दुर्गा पूजा विधि
दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।

चालीसा · दुर्गा
“नमो नमो दुर्गे सुख करनी” वाली दुर्गा चालीसा का मूल पाठ, हर चौपाई का सरल अर्थ, कठिन शब्द, भावार्थ और गीता प्रेस से पाठभेद।
नमो नमो दुर्गे सुख करनी।नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥१॥
अर्थ: सुख देने वाली दुर्गा माँ, आपको बार-बार नमस्कार है। दुःख हरने वाली अम्बे माँ, आपको बार-बार नमस्कार है।
निरंकार है ज्योति तुम्हारी।तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥२॥
अर्थ: आपकी ज्योति निराकार है, और उसका उजाला तीनों लोकों में फैला है।
शशि ललाट मुख महाविशाला।नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥३॥
अर्थ: आपके माथे पर चंद्रमा है और मुख बड़ा और तेजस्वी है। आपकी आँखें लाल हैं और भौंहें विकराल हैं।
रूप मातु को अधिक सुहावे।दरश करत जन अति सुख पावे ॥४॥
अर्थ: माँ का रूप बहुत सुहावना है; उसके दर्शन से भक्तों को बड़ा सुख मिलता है।
तुम संसार शक्ति लय कीना।पालन हेतु अन्न धन दीना ॥५॥
अर्थ: संसार की सारी शक्ति आप में ही लीन है। संसार के पालन के लिए आपने अन्न और धन दिया।
अन्नपूर्णा हुई जग पाला।तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥६॥
अर्थ: आप ही अन्नपूर्णा बनकर जगत का पालन करती हैं। आप ही आदि शक्ति हैं, सुंदरी और बाला रूप में।
प्रलयकाल सब नाशन हारी।तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥७॥
अर्थ: प्रलय के समय सबका अंत करने वाली आप ही हैं। आप ही शिव-शंकर की प्रिय गौरी हैं।
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥८॥
अर्थ: योगी शिव आपके गुण गाते हैं, और ब्रह्मा तथा विष्णु नित आपका ध्यान करते हैं।
रूप सरस्वती को तुम धारा।दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥९॥
अर्थ: आपने सरस्वती का रूप धारण किया और ऋषि-मुनियों को सद्बुद्धि देकर उनका उद्धार किया।
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।परगट भई फाड़कर खम्बा ॥१०॥
अर्थ: हे अम्बा, आपने नरसिंह का रूप धारण किया और खंभा फाड़कर प्रकट हुईं। चालीसा नरसिंह अवतार को भी देवी की ही शक्ति मानती है।
रक्षा करि प्रहलाद बचायो।हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ॥११॥
अर्थ: आपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा करके उसे बचाया, और उसके पिता हिरण्यकशिपु का वध करके उसे स्वर्ग भेजा।
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।श्री नारायण अंग समाहीं ॥१२॥
अर्थ: आपने संसार में लक्ष्मी का रूप धारण किया और श्री नारायण के अंग में समा गईं।
क्षीरसिन्धु में करत विलासा।दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥१३॥
अर्थ: आप क्षीरसागर में निवास करती हैं। हे दया की सागर, मेरे मन की आशा पूरी कीजिए।
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।महिमा अमित न जात बखानी ॥१४॥
अर्थ: हिंगलाज शक्तिपीठ में आप ही भवानी रूप में विराजती हैं। आपकी महिमा अपार है, उसका वर्णन नहीं हो सकता।
मातंगी अरु धूमावति माता।भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ॥१५॥
अर्थ: माता मातंगी और धूमावती भी आप ही हैं, और सुख देने वाली भुवनेश्वरी और बगलामुखी भी। ये दस महाविद्याओं में से हैं।
श्री भैरव तारा जग तारिणी।छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥१६॥
अर्थ: आप ही भैरवी और जगत को तारने वाली तारा हैं, और छिन्नमस्ता रूप में संसार के दुःख दूर करती हैं।
केहरि वाहन सोह भवानी।लांगुर वीर चलत अगवानी ॥१७॥
