गायत्री चालीसा
गायत्री · चालीसा
ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड

आरती · गायत्री
वेदमाता गायत्री की आरती 'जयति जय गायत्री माता': पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ, कठिन शब्द और पाठांतर।
जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता ।
अर्थ: हे गायत्री माता, आपकी जय हो, जय हो।
आदि शक्ति तुम, अलख निरञ्जन, जग पालन कर्त्री ।दुःख शोक भय, क्लेश कलह, दारिद्र्य दैन्य हर्त्री ॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥
अर्थ: आप आदि शक्ति हैं, अलख (जो आँखों से न दिखे) और निरंजन (निर्मल) हैं, और संसार का पालन करने वाली हैं। आप दुःख, शोक, भय, क्लेश, कलह, दरिद्रता और दीनता को हरने वाली हैं।
ब्रह्म रूपिणी, प्रणतपालिनी, जगतधातृ अम्बे ।भवभयहारी, जनहितकारी, सुखदा जगदम्बे ॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥
अर्थ: हे अम्बे, आप ब्रह्म का रूप हैं, शरण में झुके हुओं का पालन करने वाली हैं और संसार को धारण करने वाली हैं। हे जगदम्बे, आप संसार का भय हरने वाली, लोगों का हित करने वाली और सुख देने वाली हैं।
भय हारिणी, भव तारिणी अनघे, अज आनन्द राशी ।अविकारी, अघहरी, अविचलित, अमले, अविनाशी ॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥
अर्थ: आप भय हरने वाली, संसार से पार लगाने वाली, निष्पाप, अजन्मा और आनंद की राशि हैं। आप विकार-रहित, पाप हरने वाली, अटल, निर्मल और अविनाशी हैं।
कामधेनु सतचित आनन्दा, जय गङ्गा गीता ।सविता की शाश्वती शक्ति तुम, सावित्री सीता ॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥
अर्थ: आप कामधेनु हैं, सत्-चित्-आनंद स्वरूपा हैं; आप ही गंगा और गीता हैं, आपकी जय हो। आप सविता (सूर्य) की सदा रहने वाली शक्ति हैं; आप ही सावित्री और सीता हैं।
ऋग्, यजु, साम, अथर्व प्रणयिनी, प्रणव महामहिमे ।कुण्डलिनी सहस्रार, सुषुम्ना शोभा गुण गरिमे ॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥
अर्थ: आप ऋग्, यजु, साम और अथर्व, चारों वेदों की प्रिया हैं; हे महान महिमा वाली, आप ही प्रणव (ॐ) हैं। आप ही कुण्डलिनी, सहस्रार और सुषुम्ना की शोभा हैं, और गुणों की गरिमा से भरी हैं।
स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा, रुद्राणी ।जय सतरूपा वाणी, विद्या, कमला कल्याणी ॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥
अर्थ: आप ही स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा और रुद्राणी हैं। हे सतरूपा, आपकी जय हो; आप ही वाणी (सरस्वती), विद्या, कमला (लक्ष्मी) और कल्याणी हैं।
जननी हम हैं दीन हीन, दुःख दारिद के घेरे ।यदपि कुटिल कपटी कपूत, तौ बालक हैं तेरे ॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥
अर्थ: हे जननी, हम दीन-हीन हैं, दुःख और दरिद्रता से घिरे हैं। भले ही हम कुटिल, कपटी और बुरी संतान हों, फिर भी हैं तो तेरे ही बालक।
स्नेह सनी करुणामयि माता, चरण शरण दीजै ।बिलख रहे हम शिशु सुत तेरे, दया दृष्टि कीजै ॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥
अर्थ: हे स्नेह में डूबी करुणामयी माता, अपने चरणों की शरण दीजिए। हम तेरे छोटे बच्चे बिलख रहे हैं; हम पर दया-दृष्टि कीजिए।
काम क्रोध, मद लोभ दम्भ, दुर्भाव द्वेष हरिये ।शुद्ध बुद्धि, निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिये ॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥
अर्थ: काम, क्रोध, मद, लोभ, दंभ, बुरे भाव और द्वेष को हर लीजिए। बुद्धि को शुद्ध, हृदय को निष्पाप और मन को पवित्र कीजिए।
तुम समर्थ सब भाँति तारिणी, तुष्टि, पुष्टि त्राता।सत मारग पर हमें चलाओ जो है सुखदाता ॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥
अर्थ: आप हर तरह से समर्थ हैं, पार लगाने वाली हैं, संतोष और पोषण देने वाली और रक्षा करने वाली हैं। हमें सत्य के उस मार्ग पर चलाइए जो सुख देने वाला है।
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'जयति जय गायत्री माता' वेदमाता गायत्री की आरती है। इसमें गायत्री को आदि शक्ति, ब्रह्म-रूपिणी और सविता (सूर्य) की शाश्वत शक्ति कहा गया है, और ऋग्, यजु, साम, अथर्व, चारों वेदों से जोड़ा गया है।
आरती का आधा भाग स्तुति है, जिसमें गायत्री को गंगा, गीता, सावित्री, सीता, राधा, रुद्राणी, वाणी और कमला जैसे अनेक नामों से पुकारा गया है; बाकी आधा भाग प्रार्थना है: काम, क्रोध, लोभ जैसे दोष हरकर शुद्ध बुद्धि और पवित्र मन देने की, और सत् मार्ग पर चलाने की।
हे गायत्री माता, आपकी जय हो, जय हो।
आप आदि शक्ति हैं, अलख (जो आँखों से न दिखे) और निरंजन (निर्मल) हैं, और संसार का पालन करने वाली हैं। आप दुःख, शोक, भय, क्लेश, कलह, दरिद्रता और दीनता को हरने वाली हैं।
