ॐ जय गंगे माता
गंगा · आरती
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता

स्तोत्र · गंगा · स्तोत्र
"देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे" से शुरू होने वाला माँ गंगा का मधुर स्तोत्र, जिसे शंकराचार्य की रचना माना जाता है। 14 श्लोक, अर्थ सहित।
देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥१॥
devi sureśvari bhagavati gaṅge tribhuvanatāriṇi taralataraṅge |
śaṅkaramaulivihāriṇi vimale mama matirāstāṃ tava padakamale ||
अर्थ: हे देवी, देवताओं की ईश्वरी, भगवती गंगे! तीनों लोकों को तारने वाली, चंचल लहरों वाली, शिव के मस्तक पर विहार करने वाली, निर्मल माँ! मेरा मन सदा आपके चरण-कमलों में लगा रहे।
भागीरथि सुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः ।नाऽहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥२॥
bhāgīrathi sukhadāyini mātastava jalamahimā nigame khyātaḥ |
nā’haṃ jāne tava mahimānaṃ pāhi kṛpāmayi māmajñānam ||
अर्थ: हे भागीरथी, सुख देने वाली माँ! आपके जल की महिमा वेदों में प्रसिद्ध है। मैं आपकी महिमा नहीं जानता; हे कृपामयी, मुझ अज्ञानी की रक्षा कीजिए।
हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गे हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे ।दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥३॥
haripadapādyataraṅgiṇi gaṅge himavidhumuktādhavalataraṅge |
dūrīkuru mama duṣkṛtibhāraṃ kuru kṛpayā bhavasāgarapāram ||
अर्थ: हे गंगे, आप हरि के चरण धोने वाले जल की नदी हैं, आपकी लहरें बर्फ़, चंद्रमा और मोती जैसी उजली हैं। मेरे बुरे कर्मों का बोझ दूर कीजिए और कृपा करके मुझे संसार-सागर से पार लगाइए।
तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।मातर्गङ्गे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥४॥
tava jalamamalaṃ yena nipītaṃ paramapadaṃ khalu tena gṛhītam |
mātargaṅge tvayi yo bhaktaḥ kila taṃ draṣṭuṃ na yamaḥ śaktaḥ ||
अर्थ: जिसने आपका निर्मल जल पिया, उसने निश्चय ही परम पद पा लिया। हे माँ गंगे, जो आपका भक्त है, उसे यम देख भी नहीं सकते, ऐसा यह श्लोक कहता है।
पतितोद्धारिणि जाह्नवि गङ्गे खण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे ।भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ॥५॥
patitoddhāriṇi jāhnavi gaṅge khaṇḍitagirivaramaṇḍitabhaṅge |
bhīṣmajanani he munivarakanye patitanivāriṇi tribhuvanadhanye ||
अर्थ: हे पतितों का उद्धार करने वाली जाह्नवी गंगे! बड़े पर्वतों को काटकर बहती लहरों से सुशोभित, भीष्म की माता, मुनि जह्नु की कन्या, गिरते हुओं को बचाने वाली, तीनों लोकों में धन्य माँ!
कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।पारावारविहारिणि गङ्गे विमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥६॥
kalpalatāmiva phaladāṃ loke praṇamati yastvāṃ na patati śoke |
pārāvāravihāriṇi gaṅge vimukhayuvatikṛtataralāpāṅge ||
अर्थ: आप संसार में कल्पलता की तरह फल देने वाली हैं; जो आपको प्रणाम करता है, वह शोक में नहीं गिरता। हे समुद्र तक विहार करने वाली गंगे, जिनकी चंचल लहरें मुँह फेरती युवती की तिरछी चितवन जैसी हैं!
तव चेन्मातः स्रोतः स्नातः पुनरपि जठरे सोऽपि न जातः ।नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे ॥७॥
tava cenmātaḥ srotaḥ snātaḥ punarapi jaṭhare so’pi na jātaḥ |
narakanivāriṇi jāhnavi gaṅge kaluṣavināśini mahimottuṅge ||
अर्थ: हे माँ, जो आपकी धारा में स्नान कर लेता है, वह फिर किसी गर्भ में जन्म नहीं लेता, ऐसा यह श्लोक कहता है। हे नरक से बचाने वाली जाह्नवी गंगे, पापों का नाश करने वाली, महिमा में सबसे ऊँची!
पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गे जय जय जाह्नवि करुणापाङ्गे ।इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥८॥
punarasadaṅge puṇyataraṅge jaya jaya jāhnavi karuṇāpāṅge |
indramukuṭamaṇirājitacaraṇe sukhade śubhade bhṛtyaśaraṇye ||
अर्थ: हे अपवित्र को भी फिर पवित्र कर देने वाली, पुण्य लहरों वाली, करुणा भरी दृष्टि वाली जाह्नवी, आपकी जय हो, जय हो! जिनके चरण इन्द्र के मुकुट की मणियों से सुशोभित हैं, जो सुख और शुभ देती हैं और सेवकों को शरण देती हैं।
रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम् ।त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ॥९॥
rogaṃ śokaṃ tāpaṃ pāpaṃ hara me bhagavati kumatikalāpam |
tribhuvanasāre vasudhāhāre tvamasi gatirmama khalu saṃsāre ||
अर्थ: हे भगवती, मेरे रोग, शोक, ताप, पाप और बुरी बुद्धि के समूह को हर लीजिए। आप तीनों लोकों का सार और पृथ्वी का हार हैं; इस संसार में आप ही मेरा सहारा हैं।
अलकानन्दे परमानन्दे कुरु करुणामयि कातरवन्द्ये ।तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥१०॥
alakānande paramānande kuru karuṇāmayi kātaravandye |
tava taṭanikaṭe yasya nivāsaḥ khalu vaikuṇṭhe tasya nivāsaḥ ||
अर्थ: हे अलकनंदा, परम आनंद देने वाली, दुखियों से वंदित करुणामयी माँ, कृपा कीजिए। जिसका निवास आपके तट के पास है, उसका निवास मानो वैकुण्ठ में ही है।
वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ॥११॥
varamiha nīre kamaṭho mīnaḥ kiṃ vā tīre śaraṭaḥ kṣīṇaḥ |
athavā śvapaco malino dīnastava na hi dūre nṛpatikulīnaḥ ||
अर्थ: आपके जल में कछुआ या मछली बनकर रहना, या तट पर एक दुबली छिपकली बनकर रहना, या मैला और दीन चाण्डाल बनकर भी आपके पास रहना अच्छा है; पर आपसे दूर रहकर ऊँचे कुल का राजा होना भी अच्छा नहीं।
भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥१२॥
bho bhuvaneśvari puṇye dhanye devi dravamayi munivarakanye |
gaṅgāstavamimamamalaṃ nityaṃ paṭhati naro yaḥ sa jayati satyam ||
अर्थ: हे भुवनेश्वरी, पुण्यमयी, धन्य, जल-रूपा देवी, श्रेष्ठ मुनि की कन्या! जो मनुष्य इस निर्मल गंगा-स्तव को रोज़ पढ़ता है, वह सचमुच विजयी होता है, ऐसा यह श्लोक कहता है।
येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः ।मधुराकान्तापञ्झटिकाभिः परमानन्दकलितललिताभिः ॥१३॥
yeṣāṃ hṛdaye gaṅgābhaktisteṣāṃ bhavati sadā sukhamuktiḥ |
madhurākāntāpañjhaṭikābhiḥ paramānandakalitalalitābhiḥ ||
अर्थ: जिनके हृदय में गंगा की भक्ति है, उन्हें सदा सुख और मुक्ति मिलती है, ऐसा यह श्लोक कहता है। (यह स्तव) मधुर, मनोहर पज्झटिका छंद की, परम आनंद से भरी ललित पंक्तियों में रचा गया है।
गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारं वाञ्छितफलदं विमलं सारम् ।शङ्करसेवकशङ्कररचितं पठति सुखीस्तव इति च समाप्तः ॥१४॥
gaṅgāstotramidaṃ bhavasāraṃ vāñchitaphaladaṃ vimalaṃ sāram |
śaṅkarasevakaśaṅkararacitaṃ paṭhati sukhīstava iti ca samāptaḥ ||
अर्थ: यह गंगा-स्तोत्र संसार में सार रूप है, मनचाहा फल देने वाला, निर्मल और श्रेष्ठ है। शंकर के सेवक शंकर की इस रचना को जो पढ़ता है, वह सुखी होता है; इस प्रकार यह स्तव समाप्त हुआ।
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं गङ्गास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
|| iti śrīmacchaṅkarācāryaviracitaṃ gaṅgāstotraṃ sampūrṇam ||
अर्थ: इस प्रकार श्रीमत् शंकराचार्य द्वारा रचित गंगा स्तोत्र पूरा हुआ।
गङ्गा स्तोत्रम् "देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे" से शुरू होता है। इसमें माँ गंगा को भागीरथी, जाह्नवी, अलकनंदा, भीष्म की माता और शिव के मस्तक पर विहार करने वाली कहकर पुकारा गया है।
स्तोत्र की लय गीत जैसी है; श्लोक 13 स्वयं कहता है कि यह मधुर पज्झटिका छंद में रचा गया है। भक्त गंगा से अपने पाप, रोग, शोक और कुमति हरने और संसार-सागर से पार लगाने की प्रार्थना करता है। अंतिम श्लोक इसे "शंकर के सेवक शंकर" की रचना बताता है।