अर्थ: हे भवानी, आप सिंह की सवारी पर सुशोभित हैं, और वीर लांगुर आपके आगे-आगे चलते हैं। लोक-परंपरा में लांगुर को देवी का अग्रगामी सेवक माना जाता है।
कर में खप्पर खड्ग विराजै।जाको देख काल डर भाजै ॥१८॥
अर्थ: आपके हाथों में खप्पर और खड्ग शोभा देते हैं, जिन्हें देखकर काल भी डरकर भाग जाता है।
सोहै अस्त्र और त्रिशूला।जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥१९॥
अर्थ: आपके हाथों में अस्त्र और त्रिशूल शोभित हैं, जिन्हें देखकर शत्रु के हृदय में पीड़ा उठती है।
नगरकोट में तुम्हीं विराजत।तिहुँलोक में डंका बाजत ॥२०॥
अर्थ: नगरकोट (कांगड़ा) में आप ही विराजती हैं; तीनों लोकों में आपका डंका बजता है।
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।रक्तबीज शंखन संहारे ॥२१॥
अर्थ: आपने शुंभ और निशुंभ दानवों को मारा, और रक्तबीज जैसे अनगिनत असुरों का संहार किया।
महिषासुर नृप अति अभिमानी।जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥२२॥
अर्थ: महिषासुर राजा बड़ा अभिमानी था; उसके पापों के बोझ से धरती व्याकुल हो गई थी।
रूप कराल कालिका धारा।सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥२३॥
अर्थ: तब आपने कालिका का विकराल रूप धारण किया और उसकी सेना सहित उसका संहार किया।
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब।भई सहाय मातु तुम तब तब ॥२४॥
अर्थ: जब-जब संतों पर कठिन विपत्ति पड़ी, तब-तब हे माँ, आप उनकी सहायक बनीं।
अमरपुरी अरु बासव लोका।तब महिमा सब रहें अशोका ॥२५॥
अर्थ: देवताओं की अमरपुरी और इंद्र का लोक भी आपकी महिमा से ही शोक रहित रहते हैं। गीता प्रेस के पाठ में यहाँ “तव महिमा” (आपकी महिमा) छपा है।
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।तुम्हें सदा पूजें नर-नारी ॥२६॥
अर्थ: ज्वाला देवी के धाम में जलने वाली ज्योति आपकी ही है; नर-नारी सदा आपकी पूजा करते हैं।
प्रेम भक्ति से जो यश गावें।दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ॥२७॥
अर्थ: चालीसा कहती है कि जो प्रेम और भक्ति से आपका यश गाते हैं, दुःख और दरिद्रता उनके पास नहीं आते।
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई ॥२८॥
अर्थ: जो मनुष्य मन लगाकर आपका ध्यान करता है, उसका जन्म-मरण का बंधन छूट जाता है।
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥२९॥
अर्थ: योगी, देवता और मुनि पुकारकर कहते हैं कि आपकी शक्ति के बिना योग सिद्ध नहीं होता।
शंकर आचारज तप कीनो।काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥३०॥
अर्थ: यहाँ से चार चौपाइयों में शंकराचार्य से जुड़ी एक कथा है: शंकराचार्य ने तप किया और काम, क्रोध सबको जीत लिया।
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥३१॥
अर्थ: वे दिन-रात भगवान शंकर का ध्यान करते रहे, पर कभी आपका स्मरण नहीं किया।
शक्ति रूप का मरम न पायो।शक्ति गई तब मन पछितायो ॥३२॥
अर्थ: वे शक्ति-रूप का रहस्य नहीं समझ पाए। जब उनकी शक्ति चली गई, तब वे मन में पछताए।
शरणागत हुई कीर्ति बखानी।जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥३३॥
अर्थ: तब वे आपकी शरण में आए और आपकी कीर्ति गाई: जय जय जय जगदम्बा भवानी।
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥३४॥
अर्थ: तब आदि जगदम्बा प्रसन्न हुईं और बिना देर किए उन्हें शक्ति लौटा दी।
मोको मातु कष्ट अति घेरो।तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥३५॥
अर्थ: हे माँ, मुझे बड़े कष्ट ने घेर रखा है; आपके बिना मेरा दुःख कौन हरेगा?
