपरा के पाठ में नहीं है, इसलिए यहाँ नहीं दिया गया।

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नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।

माँ दुर्गा के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अर्गला का क्या अर्थ है?

अर्गला का अर्थ है दरवाज़े की साँकल या अवरोध। परंपरा में माना जाता है कि यह स्तोत्र सप्तशती पाठ के मार्ग की रुकावटें हटाता है, इसलिए इसे पाठ से पहले पढ़ते हैं।

"रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि" का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है: मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो। यह पंक्ति स्तोत्र के इक्कीस श्लोकों में टेक की तरह आती है।

अर्गला स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

यहाँ दिए प्रचलित पाठ में पच्चीस श्लोक हैं। दूसरे संस्करणों में छब्बीस या सत्ताईस श्लोक भी मिलते हैं, इसलिए अलग पुस्तकों में संख्या अलग दिख सकती है।

कवच, अर्गला और कीलक का क्रम क्या है?

उत्तर भारत की प्रचलित परंपरा में पहले देवी कवच, फिर अर्गला और फिर कीलक पढ़ा जाता है। कुछ परंपराओं में क्रम अलग है।

क्या अर्गला स्तोत्र अलग से पढ़ सकते हैं?

हाँ, बहुत-से भक्त इसे रोज़ की पूजा में अलग से भी पढ़ते हैं। स्तोत्र का अंतिम श्लोक इसे सप्तशती पाठ से पहले पढ़ने की बात कहता है।

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