गायत्री

आरती · गायत्री

जयति जय गायत्री माता

वेदमाता गायत्री की आरती 'जयति जय गायत्री माता': पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ, कठिन शब्द और पाठांतर।

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  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. कब पढ़ें
  7. विधि
  8. पाठ-भेद
  9. रचयिता और स्रोत
  10. ये भी पढ़ें
  11. सवाल-जवाब
  12. सुधार सुझाएँ

जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता ।

अर्थ: हे गायत्री माता, आपकी जय हो, जय हो।

आदि शक्ति तुम, अलख निरञ्जन, जग पालन कर्त्री ।दुःख शोक भय, क्लेश कलह, दारिद्र्य दैन्य हर्त्री ॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

अर्थ: आप आदि शक्ति हैं, अलख (जो आँखों से न दिखे) और निरंजन (निर्मल) हैं, और संसार का पालन करने वाली हैं। आप दुःख, शोक, भय, क्लेश, कलह, दरिद्रता और दीनता को हरने वाली हैं।

ब्रह्म रूपिणी, प्रणतपालिनी, जगतधातृ अम्बे ।भवभयहारी, जनहितकारी, सुखदा जगदम्बे ॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

अर्थ: हे अम्बे, आप ब्रह्म का रूप हैं, शरण में झुके हुओं का पालन करने वाली हैं और संसार को धारण करने वाली हैं। हे जगदम्बे, आप संसार का भय हरने वाली, लोगों का हित करने वाली और सुख देने वाली हैं।

भय हारिणी, भव तारिणी अनघे, अज आनन्द राशी ।अविकारी, अघहरी, अविचलित, अमले, अविनाशी ॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

अर्थ: आप भय हरने वाली, संसार से पार लगाने वाली, निष्पाप, अजन्मा और आनंद की राशि हैं। आप विकार-रहित, पाप हरने वाली, अटल, निर्मल और अविनाशी हैं।

कामधेनु सतचित आनन्दा, जय गङ्गा गीता ।सविता की शाश्वती शक्ति तुम, सावित्री सीता ॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

अर्थ: आप कामधेनु हैं, सत्-चित्-आनंद स्वरूपा हैं; आप ही गंगा और गीता हैं, आपकी जय हो। आप सविता (सूर्य) की सदा रहने वाली शक्ति हैं; आप ही सावित्री और सीता हैं।

ऋग्, यजु, साम, अथर्व प्रणयिनी, प्रणव महामहिमे ।कुण्डलिनी सहस्रार, सुषुम्ना शोभा गुण गरिमे ॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

अर्थ: आप ऋग्, यजु, साम और अथर्व, चारों वेदों की प्रिया हैं; हे महान महिमा वाली, आप ही प्रणव (ॐ) हैं। आप ही कुण्डलिनी, सहस्रार और सुषुम्ना की शोभा हैं, और गुणों की गरिमा से भरी हैं।

स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा, रुद्राणी ।जय सतरूपा वाणी, विद्या, कमला कल्याणी ॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

अर्थ: आप ही स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा और रुद्राणी हैं। हे सतरूपा, आपकी जय हो; आप ही वाणी (सरस्वती), विद्या, कमला (लक्ष्मी) और कल्याणी हैं।

जननी हम हैं दीन हीन, दुःख दारिद के घेरे ।यदपि कुटिल कपटी कपूत, तौ बालक हैं तेरे ॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

अर्थ: हे जननी, हम दीन-हीन हैं, दुःख और दरिद्रता से घिरे हैं। भले ही हम कुटिल, कपटी और बुरी संतान हों, फिर भी हैं तो तेरे ही बालक।

स्नेह सनी करुणामयि माता, चरण शरण दीजै ।बिलख रहे हम शिशु सुत तेरे, दया दृष्टि कीजै ॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