आशा तृष्णा निपट सतावें।मोह मदादिक सब बिनशावें ॥३६॥
अर्थ: आशा और तृष्णा मुझे बहुत सताती हैं, और मोह, मद जैसे दोष मुझे नष्ट कर रहे हैं; इनसे मुझे बचाइए।
शत्रु नाश कीजै महारानी।सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥३७॥
अर्थ: हे महारानी, शत्रुओं का नाश कीजिए। हे भवानी, मैं एकाग्र मन से आपका स्मरण करता हूँ।
करो कृपा हे मातु दयाला।ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला ॥३८॥
अर्थ: हे दयालु माँ, कृपा कीजिए; ऋद्धि-सिद्धि देकर मुझे निहाल कर दीजिए।
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ।तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥३९॥
अर्थ: जब तक मैं जीऊँ, आपकी दया का फल पाता रहूँ, और सदा आपका यश सुनाता रहूँ।
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।सब सुख भोग परमपद पावै ॥४०॥
अर्थ: चालीसा कहती है कि जो कोई दुर्गा चालीसा गाता है, वह सब सुख भोगकर अंत में परम पद पाता है।
देवीदास शरण निज जानी।करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
अर्थ: हे जगदम्बा भवानी, देवीदास को अपनी शरण में आया जानकर उस पर कृपा कीजिए।
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दुर्गा चालीसा माँ दुर्गा की सबसे प्रचलित हिन्दी स्तुति है। इसमें आरंभ या अंत का कोई दोहा नहीं है; सीधे चालीस चौपाइयाँ हैं, और उनके बाद देवीदास की विनती वाली एक चौपाई।
चालीसा माँ के रूप का वर्णन करके उनके अनेक रूप गिनाती है: अन्नपूर्णा, गौरी, सरस्वती, लक्ष्मी, नरसिंह रूप, और मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी, बगला, भैरवी, तारा, छिन्नमस्ता जैसी महाविद्याएँ। फिर हिंगलाज, नगरकोट और ज्वाला जैसे शक्तिपीठों, शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज और महिषासुर के वध की बात आती है। अंत में भक्त अपना कष्ट कहकर माँ से कृपा माँगता है।
सुख देने वाली दुर्गा माँ, आपको बार-बार नमस्कार है। दुःख हरने वाली अम्बे माँ, आपको बार-बार नमस्कार है।
आपकी ज्योति निराकार है, और उसका उजाला तीनों लोकों में फैला है।
आपके माथे पर चंद्रमा है और मुख बड़ा और तेजस्वी है। आपकी आँखें लाल हैं और भौंहें विकराल हैं।
माँ का रूप बहुत सुहावना है; उसके दर्शन से भक्तों को बड़ा सुख मिलता है।
संसार की सारी शक्ति आप में ही लीन है। संसार के पालन के लिए आपने अन्न और धन दिया।
आप ही अन्नपूर्णा बनकर जगत का पालन करती हैं। आप ही आदि शक्ति हैं, सुंदरी और बाला रूप में।
प्रलय के समय सबका अंत करने वाली आप ही हैं। आप ही शिव-शंकर की प्रिय गौरी हैं।
योगी शिव आपके गुण गाते हैं, और ब्रह्मा तथा विष्णु नित आपका ध्यान करते हैं।
आपने सरस्वती का रूप धारण किया और ऋषि-मुनियों को सद्बुद्धि देकर उनका उद्धार किया।
