तुलसी पूजा विधि
तुलसी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में तुलसी की रोज़ की पूजा: सुबह जल, परिक्रमा, शाम का दीपक, नामाष्टक और आरती; पत्ते तोड़ने के नियम, कार्तिक मास और तुलसी विवाह की बातों के साथ।

आरती · तुलसी
तुलसी माता की आरती 'जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता': पूरा पाठ, सरल अर्थ और पाठांतर। कार्तिक और तुलसी विवाह में गाई जाती है।
जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता।सब जग की सुख दाता, सबकी वर माता॥
अर्थ: हे तुलसी माता, आपकी जय हो, जय हो। आप सारे संसार को सुख देने वाली और सबको वर देने वाली माता हैं।
सब योगों से ऊपर, सब रोगों से ऊपर।रज से रक्षा करके, सबकी भव त्राता॥
॥ जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता ॥
अर्थ: आप सब योगों से ऊपर हैं और सब रोगों से ऊपर हैं। 'रज' (मैल और विकार) से रक्षा करके आप सबको संसार-सागर से पार लगाती हैं।
बटु पुत्री है श्यामा, सूर बल्ली है ग्राम्या।विष्णुप्रिय जो नर तुमको सेवे, सो नर तर जाता॥
॥ जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता ॥
अर्थ: पहली पंक्ति तुलसी के रूप गिनाती है: श्यामा (साँवली, श्यामा तुलसी), बल्ली (बेल या पौधा) और ग्राम्या (गाँव-घर में उगने वाली); इस पंक्ति के शब्द स्रोतों में अलग-अलग मिलते हैं, इसलिए इसका पूरा अर्थ निश्चित नहीं है। हे विष्णुप्रिया, जो मनुष्य आपकी सेवा करता है, वह संसार से तर जाता है।
हरि के शीश विराजत, त्रिभुवन से हो वंदित।पतित जनों की तारिणी, तुम हो विख्याता॥
॥ जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता ॥
अर्थ: आप हरि के सिर पर विराजती हैं (भगवान को तुलसी-दल चढ़ाया जाता है) और तीनों लोक आपकी वन्दना करते हैं। आप पतितों को तारने वाली के रूप में प्रसिद्ध हैं।
लेकर जन्म विजन में, आई दिव्य भवन में।मानव लोक तुम्हीं से, सुख-संपति पाता॥
॥ जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता ॥
अर्थ: आपने निर्जन वन में जन्म लिया और दिव्य भवन में आ बसीं। मनुष्य-लोक आप ही से सुख और सम्पत्ति पाता है।
हरि को तुम अति प्यारी, श्याम वर्ण सुकुमारी।प्रेम अजब है उनका, तुमसे कैसा नाता॥
॥ जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता ॥
अर्थ: आप हरि को अत्यन्त प्यारी हैं, साँवले रंग वाली कोमल देवी हैं। हरि का प्रेम अनोखा है; आपसे उनका यह नाता कैसा अद्भुत है!
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'जय जय तुलसी माता' तुलसी माता की आरती है, जो रोज़ शाम तुलसी के पास दीपक जलाते समय और विशेष रूप से कार्तिक मास और तुलसी विवाह पर गाई जाती है। आरती तुलसी को सारे जग को सुख देने वाली और सबको वर देने वाली माता कहती है।
इसमें तुलसी को हरि के शीश पर विराजने वाली, पतितों को तारने वाली और हरि की अति प्रिय बताया गया है, और अंत में आश्चर्य से कहा गया है कि हरि से उनका प्रेम का नाता कैसा अनोखा है।
हे तुलसी माता, आपकी जय हो, जय हो। आप सारे संसार को सुख देने वाली और सबको वर देने वाली माता हैं।
आप सब योगों से ऊपर हैं और सब रोगों से ऊपर हैं। 'रज' (मैल और विकार) से रक्षा करके आप सबको संसार-सागर से पार लगाती हैं।
पहली पंक्ति तुलसी के रूप गिनाती है: श्यामा (साँवली, श्यामा तुलसी), बल्ली (बेल या पौधा) और ग्राम्या (गाँव-घर में उगने वाली); इस पंक्ति के शब्द स्रोतों में अलग-अलग मिलते हैं, इसलिए इसका पूरा अर्थ निश्चित नहीं है। हे विष्णुप्रिया, जो मनुष्य आपकी सेवा करता है, वह संसार से तर जाता है।
आप हरि के सिर पर विराजती हैं (भगवान को तुलसी-दल चढ़ाया जाता है) और तीनों लोक आपकी वन्दना करते हैं। आप पतितों को तारने वाली के रूप में प्रसिद्ध हैं।
आपने निर्जन वन में जन्म लिया और दिव्य भवन में आ बसीं। मनुष्य-लोक आप ही से सुख और सम्पत्ति पाता है।
आप हरि को अत्यन्त प्यारी हैं, साँवले रंग वाली कोमल देवी हैं। हरि का प्रेम अनोखा है; आपसे उनका यह नाता कैसा अद्भुत है!
