दुर्गा

स्तोत्र · दुर्गा · स्तोत्र

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम्

"न मन्त्रं नो यन्त्रं" से शुरू होने वाला क्षमा-प्रार्थना का स्तोत्र, जिसकी पंक्ति "कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति" सबसे प्रसिद्ध है। पाठ और अर्थ।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. कब पढ़ें
  5. विधि
  6. पाठ-भेद
  7. रचयिता और स्रोत
  8. ये भी पढ़ें
  9. सवाल-जवाब
  10. सुधार सुझाएँ

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहोन चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनंपरं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥१॥

na mantraṃ no yantraṃ tadapi ca na jāne stutimaho
na cāhvānaṃ dhyānaṃ tadapi ca na jāne stutikathāḥ |
na jāne mudrāste tadapi ca na jāne vilapanaṃ
paraṃ jāne mātastvadanusaraṇaṃ kleśaharaṇam ||

अर्थ: हे माँ, मैं न मन्त्र जानता हूँ, न यन्त्र; हाय, मुझे स्तुति करना भी नहीं आता। न आवाहन जानता हूँ, न ध्यान, न स्तुति की कथाएँ। न तुम्हारी मुद्राएँ जानता हूँ, न व्याकुल होकर पुकारना। बस इतना जानता हूँ कि तुम्हारे पीछे चलना, तुम्हारी शरण लेना, सारे क्लेश हर लेता है।

यन्त्रं
पूजा का यन्त्र
अहो
हाय, अफ़सोस
आह्वानं
आवाहन, देवता को बुलाना
मुद्राः
पूजा में हाथों की मुद्राएँ
विलपनं
व्याकुल होकर पुकारना
त्वदनुसरणं
तुम्हारा अनुसरण, तुम्हारी शरण
क्लेशहरणम्
कष्ट हरने वाला

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतयाविधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवेकुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥

vidherajñānena draviṇaviraheṇālasatayā
vidheyāśakyatvāttava caraṇayoryā cyutirabhūt |
tadetat kṣantavyaṃ janani sakaloddhāriṇi śive
kuputro jāyeta kvacidapi kumātā na bhavati ||

अर्थ: पूजा की विधि न जानने से, धन की कमी से, आलस से और जो करना चाहिए उसे न कर पाने से तुम्हारे चरणों की सेवा में जो चूक हुई, हे सबका उद्धार करने वाली कल्याणमयी माँ, उसे क्षमा करना; क्योंकि पुत्र कभी कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती।

विधेः अज्ञानेन
विधि न जानने से
द्रविणविरहेण
धन की कमी से
अलसतया
आलस से
च्युतिः
चूक, भूल
क्षन्तव्यं
क्षमा करने योग्य
सकलोद्धारिणि
सबका उद्धार करने वाली
कुपुत्रः
बुरा पुत्र
कुमाता
बुरी माता

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाःपरं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवेकुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥

pṛthivyāṃ putrāste janani bahavaḥ santi saralāḥ
paraṃ teṣāṃ madhye viralataralo’haṃ tava sutaḥ |
madīyo’yaṃ tyāgaḥ samucitamidaṃ no tava śive
kuputro jāyeta kvacidapi kumātā na bhavati ||

अर्थ: हे माँ, धरती पर तुम्हारे बहुत-से सीधे-सच्चे पुत्र हैं, पर उनके बीच मैं तुम्हारा एक विरला चंचल पुत्र हूँ। फिर भी हे शिवे, मुझे त्याग देना तुम्हें शोभा नहीं देता; क्योंकि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कुमाता नहीं होती।

पृथिव्यां
धरती पर
सरलाः
सीधे-सच्चे
विरलतरलः
विरला चंचल
मदीयः त्यागः
मुझे त्याग देना
समुचितम्
उचित
नो
नहीं

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचितान वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषेकुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥

jaganmātarmātastava caraṇasevā na racitā
na vā dattaṃ devi draviṇamapi bhūyastava mayā |
tathāpi tvaṃ snehaṃ mayi nirupamaṃ yatprakuruṣe
kuputro jāyeta kvacidapi kumātā na bhavati ||

अर्थ: हे जगत की माता, मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की, न ही तुम्हें बहुत धन अर्पित किया। फिर भी तुम मुझ पर जो अनुपम स्नेह करती हो, वह इसीलिए कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कुमाता नहीं होती।

चरणसेवा
चरणों की सेवा
रचिता
की गई
द्रविणम्
धन
भूयः
अधिक
निरुपमं
जिसकी कोई उपमा नहीं
प्रकुरुषे
करती हो

परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतयामया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भवितानिरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥५॥

parityaktā devā vividhavidhasevākulatayā
mayā pañcāśīteradhikamapanīte tu vayasi |
idānīṃ cenmātastava yadi kṛpā nāpi bhavitā
nirālambo lambodarajanani kaṃ yāmi śaraṇam ||

अर्थ: तरह-तरह की सेवाओं से थककर मैंने दूसरे देवताओं को छोड़ दिया, और मेरी आयु पचासी वर्ष से अधिक बीत चुकी है। हे गणेश-जननी माँ, अब भी यदि तुम्हारी कृपा न हुई, तो मैं बिना सहारे का किसकी शरण में जाऊँ?

