शीतलाष्टकम्
शीतला माता · अष्टकम् · संस्कृत
वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्

आरती · शीतला माता
शीतला माता की आरती 'जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता': पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ, कठिन शब्द और पाठांतर।
जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।आदि ज्योति महारानी, सब फल की दाता॥
अर्थ: हे शीतला माता, आपकी जय हो। आप आदि ज्योति हैं, महारानी हैं और सब फल देने वाली हैं।
रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भाता।ऋद्धि-सिद्धि चँवर डोलावें, जगमग छवि छाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता ॥
अर्थ: आप रत्नों के सिंहासन पर सुशोभित हैं और ऊपर सफ़ेद छत्र मन को भाता है। ऋद्धि और सिद्धि चँवर डुलाती हैं, और आपकी जगमगाती छवि चारों ओर छाई है।
विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता।वेद पुराण वरणत, पार नहीं पाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता ॥
अर्थ: विष्णु आपकी सेवा में खड़े हैं, और शिव और ब्रह्मा (धाता) भी आपकी सेवा करते हैं। वेद और पुराण आपका वर्णन करते हैं, पर आपकी महिमा का पार नहीं पाते।
इन्द्र मृदङ्ग बजावत, चन्द्र वीणा हाथा।सूरज ताल बजावै, नारद मुनि गाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता ॥
अर्थ: इन्द्र मृदंग बजाते हैं, चन्द्रमा के हाथ में वीणा है, सूर्य ताल देते हैं और नारद मुनि गाते हैं।
घण्टा शङ्ख शहनाई, बाजै मन भाता।करै भक्तजन आरती, लखि लखि हर्षाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता ॥
अर्थ: घंटा, शंख और शहनाई मन को भाने वाले सुर में बजते हैं। भक्तजन आरती करते हैं और आपको देख-देखकर हर्षित होते हैं।
ब्रह्म रूप वरदानी, तुही तीन काल ज्ञाता।भक्तन को सुख देती, मातु पिता भ्राता॥
॥ ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता ॥
अर्थ: आप ब्रह्म का रूप हैं, वर देने वाली हैं और तीनों कालों को जानने वाली हैं। आप भक्तों को सुख देती हैं; उनके लिए आप ही माता, पिता और भाई हैं।
जो जन ध्यान लगावे, प्रेम शक्ति पाता।सकल मनोरथ पावे, भवनिधि तर जाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता ॥
अर्थ: आरती कहती है कि जो व्यक्ति आपका ध्यान करता है, वह प्रेम और शक्ति पाता है, उसकी सब इच्छाएँ पूरी होती हैं और वह संसार-सागर से पार हो जाता है।
रोगों से जो पीड़ित कोई, शरण तेरी आता।कोढ़ी पावे निर्मल काया, अन्ध नेत्र पाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता ॥
अर्थ: आरती कहती है कि रोगों से पीड़ित जो कोई आपकी शरण आता है, उस पर आपकी कृपा होती है: कुष्ठ रोगी निर्मल शरीर पाता है और अंधा आँखें पाता है। ये माता की कृपा में भक्त-कवि की आस्था के शब्द हैं।
बांझ पुत्र को पावे, दारिद्र कट जाता।ताको भजै जो नाहीं, सिर धुनि पछताता॥
॥ ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता ॥
अर्थ: आरती कहती है कि निःसंतान स्त्री पुत्र पाती है और दरिद्रता कट जाती है। कवि कहता है कि जो ऐसी माता को नहीं भजता, वह बाद में सिर पीटकर पछताता है; यह माता की महिमा कहने का भक्त-कवि का ढंग है।