यह स्तोत्र एक बच्चे की तरह माँ गंगा से बात करता है। भक्त मानता है कि मैं आपकी महिमा नहीं जानता, फिर भी आपकी शरण में हूँ: मेरे पाप, रोग, शोक और कुमति हर लीजिए और मुझे संसार-सागर से पार लगाइए। गंगा को शिव के मस्तक पर विहार करने वाली, हरि के चरणों से निकली, भगीरथ की लाई, जह्नु मुनि की पुत्री और भीष्म की माता कहकर याद किया गया है।
स्तोत्र का सबसे गहरा भाव श्लोक 11 में है: गंगा के पास छोटा-सा जीव बनकर रहना भी उनसे दूर राजा बनकर रहने से अच्छा है। यानी भक्ति की निकटता किसी भी पद से बड़ी है। अंत के श्लोक फलश्रुति हैं और बताते हैं कि यह स्तोत्र मधुर पज्झटिका छंद में रचा गया है।
इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि इस निर्मल गंगा-स्तव को रोज़ पढ़ने वाला विजयी होता है, जिनके हृदय में गंगा की भक्ति है उन्हें सुख और मुक्ति मिलती है, और यह स्तोत्र मनचाहा फल देने वाला है। ये स्तोत्र के अपने वचन हैं।
भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।
गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥हे भुवनेश्वरी, पुण्यमयी, धन्य, जल-रूपा देवी, श्रेष्ठ मुनि की कन्या! जो मनुष्य इस निर्मल गंगा-स्तव को रोज़ पढ़ता है, वह सचमुच विजयी होता है, ऐसा यह श्लोक कहता है।
येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः ।
मधुराकान्तापञ्झटिकाभिः परमानन्दकलितललिताभिः ॥जिनके हृदय में गंगा की भक्ति है, उन्हें सदा सुख और मुक्ति मिलती है, ऐसा यह श्लोक कहता है। (यह स्तव) मधुर, मनोहर पज्झटिका छंद की, परम आनंद से भरी ललित पंक्तियों में रचा गया है।
गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारं वाञ्छितफलदं विमलं सारम् ।
शङ्करसेवकशङ्कररचितं पठति सुखीस्तव इति च समाप्तः ॥यह गंगा-स्तोत्र संसार में सार रूप है, मनचाहा फल देने वाला, निर्मल और श्रेष्ठ है। शंकर के सेवक शंकर की इस रचना को जो पढ़ता है, वह सुखी होता है; इस प्रकार यह स्तव समाप्त हुआ।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 9 | त्वमसि गतिर्मय खलु संसारे | sanskritdocuments.org पंक्ति के अंत में यह दूसरा पाठ ("गतिर्मय") भी देता है। |
| श्लोक 14 | पठति सुखीः तव इति च समाप्तः | sa.wikisource.org का पाठ। |
अंतिम श्लोक में "शङ्करसेवकशङ्कररचितं" (शंकर के सेवक शंकर की रचना) कहा गया है और अंतिम वाक्य इसे श्रीमत् शंकराचार्य की रचना बताता है। परंपरा इसे आदि शंकराचार्य का मानती है; इसका स्वतंत्र प्रमाण नहीं मिलता।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और sa.wikisource.org तथा vignanam.org से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया। तीनों स्रोतों में चौदह श्लोक और उनका क्रम एक-सा है; अंतर केवल वर्तनी के हैं (गङ्गे/गंगे, फलदाम्/फलदां)। दो छोटे अंतर पाठ-भेद में दिए गए हैं।
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घर में तुलसी की रोज़ की पूजा: सुबह जल, परिक्रमा, शाम का दीपक, नामाष्टक और आरती; पत्ते तोड़ने के नियम, कार्तिक मास और तुलसी विवाह की बातों के साथ।
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अंतिम श्लोक इसे "शंकर के सेवक शंकर" की रचना कहता है और परंपरा इसे आदि शंकराचार्य का मानती है। इसका कोई स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता।
गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी, गंगा स्नान या रोज़ की पूजा में। इसके लिए गंगा तट पर होना आवश्यक नहीं है।
कथा है कि जह्नु मुनि ने गंगा को पी लिया था और फिर छोड़ा, इसलिए वे जाह्नवी (जह्नु की पुत्री) कहलाईं। महाभारत में भीष्म गंगा और राजा शांतनु के पुत्र हैं, इसलिए वे भीष्मजननी हैं।
यह एक छंद का नाम है, जिसमें हर चरण में सोलह मात्राएँ होती हैं और लय गीत जैसी चलती है। श्लोक 13 स्वयं बताता है कि यह स्तोत्र इसी मधुर छंद में है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।