हे अम्बा, आपने नरसिंह का रूप धारण किया और खंभा फाड़कर प्रकट हुईं। चालीसा नरसिंह अवतार को भी देवी की ही शक्ति मानती है।
आपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा करके उसे बचाया, और उसके पिता हिरण्यकशिपु का वध करके उसे स्वर्ग भेजा।
आपने संसार में लक्ष्मी का रूप धारण किया और श्री नारायण के अंग में समा गईं।
आप क्षीरसागर में निवास करती हैं। हे दया की सागर, मेरे मन की आशा पूरी कीजिए।
हिंगलाज शक्तिपीठ में आप ही भवानी रूप में विराजती हैं। आपकी महिमा अपार है, उसका वर्णन नहीं हो सकता।
माता मातंगी और धूमावती भी आप ही हैं, और सुख देने वाली भुवनेश्वरी और बगलामुखी भी। ये दस महाविद्याओं में से हैं।
आप ही भैरवी और जगत को तारने वाली तारा हैं, और छिन्नमस्ता रूप में संसार के दुःख दूर करती हैं।
हे भवानी, आप सिंह की सवारी पर सुशोभित हैं, और वीर लांगुर आपके आगे-आगे चलते हैं। लोक-परंपरा में लांगुर को देवी का अग्रगामी सेवक माना जाता है।
आपके हाथों में खप्पर और खड्ग शोभा देते हैं, जिन्हें देखकर काल भी डरकर भाग जाता है।
आपके हाथों में अस्त्र और त्रिशूल शोभित हैं, जिन्हें देखकर शत्रु के हृदय में पीड़ा उठती है।
नगरकोट (कांगड़ा) में आप ही विराजती हैं; तीनों लोकों में आपका डंका बजता है।
आपने शुंभ और निशुंभ दानवों को मारा, और रक्तबीज जैसे अनगिनत असुरों का संहार किया।
महिषासुर राजा बड़ा अभिमानी था; उसके पापों के बोझ से धरती व्याकुल हो गई थी।
तब आपने कालिका का विकराल रूप धारण किया और उसकी सेना सहित उसका संहार किया।
जब-जब संतों पर कठिन विपत्ति पड़ी, तब-तब हे माँ, आप उनकी सहायक बनीं।
देवताओं की अमरपुरी और इंद्र का लोक भी आपकी महिमा से ही शोक रहित रहते हैं। गीता प्रेस के पाठ में यहाँ “तव महिमा” (आपकी महिमा) छपा है।
ज्वाला देवी के धाम में जलने वाली ज्योति आपकी ही है; नर-नारी सदा आपकी पूजा करते हैं।
चालीसा कहती है कि जो प्रेम और भक्ति से आपका यश गाते हैं, दुःख और दरिद्रता उनके पास नहीं आते।
जो मनुष्य मन लगाकर आपका ध्यान करता है, उसका जन्म-मरण का बंधन छूट जाता है।
योगी, देवता और मुनि पुकारकर कहते हैं कि आपकी शक्ति के बिना योग सिद्ध नहीं होता।
यहाँ से चार चौपाइयों में शंकराचार्य से जुड़ी एक कथा है: शंकराचार्य ने तप किया और काम, क्रोध सबको जीत लिया।
वे दिन-रात भगवान शंकर का ध्यान करते रहे, पर कभी आपका स्मरण नहीं किया।
वे शक्ति-रूप का रहस्य नहीं समझ पाए। जब उनकी शक्ति चली गई, तब वे मन में पछताए।
तब वे आपकी शरण में आए और आपकी कीर्ति गाई: जय जय जय जगदम्बा भवानी।
तब आदि जगदम्बा प्रसन्न हुईं और बिना देर किए उन्हें शक्ति लौटा दी।
हे माँ, मुझे बड़े कष्ट ने घेर रखा है; आपके बिना मेरा दुःख कौन हरेगा?
