तुलसी

पूजा विधि · तुलसी · रोज़ की पूजा

तुलसी पूजा विधि

घर में तुलसी की रोज़ की पूजा: सुबह जल, परिक्रमा, शाम का दीपक, नामाष्टक और आरती; पत्ते तोड़ने के नियम, कार्तिक मास और तुलसी विवाह की बातों के साथ।

इस पेज पर
  1. परिचय
  2. एक नज़र में
  3. कब करें
  4. सामग्री
  5. तैयारी
  6. चित्र या मूर्ति
  7. संकल्प
  8. चरण-दर-चरण विधि
  9. पाठ
  10. भोग
  11. समापन
  12. छोटी विधि
  13. परंपराओं में अंतर
  14. ये भी पढ़ें
  15. स्रोत
  16. सवाल-जवाब
  17. सुधार सुझाएँ
रोज़ की पूजा

यह घर के तुलसी के पौधे की रोज़ की पूजा है: सुबह जल, रोली-अक्षत-फूल और परिक्रमा, शाम को दीपक, नामाष्टक और आरती; साथ में तुलसीदल तोड़ने के परंपरागत नियम और कार्तिक मास की बातें। तुलसी विवाह की पूरी विधि (मंडप और शालग्राम या विष्णु के साथ विवाह-संस्कार) यहाँ नहीं है; उसकी मुख्य बातें नीचे हैं, और विस्तृत अनुष्ठान के लिए पुरोहित या अपनी परंपरा से मार्गदर्शन लें।

परिचय

तुलसी को विष्णुप्रिया और वृंदा कहा जाता है। बहुत-से घरों के आँगन, दरवाज़े या छज्जे पर तुलसी का पौधा होता है, और उसकी रोज़ की देखभाल ही उसकी पूजा है: सुबह जल, शाम को दीपक। परंपरा में माना जाता है कि जो तुलसी को रोज़ जल देता और उसकी देखभाल करता है, उस पर भगवान विष्णु की कृपा रहती है। भगवान विष्णु और श्री कृष्ण के भोग में तुलसीदल इसी पौधे से आता है।

तुलसी की पूजा जितनी सरल है, उतनी ही प्यारी भी: इसके लिए जल का एक लोटा और एक दीपक काफ़ी है। साथ में यह भी याद रखें कि तुलसी एक जीवित पौधा है; उसे धूप, सही मात्रा में पानी और साफ़-सुथरी जगह चाहिए। पत्ते तोड़ने के कुछ परंपरागत नियम हैं, जो गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के आधार पर नीचे दिए हैं।

एक नज़र में

समय
सुबह स्नान के बाद जल; शाम को सूर्यास्त के समय दीपक
अवधि
सुबह लगभग 5 मिनट, शाम लगभग 5 मिनट
कौन कर सकता है
घर का कोई भी सदस्य: स्त्री, पुरुष, बच्चे, बुज़ुर्ग
मुख्य सामग्री
जल, रोली या हल्दी, अक्षत, फूल, घी या तिल के तेल का दीपक
आरती
जय जय तुलसी माता

पूजा कब करें

  • रोज़ सुबह स्नान के बाद जल, और शाम को सूर्यास्त के समय दीपक। कई परंपराओं में रात को तुलसी को जल नहीं दिया जाता और न ही उसे छुआ जाता है; रात की सेवा शाम का दीपक ही है।
  • कार्तिक मास तुलसी की पूजा का सबसे बड़ा समय है: पूरे महीने रोज़ शाम तुलसी के पास दीपक जलाने की रीत है। तुलसी विवाह देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा के बीच, क्षेत्र के अनुसार किसी दिन होता है; कई जगह एकादशी के अगले दिन, द्वादशी को। तारीख़ें साइट के देवउठनी एकादशी और कार्तिक पूर्णिमा के पन्नों पर हैं।
  • कुछ परिवारों में रविवार और एकादशी को तुलसी को जल नहीं दिया जाता, जबकि बहुत-से परिवार रोज़ देते हैं; अपनी पारिवारिक रीत मानें।