अर्थ: हे स्नेह में डूबी करुणामयी माता, अपने चरणों की शरण दीजिए। हम तेरे छोटे बच्चे बिलख रहे हैं; हम पर दया-दृष्टि कीजिए।

काम क्रोध, मद लोभ दम्भ, दुर्भाव द्वेष हरिये ।शुद्ध बुद्धि, निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिये ॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

अर्थ: काम, क्रोध, मद, लोभ, दंभ, बुरे भाव और द्वेष को हर लीजिए। बुद्धि को शुद्ध, हृदय को निष्पाप और मन को पवित्र कीजिए।

तुम समर्थ सब भाँति तारिणी, तुष्टि, पुष्टि त्राता।सत मारग पर हमें चलाओ जो है सुखदाता ॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

अर्थ: आप हर तरह से समर्थ हैं, पार लगाने वाली हैं, संतोष और पोषण देने वाली और रक्षा करने वाली हैं। हमें सत्य के उस मार्ग पर चलाइए जो सुख देने वाला है।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

'जयति जय गायत्री माता' वेदमाता गायत्री की आरती है। इसमें गायत्री को आदि शक्ति, ब्रह्म-रूपिणी और सविता (सूर्य) की शाश्वत शक्ति कहा गया है, और ऋग्, यजु, साम, अथर्व, चारों वेदों से जोड़ा गया है।

आरती का आधा भाग स्तुति है, जिसमें गायत्री को गंगा, गीता, सावित्री, सीता, राधा, रुद्राणी, वाणी और कमला जैसे अनेक नामों से पुकारा गया है; बाकी आधा भाग प्रार्थना है: काम, क्रोध, लोभ जैसे दोष हरकर शुद्ध बुद्धि और पवित्र मन देने की, और सत् मार्ग पर चलाने की।

अंतरा-वार अर्थ

  1. मुखड़ा जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता…

    हे गायत्री माता, आपकी जय हो, जय हो।

  2. अंतरा १ आदि शक्ति तुम, अलख निरञ्जन, जग पालन कर्त्री…

    आप आदि शक्ति हैं, अलख (जो आँखों से न दिखे) और निरंजन (निर्मल) हैं, और संसार का पालन करने वाली हैं। आप दुःख, शोक, भय, क्लेश, कलह, दरिद्रता और दीनता को हरने वाली हैं।

  3. अंतरा २ ब्रह्म रूपिणी, प्रणतपालिनी, जगतधातृ अम्बे…

    हे अम्बे, आप ब्रह्म का रूप हैं, शरण में झुके हुओं का पालन करने वाली हैं और संसार को धारण करने वाली हैं। हे जगदम्बे, आप संसार का भय हरने वाली, लोगों का हित करने वाली और सुख देने वाली हैं।

  4. अंतरा ३ भय हारिणी, भव तारिणी अनघे, अज आनन्द राशी…

    आप भय हरने वाली, संसार से पार लगाने वाली, निष्पाप, अजन्मा और आनंद की राशि हैं। आप विकार-रहित, पाप हरने वाली, अटल, निर्मल और अविनाशी हैं।

  5. अंतरा ४ कामधेनु सतचित आनन्दा, जय गङ्गा गीता…

    आप कामधेनु हैं, सत्-चित्-आनंद स्वरूपा हैं; आप ही गंगा और गीता हैं, आपकी जय हो। आप सविता (सूर्य) की सदा रहने वाली शक्ति हैं; आप ही सावित्री और सीता हैं।

  6. अंतरा ५ ऋग्, यजु, साम, अथर्व प्रणयिनी, प्रणव महामहिमे…

    आप ऋग्, यजु, साम और अथर्व, चारों वेदों की प्रिया हैं; हे महान महिमा वाली, आप ही प्रणव (ॐ) हैं। आप ही कुण्डलिनी, सहस्रार और सुषुम्ना की शोभा हैं, और गुणों की गरिमा से भरी हैं।

