दुर्गा पूजा विधि
दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।

आरती · दुर्गा
माँ दुर्गा की सबसे प्रसिद्ध आरती, जो नवरात्रि और शुक्रवार को घर-घर गाई जाती है। पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ, भावार्थ और पाठभेद।
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
अर्थ: हे अम्बे, हे गौरी, हे श्यामा गौरी माँ, आपकी जय हो। विष्णु, ब्रह्मा और शिव भी दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।
माँग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: आपकी माँग में सिंदूर और माथे पर कस्तूरी का टीका शोभा पाता है। आपकी दोनों आँखें उजली हैं और चंद्रमा जैसा मुख सुंदर है।
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: आपका शरीर सोने जैसा चमकता है और आप लाल वस्त्र पहने हैं। गले में लाल फूलों की माला है, जो कंठ पर सजती है।
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: आप सिंह की सवारी पर विराजती हैं और तलवार व खप्पर धारण करती हैं। देवता, मनुष्य और मुनि आपकी सेवा करते हैं, और आप उनके दुख हरती हैं।
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: आपके कानों में कुंडल और नाक में मोती शोभा पाते हैं। आपकी ज्योति करोड़ों चंद्रमाओं और सूर्यों के समान चमकती है।
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: आपने शुम्भ और निशुम्भ को नष्ट किया और महिषासुर का वध किया। धूम्रविलोचन असुर का भी आपने नाश किया; आपकी आँखें दिन-रात तेज और मस्ती से भरी रहती हैं।
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: आपने चण्ड और मुण्ड का संहार किया और रक्तबीज को मारा। मधु और कैटभ दोनों को मारकर आपने देवताओं को भय से मुक्त किया।
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: आप ही ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला (लक्ष्मी) हैं। शास्त्र और वेद आपका गुणगान करते हैं, और आप शिव की पटरानी हैं।
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरूँ।बाजत ताल मृदंगा, औ बाजत डमरू॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: आपके सामने चौंसठ योगिनियाँ मंगल गीत गाती हैं और भैरव नृत्य करते हैं। ताल, मृदंग और डमरू बजते हैं।
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: आप ही जगत की माता हैं और आप ही उसका भरण-पोषण करती हैं। आप भक्तों का दुख हरती हैं और उन्हें सुख-संपत्ति देती हैं।
भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी।मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: आपकी चार भुजाएँ बहुत सुंदर हैं और एक हाथ वर देने की मुद्रा में है। आरती कहती है कि जो स्त्री-पुरुष आपकी सेवा करते हैं, वे मनचाहा फल पाते हैं।
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: सोने की थाली में अगर और कपूर की बाती जल रही है, और “श्रीमालकेतु” में करोड़ों रत्नों जैसी ज्योति शोभा पा रही है।
श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे।कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे॥
॥ जय अम्बे गौरी ॥
अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि श्री अम्बे जी की यह आरती जो कोई गाता है, उसे सुख-संपत्ति मिलती है। यह बात शिवानंद स्वामी कहते हैं।
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“जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी” माँ दुर्गा की आरती है, जो नवरात्रि, दुर्गाष्टमी, शुक्रवार और माता की चौकी में सबसे अधिक गाई जाती है। इसमें माँ के रूप का वर्णन है: माँग में सिंदूर, सिंह की सवारी, हाथ में खड्ग और खप्पर; और उन असुरों के नाम हैं जिनका संहार देवी ने किया, जैसे महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज।
अंतिम अंतरे में “कहत शिवानंद स्वामी” आता है। गीता प्रेस के आरती-संग्रह में यह “श्रीअम्बाजी” शीर्षक से छपी है, और प्रचलित पाठ गीता प्रेस के पाठ से बहुत मिलता है। जहाँ स्रोतों में अंतर था, वह नीचे पाठभेद में दिया है।
हे अम्बे, हे गौरी, हे श्यामा गौरी माँ, आपकी जय हो। विष्णु, ब्रह्मा और शिव भी दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।
आपकी माँग में सिंदूर और माथे पर कस्तूरी का टीका शोभा पाता है। आपकी दोनों आँखें उजली हैं और चंद्रमा जैसा मुख सुंदर है।
आपका शरीर सोने जैसा चमकता है और आप लाल वस्त्र पहने हैं। गले में लाल फूलों की माला है, जो कंठ पर सजती है।
आप सिंह की सवारी पर विराजती हैं और तलवार व खप्पर धारण करती हैं। देवता, मनुष्य और मुनि आपकी सेवा करते हैं, और आप उनके दुख हरती हैं।
आपके कानों में कुंडल और नाक में मोती शोभा पाते हैं। आपकी ज्योति करोड़ों चंद्रमाओं और सूर्यों के समान चमकती है।
आपने शुम्भ और निशुम्भ को नष्ट किया और महिषासुर का वध किया। धूम्रविलोचन असुर का भी आपने नाश किया; आपकी आँखें दिन-रात तेज और मस्ती से भरी रहती हैं।
आपने चण्ड और मुण्ड का संहार किया और रक्तबीज को मारा। मधु और कैटभ दोनों को मारकर आपने देवताओं को भय से मुक्त किया।
आप ही ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला (लक्ष्मी) हैं। शास्त्र और वेद आपका गुणगान करते हैं, और आप शिव की पटरानी हैं।