पूजा सामग्री

  • आवश्यक इसके बिना यह विधि नहीं होती
  • वैकल्पिक हो तो अच्छा; न हो तो विकल्प दिया है
  • परंपरा-विशेष कुछ परंपराओं में ही
सामग्रीउपयोगस्थितिविकल्प / टिप्पणी
तुलसी का पौधापूजा और सेवा के लिएआवश्यकयह पूजा पौधे की ही है। घर में पौधा न हो तो मंदिर के तुलसी-चौरे पर पूजा करें, या नया पौधा लगाएँ; तब तक मन से प्रणाम।
शुद्ध जल का लोटासुबह जड़ में जल देने के लिएआवश्यकरोज़ जल देना ही तुलसी की मुख्य सेवा है। मात्रा मौसम और मिट्टी देखकर रखें: बहुत ज़्यादा जल से जड़ें गल सकती हैं, बरसात में कम, गर्मी में थोड़ा अधिक।
रोली, हल्दी या कुमकुम, और अक्षततिलक और अर्पण के लिएवैकल्पिकजो एक चीज़ हो, वही; न हो तो छोड़ दें।
फूलजड़ के पास अर्पण के लिएवैकल्पिककोई भी ताज़ा फूल; न हो तो छोड़ दें।
घी या तिल के तेल का दीपकशाम का दीपकवैकल्पिकमिट्टी का दीया और जो तेल घर में हो। हवा तेज़ हो तो दीपक को किसी आड़ में रखें।
धूप या अगरबत्तीशाम की पूजा मेंवैकल्पिकधुआँ पौधे पर सीधा न जाए; न हो तो छोड़ दें।
कच्चा सूत या मौलीविशेष दिनों पर तुलसी के तने या चौरे पर लपेटने के लिएपरंपरा-विशेषकार्तिक, एकादशी या तुलसी विवाह पर कई घरों की रीत; रोज़ ज़रूरी नहीं।
चुनरी और शृंगार की वस्तुएँतुलसी विवाह और विशेष दिनों परपरंपरा-विशेषरोज़ की पूजा में इनकी ज़रूरत नहीं।
गुड़, मिश्री या फलभोग के लिएवैकल्पिकरोज़ की तुलसी-पूजा में भोग ज़रूरी नहीं; जल और दीपक ही मुख्य सेवा है।

स्थान और अपनी तैयारी

  • तुलसी को ऐसी जगह रखें जहाँ अच्छी धूप आए: आँगन, दरवाज़े के सामने, छत या छज्जा। तुलसी-चौरा (वृंदावन) हो तो बहुत अच्छा, न हो तो गमला भी चलेगा।
  • पौधे के आसपास की जगह साफ़ रखें। परंपरा में तुलसी के पास गंदा पानी, कचरा या जूते-चप्पल नहीं रखे जाते।
  • तुलसी को छूने, जल देने या पत्ते लेने से पहले स्नान कर लें; गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के अनुसार बिना स्नान के और जूते पहनकर तुलसी नहीं तोड़ी जाती।

चित्र या मूर्ति कैसे रखें

  • पूजा करने वाला तुलसी के सामने खड़ा हो या बैठे। दीपक को सीधे ज़मीन पर न रखकर तुलसी की जड़ के पास एक छोटी थाली, दीवट या कुछ अक्षत पर रखें; गीताप्रेस में दीपक को सीधे ज़मीन पर रखना मना बताया गया है।
  • परिक्रमा के लिए पौधे के चारों ओर थोड़ी जगह हो तो अच्छा; गमला दीवार से लगा हो तो अपनी जगह पर घूमकर परिक्रमा की जाती है।
  • बहुत-से घरों में तुलसी को घर के पूर्व, उत्तर या उत्तर-पूर्व की ओर रखा जाता है; पर पौधे के लिए धूप सबसे ज़रूरी है। दिशा के बारे में परंपराओं में अंतर है।

संकल्प

रोज़ की तुलसी-पूजा में बड़ा संकल्प नहीं बोला जाता; जल देते समय मन में यह भाव रखना ही संकल्प है। कार्तिक मास का नियम या तुलसी विवाह शुरू करते समय यह संकल्प बोल सकते हैं।

हे तुलसी माता, आज मैं (अपना नाम) आपकी पूजा कर रहा/रही हूँ। आपकी सेवा करते हुए मेरा मन भगवान में लगा रहे, और मेरा घर आपकी हरियाली की तरह सुखी रहे।

कार्तिक मास में रोज़ दीपक जलाने का संकल्प कई लोग शरद पूर्णिमा या कार्तिक के पहले दिन लेते हैं; तुलसी विवाह का संकल्प पुरोहित करवाते हैं।

