दुर्गा पूजा विधि
दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।

ॐ अस्य श्रीकुञ्जिकास्तोत्रमन्त्रस्य सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,श्रीत्रिगुणात्मिका देवता, ॐ ऐं बीजं, ॐ ह्रीं शक्तिः, ॐ क्लीं कीलकम्,मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
oṃ asya śrīkuñjikāstotramantrasya sadāśiva ṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ,
śrītriguṇātmikā devatā, oṃ aiṃ bījaṃ, oṃ hrīṃ śaktiḥ, oṃ klīṃ kīlakam,
mama sarvābhīṣṭasiddhyarthe jape viniyogaḥ |
अर्थ: इस कुञ्जिका स्तोत्र रूपी मन्त्र के ऋषि सदाशिव हैं, छन्द अनुष्टुप् है, देवता त्रिगुणात्मिका देवी हैं; "ऐं" इसका बीज है, "ह्रीं" शक्ति और "क्लीं" कीलक। अपनी सब शुभ कामनाओं की सिद्धि के लिए इसका जप में विनियोग किया जाता है।
शिव उवाच ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ॥१॥
śṛṇu devi pravakṣyāmi kuñjikāstotramuttamam |
yena mantraprabhāveṇa caṇḍījāpaḥ śubho bhavet ||
अर्थ: शिव जी कहते हैं: हे देवी, सुनो, मैं उत्तम कुञ्जिका स्तोत्र बताता हूँ, जिस मन्त्र के प्रभाव से चण्डी (सप्तशती) का जप शुभ और सफल होता है।
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥२॥
na kavacaṃ nārgalāstotraṃ kīlakaṃ na rahasyakam |
na sūktaṃ nāpi dhyānaṃ ca na nyāso na ca vārcanam ||
अर्थ: (इसके पाठ से) न कवच की, न अर्गला स्तोत्र की, न कीलक की, न रहस्य की, न सूक्त की, न ध्यान की, न न्यास की और न अर्चन की आवश्यकता रहती है; ऐसा शिव जी इस श्लोक में कहते हैं।
कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥३॥
kuñjikāpāṭhamātreṇa durgāpāṭhaphalaṃ labhet |
ati guhyataraṃ devi devānāmapi durlabham ||
अर्थ: यह श्लोक कहता है: केवल कुञ्जिका के पाठ से दुर्गा पाठ (सप्तशती) का फल मिलता है। हे देवी, यह अत्यंत गुप्त है और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति ।मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥४॥
gopanīyaṃ prayatnena svayoniriva pārvati |
māraṇaṃ mohanaṃ vaśyaṃ stambhanoccāṭanādikam |
pāṭhamātreṇa saṃsiddhyet kuñjikāstotramuttamam ||
अर्थ: हे पार्वती, जैसे अपने गुप्त अंग को छिपाकर रखा जाता है, वैसे ही इसे प्रयत्न से गुप्त रखना चाहिए। यह श्लोक कहता है कि यह उत्तम कुञ्जिका स्तोत्र केवल पाठ से मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन जैसे (तन्त्र के) कर्म सिद्ध कर देता है।
अथ मन्त्रः ।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वलऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥५॥
oṃ aiṃ hrīṃ klīṃ cāmuṇḍāyai vicce |
oṃ glauṃ huṃ klīṃ jūṃ saḥ jvālaya jvālaya jvala jvala prajvala prajvala
aiṃ hrīṃ klīṃ cāmuṇḍāyai vicce jvala haṃ saṃ laṃ kṣaṃ phaṭ svāhā ||
अर्थ: यह कुञ्जिका का मन्त्र है। पहली पंक्ति नवार्ण मन्त्र है, जिसमें "ऐं ह्रीं क्लीं" बीज-अक्षर हैं और "चामुण्डायै विच्चे" चामुण्डा देवी को सम्बोधन है। आगे के अधिकांश अक्षर भी बीज हैं, जिनका शब्दार्थ नहीं किया जाता; "ज्वालय, ज्वल, प्रज्वल" का अर्थ है जलाओ, प्रकाशित करो और (मन्त्र को) पूरी तरह प्रज्वलित करो।
इति मन्त्रः ।
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि ।नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥६॥
namaste rudrarūpiṇyai namaste madhumardini |
namaḥ kaiṭabhahāriṇyai namaste mahiṣārdini ||
अर्थ: हे रुद्र-रूपिणी, तुम्हें नमस्कार; हे मधु को मारने वाली, तुम्हें नमस्कार; कैटभ का अंत करने वाली को नमस्कार; हे महिषासुर को मारने वाली, तुम्हें नमस्कार।
