तुलसी

स्तोत्र · तुलसी · श्लोक

तुलसी नामाष्टक

देवीभागवत और ब्रह्मवैवर्त पुराण में आए तुलसी जी के आठ नाम: वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी, कृष्णजीवनी।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी ।पुष्पसारा नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनी ॥३२॥

vṛndā vṛndāvanī viśvapūjitā viśvapāvanī |
puṣpasārā nandinī ca tulasī kṛṣṇajīvanī ||

अर्थ: वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी और कृष्णजीवनी, ये तुलसी देवी के आठ नाम हैं।

वृन्दा
जब बहुत से (वृन्द) पौधे और वृक्ष एक साथ होते हैं, उस रूप वाली (देवीभागवत 9.25.18)
वृन्दावनी
जो सबसे पहले वृन्दावन में प्रकट हुईं (9.25.19)
विश्वपूजिता
असंख्य लोकों में पूजी जाने वाली (9.25.20)
विश्वपावनी
असंख्य लोकों को पवित्र करने वाली (9.25.21)
पुष्पसारा
फूलों का सार, जिनके बिना फूलों के ढेर से भी देवता प्रसन्न नहीं होते (9.25.22)
नन्दिनी
जिन्हें पाकर भक्तों को आनंद होता है (9.25.23)
तुलसी
जिनकी तुलना (बराबरी) कोई नहीं कर सकता (9.25.24)
कृष्णजीवनी
श्रीकृष्ण के जीवन-स्वरूप, उनकी सदा प्रिय (9.25.25)

एतन्नामाष्टकञ्चैव स्तोत्रं नामार्थसंयुतम् ।यः पठेत्तां च संपूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥३३॥

etannāmāṣṭakañcaiva stotraṃ nāmārthasaṃyutam |
yaḥ paṭhettāṃ ca saṃpūjya so’śvamedhaphalaṃ labhet ||

अर्थ: जो तुलसी जी की पूजा करके नामों के अर्थ सहित इस नामाष्टक स्तोत्र को पढ़ता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है, ऐसा यह श्लोक कहता है।

नामाष्टकं
आठ नामों का समूह
नामार्थसंयुतम्
नामों के अर्थ के साथ
संपूज्य
पूजा करके
अश्वमेधफलं
अश्वमेध यज्ञ का फल

परिचय

तुलसी नामाष्टक एक श्लोक है, जिसमें तुलसी देवी के आठ नाम हैं: वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी और कृष्णजीवनी। इसके साथ का दूसरा श्लोक बताता है कि नामों के अर्थ के साथ इसका पाठ करने का क्या फल है।

ये दोनों श्लोक देवीभागवत पुराण (स्कन्ध 9, अध्याय 25) और ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृतिखण्ड, अध्याय 22) में तुलसी की कथा में आते हैं। इससे ठीक पहले पुराण स्वयं भगवान विष्णु की स्तुति के रूप में हर नाम का अर्थ समझाता है, और वही अर्थ यहाँ शब्दार्थ में दिए गए हैं।

भावार्थ

यह छोटा-सा पाठ तुलसी जी को आठ नामों से याद करता है, और हर नाम उनके किसी गुण को बताता है। वृन्दा और वृन्दावनी नाम उनके वृन्दावन से संबंध को, विश्वपूजिता और विश्वपावनी उनकी सब जगह पूजा और पवित्र करने की शक्ति को, पुष्पसारा उनके फूलों से भी बढ़कर होने को, नन्दिनी भक्तों को आनंद देने को, तुलसी उनकी अतुलनीयता को और कृष्णजीवनी श्रीकृष्ण से उनके गहरे प्रेम को बताता है।

पुराण की कथा में भगवान विष्णु स्वयं इन नामों से तुलसी की स्तुति करते हैं, और फिर कहा जाता है कि जो इन नामों को उनके अर्थ के साथ पढ़ता है, उसे बड़ा पुण्य मिलता है। इसका भाव यह है कि नाम केवल बोले न जाएँ, उनका अर्थ समझकर, प्रेम से लिए जाएँ।

फलश्रुति

इस नामाष्टक की फलश्रुति कहती है कि जो तुलसी जी की पूजा करके नामों के अर्थ सहित इसे पढ़ता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। यह पुराण का अपना वचन है।

एतन्नामाष्टकञ्चैव स्तोत्रं नामार्थसंयुतम् ।
यः पठेत्तां च संपूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥

जो तुलसी जी की पूजा करके नामों के अर्थ सहित इस नामाष्टक स्तोत्र को पढ़ता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है, ऐसा यह श्लोक कहता है।