आशा और तृष्णा मुझे बहुत सताती हैं, और मोह, मद जैसे दोष मुझे नष्ट कर रहे हैं; इनसे मुझे बचाइए।
हे महारानी, शत्रुओं का नाश कीजिए। हे भवानी, मैं एकाग्र मन से आपका स्मरण करता हूँ।
हे दयालु माँ, कृपा कीजिए; ऋद्धि-सिद्धि देकर मुझे निहाल कर दीजिए।
जब तक मैं जीऊँ, आपकी दया का फल पाता रहूँ, और सदा आपका यश सुनाता रहूँ।
चालीसा कहती है कि जो कोई दुर्गा चालीसा गाता है, वह सब सुख भोगकर अंत में परम पद पाता है।
हे जगदम्बा भवानी, देवीदास को अपनी शरण में आया जानकर उस पर कृपा कीजिए।
दुर्गा चालीसा का भाव यह है कि एक ही आदि शक्ति सब रूपों में है। वही अन्नपूर्णा बनकर पालती है, गौरी बनकर शिव के साथ है, सरस्वती बनकर बुद्धि देती है, लक्ष्मी बनकर नारायण के साथ है, और प्रलय में सबको अपने में समेट लेती है। महाविद्याएँ, शक्तिपीठ और असुरों का वध, सब उसी शक्ति के काम बताए गए हैं।
चालीसा शंकराचार्य की एक कथा भी कहती है: केवल शिव का ध्यान करने वाले शंकराचार्य जब शक्ति के बिना असहाय हुए, तब उन्होंने देवी की शरण ली और माँ ने तुरंत शक्ति लौटा दी। इसके बाद भक्त अपनी बात कहता है: कष्ट, आशा-तृष्णा और मोह से घिरा है, माँ के सिवा कोई सहारा नहीं। अंत में वह बस इतना माँगता है कि जीवन भर माँ की दया मिले और वह उनका यश गाता रहे।
चौपाई 27 और 40 दुर्गा चालीसा की फलश्रुति हैं। चालीसा अपने वचनों में कहती है कि प्रेम और भक्ति से माँ का यश गाने वालों के पास दुःख और दरिद्रता नहीं आते, और जो इसे गाता है वह सुख भोगकर परम पद पाता है। यहाँ इन्हें चालीसा के अपने वचन के रूप में दिया गया है।
प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥चालीसा कहती है कि जो प्रेम और भक्ति से आपका यश गाते हैं, दुःख और दरिद्रता उनके पास नहीं आते।
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥चालीसा कहती है कि जो कोई दुर्गा चालीसा गाता है, वह सब सुख भोगकर अंत में परम पद पाता है।
दुर्गा चालीसा नवरात्रि में घर-घर पढ़ी जाती है। बहुत से परिवार नौ दिनों तक रोज़ आरती से पहले इसका पाठ करते हैं, और माता की चौकी, जागरण, दुर्गा अष्टमी और शुक्रवार की पूजा में भी यह गाई जाती है।
जो लोग दुर्गा सप्तशती का संस्कृत पाठ नहीं कर पाते, उनके लिए यह सरल हिन्दी में माँ की महिमा का स्मरण है। इसमें शक्तिपीठों और महाविद्याओं के नाम आने से यह देवी के अलग-अलग रूपों और धामों को एक साथ याद करने का माध्यम भी बन जाती है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| चौपाई 1 | नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी | sanskritdocuments.org के क्रमांकित पाठ और भक्ति भारत में दूसरी पंक्ति में भी “दुर्गे”; sanskritdocuments.org के “मूल पाठ” और गीता प्रेस में “अम्बे”। |
| चौपाई 5 | तुम संसार शक्ति लै कीना | sanskritdocuments.org के क्रमांकित पाठ में “लय” की जगह “लै”। |
| चौपाई 11 | हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो | sanskritdocuments.org के क्रमांकित पाठ और भक्ति भारत में। नरसिंह कथा में प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु थे; sanskritdocuments.org के मूल पाठ में “हिरणाकुश” और गीता प्रेस में “हिरनाकुस” है। |
| चौपाई 23 | रूप कराल काली को धारा | गीता प्रेस की पुस्तिका में “कालिका” की जगह। |
