गङ्गा स्तोत्रम्
गंगा · स्तोत्र · संस्कृत
देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे

आरती · गंगा
गंगा माता की आरती 'ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता': पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ और पाठांतर। गंगा दशहरा और संध्या आरती में गाई जाती है।
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
अर्थ: हे गंगा माता, आपकी जय हो। आरती कहती है कि जो मनुष्य आपका ध्यान करता है, वह मनचाहा फल पाता है।
चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता।शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥
॥ ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता ॥
अर्थ: आपकी ज्योति चन्द्रमा जैसी उजली है और आपका जल निर्मल बहता आता है। जो आपकी शरण में आता है, वह मनुष्य संसार-सागर से तर जाता है।
पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता॥
॥ ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता ॥
अर्थ: आपने राजा सगर के पुत्रों को तारा, यह सारा संसार जानता है। आपकी कृपा-दृष्टि तीनों लोकों को सुख देने वाली है।
एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता।यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता॥
॥ ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता ॥
अर्थ: आरती कहती है कि जो प्राणी एक बार भी आपकी शरण में आता है, उसका मृत्यु (यम) का भय मिट जाता है और वह परम गति पाता है।
आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता।सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥
॥ ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता ॥
अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि हे माता, जो मनुष्य आपकी आरती रोज़ गाता है, वह सेवक सहज ही मुक्ति पाता है।
हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।
'ॐ जय गंगे माता' माँ गंगा की सबसे जानी-पहचानी हिन्दी आरती है। इसमें गंगा को चन्द्रमा जैसी उजली ज्योति और निर्मल जल वाली माता कहा गया है, जिन्होंने राजा सगर के पुत्रों का उद्धार किया।
आरती छोटी है: टेक और चार अंतरे। गंगा दशहरा पर, घाटों की संध्या गंगा आरती के समय और घर में गंगाजल की पूजा करते हुए इसे गाया जाता है।
हे गंगा माता, आपकी जय हो। आरती कहती है कि जो मनुष्य आपका ध्यान करता है, वह मनचाहा फल पाता है।
आपकी ज्योति चन्द्रमा जैसी उजली है और आपका जल निर्मल बहता आता है। जो आपकी शरण में आता है, वह मनुष्य संसार-सागर से तर जाता है।
आपने राजा सगर के पुत्रों को तारा, यह सारा संसार जानता है। आपकी कृपा-दृष्टि तीनों लोकों को सुख देने वाली है।
आरती कहती है कि जो प्राणी एक बार भी आपकी शरण में आता है, उसका मृत्यु (यम) का भय मिट जाता है और वह परम गति पाता है।
आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि हे माता, जो मनुष्य आपकी आरती रोज़ गाता है, वह सेवक सहज ही मुक्ति पाता है।
यह छोटी-सी आरती गंगा के दो रूप एक साथ दिखाती है: चन्द्रमा जैसी उजली, निर्मल जल वाली नदी, और कृपा करने वाली माता। राजा सगर के पुत्रों के उद्धार की ओर संकेत करके आरती याद दिलाती है कि भगीरथ की तपस्या से धरती पर आईं गंगा उद्धार करने वाली मानी गईं।
बाकी अंतरे शरण का भाव हैं: जो गंगा की शरण आता है, जो उनका ध्यान करता है, जो रोज़ उनकी आरती गाता है, उसके भय मिटते हैं। इस तरह यह आरती गंगा की पूजा के साथ उनके प्रति कृतज्ञता का गीत भी है।
अंतिम अंतरा कहता है कि गंगा माता की आरती रोज़ गाने वाला सेवक सहज ही मुक्ति पाता है। ये आरती के अपने शब्द हैं, जो गंगा के प्रति भक्त की श्रद्धा बताते हैं; इन्हें किसी निश्चित फल का वादा न समझें।
आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता।
सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि हे माता, जो मनुष्य आपकी आरती रोज़ गाता है, वह सेवक सहज ही मुक्ति पाता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| टेक | ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता | भक्ति भारत, भारतकोश और आज तक के पाठ में |
| अंतरा 2 | कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता | भक्ति भारत और भारतकोश में |
| अंतरा 3 | एक ही बार जो तेरी, शरणागति आता। यम की त्रास मिटा कर, परमगति पाता॥ | भक्ति भारत और भारतकोश में (वहाँ 'शारणागति' छपा है) |
| अंतरा 4 | आरती मात तुम्हारी, जो जन नित्य गाता। दास वही सहज में, मुक्ति को पाता॥ | भक्ति भारत और भारतकोश में (वहाँ 'मुक्त्ति' छपा है) |
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और भारतकोश (bharatdiscovery.org) के पाठ से मिलाई गई; आज तक और शुभ पंचांग के पाठ भी देखे गए। टेक, चारों अंतरे और उनका क्रम सब में एक है, पर शब्द दो रूपों में मिलते हैं: भक्ति भारत, भारतकोश और आज तक ('श्री जय गंगे माता', 'एक ही बार जो तेरी', 'दास वही') और द्रिक पंचांग व शुभ पंचांग ('मैया जय गंगे माता', 'एक बार जो प्राणी', 'सेवक वही')। पहले रूप के तीनों पाठ एक-दूसरे की प्रति लगते हैं और उनमें 'शारणागति', 'मुक्त्ति' जैसी एक जैसी छपाई की भूलें हैं, इसलिए आधार द्रिक पंचांग का साफ़ पाठ लिया गया और पहले रूप के शब्द पाठांतर में दिए गए। भक्ति भारत में आरती से पहले 'नमामि गंगे' श्लोक और 'हर हर गंगे' जयकारा भी छपा है; वह आरती का भाग नहीं, इसलिए नहीं लिया गया। पाठांतर में 'शरणागति' और 'मुक्ति' शुद्ध वर्तनी में लिखे गए हैं और छपा रूप कोष्ठक में बताया गया है। रचयिता अज्ञात।
गंगा · स्तोत्र · संस्कृत
देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे
तुलसी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में तुलसी की रोज़ की पूजा: सुबह जल, परिक्रमा, शाम का दीपक, नामाष्टक और आरती; पत्ते तोड़ने के नियम, कार्तिक मास और तुलसी विवाह की बातों के साथ।
तुलसी · श्लोक · संस्कृत
वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी
यमुना, कृष्ण · अष्टकम् · संस्कृत
नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा
तुलसी · आरती
जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता
गंगा दशहरा और गंगा सप्तमी पर विशेष रूप से, और हरिद्वार, ऋषिकेश, वाराणसी जैसे घाटों पर संध्या की गंगा आरती के समय। घर में गंगाजल की पूजा करते हुए भी इसे गा सकते हैं।
कथा के अनुसार राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र कपिल मुनि के क्रोध से भस्म हो गए थे। उनके वंशज भगीरथ की तपस्या से गंगा धरती पर आईं और उनके जल से उन पुत्रों का उद्धार हुआ।
गंगाजल के पात्र या गंगा माता के चित्र के सामने दीपक जलाएँ, फूल चढ़ाएँ और यह आरती गाएँ। अंत में थोड़ा गंगाजल आचमन की तरह लें या घर में छिड़कें।
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को। मान्यता है कि इसी दिन गंगा धरती पर उतरीं; इस दिन गंगा-स्नान, दान और गंगा की आरती का विशेष चलन है।
स्रोतों में रचयिता का नाम नहीं मिलता। कुछ पाठों में अंतिम अंतरा 'दास वही सहज में' है और कुछ में 'सेवक वही सहज में'; दोनों में किसी कवि का नाम नहीं है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।