शीतल करती जननी, तू ही है जग त्राता।उत्पत्ति व्याधि बिनाशन, तू सब की घाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता ॥
अर्थ: हे जननी, आप शीतलता देती हैं और आप ही संसार की रक्षा करने वाली हैं। आप उपजे हुए रोगों का नाश करने वाली हैं; सब कष्टों को मिटाने वाली आप ही हैं।
दास विचित्र कर जोड़े, सुन मेरी माता।भक्ति आपनी दीजै, और न कुछ भाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता ॥
अर्थ: दास विचित्र हाथ जोड़कर कहता है: हे मेरी माता, सुनिए। मुझे अपनी भक्ति दीजिए; मुझे और कुछ नहीं भाता।
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'जय शीतला माता' शीतलता देने वाली शीतला माता की आरती है, जो विशेष रूप से शीतला अष्टमी (बसौड़ा) की पूजा में गाई जाती है। आरती माता को 'आदि ज्योति महारानी' कहती है, जिनकी सेवा में विष्णु, शिव और ब्रह्मा खड़े रहते हैं और इन्द्र, चन्द्र, सूर्य और नारद बाजे बजाते और गाते हैं।
आगे के अंतरों में शरण में आए भक्तों पर माता की कृपा का वर्णन है, और अंत में कवि माता से केवल उनकी भक्ति माँगता है: 'भक्ति आपनी दीजै, और न कुछ भाता'।
हे शीतला माता, आपकी जय हो। आप आदि ज्योति हैं, महारानी हैं और सब फल देने वाली हैं।
आप रत्नों के सिंहासन पर सुशोभित हैं और ऊपर सफ़ेद छत्र मन को भाता है। ऋद्धि और सिद्धि चँवर डुलाती हैं, और आपकी जगमगाती छवि चारों ओर छाई है।
विष्णु आपकी सेवा में खड़े हैं, और शिव और ब्रह्मा (धाता) भी आपकी सेवा करते हैं। वेद और पुराण आपका वर्णन करते हैं, पर आपकी महिमा का पार नहीं पाते।
इन्द्र मृदंग बजाते हैं, चन्द्रमा के हाथ में वीणा है, सूर्य ताल देते हैं और नारद मुनि गाते हैं।
घंटा, शंख और शहनाई मन को भाने वाले सुर में बजते हैं। भक्तजन आरती करते हैं और आपको देख-देखकर हर्षित होते हैं।
आप ब्रह्म का रूप हैं, वर देने वाली हैं और तीनों कालों को जानने वाली हैं। आप भक्तों को सुख देती हैं; उनके लिए आप ही माता, पिता और भाई हैं।
आरती कहती है कि जो व्यक्ति आपका ध्यान करता है, वह प्रेम और शक्ति पाता है, उसकी सब इच्छाएँ पूरी होती हैं और वह संसार-सागर से पार हो जाता है।
आरती कहती है कि रोगों से पीड़ित जो कोई आपकी शरण आता है, उस पर आपकी कृपा होती है: कुष्ठ रोगी निर्मल शरीर पाता है और अंधा आँखें पाता है। ये माता की कृपा में भक्त-कवि की आस्था के शब्द हैं।
आरती कहती है कि निःसंतान स्त्री पुत्र पाती है और दरिद्रता कट जाती है। कवि कहता है कि जो ऐसी माता को नहीं भजता, वह बाद में सिर पीटकर पछताता है; यह माता की महिमा कहने का भक्त-कवि का ढंग है।
हे जननी, आप शीतलता देती हैं और आप ही संसार की रक्षा करने वाली हैं। आप उपजे हुए रोगों का नाश करने वाली हैं; सब कष्टों को मिटाने वाली आप ही हैं।
दास विचित्र हाथ जोड़कर कहता है: हे मेरी माता, सुनिए। मुझे अपनी भक्ति दीजिए; मुझे और कुछ नहीं भाता।
शीतला माता का नाम ही शीतलता से बना है, और यह आरती उन्हें ताप और रोग से पीड़ित लोगों को शीतलता देने वाली माँ के रूप में गाती है। पहले अंतरों में उनका राजसी रूप है: रत्न-सिंहासन, श्वेत छत्र, चँवर डुलाती ऋद्धि-सिद्धि, सेवा में खड़े विष्णु, शिव और ब्रह्मा, और बाजे बजाते देवता।