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि ।जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ॥७॥
namaste śumbhahantryai ca niśumbhāsuraghātini |
jāgrataṃ hi mahādevi japaṃ siddhaṃ kuruṣva me ||
अर्थ: शुम्भ का वध करने वाली और निशुम्भ असुर को मारने वाली, तुम्हें नमस्कार। हे महादेवी, मेरे जप को जाग्रत और सिद्ध करो।
ऐङ्कारी सृष्टिरूपायै ह्रीङ्कारी प्रतिपालिका ।क्लीङ्कारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥८॥
aiṅkārī sṛṣṭirūpāyai hrīṅkārī pratipālikā |
klīṅkārī kāmarūpiṇyai bījarūpe namo’stu te ||
अर्थ: "ऐं" के रूप में तुम सृष्टि-रूपा हो, "ह्रीं" के रूप में पालन करने वाली, और "क्लीं" के रूप में काम-रूपा (इच्छा-शक्ति)। हे बीज-रूपा देवी, तुम्हें नमस्कार है।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥९॥
cāmuṇḍā caṇḍaghātī ca yaikārī varadāyinī |
vicce cābhayadā nityaṃ namaste mantrarūpiṇi ||
अर्थ: "चामुण्डा" के रूप में तुम चण्ड का नाश करने वाली हो, "यै" के रूप में वर देने वाली, और "विच्चे" के रूप में सदा अभय देने वाली। हे मन्त्र-रूपिणी, तुम्हें नमस्कार है। (यह श्लोक नवार्ण मन्त्र के अक्षरों को देवी के रूप बताता है।)
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥१०॥
dhāṃ dhīṃ dhūṃ dhūrjaṭeḥ patnī vāṃ vīṃ vūṃ vāgadhīśvarī |
krāṃ krīṃ krūṃ kālikā devi śāṃ śīṃ śūṃ me śubhaṃ kuru ||
अर्थ: "धां धीं धूं" के रूप में तुम धूर्जटि (शिव) की पत्नी हो, "वां वीं वूं" के रूप में वाणी की अधीश्वरी, "क्रां क्रीं क्रूं" के रूप में कालिका देवी; "शां शीं शूं" के रूप में मेरा कल्याण करो।
हुं हुं हुङ्काररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥११॥
huṃ huṃ huṅkārarūpiṇyai jaṃ jaṃ jaṃ jambhanādinī |
bhrāṃ bhrīṃ bhrūṃ bhairavī bhadre bhavānyai te namo namaḥ ||
अर्थ: "हुं हुं" के रूप में तुम हुंकार-रूपिणी हो, "जं जं जं" के रूप में जम्भनादिनी, और "भ्रां भ्रीं भ्रूं" के रूप में भैरवी। हे भद्रे, हे भवानी, तुम्हें बार-बार नमस्कार है।
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षम् ।धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥१२॥
aṃ kaṃ caṃ ṭaṃ taṃ paṃ yaṃ śaṃ vīṃ duṃ aiṃ vīṃ haṃ kṣam |
dhijāgraṃ dhijāgraṃ troṭaya troṭaya dīptaṃ kuru kuru svāhā ||
अर्थ: ये बीज-अक्षरों की पंक्ति है, जिनका शब्दार्थ नहीं किया जाता। फिर प्रार्थना है: (बाधाओं को) तोड़ो, तोड़ो; (मन्त्र को) दीप्त करो, दीप्त करो; स्वाहा।
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ॥१३॥
pāṃ pīṃ pūṃ pārvatī pūrṇā khāṃ khīṃ khūṃ khecarī tathā |
sāṃ sīṃ sūṃ saptaśatī devyā mantrasiddhiṃ kuruṣva me ||
अर्थ: "पां पीं पूं" के रूप में तुम पार्वती और पूर्णा हो, "खां खीं खूं" के रूप में खेचरी (आकाश में विचरने वाली); "सां सीं सूं" के रूप में, हे सप्तशती की देवी, मेरे मन्त्र को सिद्ध करो।
कुञ्जिकायै नमो नमः ।
इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे ।अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥१४॥
idaṃ tu kuñjikāstotraṃ mantrajāgartihetave |
abhakte naiva dātavyaṃ gopitaṃ rakṣa pārvati ||
अर्थ: (कुञ्जिका देवी को बार-बार नमस्कार।) यह कुञ्जिका स्तोत्र मन्त्र को जगाने के लिए है। हे पार्वती, इसे भक्ति न रखने वाले को नहीं देना चाहिए; इसे गुप्त रखकर इसकी रक्षा करो।
यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् ।न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥१५॥
