जयति जय गायत्री माता
गायत्री · आरती
जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता

चालीसा · गायत्री
वेदमाता गायत्री की स्तुति की चालीसा: दो दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अंत का दोहा। मूल पाठ, हर चौपाई का अर्थ, भावार्थ और कठिन शब्द।
ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड।शान्ति कान्ति जागृत प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड॥
अर्थ: ह्रीं, श्रीं, क्लीं (बीज-मंत्र), मेधा, प्रभा, जीवन की प्रचंड ज्योति, शांति, कांति, जागृति, प्रगति और रचना की अखंड शक्ति — ये सब माँ गायत्री के ही रूप हैं।
जगत जननी मङ्गल करनि, गायत्री सुखधाम।प्रणवों सावित्री स्वधा, स्वाहा पूरन काम॥
अर्थ: जगत की माता, मंगल करने वाली, सुख का धाम गायत्री को मैं प्रणाम करता हूँ। वे ही सावित्री, स्वधा और स्वाहा हैं, और सब कामनाएँ पूरी करने वाली हैं।
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी।गायत्री नित कलिमल दहनी ॥१॥
अर्थ: “भूर्भुवः स्वः” और ॐ से युक्त माता गायत्री सदा कलियुग के पापों को जलाती हैं।
अक्षर चौविस परम पुनीता।इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता ॥२॥
अर्थ: गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर परम पवित्र हैं; इनमें शास्त्र, वेद और गीता का सार बसा है।
शाश्वत सतोगुणी सत रूपा।सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥३॥
अर्थ: माँ सदा रहने वाली, सत्त्व गुण वाली और सत्य-स्वरूप हैं; वे सत्य, सनातन और अनुपम अमृत जैसी हैं।
हंसारूढ सिताम्बर धारी।स्वर्ण कान्ति शुचि गगन-बिहारी ॥४॥
अर्थ: वे हंस पर विराजती हैं और सफ़ेद वस्त्र धारण करती हैं; उनकी कांति सोने जैसी है और वे पवित्र आकाश में विचरती हैं।
पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला।शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥५॥
अर्थ: उनके हाथों में पुस्तक, पुष्प, कमंडलु और माला है; उनका शरीर उजला है और नेत्र बड़े-बड़े हैं।
ध्यान धरत पुलकित हित होई।सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई ॥६॥
अर्थ: उनका ध्यान करते ही मन पुलकित होता है और भला होता है; सुख उपजता है और दुख व दुर्बुद्धि नष्ट होती है।
कामधेनु तुम सुर तरु छाया।निराकार की अद्भुत माया ॥७॥
अर्थ: आप कामधेनु हैं और कल्पवृक्ष की छाया हैं; आप निराकार परमात्मा की अद्भुत माया (शक्ति) हैं।
तुम्हरी शरण गहै जो कोई।तरै सकल संकट सों सोई ॥८॥
अर्थ: जो कोई आपकी शरण लेता है, वह सब संकटों से पार हो जाता है।
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली।दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥९॥
अर्थ: सरस्वती, लक्ष्मी और काली आप ही हैं; आपकी ज्योति सबसे निराली चमकती है।
तुम्हरी महिमा पार न पावैं।जो शारद शत मुख गुन गावैं ॥१०॥
अर्थ: आपकी महिमा का पार कोई नहीं पा सकता, चाहे स्वयं सरस्वती सौ मुखों से आपके गुण गाएँ।
चार वेद की मात पुनीता।तुम ब्रह्माणी गौरी सीता ॥११॥
अर्थ: आप चारों वेदों की पवित्र माता हैं; आप ही ब्रह्माणी, गौरी और सीता हैं।
महामन्त्र जितने जग माहीं।कोउ गायत्री सम नाहीं ॥१२॥
अर्थ: संसार में जितने भी महामंत्र हैं, उनमें कोई भी गायत्री के समान नहीं है।
सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै।आलस पाप अविद्या नासै ॥१३॥
अर्थ: आपका स्मरण करते ही हृदय में ज्ञान का प्रकाश होता है, और आलस्य, पाप और अज्ञान नष्ट होते हैं।
सृष्टि बीज जग जननि भवानी।कालरात्रि वरदा कल्याणी ॥१४॥