परित्यक्ताः
छोड़ दिए गए
सेवाकुलतया
सेवाओं से व्याकुल होकर
पञ्चाशीतेः अधिकम्
पचासी से अधिक
अपनीते वयसि
आयु बीत जाने पर
निरालम्बः
बिना सहारे का
लम्बोदरजननि
हे गणेश की माता
शरणम्
आश्रय

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरानिरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।तवापर्णे कर्णे विशति मनु वर्णे फलमिदंजनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥

śvapāko jalpāko bhavati madhupākopamagirā
nirātaṅko raṅko viharati ciraṃ koṭikanakaiḥ |
tavāparṇe karṇe viśati manu varṇe phalamidaṃ
janaḥ ko jānīte janani japanīyaṃ japavidhau ||

अर्थ: हे अपर्णा, तुम्हारे मन्त्र का एक अक्षर कान में पड़ते ही यह फल होता है कि समाज में सबसे नीचा समझा जाने वाला भी मधु जैसी मीठी वाणी का वक्ता बन जाता है, और दरिद्र भी निर्भय होकर करोड़ों स्वर्ण-मुद्राओं के साथ बहुत समय तक विचरता है। तब हे माँ, विधि से तुम्हारा जप करने का फल क्या होगा, इसे कौन जान सकता है?

श्वपाकः
समाज में सबसे नीचा समझा जाने वाला व्यक्ति
जल्पाकः
बोलने में कुशल, वक्ता
मधुपाकोपमगिरा
मधु जैसी मीठी वाणी से
निरातङ्कः
निर्भय
रङ्कः
दरिद्र
कोटिकनकैः
करोड़ों स्वर्ण-मुद्राओं के साथ
मनुवर्णे
मन्त्र का अक्षर
अपर्णे
हे अपर्णा (पार्वती)

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरोजटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवींभवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥

citābhasmālepo garalamaśanaṃ dikpaṭadharo
jaṭādhārī kaṇṭhe bhujagapatihārī paśupatiḥ |
kapālī bhūteśo bhajati jagadīśaikapadavīṃ
bhavāni tvatpāṇigrahaṇaparipāṭīphalamidam ||

अर्थ: जो चिता की भस्म लगाते हैं, विष ही जिनका भोजन है, दिशाएँ ही जिनके वस्त्र हैं, जो जटा धारण करते हैं, गले में नागराज का हार पहनते हैं, जो पशुपति, कपाल धारण करने वाले और भूतों के स्वामी हैं, वे शिव जगदीश्वर की अनोखी पदवी पाते हैं; हे भवानी, यह तुम्हारे साथ उनके विवाह का ही फल है।

चिताभस्मालेपः
चिता की राख का लेप
गरलम् अशनं
विष का भोजन
दिक्पटधरः
दिशाओं को ही वस्त्र बनाने वाले
भुजगपतिहारी
नागराज का हार पहनने वाले
कपाली
कपाल धारण करने वाले
जगदीशैकपदवीं
जगदीश्वर की अनोखी पदवी
पाणिग्रहण
विवाह

न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मेन विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वैमृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥

na mokṣasyākāṅkṣā bhavavibhavavāñchāpi ca na me
na vijñānāpekṣā śaśimukhi sukhecchāpi na punaḥ |
atastvāṃ saṃyāce janani jananaṃ yātu mama vai
mṛḍānī rudrāṇī śiva śiva bhavānīti japataḥ ||

अर्थ: हे चन्द्रमुखी माँ, मुझे न मोक्ष की इच्छा है, न संसार के वैभव की चाह; न ज्ञान की अपेक्षा है, न सुख की इच्छा। इसलिए मैं तुमसे बस यही माँगता हूँ कि मेरा जीवन "मृडानी, रुद्राणी, शिव शिव, भवानी" जपते हुए बीते।

आकाङ्क्षा
इच्छा
भवविभव
संसार का वैभव
विज्ञानापेक्षा
ज्ञान की चाह
शशिमुखि
हे चन्द्रमुखी
संयाचे
विनती करता हूँ
जननं यातु
जीवन बीते
जपतः
जप करते हुए

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैःकिं रूक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथेधत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥

nārādhitāsi vidhinā vividhopacāraiḥ
kiṃ rūkṣacintanaparairna kṛtaṃ vacobhiḥ |
śyāme tvameva yadi kiñcana mayyanāthe
dhatse kṛpāmucitamamba paraṃ tavaiva ||

