तुलसी नामाष्टक
तुलसी · श्लोक · संस्कृत
शाम की पूजा में (चरण 6)

पूजा विधि · तुलसी · रोज़ की पूजा
घर में तुलसी की रोज़ की पूजा: सुबह जल, परिक्रमा, शाम का दीपक, नामाष्टक और आरती; पत्ते तोड़ने के नियम, कार्तिक मास और तुलसी विवाह की बातों के साथ।
यह घर के तुलसी के पौधे की रोज़ की पूजा है: सुबह जल, रोली-अक्षत-फूल और परिक्रमा, शाम को दीपक, नामाष्टक और आरती; साथ में तुलसीदल तोड़ने के परंपरागत नियम और कार्तिक मास की बातें। तुलसी विवाह की पूरी विधि (मंडप और शालग्राम या विष्णु के साथ विवाह-संस्कार) यहाँ नहीं है; उसकी मुख्य बातें नीचे हैं, और विस्तृत अनुष्ठान के लिए पुरोहित या अपनी परंपरा से मार्गदर्शन लें।
तुलसी को विष्णुप्रिया और वृंदा कहा जाता है। बहुत-से घरों के आँगन, दरवाज़े या छज्जे पर तुलसी का पौधा होता है, और उसकी रोज़ की देखभाल ही उसकी पूजा है: सुबह जल, शाम को दीपक। परंपरा में माना जाता है कि जो तुलसी को रोज़ जल देता और उसकी देखभाल करता है, उस पर भगवान विष्णु की कृपा रहती है। भगवान विष्णु और श्री कृष्ण के भोग में तुलसीदल इसी पौधे से आता है।
तुलसी की पूजा जितनी सरल है, उतनी ही प्यारी भी: इसके लिए जल का एक लोटा और एक दीपक काफ़ी है। साथ में यह भी याद रखें कि तुलसी एक जीवित पौधा है; उसे धूप, सही मात्रा में पानी और साफ़-सुथरी जगह चाहिए। पत्ते तोड़ने के कुछ परंपरागत नियम हैं, जो गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के आधार पर नीचे दिए हैं।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| तुलसी का पौधा | पूजा और सेवा के लिए | आवश्यक | यह पूजा पौधे की ही है। घर में पौधा न हो तो मंदिर के तुलसी-चौरे पर पूजा करें, या नया पौधा लगाएँ; तब तक मन से प्रणाम। |
| शुद्ध जल का लोटा | सुबह जड़ में जल देने के लिए | आवश्यक | रोज़ जल देना ही तुलसी की मुख्य सेवा है। मात्रा मौसम और मिट्टी देखकर रखें: बहुत ज़्यादा जल से जड़ें गल सकती हैं, बरसात में कम, गर्मी में थोड़ा अधिक। |
| रोली, हल्दी या कुमकुम, और अक्षत | तिलक और अर्पण के लिए | वैकल्पिक | जो एक चीज़ हो, वही; न हो तो छोड़ दें। |
| फूल | जड़ के पास अर्पण के लिए | वैकल्पिक | कोई भी ताज़ा फूल; न हो तो छोड़ दें। |
| घी या तिल के तेल का दीपक | शाम का दीपक | वैकल्पिक | मिट्टी का दीया और जो तेल घर में हो। हवा तेज़ हो तो दीपक को किसी आड़ में रखें। |
| धूप या अगरबत्ती | शाम की पूजा में | वैकल्पिक | धुआँ पौधे पर सीधा न जाए; न हो तो छोड़ दें। |
| कच्चा सूत या मौली | विशेष दिनों पर तुलसी के तने या चौरे पर लपेटने के लिए | परंपरा-विशेष | कार्तिक, एकादशी या तुलसी विवाह पर कई घरों की रीत; रोज़ ज़रूरी नहीं। |
| चुनरी और शृंगार की वस्तुएँ | तुलसी विवाह और विशेष दिनों पर | परंपरा-विशेष | रोज़ की पूजा में इनकी ज़रूरत नहीं। |
| गुड़, मिश्री या फल | भोग के लिए | वैकल्पिक | रोज़ की तुलसी-पूजा में भोग ज़रूरी नहीं; जल और दीपक ही मुख्य सेवा है। |
रोज़ की तुलसी-पूजा में बड़ा संकल्प नहीं बोला जाता; जल देते समय मन में यह भाव रखना ही संकल्प है। कार्तिक मास का नियम या तुलसी विवाह शुरू करते समय यह संकल्प बोल सकते हैं।