अर्थ: आप सृष्टि का बीज, जगत की माता भवानी हैं; आप ही कालरात्रि, वर देने वाली और कल्याण करने वाली हैं।
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते।तुम सों पावें सुरता तेते ॥१५॥
अर्थ: ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और जितने भी देवता हैं, वे सब आपसे ही अपना देवत्व पाते हैं।
तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे।जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥१६॥
अर्थ: आप भक्तों की हैं और भक्त आपके हैं; जैसे माँ को पुत्र प्राणों से भी प्यारा होता है।
महिमा अपरम्पार तुम्हारी।जय जय जय त्रिपदा भयहारी ॥१७॥
अर्थ: आपकी महिमा अपरंपार है। हे त्रिपदा (तीन चरणों वाली गायत्री), भय हरने वाली, आपकी जय हो, जय हो, जय हो।
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना।तुम सम अधिक न जगमे आना ॥१८॥
अर्थ: आप सारे ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण हैं; संसार में आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं।
तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा।तुमहिं पाय कछु रहै न कलेशा ॥१९॥
अर्थ: आपको जान लेने पर कुछ जानना शेष नहीं रहता, और आपको पा लेने पर कोई क्लेश नहीं रहता।
जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई।पारस परसि कुधातु सुहाई ॥२०॥
अर्थ: जो आपको जान लेता है वह आपका ही रूप हो जाता है, जैसे पारस को छूकर खोटी धातु भी सुंदर (सोना) हो जाती है।
तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई।माता तुम सब ठौर समाई ॥२१॥
अर्थ: आपकी शक्ति हर जगह चमकती है; हे माता, आप सब जगह समाई हुई हैं।
ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे।सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ॥२२॥
अर्थ: ग्रह, नक्षत्र और अनगिनत ब्रह्मांड, सब आपकी प्रेरणा से ही गतिमान हैं।
सकल सृष्टि की प्राण विधाता।पालक पोषक नाशक त्राता ॥२३॥
अर्थ: आप सारी सृष्टि के प्राणों की विधाता हैं; आप ही पालन करने वाली, पोषण करने वाली, संहार करने वाली और रक्षा करने वाली हैं।
मातेश्वरी दया व्रत धारी।तुम सन तरे पातकी भारी ॥२४॥
अर्थ: हे मातेश्वरी, आपने दया का व्रत धारण किया है; आपकी कृपा से बड़े-बड़े पापी भी तर गए।
जापर कृपा तुम्हारी होई।तापर कृपा करें सब कोई ॥२५॥
अर्थ: जिस पर आपकी कृपा होती है, उस पर सब कोई कृपा करते हैं।
मन्द बुद्धि ते बुधि बल पावें।रोगी रोग रहित हो जावें ॥२६॥
अर्थ: मंद बुद्धि वाले बुद्धि और बल पाते हैं, और रोगी रोग से मुक्त हो जाते हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
दरिद्र मिटै कटै सब पीरा।नाशै दुःख हरै भव भीरा ॥२७॥
अर्थ: दरिद्रता मिटती है, सब पीड़ा कटती है, दुख नष्ट होता है और संसार का भय दूर होता है।
गृह क्लेश चित चिन्ता भारी।नासै गायत्री भय हारी ॥२८॥
अर्थ: घर का क्लेश और मन की भारी चिंता, भय हरने वाली गायत्री दोनों को दूर करती हैं।
सन्तति हीन सुसन्तति पावें।सुख संपति युत मोद मनावें ॥२९॥
अर्थ: संतान की चाह रखने वाले अच्छी संतान पाते हैं और सुख-संपत्ति के साथ आनंद मनाते हैं।
भूत पिशाच सबै भय खावें।यम के दूत निकट नहिं आवें ॥३०॥
अर्थ: भूत-पिशाच सब (उनसे) डरते हैं और यमदूत पास नहीं आते, ऐसा चालीसा कहती है।
जो सधवा सुमिरें चित लाई।अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥३१॥
अर्थ: जो सुहागिन स्त्रियाँ मन लगाकर आपका स्मरण करती हैं, उनका सौभाग्य अखंड और सदा सुख देने वाला रहता है।
घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी।विधवा रहें सत्य व्रत धारी ॥३२॥
अर्थ: कुमारी कन्याएँ सुख देने वाला घर और वर पाती हैं, और विधवा स्त्रियाँ सत्य के व्रत में दृढ़ रहती हैं।
जयति जयति जगदम्ब भवानी।तुम सम और दयालु न दानी ॥३३॥
अर्थ: हे जगदंबा भवानी, आपकी जय हो, जय हो; आपके समान दूसरा कोई दयालु और दानी नहीं।
जो सतगुरु सो दीक्षा पावे।सो साधन को सफल बनावे ॥३४॥
अर्थ: जो सद्गुरु से दीक्षा पाता है, वह अपनी साधना को सफल बनाता है।
सुमिरन करे सुरुचि बडभागी।लहै मनोरथ गृही विरागी ॥३५॥
अर्थ: जो भाग्यशाली रुचि से आपका स्मरण करता है, वह गृहस्थ हो या विरक्त, अपना मनोरथ पाता है।
अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता।सब समर्थ गायत्री माता ॥३६॥
अर्थ: आठों सिद्धियों और नौ निधियों को देने वाली गायत्री माता सब कुछ करने में समर्थ हैं।
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी।आरत अर्थी चिन्तित भोगी ॥३७॥
अर्थ: ऋषि, मुनि, संन्यासी, तपस्वी, योगी, दुखी, कुछ चाहने वाले, चिंतित और भोगी (गृहस्थ) — सब तरह के लोग (आपकी शरण में आते हैं)।
जो जो शरण तुम्हारी आवें।सो सो मन वांछित फल पावें ॥३८॥
अर्थ: जो-जो आपकी शरण में आते हैं, वे-वे मनचाहा फल पाते हैं।
बल बुधि विद्या शील स्वभाउ।धन वैभव यश तेज उछाउ ॥३९॥
अर्थ: बल, बुद्धि, विद्या, शील, अच्छा स्वभाव, धन, वैभव, यश, तेज और उत्साह —
सकल बढें उपजें सुख नाना।जे यह पाठ करै धरि ध्याना ॥४०॥
अर्थ: — ये सब बढ़ते हैं और अनेक सुख उपजते हैं, उसके जो ध्यान लगाकर यह पाठ करता है, ऐसा चालीसा कहती है।
यह चालीसा भक्ति युत, पाठ करै जो कोई।तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय॥
अर्थ: जो कोई भक्ति के साथ इस चालीसा का पाठ करता है, उस पर माँ गायत्री की कृपा और प्रसन्नता होती है।
हर चौपाई का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।
गायत्री चालीसा वेदमाता गायत्री की स्तुति है, जो “ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा” वाले दोहे से शुरू होती है। इसमें दो आरंभिक दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। चालीसा गायत्री मंत्र के “भूर्भुवः स्वः” और उसके चौबीस अक्षरों को याद करती है, और देवी को सरस्वती, लक्ष्मी, काली, ब्रह्माणी, गौरी और सीता, सबका एक ही रूप कहती है।
इसकी भाषा सरल, अवधी-मिश्रित हिंदी है। रचयिता का नाम पाठ में या किसी स्रोत में नहीं मिलता। यह पाठ sanskritdocuments.org पर जाँचा हुआ मिलता है और गायत्री की उपासना करने वाले घरों में बहुत पढ़ा जाता है।
ह्रीं, श्रीं, क्लीं (बीज-मंत्र), मेधा, प्रभा, जीवन की प्रचंड ज्योति, शांति, कांति, जागृति, प्रगति और रचना की अखंड शक्ति — ये सब माँ गायत्री के ही रूप हैं।
जगत की माता, मंगल करने वाली, सुख का धाम गायत्री को मैं प्रणाम करता हूँ। वे ही सावित्री, स्वधा और स्वाहा हैं, और सब कामनाएँ पूरी करने वाली हैं।
“भूर्भुवः स्वः” और ॐ से युक्त माता गायत्री सदा कलियुग के पापों को जलाती हैं।
गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर परम पवित्र हैं; इनमें शास्त्र, वेद और गीता का सार बसा है।
माँ सदा रहने वाली, सत्त्व गुण वाली और सत्य-स्वरूप हैं; वे सत्य, सनातन और अनुपम अमृत जैसी हैं।
वे हंस पर विराजती हैं और सफ़ेद वस्त्र धारण करती हैं; उनकी कांति सोने जैसी है और वे पवित्र आकाश में विचरती हैं।
उनके हाथों में पुस्तक, पुष्प, कमंडलु और माला है; उनका शरीर उजला है और नेत्र बड़े-बड़े हैं।