अर्थ: हे श्यामा, मैंने विधि से अनेक उपचारों द्वारा तुम्हारी आराधना नहीं की; उलटे रूखे विचारों से भरे वचनों से मैंने क्या नहीं किया! फिर भी हे माँ, यदि तुम मुझ अनाथ पर कुछ भी कृपा करती हो, तो यह तुम्हारे ही योग्य है, तुम्हारी ही बड़ाई है।

आराधिता
आराधना की गई
विविधोपचारैः
अनेक पूजा-उपचारों से
रूक्षचिन्तनपरैः
रूखे, कठोर विचारों वाले
वचोभिः
वचनों से
श्यामे
हे श्यामा
अनाथे
अनाथ पर
उचितम्
योग्य

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयंकरोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।नैतच्छठत्वं मम भावयेथाःक्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥

āpatsu magnaḥ smaraṇaṃ tvadīyaṃ
karomi durge karuṇārṇaveśi |
naitacchaṭhatvaṃ mama bhāvayethāḥ
kṣudhātṛṣārtā jananīṃ smaranti ||

अर्थ: हे करुणा के सागर की स्वामिनी दुर्गा, विपत्तियों में डूबकर ही मैं तुम्हारा स्मरण करता हूँ; इसे मेरी धूर्तता मत समझना, क्योंकि भूख-प्यास से व्याकुल बच्चे माँ को ही याद करते हैं।

आपत्सु
विपत्तियों में
मग्नः
डूबा हुआ
करुणार्णवेशि
करुणा के सागर की स्वामिनी
शठत्वं
धूर्तता
भावयेथाः
समझना
क्षुधातृषार्ताः
भूख-प्यास से व्याकुल

जगदम्ब विचित्र मत्र किंपरिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।अपराधपरम्परापरंन हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥

jagadamba vicitra matra kiṃ
paripūrṇā karuṇāsti cenmayi |
aparādhaparamparāparaṃ
na hi mātā samupekṣate sutam ||

अर्थ: हे जगदम्बा, यदि मुझ पर तुम्हारी पूरी करुणा है तो इसमें आश्चर्य क्या? अपराध पर अपराध करते रहने वाले पुत्र की भी माता उपेक्षा नहीं करती।

विचित्रम्
आश्चर्य
परिपूर्णा
पूरी
अपराधपरम्परापरं
लगातार अपराध करने वाले को
समुपेक्षते
उपेक्षा करती है
सुतम्
पुत्र को

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥

matsamaḥ pātakī nāsti pāpaghnī tvatsamā na hi |
evaṃ jñātvā mahādevi yathāyogyaṃ tathā kuru ||

अर्थ: मेरे जैसा कोई पापी नहीं और तुम्हारे जैसी कोई पाप नष्ट करने वाली नहीं। हे महादेवी, यह जानकर जैसा उचित हो वैसा करो।

मत्समः
मेरे समान
पातकी
पापी
पापघ्नी
पाप का नाश करने वाली
त्वत्समा
तुम्हारे समान
यथायोग्यं
जैसा उचित हो

इति श्रीदेव्यपराधक्षमापणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

iti śrīdevyaparādhakṣamāpaṇastotraṃ sampūrṇam |

अर्थ: इस प्रकार श्री देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र पूरा हुआ।

परिचय

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र में भक्त माँ से अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगता है। वह मानता है कि उसे न मन्त्र आते हैं, न पूजा की विधि; उसने न सेवा की, न धन चढ़ाया। फिर भी उसका भरोसा एक ही बात पर है, जो कई श्लोकों के अंत में आती है: "कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति", यानी पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती।

यह स्तोत्र परंपरा से आदि शंकराचार्य का माना जाता है। दुर्गा सप्तशती या किसी भी देवी-पूजा के अंत में, अनजाने में हुई भूलों की क्षमा के लिए इसे पढ़ने की परंपरा है।

भावार्थ

इस स्तोत्र में भक्त अपनी कमियों की पूरी सूची माँ के सामने रख देता है: उसे मन्त्र, यन्त्र, ध्यान, मुद्रा, कुछ नहीं आता; उसने न सेवा की, न धन चढ़ाया; वह चंचल है, आलसी है, और विपत्ति आने पर ही माँ को याद करता है। वह कुछ भी छिपाता नहीं।

फिर भी उसका भरोसा टूटता नहीं, क्योंकि वह माँ और बच्चे के रिश्ते पर टिका है: बच्चा बुरा हो सकता है, पर माँ बुरी नहीं होती; भूखा-प्यासा बच्चा माँ को ही पुकारता है; बार-बार गलती करने वाले बच्चे की भी माँ उपेक्षा नहीं करती। पूजा की विधि से बड़ा यह भरोसा ही इस स्तोत्र का सार है।