पूजा की विधि, चरण-दर-चरण

  1. १सुबह जल

    क्या करें
    स्नान के बाद तुलसी की जड़ में धीरे-धीरे जल दें।
    कैसे करें
    लोटे से जल पत्तों पर नहीं, जड़ के पास मिट्टी में धीरे-धीरे डालें। जल देते समय नीचे का श्लोक पढ़ें या मन में 'तुलसी माता को प्रणाम' कहें।
    भाव
    जैसे घर के किसी प्रिय सदस्य को सुबह पानी देते हैं, वैसे ही तुलसी माता की सेवा।
    पाठ

    नमस्तुलसि कल्याणि नमो विष्णुप्रिये शुभे।
    नमो मोक्षप्रदे देवि नमः सम्पत्प्रदायिके॥

    अर्थ: हे कल्याण करने वाली तुलसी, तुम्हें नमस्कार; हे विष्णु की प्रिय, शुभ देवी, तुम्हें नमस्कार। हे मोक्ष देने वाली देवी, तुम्हें नमस्कार; हे संपदा देने वाली, तुम्हें नमस्कार।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: तुलसीस्तोत्रम् (पुण्डरीककृत), श्लोक 2

    विकल्प
    श्लोक न आए तो केवल 'जय तुलसी माता' कहकर जल दें।
  2. २रोली, अक्षत और फूल

    क्या करें
    तुलसी-चौरे या गमले पर रोली या हल्दी का तिलक लगाएँ, अक्षत और फूल चढ़ाएँ।
    कैसे करें
    चौरे या गमले पर अनामिका से तिलक लगाएँ। अक्षत और फूल जड़ के पास रखें; पत्तों पर रोली न लगाएँ।
    भाव
    घर की इस हरी देवी का आदर।
    विकल्प
    रोज़ केवल जल भी काफ़ी है; तिलक-फूल विशेष दिनों पर।
  3. ३परिक्रमा

    क्या करें
    तुलसी की परिक्रमा करें।
    कैसे करें
    दाहिनी ओर से घूमते हुए तीन या सात परिक्रमा करें; जगह न हो तो अपनी जगह पर घूम जाएँ। परिक्रमा करते हुए भगवान का नाम लें।
    भाव
    जिसे प्रिय मानते हैं, उसके चारों ओर श्रद्धा से घूमना।
    विकल्प
    परिक्रमा न हो सके तो हाथ जोड़कर प्रणाम।
  4. ४तुलसीदल लेना हो तो

    क्या करें
    भगवान की पूजा के लिए तुलसीदल चाहिए तो सुबह स्नान के बाद, नियमों का ध्यान रखकर लें।
    कैसे करें
    एक-एक पत्ता अलग तोड़ने के बजाय पत्तियों वाले अगले भाग (या पत्तियों सहित मंजरी) को धीरे से, पौधे को हिलाए बिना लें। तोड़ते समय नीचे का श्लोक पढ़ें। गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के अनुसार मंगलवार, शुक्रवार और रविवार को, द्वादशी, अमावस्या और पूर्णिमा को, संक्रांति के दिन, सूतक के दिनों में, रात को और सुबह-शाम की संध्या के समय तुलसी नहीं तोड़ी जाती। उन दिनों पौधे से अपने-आप गिरे पत्ते या पिछले दिन तोड़कर रखे पत्ते काम में लें; तुलसीदल बासी नहीं माना जाता।
    भाव
    पौधे से उतना ही लेना, जितना भगवान की सेवा में चाहिए, और धन्यवाद के साथ।
    पाठ

    तुलस्यमृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिया।
    चिनोमि केशवस्यार्थे वरदा भव शोभने॥

    अर्थ: हे तुलसी, तुम अमृत से उत्पन्न हुई हो और सदा केशव (भगवान) को प्रिय हो। हे सुंदर देवी, मैं केशव की पूजा के लिए तुम्हारे पत्ते चुन रहा हूँ; मुझ पर कृपा करो।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: तुलसीदल तोड़ने का मंत्र (आह्निकसूत्रावली से)

    विकल्प
    पत्ते की ज़रूरत न हो तो यह चरण छोड़ दें; रोज़ की पूजा में तुलसी तोड़ना ज़रूरी नहीं।
  5. ५शाम का दीपक

    क्या करें
    सूर्यास्त के समय तुलसी के पास घी या तिल के तेल का दीपक जलाएँ।
    कैसे करें
    दीपक को जड़ के पास छोटी थाली या दीवट पर रखें। दीपक जलाकर नीचे का श्लोक पढ़ें और प्रणाम करें। चाहें तो धूप भी दिखाएँ।
    भाव
    दिन ढलते समय घर के आँगन में भगवान का प्रकाश।
    पाठ

    शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुखसम्पदम्।
    शत्रुबुद्धिविनाशं च दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥

    अर्थ: हे दीपक की ज्योति, तुम शुभ, कल्याण, आरोग्य और सुख-संपदा दो, और मन से शत्रुता के भाव को मिटाओ; तुम्हें नमस्कार।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: सांध्यदीप

    विकल्प
    दीपक न जला सकें (तेज़ हवा या जगह की कमी) तो घर के भीतर पूजा-स्थान पर दीपक जलाकर तुलसी को मन से प्रणाम करें।
  6. ६तुलसी नामाष्टक

    क्या करें
    तुलसी के आठ नामों वाला श्लोक पढ़ें।
    कैसे करें
    दीपक के सामने हाथ जोड़कर नीचे का श्लोक एक या तीन बार पढ़ें।
    भाव
    तुलसी माता को उनके प्यारे नामों से पुकारना।
    पाठ

    वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
    पुष्पसारा नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनी॥

    अर्थ: वृंदा, वृंदावनी (वृंदावन वाली), विश्वपूजिता (सारा जगत जिनकी पूजा करता है), विश्वपावनी (जगत को पवित्र करने वाली), पुष्पसारा (फूलों का सार), नंदिनी (आनंद देने वाली), तुलसी और कृष्णजीवनी (श्री कृष्ण की प्राण-प्रिय): ये तुलसी के आठ नाम हैं।

    तुलसी नामाष्टक: पूरा पाठ और अर्थ

    विकल्प
    श्लोक न पढ़ सकें तो 'जय तुलसी माता' कहें।
  7. ७आरती

    क्या करें
    'जय जय तुलसी माता' गाते हुए आरती करें।
    कैसे करें
    उसी दीपक से या कपूर से तुलसी की आरती करें। आरती के बाद थोड़ा जल गिराएँ और दोनों हथेलियों से आरती लें। आरती का दीपक तुलसी के पास ही रहने दें।
    भाव
    शाम की पूजा पूरी होने का आनंद।
    विकल्प
    बोल याद न हों तो दीपक घुमाते हुए 'जय तुलसी माता' कहें।
    आरतीजय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी मातापूरी तुलसी माता की आरती पढ़ें
  8. ८प्रणाम और क्षमा प्रार्थना

    क्या करें
    हाथ जोड़कर प्रणाम करें और क्षमा प्रार्थना करें।
    कैसे करें
    नीचे दी गई क्षमा प्रार्थना पढ़ें। तुलसी के पास रखा दीपक अपने-आप बुझने दें।
    भाव
    सेवा में जो कमी रह गई, उसे माँ पर छोड़ देना।
    विकल्प
    समय कम हो तो केवल प्रणाम।

पूजा में पढ़े जाने वाले पाठ

कृष्ण

दामोदराष्टकम्

कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत

कार्तिक मास में तुलसी के पास दीपक जलाते समय कई वैष्णव घरों में पढ़ा जाता है

भोग

  • गुड़ या मिश्री
  • मौसम के फल
  • कार्तिक और तुलसी विवाह पर कई घरों में आँवला, बेर, सिंघाड़ा और गन्ना

रोज़ की तुलसी-पूजा में भोग ज़रूरी नहीं; जल और दीपक ही मुख्य सेवा है। जो भोग रखें, उसे बाद में प्रसाद की तरह बाँट दें; तुलसी की जड़ में मीठी चीज़ें न छोड़ें, इससे चींटियाँ और कीड़े लगते हैं।

प्रार्थना और समापन

हे तुलसी माता, आज की सेवा में जो कमी रह गई हो, उसे क्षमा करें। आप हमारे आँगन में ऐसे ही हरी-भरी रहें, और हमारा मन भगवान में लगा रहे।

क्षमा प्रार्थना

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥

अर्थ: हे परमेश्वरी, मैं न आपको बुलाना जानती/जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; मुझे क्षमा करें। हे देवी, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें।

स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीमहालक्ष्मी-पूजन: क्षमा-प्रार्थना (देवी के लिए स्त्रीलिंग रूप)