हे अम्बे, आप ब्रह्म का रूप हैं, शरण में झुके हुओं का पालन करने वाली हैं और संसार को धारण करने वाली हैं। हे जगदम्बे, आप संसार का भय हरने वाली, लोगों का हित करने वाली और सुख देने वाली हैं।
आप भय हरने वाली, संसार से पार लगाने वाली, निष्पाप, अजन्मा और आनंद की राशि हैं। आप विकार-रहित, पाप हरने वाली, अटल, निर्मल और अविनाशी हैं।
आप कामधेनु हैं, सत्-चित्-आनंद स्वरूपा हैं; आप ही गंगा और गीता हैं, आपकी जय हो। आप सविता (सूर्य) की सदा रहने वाली शक्ति हैं; आप ही सावित्री और सीता हैं।
आप ऋग्, यजु, साम और अथर्व, चारों वेदों की प्रिया हैं; हे महान महिमा वाली, आप ही प्रणव (ॐ) हैं। आप ही कुण्डलिनी, सहस्रार और सुषुम्ना की शोभा हैं, और गुणों की गरिमा से भरी हैं।
आप ही स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा और रुद्राणी हैं। हे सतरूपा, आपकी जय हो; आप ही वाणी (सरस्वती), विद्या, कमला (लक्ष्मी) और कल्याणी हैं।
हे जननी, हम दीन-हीन हैं, दुःख और दरिद्रता से घिरे हैं। भले ही हम कुटिल, कपटी और बुरी संतान हों, फिर भी हैं तो तेरे ही बालक।
हे स्नेह में डूबी करुणामयी माता, अपने चरणों की शरण दीजिए। हम तेरे छोटे बच्चे बिलख रहे हैं; हम पर दया-दृष्टि कीजिए।
काम, क्रोध, मद, लोभ, दंभ, बुरे भाव और द्वेष को हर लीजिए। बुद्धि को शुद्ध, हृदय को निष्पाप और मन को पवित्र कीजिए।
आप हर तरह से समर्थ हैं, पार लगाने वाली हैं, संतोष और पोषण देने वाली और रक्षा करने वाली हैं। हमें सत्य के उस मार्ग पर चलाइए जो सुख देने वाला है।
गायत्री मंत्र सविता (सूर्य) से बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना है, और यह आरती उसी मंत्र की देवी को माँ के रूप में गाती है। पहले भाग में गायत्री की महिमा है: वे आदि शक्ति, ब्रह्म-रूपिणी, सविता की शाश्वत शक्ति, चारों वेदों की प्रिया और ॐकार-स्वरूपा हैं; गंगा, गीता, सावित्री, सीता, राधा, रुद्राणी, वाणी और कमला, सब उन्हीं के रूप हैं।
दूसरे भाग में भक्त अपनी कमज़ोरी सीधे मान लेता है: हम दीन, दुखी, कुटिल और कपटी भी हों, फिर भी तेरे बालक हैं। उसकी माँग धन या फल की नहीं, भीतर की शुद्धि की है: काम, क्रोध, लोभ और द्वेष हटें, बुद्धि शुद्ध हो, मन पवित्र हो, और माँ हमें सत् मार्ग पर चलाएँ। यही गायत्री मंत्र की बुद्धि-प्रार्थना का भाव है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| टेक | जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता। सत् मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥ | द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और आज तक में टेक के साथ अंतिम अंतरे की पंक्ति 'सत् मारग पर हमें चलाओ' भी जुड़ी है; sanskritdocuments.org और भारतकोश में टेक एक ही पंक्ति की है |
| अंतरा 7 | जननी हम हैं दीन-हीन, दुःख-दरिद्र के घेरे। यदपि कुटिल, कपटी कपूत, तउ बालक हैं तेरे॥ | द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और भारतकोश में ('दारिद' की जगह 'दरिद्र', 'तौ' की जगह 'तउ' या 'तऊ') |
| अंतरा 10 | सत् मार्ग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता | द्रिक पंचांग में |
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति sanskritdocuments.org (gAyatrIAratIHindi) और द्रिक पंचांग के पाठ से मिलाई गई; भक्ति भारत, भारतकोश (bharatdiscovery.org) और आज तक का पाठ भी देखा गया। अंतरों के शब्द और क्रम सब में एक हैं; अंतर केवल वर्तनी और टेक के रूप में है। आधार sanskritdocuments.org का पाठ है; उसकी अंतिम अंतरे की पहली पंक्ति में 'भौति' छपा है, इसलिए वह पंक्ति द्रिक पंचांग से ली गई ('सब भाँति')। भक्ति भारत और आज तक में अंतिम अंतरा ('तुम समर्थ सब भाँति तारिणी') नहीं है; वे उसकी दूसरी पंक्ति को टेक के साथ गाते हैं। गायत्री माता की दूसरी आरती 'आरती श्री गायत्री जी की' अलग रचना है और यहाँ नहीं ली गई। रचयिता अज्ञात।
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कई स्थानों पर ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को गायत्री जयंती मनाई जाती है और कुछ परंपराओं में श्रावण पूर्णिमा को। अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार मनाएँ।
गायत्री मंत्र सविता देव (सूर्य) को संबोधित है और उनसे बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना करता है। इसलिए गायत्री को सविता की शक्ति कहा जाता है; इसी मंत्र के कारण उन्हें सावित्री भी कहते हैं।
'आरती श्री गायत्री जी की, ज्ञानदीप और श्रद्धा की बाती' गायत्री माता की दूसरी प्रचलित आरती है। यहाँ 'जयति जय गायत्री माता' का पाठ दिया गया है।
उपलब्ध स्रोतों में रचयिता का नाम नहीं मिलता और आरती में किसी कवि की छाप भी नहीं है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।