गंगा

आरती · गंगा

ॐ जय गंगे माता

गंगा माता की आरती 'ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता': पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ और पाठांतर। गंगा दशहरा और संध्या आरती में गाई जाती है।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. फलश्रुति
  7. कब पढ़ें
  8. विधि
  9. पाठ-भेद
  10. रचयिता और स्रोत
  11. ये भी पढ़ें
  12. सवाल-जवाब
  13. सुधार सुझाएँ

ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥

अर्थ: हे गंगा माता, आपकी जय हो। आरती कहती है कि जो मनुष्य आपका ध्यान करता है, वह मनचाहा फल पाता है।

चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता।शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता ॥

अर्थ: आपकी ज्योति चन्द्रमा जैसी उजली है और आपका जल निर्मल बहता आता है। जो आपकी शरण में आता है, वह मनुष्य संसार-सागर से तर जाता है।

पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता ॥

अर्थ: आपने राजा सगर के पुत्रों को तारा, यह सारा संसार जानता है। आपकी कृपा-दृष्टि तीनों लोकों को सुख देने वाली है।

एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता।यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता ॥

अर्थ: आरती कहती है कि जो प्राणी एक बार भी आपकी शरण में आता है, उसका मृत्यु (यम) का भय मिट जाता है और वह परम गति पाता है।

आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता।सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता ॥

अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि हे माता, जो मनुष्य आपकी आरती रोज़ गाता है, वह सेवक सहज ही मुक्ति पाता है।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

'ॐ जय गंगे माता' माँ गंगा की सबसे जानी-पहचानी हिन्दी आरती है। इसमें गंगा को चन्द्रमा जैसी उजली ज्योति और निर्मल जल वाली माता कहा गया है, जिन्होंने राजा सगर के पुत्रों का उद्धार किया।

आरती छोटी है: टेक और चार अंतरे। गंगा दशहरा पर, घाटों की संध्या गंगा आरती के समय और घर में गंगाजल की पूजा करते हुए इसे गाया जाता है।

अंतरा-वार अर्थ

  1. मुखड़ा ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता…

    हे गंगा माता, आपकी जय हो। आरती कहती है कि जो मनुष्य आपका ध्यान करता है, वह मनचाहा फल पाता है।

  2. अंतरा १ चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता…

    आपकी ज्योति चन्द्रमा जैसी उजली है और आपका जल निर्मल बहता आता है। जो आपकी शरण में आता है, वह मनुष्य संसार-सागर से तर जाता है।

  3. अंतरा २ पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता…

    आपने राजा सगर के पुत्रों को तारा, यह सारा संसार जानता है। आपकी कृपा-दृष्टि तीनों लोकों को सुख देने वाली है।

  4. अंतरा ३ एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता…

    आरती कहती है कि जो प्राणी एक बार भी आपकी शरण में आता है, उसका मृत्यु (यम) का भय मिट जाता है और वह परम गति पाता है।

  5. अंतरा ४ आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता…

    आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि हे माता, जो मनुष्य आपकी आरती रोज़ गाता है, वह सेवक सहज ही मुक्ति पाता है।

भावार्थ

यह छोटी-सी आरती गंगा के दो रूप एक साथ दिखाती है: चन्द्रमा जैसी उजली, निर्मल जल वाली नदी, और कृपा करने वाली माता। राजा सगर के पुत्रों के उद्धार की ओर संकेत करके आरती याद दिलाती है कि भगीरथ की तपस्या से धरती पर आईं गंगा उद्धार करने वाली मानी गईं।

बाकी अंतरे शरण का भाव हैं: जो गंगा की शरण आता है, जो उनका ध्यान करता है, जो रोज़ उनकी आरती गाता है, उसके भय मिटते हैं। इस तरह यह आरती गंगा की पूजा के साथ उनके प्रति कृतज्ञता का गीत भी है।

कठिन शब्दों के अर्थ

ध्याता
ध्यान करता है
मनवांछित
मन में चाहा हुआ
निर्मल
स्वच्छ, मैल रहित
तर जाता
पार हो जाता है
सगर
अयोध्या के राजा, जिनके साठ हज़ार पुत्रों का उद्धार गंगा के जल से हुआ
ज्ञाता
यहाँ: जाना हुआ, सबको पता
त्रिभुवन
तीनों लोक
प्राणी
जीव
त्रास
भय, डर
यम
मृत्यु के देवता
परमगति
सबसे ऊँची गति, मोक्ष
मातु
माता
नित
रोज़
सहज
आसानी से
मुक्ति
मोक्ष, बन्धन से छुटकारा