पूजा के बाद

  • अपने-आप गिरे सूखे पत्ते और पुराने फूल उसी गमले की मिट्टी में मिला दें; वे खाद बन जाते हैं।
  • पौधे की देखभाल भी पूजा है: सर्दियों में पाले से बचाने के लिए रात को हल्का कपड़ा ओढ़ा दें, और गर्मी में तेज़ दोपहर की धूप से थोड़ी छाया दें।
  • पौधा सूख जाए तो डरने की कोई बात नहीं; वह भी प्रकृति का नियम है। परंपरा में सूखे पौधे को सम्मान से साफ़ मिट्टी में रख दिया जाता है या अपनी रीत के अनुसार बहते जल में प्रवाहित किया जाता है, और नया पौधा लगाया जाता है। उसकी लकड़ी से कई लोग माला भी बनवाते हैं।

समय कम हो तो: छोटी विधि

  1. सुबह स्नान के बाद तुलसी की जड़ में जल दें।
  2. चौरे या गमले पर तिलक लगाएँ, अक्षत और फूल चढ़ाएँ।
  3. तीन या सात परिक्रमा करें।
  4. पत्ते लेने हों तो नियमों का ध्यान रखकर सुबह ही लें।
  5. शाम को जड़ के पास दीपक जलाएँ।
  6. नामाष्टक पढ़कर 'जय जय तुलसी माता' से आरती करें और प्रणाम करें।

परंपराओं में अंतर

  • जल के दिन: कुछ परिवारों में रविवार और एकादशी को तुलसी को जल नहीं दिया जाता, जबकि बहुत-से परिवार रोज़ देते हैं। रात को जल न देने और न छूने की रीत बहुत-सी परंपराओं में है।
  • पत्ते तोड़ना: गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश मंगलवार, शुक्रवार, रविवार, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, सूतक, रात और संध्या के समय तुलसी तोड़ना मना बताती है, पर यह भी कहती है कि शालग्राम की पूजा के लिए निषिद्ध दिनों में भी तुलसी ली जा सकती है। कुछ परंपराओं में एकादशी को भी तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
  • कुछ परंपराओं में तुलसी की पूजा के लिए मंगलवार और शुक्रवार विशेष माने जाते हैं। ओडिशा में वैशाख महीने में तुलसी के ऊपर नीचे छेद वाला मटका टाँगा जाता है, ताकि गर्मी में उस पर ठंडे जल की धार गिरती रहे।
  • तुलसी विवाह: कहीं देवउठनी एकादशी को, कहीं द्वादशी को और कहीं पूर्णिमा तक किसी दिन होता है। दूल्हा कहीं शालग्राम, कहीं श्री कृष्ण या विष्णु की मूर्ति होते हैं; आंध्र और तेलंगाना में कार्तिक शुक्ल द्वादशी को आँवले की टहनी को विष्णु मानकर विवाह होता है।
  • गौड़ीय वैष्णव परंपरा में कार्तिक को दामोदर मास कहते हैं; पूरे महीने शाम को दीपक के साथ दामोदराष्टकम् पढ़ा जाता है, और तुलसी की आरती व परिक्रमा रोज़ होती है।

ये भी पढ़ें

गंगा

गङ्गा स्तोत्रम्

गंगा · स्तोत्र · संस्कृत

देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे

यमुना

यमुनाष्टकम्

यमुना, कृष्ण · अष्टकम् · संस्कृत

नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा

तुलसी माता के लिए और

स्रोत और समीक्षा

  • गीताप्रेस, गोरखपुर: नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (archive.org पर स्कैन): तुलसीदल-चयन, तोड़ने का मंत्र और निषिद्ध समय; तुलसीदल बासी नहीं होता; तुलसीस्तोत्रम् (पुण्डरीककृत); सांध्यदीप; दीपक सीधे ज़मीन पर न रखना; देवी-पूजा की क्षमा-प्रार्थना। दो अलग स्कैन से मिलाया।
  • sanskritdocuments.org: श्रीतुलसीनामाष्टकस्तोत्रम्: वृन्दा वृन्दावनी श्लोक का पाठ
  • Wikipedia: Tulasi in Hinduism: आँगन में तुलसी, रोज़ जल और देखभाल, सुबह-शाम दीपक, मंगलवार-शुक्रवार, ओडिशा में वैशाख का मटका, सूखे पौधे के साथ व्यवहार
  • Wikipedia: Tulasi Vivaha: प्रबोधिनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा, क्षेत्रीय अंतर, आँवले की टहनी वाली तेलुगु रीत
  • dailybhakti.app: देवउठनी एकादशी और कार्तिक पूर्णिमा: देवउठनी के अगले दिन तुलसी विवाह की बात साइट के व्रत पन्ने से मिलाई गई

समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): तुलसीस्तोत्र का श्लोक, तुलसीदल तोड़ने का मंत्र और नियम, और सांध्यदीप का श्लोक गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (archive.org के दो स्कैन के OCR से मिलाकर) से; नामाष्टक sanskritdocuments से; क्षमा-प्रार्थना गीताप्रेस की श्रीमहालक्ष्मी-पूजन वाली स्त्रीलिंग रूप से। 'रात को जल न देना' और 'रविवार-एकादशी को जल न देना' प्रचलित पारिवारिक रीतें हैं; गीताप्रेस में रात और इन दिनों तुलसी तोड़ने की मनाही है, जल की नहीं, इसलिए इन्हें 'कई परंपराओं में' / 'कुछ परिवारों में' कहकर लिखा गया। पौधा और जल 'आवश्यक' कहे गए, क्योंकि यह पूजा पौधे की और उसे जल देने की ही है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

रात को तुलसी को जल क्यों नहीं देते?

बहुत-सी परंपराओं में रात को तुलसी को जल देना, छूना और उसके पत्ते तोड़ना मना है; गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश भी रात और संध्या के समय तुलसी तोड़ने से मना करती है। रात की सेवा शाम का दीपक है। पौधे के लिए भी सुबह का पानी ही ठीक रहता है।

रविवार और एकादशी को तुलसी को जल दें या नहीं?

इस पर घरों की रीत अलग है। कुछ परिवार इन दिनों जल नहीं देते, बहुत-से परिवार रोज़ देते हैं। अपनी पारिवारिक रीत मानें। तेज़ गर्मी में पौधा मुरझा रहा हो तो कई लोग जड़ में थोड़ा जल दे देते हैं, क्योंकि पौधे की देखभाल भी सेवा ही है; यह अपने विवेक से तय करें।

किन दिनों तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए?

गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के अनुसार मंगलवार, शुक्रवार और रविवार को; द्वादशी, अमावस्या और पूर्णिमा को; संक्रांति के दिन; जन्म या मृत्यु के सूतक में; और रात व संध्या के समय। बिना स्नान के और जूते पहनकर भी नहीं। इन दिनों अपने-आप गिरे पत्ते या पहले से रखे पत्ते भगवान को चढ़ाए जाते हैं।

तुलसी का पौधा सूख जाए तो क्या करें?

डरने की कोई बात नहीं; पौधे मौसम से, ज़्यादा पानी से या उम्र से सूखते हैं। सूखे पौधे को सम्मान से साफ़ मिट्टी में रख दें या अपनी रीत के अनुसार प्रवाहित करें, और नया पौधा लगा लें। अगली बार धूप, पानी की मात्रा और मिट्टी का ध्यान रखें।

क्या मासिक धर्म के दिनों में तुलसी को जल दे सकते हैं?

इस पर परिवारों में अलग-अलग रीत है। कई घरों में उन दिनों तुलसी को छूना और जल देना घर का कोई और सदस्य करता है, जबकि बहुत-से परिवार ऐसा नियम नहीं मानते। जो भी रीत हो, दूर से प्रणाम और मन से प्रार्थना हर दिन की जा सकती है; इसमें अपराध-बोध की कोई बात नहीं है।

क्या पुरुष भी तुलसी की पूजा कर सकते हैं?

हाँ। परंपरा में तुलसी की रोज़ की देखभाल अक्सर घर की स्त्रियाँ करती आई हैं, पर तुलसी की पूजा, जल, दीपक और परिक्रमा घर का कोई भी सदस्य कर सकता है।

तुलसी विवाह कब और कैसे होता है?

तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी) से कार्तिक पूर्णिमा के बीच, क्षेत्र के अनुसार किसी दिन होता है। तुलसी को दुल्हन की तरह चुनरी और शृंगार से सजाया जाता है, और शालग्राम या भगवान विष्णु अथवा श्री कृष्ण की मूर्ति को दूल्हा मानकर विवाह की रीतें की जाती हैं। इसके साथ विवाहों का मौसम शुरू माना जाता है। पूरी विधि के लिए अपनी परंपरा या पुरोहित से मार्गदर्शन लें; तारीख़ साइट के देवउठनी एकादशी पन्ने पर है।

छज्जे पर तुलसी है और दीपक जलाना संभव नहीं, तो?

हवा या जगह की वजह से दीपक न जल सके तो घर के पूजा-स्थान पर दीपक जलाकर तुलसी की ओर मुख करके प्रणाम कर लें। चारों ओर से ढका दीपक भी काम आता है। सुरक्षा का ध्यान पहले रखें।

सुधार सुझाएँ

इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।

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