यह श्लोक कब पढ़ा जाता है

  • रोज़ तुलसी पूजा और तुलसी को जल चढ़ाते समय
  • कार्तिक मास में, विशेषकर कार्तिक पूर्णिमा पर, जिसे पुराण तुलसी का जन्म-दिन बताता है
  • देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह पर
  • तुलसी के पास शाम का दीपक जलाते समय

पढ़ने की विधि

  • तुलसी जी को जल चढ़ाकर, हो सके तो दीपक जलाकर, उनके सामने हाथ जोड़ें।
  • आठों नाम धीरे-धीरे लें और हर नाम के साथ उसका अर्थ मन में याद करें; पुराण नामों के अर्थ के साथ पाठ की बात कहता है।
  • फिर दूसरा श्लोक पढ़कर तुलसी जी की परिक्रमा या प्रणाम करें।
पूरी विधितुलसी पूजा विधिघर में तुलसी की रोज़ की पूजा: सुबह जल, परिक्रमा, शाम का दीपक, नामाष्टक और आरती; पत्ते तोड़ने के नियम, कार्तिक मास और तुलसी विवाह की बातों के साथ।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
श्लोक 32पुष्पसारा नन्दनी चsa.wikisource.org के देवीभागवत-पाठ में "नन्दनी" छपा है; sanskritdocuments.org और ब्रह्मवैवर्त पुराण ("नन्दिनीं") के अनुसार यहाँ "नन्दिनी" लिया गया है।
श्लोक 32वृन्दां वृन्दावनीं विश्वपावनीं विश्वपूजिताम् । पुष्पसारां नन्दिनीं च तुलसीं कृष्णजीवनीम् ॥ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृतिखण्ड 22.32) का पाठ: नाम द्वितीया विभक्ति में हैं और विश्वपावनी व विश्वपूजिता का क्रम बदला है।
श्लोक 33एतन्नामाष्टकं स्तोत्रं पठन्मङ्गलमाप्नुयात् ।sanskritdocuments.org का पाठ, जिसमें दूसरे श्लोक की जगह केवल यह आधी पंक्ति है: "इस नामाष्टक स्तोत्र को पढ़कर मंगल पाए"।
श्लोक 33एतन्नामाष्टकं चैतत्स्तोत्रं नामार्थसंयुतम्ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृतिखण्ड 22.33) का पाठ।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
ग्रंथ / स्रोत
देवीभागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 25, श्लोक 32–33
भाषा
संस्कृत

यही दो श्लोक ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृतिखण्ड, अध्याय 22, श्लोक 32–33) में भी हैं, जहाँ नाम द्वितीया विभक्ति में (वृन्दां वृन्दावनीं...) छपे हैं। इन नामों का अर्थ देवीभागवत 9.25.18–25 में भगवान विष्णु की तुलसी-स्तुति में बताया गया है। श्लोक-संख्या देवीभागवत के अध्याय की है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पहला श्लोक sanskritdocuments.org से लिया गया और sa.wikisource.org पर देवीभागवत पुराण (9.25.32–33) तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृतिखण्ड 22.32–33) से मिलाया गया; दूसरा (फलश्रुति) श्लोक देवीभागवत पुराण से लिया गया। sanskritdocuments.org पर दूसरे श्लोक की जगह केवल एक आधी पंक्ति है, इसलिए पूरा श्लोक पुराण से लिया गया और वह आधी पंक्ति पाठ-भेद में है। नामों के अर्थ देवीभागवत 9.25.18–25 के आधार पर हैं। लेबल "श्लोक" रखा गया, क्योंकि यह आठ श्लोकों वाला अष्टक नहीं, आठ नामों वाला एक श्लोक है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

तुलसी नामाष्टक किस ग्रंथ से है?

देवीभागवत पुराण (स्कन्ध 9, अध्याय 25, श्लोक 32–33) से; यही श्लोक ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृतिखण्ड, अध्याय 22) में भी हैं।

तुलसी के आठ नाम कौन से हैं?

वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी और कृष्णजीवनी।

"तुलसी" नाम का अर्थ क्या है?

देवीभागवत पुराण कहता है कि सारे लोकों में जिनकी तुला (बराबरी) नहीं है, वे तुलसी कहलाती हैं।

इसे कब पढ़ें?

रोज़ तुलसी को जल चढ़ाते या दीपक जलाते समय, और विशेषकर कार्तिक मास, कार्तिक पूर्णिमा और तुलसी विवाह पर। इसका कोई कठिन नियम नहीं है।

क्या इसे स्तोत्र कहें या श्लोक?

पुराण स्वयं इसे "नामाष्टक स्तोत्र" कहता है, पर रूप में यह आठ नामों वाला एक श्लोक है, जिसके साथ फलश्रुति का एक श्लोक है।

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पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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