आगे के अंतरे भक्तों पर माता की कृपा का बखान हैं, जिनमें रोग, दरिद्रता और संतान की बातें आती हैं; ये भक्त-कवि की आस्था के शब्द हैं। आरती का अंत सबसे सुंदर है: कवि माता से और कुछ नहीं, केवल उनकी भक्ति माँगता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| अंतरा 10 | दास नारायण कर जोरी माता। भक्ति आपनी दीजै और न कुछ माता॥ | द्रिक पंचांग के पाठ में; भक्ति भारत और भारतकोश में 'दास विचित्र कर जोड़े, सुन मेरी माता' |
| अंतरा 9 | शीतल करती जन की तू ही है जग त्राता। उत्पत्ति बाला बिनाशन तू सब की माता॥ | द्रिक पंचांग में |
| अंतरा 1 | ऋद्धि-सिद्धि चँवर ढुलावें | भक्ति भारत में; द्रिक पंचांग और भारतकोश में 'डोलावें' |
| अंतरा 6 | जो भी ध्यान लगावैं प्रेम भक्ति लाता | भारतकोश में |
भक्ति भारत और भारतकोश के पाठ में अंतिम अंतरा 'दास विचित्र कर जोड़े' से शुरू होता है, जो कवि की छाप लगती है; द्रिक पंचांग के पाठ में यहाँ 'दास नारायण' है। रचयिता के बारे में और कोई जानकारी नहीं मिली।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति भक्ति भारत, भारतकोश (bharatdiscovery.org) और द्रिक पंचांग के पाठ से मिलाई गई। टेक और पहले आठ अंतरे तीनों में लगभग एक जैसे हैं; अंतिम दो अंतरों में भक्ति भारत और भारतकोश एक ओर हैं और द्रिक पंचांग दूसरी ओर, इसलिए बहुमत का पाठ लिया गया। 'चँवर डोलावें' द्रिक पंचांग और भारतकोश का पाठ है; बाकी पंक्तियाँ भक्ति भारत से, जिनसे भारतकोश शब्दशः या लगभग मिलता है। भारतकोश के पाठ में कुछ छपाई की भूलें हैं (छत्र के लिए 'भ्राता', 'हरहाता'); वहाँ भक्ति भारत का पाठ लिया गया। फल बताने वाले अंतरों (6 से 8) का अर्थ आरती के अपने कथन के रूप में लिखा गया है, और इलाज न छोड़ने की बात प्रश्नोत्तर में जोड़ी गई है।
शीतला माता · अष्टकम् · संस्कृत
वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्
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नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।
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दुर्गा · चालीसा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी
मुख्य रूप से शीतला अष्टमी (बसौड़ा) पर, जो होली के बाद चैत्र कृष्ण अष्टमी को आती है; कई परिवार सप्तमी को पूजा करते हैं। माता की पूजा के अंत में यह आरती गाई जाती है।
शीतला अष्टमी को एक दिन पहले बना भोजन माता को चढ़ाने और वही प्रसाद के रूप में खाने की परंपरा को बसौड़ा कहते हैं। इस दिन घर में ताज़ा खाना नहीं पकाया जाता।
नहीं। आरती की ये पंक्तियाँ माता की कृपा में भक्त की आस्था बताती हैं। बीमारी में डॉक्टर की सलाह और इलाज ज़रूरी है; पूजा और प्रार्थना उसके साथ मन को बल देती हैं।
नहीं। यह माता की महिमा बताने का भक्त-कवियों का पुराना ढंग है, कोई दंड की बात नहीं। आरती का अंतिम भाव प्रेम का है: 'भक्ति आपनी दीजै, और न कुछ भाता'।
भक्ति भारत और भारतकोश के पाठ में अंतिम अंतरा 'दास विचित्र कर जोड़े' से शुरू होता है, जो कवि की छाप लगती है; द्रिक पंचांग में यहाँ 'दास नारायण' है। कवि के बारे में और कोई जानकारी नहीं मिली।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।