उनका ध्यान करते ही मन पुलकित होता है और भला होता है; सुख उपजता है और दुख व दुर्बुद्धि नष्ट होती है।
आप कामधेनु हैं और कल्पवृक्ष की छाया हैं; आप निराकार परमात्मा की अद्भुत माया (शक्ति) हैं।
जो कोई आपकी शरण लेता है, वह सब संकटों से पार हो जाता है।
सरस्वती, लक्ष्मी और काली आप ही हैं; आपकी ज्योति सबसे निराली चमकती है।
आपकी महिमा का पार कोई नहीं पा सकता, चाहे स्वयं सरस्वती सौ मुखों से आपके गुण गाएँ।
आप चारों वेदों की पवित्र माता हैं; आप ही ब्रह्माणी, गौरी और सीता हैं।
संसार में जितने भी महामंत्र हैं, उनमें कोई भी गायत्री के समान नहीं है।
आपका स्मरण करते ही हृदय में ज्ञान का प्रकाश होता है, और आलस्य, पाप और अज्ञान नष्ट होते हैं।
आप सृष्टि का बीज, जगत की माता भवानी हैं; आप ही कालरात्रि, वर देने वाली और कल्याण करने वाली हैं।
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और जितने भी देवता हैं, वे सब आपसे ही अपना देवत्व पाते हैं।
आप भक्तों की हैं और भक्त आपके हैं; जैसे माँ को पुत्र प्राणों से भी प्यारा होता है।
आपकी महिमा अपरंपार है। हे त्रिपदा (तीन चरणों वाली गायत्री), भय हरने वाली, आपकी जय हो, जय हो, जय हो।
आप सारे ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण हैं; संसार में आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं।
आपको जान लेने पर कुछ जानना शेष नहीं रहता, और आपको पा लेने पर कोई क्लेश नहीं रहता।
जो आपको जान लेता है वह आपका ही रूप हो जाता है, जैसे पारस को छूकर खोटी धातु भी सुंदर (सोना) हो जाती है।
आपकी शक्ति हर जगह चमकती है; हे माता, आप सब जगह समाई हुई हैं।
ग्रह, नक्षत्र और अनगिनत ब्रह्मांड, सब आपकी प्रेरणा से ही गतिमान हैं।
आप सारी सृष्टि के प्राणों की विधाता हैं; आप ही पालन करने वाली, पोषण करने वाली, संहार करने वाली और रक्षा करने वाली हैं।
हे मातेश्वरी, आपने दया का व्रत धारण किया है; आपकी कृपा से बड़े-बड़े पापी भी तर गए।
जिस पर आपकी कृपा होती है, उस पर सब कोई कृपा करते हैं।
मंद बुद्धि वाले बुद्धि और बल पाते हैं, और रोगी रोग से मुक्त हो जाते हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
दरिद्रता मिटती है, सब पीड़ा कटती है, दुख नष्ट होता है और संसार का भय दूर होता है।
घर का क्लेश और मन की भारी चिंता, भय हरने वाली गायत्री दोनों को दूर करती हैं।
संतान की चाह रखने वाले अच्छी संतान पाते हैं और सुख-संपत्ति के साथ आनंद मनाते हैं।
भूत-पिशाच सब (उनसे) डरते हैं और यमदूत पास नहीं आते, ऐसा चालीसा कहती है।
जो सुहागिन स्त्रियाँ मन लगाकर आपका स्मरण करती हैं, उनका सौभाग्य अखंड और सदा सुख देने वाला रहता है।
कुमारी कन्याएँ सुख देने वाला घर और वर पाती हैं, और विधवा स्त्रियाँ सत्य के व्रत में दृढ़ रहती हैं।
हे जगदंबा भवानी, आपकी जय हो, जय हो; आपके समान दूसरा कोई दयालु और दानी नहीं।
जो सद्गुरु से दीक्षा पाता है, वह अपनी साधना को सफल बनाता है।
जो भाग्यशाली रुचि से आपका स्मरण करता है, वह गृहस्थ हो या विरक्त, अपना मनोरथ पाता है।
आठों सिद्धियों और नौ निधियों को देने वाली गायत्री माता सब कुछ करने में समर्थ हैं।
ऋषि, मुनि, संन्यासी, तपस्वी, योगी, दुखी, कुछ चाहने वाले, चिंतित और भोगी (गृहस्थ) — सब तरह के लोग (आपकी शरण में आते हैं)।
जो-जो आपकी शरण में आते हैं, वे-वे मनचाहा फल पाते हैं।
बल, बुद्धि, विद्या, शील, अच्छा स्वभाव, धन, वैभव, यश, तेज और उत्साह —
— ये सब बढ़ते हैं और अनेक सुख उपजते हैं, उसके जो ध्यान लगाकर यह पाठ करता है, ऐसा चालीसा कहती है।