यह आरती घर-आँगन की तुलसी को माता के रूप में देखती है: वह सारे जग को सुख देती है, रोगों और विकारों से ऊपर है, और जो उसकी सेवा करता है उसे संसार से पार लगाती है। भगवान विष्णु की पूजा तुलसी-दल के बिना पूरी नहीं मानी जाती, इसीलिए आरती कहती है कि तुलसी हरि के शीश पर विराजती हैं।
अंतिम अंतरे में आरती का स्वर प्रेम का हो जाता है: वन में जन्मी तुलसी हरि को अति प्यारी हैं, और भक्त आश्चर्य करता है कि हरि का उनसे कैसा अनोखा नाता है। तुलसी विवाह की परंपरा इसी नाते का उत्सव है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| टेक | जय जय तुलसी माता, सबकी सुखदाता वर माता | द्रिक पंचांग और भारतकोश के पाठ में टेक इसी एक पंक्ति की है |
| अंतरा 1 | सब योगों के ऊपर, सब रोगों के ऊपर, रुज से रक्षा करके भव त्राता | द्रिक पंचांग में ('रुज' यानी रोग); भारतकोश में 'रज से रक्षा करके भव त्राता' |
| अंतरा 2 | बहु पुत्री है श्यामा, सूर वल्ली है ग्राम्या, विष्णु प्रिय जो तुमको सेवे, सो नर तर जाता | द्रिक पंचांग और भारतकोश में; शुभ पंचांग में 'सुर बल्ली' |
| अंतरा 5 | प्रेम अजब है श्री हरि का तुम से नाता | द्रिक पंचांग और भारतकोश में |
| अंत में | हमारी विपद हरो तुम, कृपा करो माता | भक्ति भारत इस पंक्ति को अतिरिक्त पंक्ति के रूप में अलग चिह्नित करता है; आज तक और शुभ पंचांग इसे अंतिम अंतरे में जोड़ते हैं। द्रिक पंचांग और भारतकोश में यह नहीं है, इसलिए मूल पाठ में नहीं ली गई। |
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति भक्ति भारत, द्रिक पंचांग और शुभ पंचांग के पाठ से मिलाई गई; भारतकोश (bharatdiscovery.org) और आज तक का पाठ भी देखा गया। अंतरों के भाव और क्रम सब में एक हैं, पर पाठ दो रूपों में है: भक्ति भारत, आज तक और शुभ पंचांग में चार चरणों की टेक ('जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता। सब जग की सुख दाता, सबकी वर माता') और चार-चार चरणों के अंतरे; द्रिक पंचांग और भारतकोश में एक पंक्ति की टेक और कुछ छोटे अंतरे। यहाँ पहला रूप लिया गया, क्योंकि उसके हर अंतरे के चरण टेक के चरणों से मेल खाते हैं (जैसे 'रज से रक्षा करके, सबकी भव त्राता')। दूसरे रूप के अंतर पाठांतर में हैं। 'रज से रक्षा करके, सबकी भव त्राता' शुभ पंचांग से लिया गया (भक्ति भारत और आज तक में 'रक्ष' छपा है)। दूसरे अंतरे की पहली पंक्ति भक्ति भारत और आज तक का पाठ है ('सूर बल्ली'); उसका अर्थ अनिश्चित है और यह बात अर्थ में साफ़ लिखी गई है। शाम को तुलसी-दल न तोड़ने का नियम ('रात्रि और दोनों संध्याओंमें भी तुलसीदल न तोड़े') और 'तुलसी के बिना भगवान की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती' वाली बात गीता प्रेस के आरती-संग्रह की भूमिका में है (archive.org: HindiBookAartiSangrahCompletebyGitaPress)। रचयिता अज्ञात।
तुलसी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में तुलसी की रोज़ की पूजा: सुबह जल, परिक्रमा, शाम का दीपक, नामाष्टक और आरती; पत्ते तोड़ने के नियम, कार्तिक मास और तुलसी विवाह की बातों के साथ।
तुलसी · श्लोक · संस्कृत
वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी
गंगा · स्तोत्र · संस्कृत
देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे
यमुना, कृष्ण · अष्टकम् · संस्कृत
नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा
गंगा · आरती
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता
रोज़ शाम तुलसी के पास दीपक जलाते समय यह आरती गाई जाती है। कार्तिक मास, देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह पर इसका विशेष चलन है।
कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) या द्वादशी को तुलसी का विवाह भगवान शालिग्राम या विष्णु के साथ कराया जाता है। उस दिन पूजा के अंत में यह आरती गाई जाती है।
यह पंक्ति तुलसी के रूप गिनाती लगती है: श्यामा (साँवली तुलसी), बल्ली (पौधा) और ग्राम्या (गाँव-घर की)। अलग-अलग पाठों में यहाँ 'बहु पुत्री', 'सुर बल्ली' और 'सूर वल्ली' भी मिलते हैं, इसलिए इसका अर्थ पूरी तरह निश्चित नहीं है।
परंपरा में संध्या और रात के समय तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते; गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' की भूमिका में भी यही नियम दिया गया है। पूजा के लिए पत्ते दिन में ही ले लें।
स्रोतों में रचयिता का नाम नहीं मिलता और आरती में किसी कवि की छाप भी नहीं है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।