  7. अंतरा ६ स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा, रुद्राणी…

    आप ही स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा और रुद्राणी हैं। हे सतरूपा, आपकी जय हो; आप ही वाणी (सरस्वती), विद्या, कमला (लक्ष्मी) और कल्याणी हैं।

  8. अंतरा ७ जननी हम हैं दीन हीन, दुःख दारिद के घेरे…

    हे जननी, हम दीन-हीन हैं, दुःख और दरिद्रता से घिरे हैं। भले ही हम कुटिल, कपटी और बुरी संतान हों, फिर भी हैं तो तेरे ही बालक।

  9. अंतरा ८ स्नेह सनी करुणामयि माता, चरण शरण दीजै…

    हे स्नेह में डूबी करुणामयी माता, अपने चरणों की शरण दीजिए। हम तेरे छोटे बच्चे बिलख रहे हैं; हम पर दया-दृष्टि कीजिए।

  10. अंतरा ९ काम क्रोध, मद लोभ दम्भ, दुर्भाव द्वेष हरिये…

    काम, क्रोध, मद, लोभ, दंभ, बुरे भाव और द्वेष को हर लीजिए। बुद्धि को शुद्ध, हृदय को निष्पाप और मन को पवित्र कीजिए।

  11. अंतरा १० तुम समर्थ सब भाँति तारिणी, तुष्टि, पुष्टि त्राता…

    आप हर तरह से समर्थ हैं, पार लगाने वाली हैं, संतोष और पोषण देने वाली और रक्षा करने वाली हैं। हमें सत्य के उस मार्ग पर चलाइए जो सुख देने वाला है।

भावार्थ

गायत्री मंत्र सविता (सूर्य) से बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना है, और यह आरती उसी मंत्र की देवी को माँ के रूप में गाती है। पहले भाग में गायत्री की महिमा है: वे आदि शक्ति, ब्रह्म-रूपिणी, सविता की शाश्वत शक्ति, चारों वेदों की प्रिया और ॐकार-स्वरूपा हैं; गंगा, गीता, सावित्री, सीता, राधा, रुद्राणी, वाणी और कमला, सब उन्हीं के रूप हैं।

दूसरे भाग में भक्त अपनी कमज़ोरी सीधे मान लेता है: हम दीन, दुखी, कुटिल और कपटी भी हों, फिर भी तेरे बालक हैं। उसकी माँग धन या फल की नहीं, भीतर की शुद्धि की है: काम, क्रोध, लोभ और द्वेष हटें, बुद्धि शुद्ध हो, मन पवित्र हो, और माँ हमें सत् मार्ग पर चलाएँ। यही गायत्री मंत्र की बुद्धि-प्रार्थना का भाव है।

कठिन शब्दों के अर्थ

जयति
जय हो
अलख
जो आँखों से न दिखे
निरञ्जन
निर्मल, दोष-रहित
कर्त्री
करने वाली
दैन्य
दीनता
हर्त्री
हरने वाली
प्रणतपालिनी
शरण में झुके हुओं का पालन करने वाली
जगतधातृ
जगत को धारण करने वाली
अनघे
हे निष्पाप
अज
अजन्मा
अघ
पाप
अमले
हे निर्मल
सविता
सूर्य, प्रेरणा देने वाले देव
शाश्वती
सदा रहने वाली
प्रणयिनी
प्रिया, जिससे प्रेम हो
प्रणव
ॐकार
सहस्रार
योग में सिर के ऊपर का चक्र
सुषुम्ना
योग में शरीर की मध्य नाड़ी
स्वाहा, स्वधा
देवताओं और पितरों को आहुति देते समय बोले जाने वाले शब्द, जिन्हें देवी माना गया है
सतरूपा
सत्य-स्वरूपा; शतरूपा, अनेक रूपों वाली
दारिद
दरिद्रता
कपूत
बुरी संतान
सनी
डूबी हुई
दम्भ
दिखावा, घमंड
तुष्टि, पुष्टि
संतोष और पोषण