आपके सामने चौंसठ योगिनियाँ मंगल गीत गाती हैं और भैरव नृत्य करते हैं। ताल, मृदंग और डमरू बजते हैं।
आप ही जगत की माता हैं और आप ही उसका भरण-पोषण करती हैं। आप भक्तों का दुख हरती हैं और उन्हें सुख-संपत्ति देती हैं।
आपकी चार भुजाएँ बहुत सुंदर हैं और एक हाथ वर देने की मुद्रा में है। आरती कहती है कि जो स्त्री-पुरुष आपकी सेवा करते हैं, वे मनचाहा फल पाते हैं।
सोने की थाली में अगर और कपूर की बाती जल रही है, और “श्रीमालकेतु” में करोड़ों रत्नों जैसी ज्योति शोभा पा रही है।
आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि श्री अम्बे जी की यह आरती जो कोई गाता है, उसे सुख-संपत्ति मिलती है। यह बात शिवानंद स्वामी कहते हैं।
आरती माँ के दर्शन से शुरू होती है: सिंदूर, कस्तूरी का टीका, चंद्रमा जैसा मुख, सोने जैसा शरीर, लाल वस्त्र, कानों में कुंडल और नाक में मोती। फिर माँ का पराक्रम आता है: सिंह की सवारी, हाथ में खड्ग और खप्पर, और महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, धूम्रविलोचन, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज और मधु-कैटभ जैसे असुरों का अंत, जिनकी कथाएँ दुर्गा सप्तशती में हैं।
इसके बाद आरती माँ को सब रूपों में एक बताती है: वही ब्रह्माणी, रुद्राणी और लक्ष्मी हैं, वही शिव की पटरानी हैं, वही जगत की माता और पालनहार हैं। भाव यह है कि जो शक्ति असुरों का नाश करती है, वही अपने भक्तों के लिए माँ है, जो उनका दुख हरती है और वर देने को हाथ उठाए रहती है।
अंतरा 12 इस आरती की फलश्रुति है। आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि अम्बे जी की यह आरती गाने वाले को सुख-संपत्ति मिलती है; यहाँ यह आरती के अपने वचन के रूप में दिया है।
श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे॥आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि श्री अम्बे जी की यह आरती जो कोई गाता है, उसे सुख-संपत्ति मिलती है। यह बात शिवानंद स्वामी कहते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| मुखड़ा | ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी | वेबदुनिया में; भक्ति भारत में अंतरों के बाद “ॐ जय अम्बे गौरी” दोहराया गया है। |
| मुखड़ा | तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी | भक्ति भारत और वेबदुनिया में “निशदिन”; गीता प्रेस और द्रिक पंचांग में “निशिदिन”। |
| अंतरा 3 | केहरि वाहन राजत, खड्ग खपर धारी | गीता प्रेस; sanskritdocuments.org में “खड्ग कृपाण धारी”। |
| अंतरा 4 | कोटिक चंद्र दिवाकर राजत समज्योति | वेबदुनिया में शब्दों का क्रम यह है। |
| अंतरा 8 | चौंसठ योगिनि गावत, नृत्य करत भैरूँ | गीता प्रेस और sanskritdocuments.org में “मंगल” शब्द नहीं है। भक्ति भारत और वेबदुनिया में दूसरी पंक्ति “अरू बाजत डमरू”। |
| अंतरा 10 | भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्पर धारी | भक्ति भारत इसे “वर मुद्रा धारी” के साथ दूसरे पाठ के रूप में देता है। |
| अंतरा 12 | माँ अम्बे की आरती जो कोई नर गावे | sanskritdocuments.org का पाठ। |
अंतिम अंतरे की पंक्ति “कहत शिवानंद स्वामी” ही इसका आधार है; “ॐ जय शिव ओंकारा” के अंत में भी यही नाम आता है। शिवानंद स्वामी के बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति भक्ति भारत, द्रिक पंचांग, गीता प्रेस के आरती-संग्रह (कोड 153, archive.org पर स्कैन से पढ़ा गया पाठ), sanskritdocuments.org (आरती संग्रह) और वेबदुनिया से मिलाई। हर पंक्ति कम से कम दो स्रोतों में है (वर्तनी के छोटे अंतर छोड़कर)। प्रचलित पाठ और गीता प्रेस का पाठ लगभग एक हैं। जहाँ वेब स्रोत अलग थे, वहाँ गीता प्रेस वाला शब्द चुना: “निशिदिन” (गीता प्रेस, द्रिक पंचांग), “औ बाजत डमरू” (गीता प्रेस; sanskritdocuments में “और”)। अंतरा 8 में “मंगल गावत” भक्ति भारत, द्रिक पंचांग और वेबदुनिया के बहुमत से रखा, गीता प्रेस में यह शब्द नहीं है। “खप्पर” सब वेब स्रोतों की वर्तनी है, गीता प्रेस “खपर” लिखता है। “श्रीमालकेतु” का स्पष्ट अर्थ किसी स्रोत में नहीं मिला, इसलिए अर्थ में शब्द को वैसे ही रखा।
दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।
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अंतिम अंतरे में “कहत शिवानंद स्वामी” आता है, इसलिए इसे शिवानंद स्वामी की रचना माना जाता है। उनके जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
“शिवरी” में “री” संबोधन का शब्द है। पूरी पंक्ति का अर्थ है: विष्णु, ब्रह्मा और शिव भी दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।
नवरात्रि में माँ की पूजा के बाद, सुबह और शाम दोनों समय, यह आरती गाई जाती है। जितना संभव हो, उतना करें; श्रद्धा से एक बार गाना भी पूरा है।
दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण) में। उसमें मधु-कैटभ, महिषासुर, धूम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज और शुम्भ-निशुम्भ के अंत की कथाएँ हैं।
नहीं, ये दो अलग आरतियाँ हैं, हालाँकि दोनों माँ दुर्गा की पूजा में गाई जाती हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।