आठवें श्लोक में भक्त की माँग भी अनोखी है: उसे न मोक्ष चाहिए, न धन, न ज्ञान, न सुख; बस इतना कि जीवन माँ का नाम जपते बीते। अंतिम श्लोक में वह सब कुछ माँ पर छोड़ देता है: मेरे जैसा पापी नहीं, तुम्हारे जैसी पाप हरने वाली नहीं; जैसा उचित हो, वैसा करो।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • दुर्गा सप्तशती के पाठ या नवरात्रि की पूजा के अंत में, क्षमा-प्रार्थना के रूप में
  • किसी भी देवी-पूजा के बाद, पूजा में हुई भूलों के लिए
  • जब मन भारी हो और माँ की शरण लेने का मन हो

पढ़ने की विधि

  • पूजा पूरी होने के बाद हाथ जोड़कर, माँ के सामने बैठकर इसे पढ़ें।
  • हर श्लोक को उसका अर्थ मन में रखते हुए धीरे पढ़ें; यह स्तोत्र भाव से पढ़ने का है, जल्दी से नहीं।
  • "कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति" वाली पंक्ति पर रुककर माँ के सामने अपनी भूलें मन ही मन स्वीकार करें।
  • पूरा स्तोत्र न हो सके तो पहले श्लोक और अंतिम श्लोक का पाठ भी किया जाता है।
पूरी विधिदुर्गा पूजा विधिनवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
श्लोक 5परित्यक्ता देवान्विविधविधिसेवाकुलतयाstotranidhi.com का पाठ।
श्लोक 6जननि जननीयं जपविधौsanskritdocuments.org का पाठ; ऊपर stotranidhi.com और drikpanchang.com वाला "जपनीयं" रखा गया है।
श्लोक 8न मोक्षस्याकाङ्क्षा न च विभववाञ्छापि च न मेstotranidhi.com का पाठ।
श्लोक 10करोमि दुर्गे करुणार्णवे शिवेstotranidhi.com का पाठ।
श्लोक 11अपराधपरम्परावृतंstotranidhi.com का पाठ (अपराधों की परम्परा से घिरे हुए)।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
आदि शंकराचार्य (परंपरा के अनुसार)
भाषा
संस्कृत

परंपरा और कई संग्रह इसे शंकराचार्य की रचना बताते हैं। पाँचवें श्लोक में कहने वाला अपनी आयु पचासी वर्ष से अधिक बताता है; कुछ लोग इसे कवि का अपना कथन मानकर इस मान्यता पर प्रश्न उठाते हैं, जबकि दूसरे इसे एक साधारण भक्त की ओर से कही गई बात मानते हैं।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): बारहों श्लोक sanskritdocuments.org, stotranidhi.com और drikpanchang.com के पाठ से मिलाए गए। जहाँ स्रोत अलग हैं, वहाँ दो स्रोतों में मिलने वाला पाठ रखा गया और दूसरा पाठ-भेद में दिया गया। श्लोक 9 में दो स्रोतों में "रुक्ष" छपा है; शुद्ध रूप "रूक्ष" (stotranidhi.com) रखा गया है।

ये भी पढ़ें

दुर्गा

दुर्गा पूजा विधि

दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा

नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।

माँ दुर्गा के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

"कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति" का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है: पुत्र कभी कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती। यह पंक्ति इस स्तोत्र के तीन श्लोकों के अंत में आती है और पूरे स्तोत्र का भाव इसी में है।

यह स्तोत्र किसने रचा?

परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। पाँचवें श्लोक में आयु पचासी वर्ष से अधिक बताई गई है, इसलिए कुछ लोग इस मान्यता पर प्रश्न उठाते हैं; रचयिता को परंपरा के अनुसार ही समझें।

क्या यह दुर्गा सप्तशती की क्षमा-प्रार्थना ही है?

नहीं। दुर्गा सप्तशती के अंत में एक अलग क्षमा-प्रार्थना पढ़ी जाती है जो "अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया" से शुरू होती है। यह स्तोत्र उससे अलग है, पर दोनों का भाव क्षमा माँगना ही है।

इसे कब पढ़ना चाहिए?

इसे प्रायः देवी-पूजा या सप्तशती पाठ के अंत में पढ़ा जाता है, ताकि अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा माँगी जा सके। कोई इसे कभी भी, मन के भाव से पढ़ सकता है।

इसमें कितने श्लोक हैं?

इसमें बारह श्लोक हैं। पहले आठ श्लोक एक लम्बे छन्द (शिखरिणी) में हैं और बाद के चार श्लोक अलग-अलग छोटे छन्दों में।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

सुधार भेजें