यह आरती कब गाई जाती है

  • गायत्री जयंती पर (कई स्थानों पर ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को, कुछ परंपराओं में श्रावण पूर्णिमा को)
  • गायत्री मंत्र के जप या गायत्री यज्ञ के बाद
  • रोज़ की पूजा के अंत में

आरती कैसे करें

  • गायत्री माता के चित्र के सामने दीपक जलाएँ; हो सके तो पहले कुछ देर गायत्री मंत्र का जप करें, फिर आरती गाएँ।
  • टेक 'जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता' से शुरू करें और हर अंतरे के बाद इसे दोहराएँ।
  • अंतिम अंतरा 'तुम समर्थ सब भाँति तारिणी' प्रार्थना है; उसके बाद टेक गाकर आरती पूरी करें।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
टेकजयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता। सत् मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और आज तक में टेक के साथ अंतिम अंतरे की पंक्ति 'सत् मारग पर हमें चलाओ' भी जुड़ी है; sanskritdocuments.org और भारतकोश में टेक एक ही पंक्ति की है
अंतरा 7जननी हम हैं दीन-हीन, दुःख-दरिद्र के घेरे। यदपि कुटिल, कपटी कपूत, तउ बालक हैं तेरे॥द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और भारतकोश में ('दारिद' की जगह 'दरिद्र', 'तौ' की जगह 'तउ' या 'तऊ')
अंतरा 10सत् मार्ग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाताद्रिक पंचांग में

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
भाषा
हिन्दी

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति sanskritdocuments.org (gAyatrIAratIHindi) और द्रिक पंचांग के पाठ से मिलाई गई; भक्ति भारत, भारतकोश (bharatdiscovery.org) और आज तक का पाठ भी देखा गया। अंतरों के शब्द और क्रम सब में एक हैं; अंतर केवल वर्तनी और टेक के रूप में है। आधार sanskritdocuments.org का पाठ है; उसकी अंतिम अंतरे की पहली पंक्ति में 'भौति' छपा है, इसलिए वह पंक्ति द्रिक पंचांग से ली गई ('सब भाँति')। भक्ति भारत और आज तक में अंतिम अंतरा ('तुम समर्थ सब भाँति तारिणी') नहीं है; वे उसकी दूसरी पंक्ति को टेक के साथ गाते हैं। गायत्री माता की दूसरी आरती 'आरती श्री गायत्री जी की' अलग रचना है और यहाँ नहीं ली गई। रचयिता अज्ञात।

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माँ गायत्री के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गायत्री माता की आरती कब गाई जाती है?

गायत्री मंत्र के जप, गायत्री यज्ञ या घर की पूजा के बाद, और गायत्री जयंती पर विशेष रूप से। इसे रोज़ की पूजा के अंत में भी गाया जा सकता है।

गायत्री जयंती कब होती है?

कई स्थानों पर ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को गायत्री जयंती मनाई जाती है और कुछ परंपराओं में श्रावण पूर्णिमा को। अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार मनाएँ।

आरती में गायत्री को 'सविता की शाश्वती शक्ति' क्यों कहा गया है?

गायत्री मंत्र सविता देव (सूर्य) को संबोधित है और उनसे बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना करता है। इसलिए गायत्री को सविता की शक्ति कहा जाता है; इसी मंत्र के कारण उन्हें सावित्री भी कहते हैं।

गायत्री माता की दूसरी आरती 'आरती श्री गायत्री जी की' कौन-सी है?

'आरती श्री गायत्री जी की, ज्ञानदीप और श्रद्धा की बाती' गायत्री माता की दूसरी प्रचलित आरती है। यहाँ 'जयति जय गायत्री माता' का पाठ दिया गया है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

उपलब्ध स्रोतों में रचयिता का नाम नहीं मिलता और आरती में किसी कवि की छाप भी नहीं है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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