yastu kuñjikayā devi hīnāṃ saptaśatīṃ paṭhet |
na tasya jāyate siddhiraraṇye rodanaṃ yathā ||
अर्थ: यह श्लोक कहता है: हे देवी, जो कुञ्जिका के बिना सप्तशती का पाठ करता है, उसे सिद्धि नहीं मिलती, जैसे वन में रोना व्यर्थ होता है।
इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादेकुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
iti śrīrudrayāmale gaurītantre śivapārvatīsaṃvāde
kuñjikāstotraṃ sampūrṇam |
अर्थ: इस प्रकार श्री रुद्रयामल के गौरी तन्त्र में शिव-पार्वती संवाद के रूप में कुञ्जिका स्तोत्र पूरा हुआ।
सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्र भगवान शिव और माँ पार्वती के संवाद के रूप में है। "कुञ्जिका" का अर्थ है कुंजी (चाबी)। स्तोत्र स्वयं को दुर्गा सप्तशती की कुंजी कहता है: इसमें नवार्ण मन्त्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) है, उसके बीज-अक्षरों की व्याख्या करने वाले श्लोक हैं और देवी से मन्त्र को जाग्रत और सिद्ध करने की प्रार्थना है।
यह स्तोत्र अपने बारे में बड़े दावे करता है: कि इसके पाठ से सप्तशती का फल मिलता है, कवच-अर्गला-कीलक की आवश्यकता नहीं रहती, और इसके बिना सप्तशती का पाठ सिद्धि नहीं देता। ये स्तोत्र के अपने शब्द हैं, जिन्हें यहाँ अर्थ सहित वैसे ही दिया गया है। बहुत-से भक्त इसे देवी की स्तुति के रूप में अलग से भी पढ़ते हैं, और बहुत-से सप्तशती के साथ उसके सभी अंग भी पढ़ते हैं।
स्तोत्र की शुरुआत में शिव जी पार्वती जी से कहते हैं कि वे उन्हें उत्तम कुञ्जिका स्तोत्र बताएँगे, जिससे चण्डी (दुर्गा सप्तशती) का पाठ सफल होता है। फिर वे इसकी महिमा बताते हैं: इसके साथ कवच, अर्गला, कीलक जैसे अंगों की आवश्यकता नहीं, केवल इसके पाठ से सप्तशती का फल मिलता है, और यह अत्यंत गुप्त है।
इसके बाद मन्त्र है, जिसकी पहली पंक्ति नवार्ण मन्त्र "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" है। आगे के श्लोकों में देवी को उनके असुर-संहार के लिए नमस्कार है, और फिर नवार्ण मन्त्र के हर अक्षर को देवी का एक रूप बताया गया है: "ऐं" सृष्टि, "ह्रीं" पालन, "क्लीं" इच्छा-शक्ति, "चामुण्डा" चण्ड का नाश, "यै" वर और "विच्चे" अभय। बार-बार की प्रार्थना है कि देवी मेरे जप को जाग्रत और सिद्ध करें।
अंत में शिव जी कहते हैं कि यह स्तोत्र मन्त्र को जगाने के लिए है, इसे श्रद्धा न रखने वाले को न दिया जाए, और इसके बिना सप्तशती का पाठ वन में रोने जैसा है। ये दावे स्तोत्र की अपनी परंपरा के हैं; दूसरी परंपराएँ सप्तशती को कवच, अर्गला और कीलक के साथ पढ़ती हैं।
इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि केवल इसके पाठ से दुर्गा सप्तशती का फल मिलता है, कि इसके पाठ से मारण, मोहन जैसे तान्त्रिक कर्म भी सिद्ध होते हैं, और कि इसके बिना सप्तशती का पाठ सिद्धि नहीं देता। ये स्तोत्र के अपने शब्द हैं, हमारा दावा नहीं; यहाँ इन्हें केवल पाठ का अर्थ समझाने के लिए दिया गया है।
कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥यह श्लोक कहता है: केवल कुञ्जिका के पाठ से दुर्गा पाठ (सप्तशती) का फल मिलता है। हे देवी, यह अत्यंत गुप्त है और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति ।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥हे पार्वती, जैसे अपने गुप्त अंग को छिपाकर रखा जाता है, वैसे ही इसे प्रयत्न से गुप्त रखना चाहिए। यह श्लोक कहता है कि यह उत्तम कुञ्जिका स्तोत्र केवल पाठ से मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन जैसे (तन्त्र के) कर्म सिद्ध कर देता है।
यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् ।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥यह श्लोक कहता है: हे देवी, जो कुञ्जिका के बिना सप्तशती का पाठ करता है, उसे सिद्धि नहीं मिलती, जैसे वन में रोना व्यर्थ होता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 10 | क्रां क्रीं क्रूं कुञ्जिका देवि | sanskritdocuments.org के मुख्य पाठ में "कुञ्जिका" है और "कालिका" दूसरे पाठ के रूप में; stotranidhi.com और drikpanchang.com में "कालिका" है, जो ऊपर रखा गया है। |
| श्लोक 11 | ज्रां ज्रीं ज्रूं भालनादिनी | sanskritdocuments.org पर दूसरे पाठ के रूप में दिया है। |
| श्लोक 13 | म्लां म्लीं म्लूं मूलविस्तीर्णा कुञ्जिकास्तोत्र हेतवे | sanskritdocuments.org के पाठ में श्लोक 13 की एक अतिरिक्त पंक्ति; stotranidhi.com और drikpanchang.com में यह पंक्ति नहीं है। |
| मन्त्र (5) और श्लोक 12 | लम्बे मन्त्र-पाठ | sanskritdocuments.org कुछ पुस्तकों से लिए लम्बे मन्त्र-पाठ भी दूसरे पाठ के रूप में देता है; ऊपर वह पाठ है जो तीनों स्रोतों में मिलता है। |
| श्लोक-संख्या | 1 से 4, फिर मन्त्र, फिर 1 से 8 | drikpanchang.com पर संख्या मन्त्र के बाद फिर से 1 से शुरू होती है और अंतिम दो श्लोकों पर संख्या नहीं है; ऊपर sanskritdocuments.org और stotranidhi.com की लगातार संख्या (1 से 15) दी गई है। |
| समापन | इति श्री डामरतन्त्रे ईश्वरपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् | sanskritdocuments.org पर दी दूसरी समापन-पंक्ति। |
पाठ की अंतिम पंक्ति इसे रुद्रयामल के गौरी तन्त्र में शिव-पार्वती संवाद बताती है; sanskritdocuments.org पर दी एक दूसरी समापन-पंक्ति इसे डामर तन्त्र का भी कहती है। मूल तन्त्र-ग्रंथ में इसका स्थान हमने स्वयं नहीं देखा।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पूरा पाठ sanskritdocuments.org, stotranidhi.com और drikpanchang.com से पंक्ति-पंक्ति मिलाया गया। sanskritdocuments.org के पाठ में कई पुस्तकों के भेद एक साथ दिए हैं; ऊपर वह पाठ रखा गया है जो stotranidhi.com और drikpanchang.com में भी मिलता है, और बाकी भेद पाठ-भेद में दिए गए हैं। श्लोक 7 और 13 में "कुरुष्व" का शुद्ध रूप stotranidhi.com और drikpanchang.com से लिया गया है; sanskritdocuments.org पर "कुरूष्व" छपा है। विनियोग drikpanchang.com पर नहीं है; stotranidhi.com पर वह "ॐ" की जगह "ओं" लिखकर इन्हीं शब्दों में है।
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ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी
कुञ्जिका का अर्थ है कुंजी (चाबी)। स्तोत्र स्वयं को दुर्गा सप्तशती और उसके मन्त्रों को खोलने वाली कुंजी कहता है।
स्तोत्र स्वयं कहता है कि इसके पाठ से सप्तशती का फल मिलता है। यह इस स्तोत्र की अपनी बात है; बहुत-से भक्त पूरी सप्तशती भी पढ़ते हैं, और कौन क्या पढ़े यह अपनी परंपरा और सामर्थ्य पर निर्भर है।
ये बीज-अक्षर हैं, जिनका शब्दार्थ नहीं होता। स्तोत्र का आठवाँ श्लोक इन्हें देवी के रूप बताता है: ऐं सृष्टि, ह्रीं पालन और क्लीं इच्छा-शक्ति।
स्तोत्र कहता है कि यह मन्त्र को जगाने वाला है और इसे श्रद्धा न रखने वाले को न दिया जाए। आज यह सप्तशती की कई छपी पुस्तकों में मिलता है; परंपरा का भाव यही है कि इसे श्रद्धा और गम्भीरता से पढ़ा जाए।
पाठ की अंतिम पंक्ति इसे रुद्रयामल तन्त्र के गौरी तन्त्र में शिव-पार्वती संवाद बताती है। कुछ संस्करण इसे डामर तन्त्र का भी कहते हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।