या कुन्देन्दुतुषारहारधवला (सरस्वती वन्दना)
सरस्वती · श्लोक · संस्कृत
ध्यान के समय (चरण 4); बच्चे इसे रोज़ पढ़ाई से पहले भी पढ़ सकते हैं

पूजा विधि · सरस्वती · त्योहार की पूजा
वसंत पंचमी पर घर में माँ सरस्वती की पूजा: पीले फूल, किताबें और वाद्य माँ के सामने, बच्चों का विद्यारंभ, मंत्र, आरती और प्रसाद, सरल विकल्पों के साथ।
यह वसंत पंचमी पर घर में माँ सरस्वती की पूजा है: पीले-सफ़ेद फूल और वस्त्र, किताबें, कलम और वाद्य माँ के सामने रखना, पंचोपचार, बच्चों का अक्षर-आरंभ (विद्यारंभ), आरती और प्रसाद। यही सरल पूजा पढ़ाई या कोई कला शुरू करने से पहले भी की जा सकती है। मिट्टी की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा और विसर्जन वाली सार्वजनिक पूजा, विद्यालयों का हवन और उपनयन जैसे संस्कार यहाँ नहीं हैं; उनके लिए पुरोहित से मार्गदर्शन लें।
माँ सरस्वती विद्या, वाणी, संगीत और कला की देवी हैं। माघ शुक्ल पंचमी, यानी वसंत पंचमी, उनकी पूजा का सबसे बड़ा दिन है। यह वसंत के आने का भी पर्व है: खेतों में सरसों के पीले फूल खिलते हैं, इसलिए इस दिन पीले वस्त्र, पीले फूल और पीले पकवानों की रीत है। माँ स्वयं श्वेत वस्त्र और श्वेत कमल वाली हैं, इसलिए सफ़ेद फूल और सफ़ेद चंदन भी उन्हें चढ़ाए जाते हैं।
इस पूजा की सबसे सुंदर बात यह है कि घर की किताबें, कलम और वाद्य माँ के सामने रखे जाते हैं, और कई घरों में छोटे बच्चे इसी दिन पहला अक्षर लिखते हैं। पूजा कोई परीक्षा का नुस्ख़ा नहीं, विद्या के प्रति आदर और मन की एकाग्रता की प्रार्थना है। पूरी सामग्री न हो तो भी एक दीपक, एक फूल और माँ की वंदना काफ़ी है।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| माँ सरस्वती का चित्र या मूर्ति | पूजा का केंद्र | वैकल्पिक | चित्र न हो तो दीपक के पास कोई पवित्र पुस्तक रखकर उसे माँ का रूप मानकर पूजा करें। |
| पीला या सफ़ेद कपड़ा | चौकी पर बिछाने के लिए | परंपरा-विशेष | वसंत पंचमी की रीत है; कोई भी साफ़ कपड़ा चलेगा। |
| पीले और सफ़ेद फूल, फूलमाला | पुष्प अर्पण के लिए | वैकल्पिक | गेंदा, सरसों के फूल या सफ़ेद फूल; जो भी ताज़ा फूल मिले। |
| घर की किताबें, कलम, दवात या तख़्ती, और वाद्य | माँ के सामने रखकर पूजा के लिए | परंपरा-विशेष | जो एक-दो किताबें और एक कलम हों, वही; वाद्य न हो तो छोड़ दें। |
| सफ़ेद चंदन या केसर, रोली, हल्दी से रंगे अक्षत | तिलक और अर्पण के लिए | वैकल्पिक | जो एक-दो चीज़ें हों, वही। |
| घी का दीपक और धूप | दीप-धूप और आरती के लिए | वैकल्पिक | घी न हो तो तिल के तेल का दीपक। |
| नैवेद्य: पीले मीठे चावल, बूंदी या बेसन के लड्डू, केसर की खीर, बेर और मौसम के फल | भोग के लिए | वैकल्पिक | कुछ न हो तो मिश्री या गुड़ और एक फल। |
| विद्यारंभ के लिए चावल या आटे से भरी थाली, या तख़्ती और खड़िया | बच्चे का पहला अक्षर लिखने के लिए | परंपरा-विशेष | केवल तब, जब घर में कोई छोटा बच्चा पढ़ाई शुरू कर रहा हो; काग़ज़ और कलम भी चलेंगे। |
| शुद्ध जल का लोटा | आचमन और छींटे देने के लिए | वैकल्पिक | गंगाजल हो तो कुछ बूँदें मिला लें। |
पूजा से पहले मन में निश्चय करना कि किसकी, किस भाव से पूजा कर रहे हैं। दाहिने हाथ में थोड़ा जल, फूल और अक्षत लेकर संकल्प बोलें और जल थाली में छोड़ दें।
हे माँ सरस्वती, आज वसंत पंचमी के दिन मैं (अपना नाम) अपने परिवार के साथ आपकी पूजा कर रहा/रही हूँ। हमारी पढ़ाई, वाणी और कला पर अपनी कृपा रखें, और इस छोटी-सी पूजा को स्वीकार करें।
विस्तृत पूजा में पुरोहित संस्कृत संकल्प, कलश-स्थापना और गणेश-पूजन भी करवाते हैं। घर की पूजा में अपनी भाषा का यह संकल्प काफ़ी है।
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
अर्थ: जो कुंद के फूल, चंद्रमा, हिम और मोतियों के हार जैसी उज्ज्वल हैं, जो श्वेत वस्त्र पहने हैं; जिनके हाथ वीणा के सुंदर दंड से शोभित हैं, जो श्वेत कमल पर बैठी हैं; ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि देवता जिनकी सदा पूजा करते हैं, सारी जड़ता (अज्ञान और आलस) दूर करने वाली वे भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें।
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला (सरस्वती वन्दना): पूरा पाठ और अर्थ
सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥
अर्थ: हे वर देने वाली, इच्छा के अनुसार रूप धरने वाली माँ सरस्वती, आपको नमस्कार। मैं विद्या आरंभ कर रहा हूँ; मुझे सदा सफलता मिले।
स्रोत: प्रचलित विद्यारंभ-श्लोक: shlokam.org और sanskritdocuments.org (श्लोक संग्रह 2)
ॐ वाग्देव्यै च विद्महे कामराजाय धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम वाणी की देवी को जानते हैं और उनका ध्यान करते हैं; वे देवी हमें प्रेरणा दें।
सरस्वती · श्लोक · संस्कृत
ध्यान के समय (चरण 4); बच्चे इसे रोज़ पढ़ाई से पहले भी पढ़ सकते हैं
सरस्वती · आरती
आरती (चरण 12)
वसंत पंचमी पर पीले रंग के पकवानों की रीत है। भोग सात्त्विक हो: प्याज़-लहसुन के बिना। बंगाल के कई घरों में सरस्वती पूजा से पहले बेर न खाने और पूजा में पहले माँ को बेर चढ़ाने की रीत है।
हे माँ सरस्वती, इस पूजा में जो कमी रह गई हो, उसे क्षमा करें। हमारी बुद्धि को साफ़ रखें, वाणी को मीठा और सच्चा बनाएँ, और हमें मन लगाकर सीखने की लगन दें।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अर्थ: हे परमेश्वरी, मैं न आपको बुलाना जानती/जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; मुझे क्षमा करें। हे देवी, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, श्रीमहालक्ष्मी-पूजन: क्षमा-प्रार्थना (देवी के लिए स्त्रीलिंग रूप)
दुर्गा · आरती
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
लक्ष्मी · आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता
पार्वती · आरती
जय पार्वती माता जय पार्वती माता
शीतला माता · आरती
जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): या कुन्देन्दु वंदना sanskritdocuments के अगस्त्य-सरस्वती स्तोत्र से (साइट के saraswati-vandana पाठ की तरह 'पूजिता' रखा गया); विद्यारंभ-श्लोक shlokam.org से ('सरस्वति' संबोधन; sanskritdocuments में 'सरस्वती' छपा है); मंत्र साइट के मंत्र पन्नों से; क्षमा-प्रार्थना गीताप्रेस की श्रीमहालक्ष्मी-पूजन वाली स्त्रीलिंग रूप से। क्षेत्रीय रीतें Wikipedia (Vasant Panchami) से; बंगाल में उस दिन न पढ़ने और बेर की रीत, केरल का विद्यारंभ और आयुध पूजा प्रचलित रीतों के रूप में लिखे गए। साइट पर वसंत पंचमी का व्रत पन्ना नहीं है, इसलिए तिथि के लिए पंचांग का पता दिया।
यह क्षेत्र की रीत पर है। बंगाल के कई घरों में उस दिन किताबें माँ के पास रखी रहती हैं और अगले दिन से पढ़ाई होती है; दूसरे बहुत-से घरों में पूजा के बाद पढ़ाई शुरू करना ही शुभ माना जाता है। दोनों रीतें विद्या के आदर की ही हैं। परीक्षा पास हो तो अपनी पढ़ाई का ध्यान रखें।
पूजा किसी नतीजे का वादा नहीं है। यह विद्या के प्रति आदर, मन की एकाग्रता और मेहनत की लगन की प्रार्थना है। मेहनत के साथ की गई प्रार्थना मन को शांत और भरोसेमंद रखती है; यही इसका असली फल है।
परंपरा में आमतौर पर दो से पाँच साल की उम्र में, जब बच्चा पढ़ाई शुरू करने वाला हो। इसके लिए वसंत पंचमी, विजयादशमी या कोई शुभ दिन चुना जाता है। घर में यह सरल रूप से किया जा सकता है; कुछ परिवार इसे मंदिर में या पुरोहित से करवाते हैं।
दोनों। माँ सरस्वती श्वेत वस्त्र और श्वेत कमल वाली हैं, और वसंत पंचमी सरसों के पीले फूलों का पर्व है। इसलिए दोनों रंगों के फूल और वस्त्र प्रचलित हैं। जो रंग मिले, वही चढ़ाएँ।
कोई पवित्र पुस्तक या बच्चे की पहली किताब को साफ़ कपड़े पर रखकर उसे माँ का रूप मानकर पूजा की जा सकती है। चाहें तो पास के मंदिर या विद्यालय की सरस्वती पूजा में शामिल हों।
इस पर परिवारों में अलग-अलग रीत है। कई घरों में उन दिनों मूर्ति छूना टाला जाता है और पूजा कोई और सदस्य करता है, जबकि बहुत-से परिवार ऐसा कोई नियम नहीं मानते। जो भी रीत हो, वंदना पढ़ना, मन से प्रार्थना करना और अपनी किताबें माँ के सामने रखना हर हाल में हो सकता है।
परंपराएँ अलग-अलग बात कहती हैं: कुछ में बीज मंत्र गुरु से लेकर ही जपे जाते हैं, जबकि बहुत-से घरों में यह मंत्र सहज रूप से बोला जाता है। अगर मन में शंका हो तो 'या कुन्देन्दु' वंदना पढ़ें या 'श्री सरस्वत्यै नमः' कहें; ये सबके लिए हैं।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।