फलश्रुति

अंतिम अंतरा कहता है कि गंगा माता की आरती रोज़ गाने वाला सेवक सहज ही मुक्ति पाता है। ये आरती के अपने शब्द हैं, जो गंगा के प्रति भक्त की श्रद्धा बताते हैं; इन्हें किसी निश्चित फल का वादा न समझें।

आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता।
सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥

आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि हे माता, जो मनुष्य आपकी आरती रोज़ गाता है, वह सेवक सहज ही मुक्ति पाता है।

यह आरती कब गाई जाती है

  • गंगा दशहरा (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) पर
  • गंगा सप्तमी (वैशाख शुक्ल सप्तमी) पर
  • हरिद्वार, ऋषिकेश, वाराणसी जैसे घाटों पर संध्या की गंगा आरती के समय
  • गंगा-स्नान के बाद या घर में गंगाजल की पूजा करते समय

आरती कैसे करें

  • घाट पर हों तो दीपक जलाकर गंगा की ओर मुख करके आरती गाएँ; घर में गंगाजल के पात्र या गंगा माता के चित्र के सामने दीपक जलाएँ।
  • टेक 'ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता' गाकर हर अंतरे के बाद इसे दोहराएँ।
  • नदी को पूजने का अर्थ उसे स्वच्छ रखना भी है: दीपदान करें तो पत्तों के दोने में करें, और कचरा या सजावट का सामान जल में न डालें।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
टेकॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माताभक्ति भारत, भारतकोश और आज तक के पाठ में
अंतरा 2कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाताभक्ति भारत और भारतकोश में
अंतरा 3एक ही बार जो तेरी, शरणागति आता। यम की त्रास मिटा कर, परमगति पाता॥भक्ति भारत और भारतकोश में (वहाँ 'शारणागति' छपा है)
अंतरा 4आरती मात तुम्हारी, जो जन नित्य गाता। दास वही सहज में, मुक्ति को पाता॥भक्ति भारत और भारतकोश में (वहाँ 'मुक्त्ति' छपा है)

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
भाषा
हिन्दी

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और भारतकोश (bharatdiscovery.org) के पाठ से मिलाई गई; आज तक और शुभ पंचांग के पाठ भी देखे गए। टेक, चारों अंतरे और उनका क्रम सब में एक है, पर शब्द दो रूपों में मिलते हैं: भक्ति भारत, भारतकोश और आज तक ('श्री जय गंगे माता', 'एक ही बार जो तेरी', 'दास वही') और द्रिक पंचांग व शुभ पंचांग ('मैया जय गंगे माता', 'एक बार जो प्राणी', 'सेवक वही')। पहले रूप के तीनों पाठ एक-दूसरे की प्रति लगते हैं और उनमें 'शारणागति', 'मुक्त्ति' जैसी एक जैसी छपाई की भूलें हैं, इसलिए आधार द्रिक पंचांग का साफ़ पाठ लिया गया और पहले रूप के शब्द पाठांतर में दिए गए। भक्ति भारत में आरती से पहले 'नमामि गंगे' श्लोक और 'हर हर गंगे' जयकारा भी छपा है; वह आरती का भाग नहीं, इसलिए नहीं लिया गया। पाठांतर में 'शरणागति' और 'मुक्ति' शुद्ध वर्तनी में लिखे गए हैं और छपा रूप कोष्ठक में बताया गया है। रचयिता अज्ञात।

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माँ गंगा के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गंगा जी की आरती कब गाई जाती है?

गंगा दशहरा और गंगा सप्तमी पर विशेष रूप से, और हरिद्वार, ऋषिकेश, वाराणसी जैसे घाटों पर संध्या की गंगा आरती के समय। घर में गंगाजल की पूजा करते हुए भी इसे गा सकते हैं।

आरती में 'पुत्र सगर के तारे' का क्या अर्थ है?

कथा के अनुसार राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र कपिल मुनि के क्रोध से भस्म हो गए थे। उनके वंशज भगीरथ की तपस्या से गंगा धरती पर आईं और उनके जल से उन पुत्रों का उद्धार हुआ।

घर में गंगा आरती कैसे करें?

गंगाजल के पात्र या गंगा माता के चित्र के सामने दीपक जलाएँ, फूल चढ़ाएँ और यह आरती गाएँ। अंत में थोड़ा गंगाजल आचमन की तरह लें या घर में छिड़कें।

गंगा दशहरा कब होता है?

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को। मान्यता है कि इसी दिन गंगा धरती पर उतरीं; इस दिन गंगा-स्नान, दान और गंगा की आरती का विशेष चलन है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

स्रोतों में रचयिता का नाम नहीं मिलता। कुछ पाठों में अंतिम अंतरा 'दास वही सहज में' है और कुछ में 'सेवक वही सहज में'; दोनों में किसी कवि का नाम नहीं है।

सुधार सुझाएँ

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