हे तुलसी माता, आज मैं (अपना नाम) आपकी पूजा कर रहा/रही हूँ। आपकी सेवा करते हुए मेरा मन भगवान में लगा रहे, और मेरा घर आपकी हरियाली की तरह सुखी रहे।
कार्तिक मास में रोज़ दीपक जलाने का संकल्प कई लोग शरद पूर्णिमा या कार्तिक के पहले दिन लेते हैं; तुलसी विवाह का संकल्प पुरोहित करवाते हैं।
नमस्तुलसि कल्याणि नमो विष्णुप्रिये शुभे।
नमो मोक्षप्रदे देवि नमः सम्पत्प्रदायिके॥
अर्थ: हे कल्याण करने वाली तुलसी, तुम्हें नमस्कार; हे विष्णु की प्रिय, शुभ देवी, तुम्हें नमस्कार। हे मोक्ष देने वाली देवी, तुम्हें नमस्कार; हे संपदा देने वाली, तुम्हें नमस्कार।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: तुलसीस्तोत्रम् (पुण्डरीककृत), श्लोक 2
तुलस्यमृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिया।
चिनोमि केशवस्यार्थे वरदा भव शोभने॥
अर्थ: हे तुलसी, तुम अमृत से उत्पन्न हुई हो और सदा केशव (भगवान) को प्रिय हो। हे सुंदर देवी, मैं केशव की पूजा के लिए तुम्हारे पत्ते चुन रहा हूँ; मुझ पर कृपा करो।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: तुलसीदल तोड़ने का मंत्र (आह्निकसूत्रावली से)
शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुखसम्पदम्।
शत्रुबुद्धिविनाशं च दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
अर्थ: हे दीपक की ज्योति, तुम शुभ, कल्याण, आरोग्य और सुख-संपदा दो, और मन से शत्रुता के भाव को मिटाओ; तुम्हें नमस्कार।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: सांध्यदीप
वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनी॥
अर्थ: वृंदा, वृंदावनी (वृंदावन वाली), विश्वपूजिता (सारा जगत जिनकी पूजा करता है), विश्वपावनी (जगत को पवित्र करने वाली), पुष्पसारा (फूलों का सार), नंदिनी (आनंद देने वाली), तुलसी और कृष्णजीवनी (श्री कृष्ण की प्राण-प्रिय): ये तुलसी के आठ नाम हैं।
तुलसी · श्लोक · संस्कृत
शाम की पूजा में (चरण 6)
तुलसी · आरती
आरती (चरण 7)
कृष्ण, बाल गोपाल · अष्टकम् · संस्कृत
कार्तिक मास में तुलसी के पास दीपक जलाते समय कई वैष्णव घरों में पढ़ा जाता है
रोज़ की तुलसी-पूजा में भोग ज़रूरी नहीं; जल और दीपक ही मुख्य सेवा है। जो भोग रखें, उसे बाद में प्रसाद की तरह बाँट दें; तुलसी की जड़ में मीठी चीज़ें न छोड़ें, इससे चींटियाँ और कीड़े लगते हैं।
हे तुलसी माता, आज की सेवा में जो कमी रह गई हो, उसे क्षमा करें। आप हमारे आँगन में ऐसे ही हरी-भरी रहें, और हमारा मन भगवान में लगा रहे।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अर्थ: हे परमेश्वरी, मैं न आपको बुलाना जानती/जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; मुझे क्षमा करें। हे देवी, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीमहालक्ष्मी-पूजन: क्षमा-प्रार्थना (देवी के लिए स्त्रीलिंग रूप)
गंगा · आरती
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता
गंगा · स्तोत्र · संस्कृत
देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे
यमुना, कृष्ण · अष्टकम् · संस्कृत
नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): तुलसीस्तोत्र का श्लोक, तुलसीदल तोड़ने का मंत्र और नियम, और सांध्यदीप का श्लोक गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (archive.org के दो स्कैन के OCR से मिलाकर) से; नामाष्टक sanskritdocuments से; क्षमा-प्रार्थना गीताप्रेस की श्रीमहालक्ष्मी-पूजन वाली स्त्रीलिंग रूप से। 'रात को जल न देना' और 'रविवार-एकादशी को जल न देना' प्रचलित पारिवारिक रीतें हैं; गीताप्रेस में रात और इन दिनों तुलसी तोड़ने की मनाही है, जल की नहीं, इसलिए इन्हें 'कई परंपराओं में' / 'कुछ परिवारों में' कहकर लिखा गया। पौधा और जल 'आवश्यक' कहे गए, क्योंकि यह पूजा पौधे की और उसे जल देने की ही है।
बहुत-सी परंपराओं में रात को तुलसी को जल देना, छूना और उसके पत्ते तोड़ना मना है; गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश भी रात और संध्या के समय तुलसी तोड़ने से मना करती है। रात की सेवा शाम का दीपक है। पौधे के लिए भी सुबह का पानी ही ठीक रहता है।
इस पर घरों की रीत अलग है। कुछ परिवार इन दिनों जल नहीं देते, बहुत-से परिवार रोज़ देते हैं। अपनी पारिवारिक रीत मानें। तेज़ गर्मी में पौधा मुरझा रहा हो तो कई लोग जड़ में थोड़ा जल दे देते हैं, क्योंकि पौधे की देखभाल भी सेवा ही है; यह अपने विवेक से तय करें।
गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के अनुसार मंगलवार, शुक्रवार और रविवार को; द्वादशी, अमावस्या और पूर्णिमा को; संक्रांति के दिन; जन्म या मृत्यु के सूतक में; और रात व संध्या के समय। बिना स्नान के और जूते पहनकर भी नहीं। इन दिनों अपने-आप गिरे पत्ते या पहले से रखे पत्ते भगवान को चढ़ाए जाते हैं।
डरने की कोई बात नहीं; पौधे मौसम से, ज़्यादा पानी से या उम्र से सूखते हैं। सूखे पौधे को सम्मान से साफ़ मिट्टी में रख दें या अपनी रीत के अनुसार प्रवाहित करें, और नया पौधा लगा लें। अगली बार धूप, पानी की मात्रा और मिट्टी का ध्यान रखें।
इस पर परिवारों में अलग-अलग रीत है। कई घरों में उन दिनों तुलसी को छूना और जल देना घर का कोई और सदस्य करता है, जबकि बहुत-से परिवार ऐसा नियम नहीं मानते। जो भी रीत हो, दूर से प्रणाम और मन से प्रार्थना हर दिन की जा सकती है; इसमें अपराध-बोध की कोई बात नहीं है।
हाँ। परंपरा में तुलसी की रोज़ की देखभाल अक्सर घर की स्त्रियाँ करती आई हैं, पर तुलसी की पूजा, जल, दीपक और परिक्रमा घर का कोई भी सदस्य कर सकता है।
तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी) से कार्तिक पूर्णिमा के बीच, क्षेत्र के अनुसार किसी दिन होता है। तुलसी को दुल्हन की तरह चुनरी और शृंगार से सजाया जाता है, और शालग्राम या भगवान विष्णु अथवा श्री कृष्ण की मूर्ति को दूल्हा मानकर विवाह की रीतें की जाती हैं। इसके साथ विवाहों का मौसम शुरू माना जाता है। पूरी विधि के लिए अपनी परंपरा या पुरोहित से मार्गदर्शन लें; तारीख़ साइट के देवउठनी एकादशी पन्ने पर है।
हवा या जगह की वजह से दीपक न जल सके तो घर के पूजा-स्थान पर दीपक जलाकर तुलसी की ओर मुख करके प्रणाम कर लें। चारों ओर से ढका दीपक भी काम आता है। सुरक्षा का ध्यान पहले रखें।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।