| चौपाई 25 | अमर पुरी औरों सब लोका। तव महिमा सब रहै असोका॥ | गीता प्रेस की पुस्तिका में: अमरपुरी और सब लोक आपकी महिमा से शोक रहित रहते हैं। |
| चौपाई 36 | आसा तृस्ना निपट सतावै। रिपु मूरख मोहि अति डरपावै॥ | गीता प्रेस की पुस्तिका में दूसरी पंक्ति अलग है: मूर्ख शत्रु मुझे बहुत डराते हैं। |
| चौपाई 40 | श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै | sanskritdocuments.org के क्रमांकित पाठ और भक्ति भारत में; वहाँ के मूल पाठ में “दुर्गा चालीसा जो जन गावे”। गीता प्रेस में “दुर्गा चालीसा जो कोई गावै”। |
| अंत में | शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे निःशंक। मैं आया तेरी शरण में, मातु लीजिये अंक॥ | भक्ति भारत और कुछ नई पुस्तकों में अंत में यह दोहा मिलता है; sanskritdocuments.org और गीता प्रेस के पाठ में नहीं है, इसलिए यहाँ नहीं जोड़ा गया। |
| पूरा पाठ | ससि ललाट मुख महा बिसाला… | गीता प्रेस की पुस्तिका पूरा पाठ अवधी वर्तनी में छापती है (ससि, सक्ति, सिव, बिष्णु, असोका)। यहाँ प्रचलित वर्तनी वाला पाठ है। |
अंतिम चौपाई “देवीदास शरण निज जानी” में यह नाम आता है, इसलिए इन्हें रचयिता माना जाता है। इनके बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org के दोनों पाठ (क्रमांकित और “मूल पाठ”) गीता प्रेस की पुस्तिका 1033 (archive.org OCR) और भक्ति भारत के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाए। हर पंक्ति sanskritdocuments.org के किसी एक पाठ में ज्यों की त्यों मिलती है। आधार sanskritdocuments.org का क्रमांकित पाठ है, जो प्रचलित वर्तनी में है। जहाँ वह भूल लगा, वहाँ उसी पृष्ठ के मूल पाठ का शब्द लिया, जो गीता प्रेस से मेल खाता है: चौपाई 1 में “अम्बे”, चौपाई 5 में “लय”, चौपाई 11 में “हिरणाकुश”, चौपाई 40 में “श्री” के बिना। गीता प्रेस के अलग शब्द पाठभेद में दिए हैं।
दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।
दुर्गा · आरती
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
दुर्गा · स्तोत्र · संस्कृत
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
दुर्गा · स्तोत्र · संस्कृत
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्
दुर्गा · स्तुति · संस्कृत
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः
दुर्गा · स्तोत्र · संस्कृत
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी
अंतिम चौपाई में “देवीदास” नाम आता है, इसलिए उन्हें रचयिता माना जाता है। उनके बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
सबसे अधिक नवरात्रि के नौ दिनों में; इसके अलावा दुर्गा अष्टमी, शुक्रवार और माता की चौकी या जागरण में।
ये देवी के प्रसिद्ध धाम हैं: हिंगलाज एक प्राचीन शक्तिपीठ है, नगरकोट कांगड़ा का पुराना नाम है, और ज्वाला ज्वाला देवी का धाम है जहाँ ज्योति की पूजा होती है।
चालीसा के अनुसार शंकराचार्य केवल शिव का ध्यान करते थे और शक्ति के महत्व को नहीं समझे; शक्ति खोने पर उन्होंने देवी की शरण ली और माँ ने उन्हें तुरंत शक्ति लौटा दी। यह कथा देवी-भक्ति की परंपरा में कही जाती है।
sanskritdocuments.org और गीता प्रेस के पाठ में कोई दोहा नहीं है; चालीसा देवीदास वाली चौपाई पर पूरी होती है। कुछ पुस्तकों में बाद में जुड़ा एक दोहा मिलता है, जो पाठभेद में दिया गया है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।