जो कोई भक्ति के साथ इस चालीसा का पाठ करता है, उस पर माँ गायत्री की कृपा और प्रसन्नता होती है।
गायत्री चालीसा देवी गायत्री को सारे ज्ञान, शक्ति और सृष्टि का मूल मानकर उनकी स्तुति करती है। आरंभ के दोहों में बीज-मंत्रों के साथ मेधा, प्रभा, शांति, कांति और प्रगति जैसी शक्तियों के नाम लेकर बताया गया है कि ये सब गायत्री के ही रूप हैं। फिर उनके रूप का ध्यान है: हंस पर बैठी, श्वेत वस्त्र पहने, हाथों में पुस्तक, पुष्प, कमंडलु और माला।
बीच की चौपाइयों में गायत्री को चारों वेदों की माता, सब महामंत्रों में श्रेष्ठ, और सरस्वती, लक्ष्मी, काली, ब्रह्माणी, गौरी व सीता का एक ही रूप कहा गया है। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी उन्हीं से शक्ति पाते हैं, और ग्रह-नक्षत्र उन्हीं की प्रेरणा से चलते हैं। उन्हें जान लेने पर कुछ जानना शेष नहीं रहता, जैसे पारस के छूने से खोटी धातु भी सोना हो जाती है।
अंतिम भाग में चालीसा बताती है कि माँ की कृपा से जीवन के कौन-कौन से दुख दूर होते हैं — मंद बुद्धि, रोग, दरिद्रता, घर का क्लेश, भय — और कि ऋषि-मुनि से लेकर दुखी, चिंतित और गृहस्थ तक, हर तरह के लोग उनकी शरण में आते हैं। ये चालीसा के अपने वचन हैं; इसका केंद्र माँ के प्रति भरोसा और सद्बुद्धि की चाह है।
चौपाई 25 से 32, 35, 37 से 40 और अंतिम दोहा इस चालीसा की फलश्रुति हैं। चालीसा के अपने वचनों में: माँ गायत्री की कृपा से बुद्धि, स्वास्थ्य, सुख-संपत्ति और घर की शांति मिलती है, भय दूर होता है, और जो भक्ति से इसका पाठ करता है उस पर माँ प्रसन्न होती हैं। ये पाठ के वचन हैं; यहाँ इन्हें उसी रूप में दिया गया है।
जापर कृपा तुम्हारी होई।
तापर कृपा करें सब कोई॥जिस पर आपकी कृपा होती है, उस पर सब कोई कृपा करते हैं।
मन्द बुद्धि ते बुधि बल पावें।
रोगी रोग रहित हो जावें॥मंद बुद्धि वाले बुद्धि और बल पाते हैं, और रोगी रोग से मुक्त हो जाते हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
दरिद्र मिटै कटै सब पीरा।
नाशै दुःख हरै भव भीरा॥दरिद्रता मिटती है, सब पीड़ा कटती है, दुख नष्ट होता है और संसार का भय दूर होता है।
गृह क्लेश चित चिन्ता भारी।
नासै गायत्री भय हारी॥घर का क्लेश और मन की भारी चिंता, भय हरने वाली गायत्री दोनों को दूर करती हैं।
सन्तति हीन सुसन्तति पावें।
सुख संपति युत मोद मनावें॥संतान की चाह रखने वाले अच्छी संतान पाते हैं और सुख-संपत्ति के साथ आनंद मनाते हैं।
भूत पिशाच सबै भय खावें।
यम के दूत निकट नहिं आवें॥भूत-पिशाच सब (उनसे) डरते हैं और यमदूत पास नहीं आते, ऐसा चालीसा कहती है।
जो सधवा सुमिरें चित लाई।
अछत सुहाग सदा सुखदाई॥जो सुहागिन स्त्रियाँ मन लगाकर आपका स्मरण करती हैं, उनका सौभाग्य अखंड और सदा सुख देने वाला रहता है।
घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी।
विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥कुमारी कन्याएँ सुख देने वाला घर और वर पाती हैं, और विधवा स्त्रियाँ सत्य के व्रत में दृढ़ रहती हैं।
सुमिरन करे सुरुचि बडभागी।
लहै मनोरथ गृही विरागी॥जो भाग्यशाली रुचि से आपका स्मरण करता है, वह गृहस्थ हो या विरक्त, अपना मनोरथ पाता है।
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी।
आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥ऋषि, मुनि, संन्यासी, तपस्वी, योगी, दुखी, कुछ चाहने वाले, चिंतित और भोगी (गृहस्थ) — सब तरह के लोग (आपकी शरण में आते हैं)।
जो जो शरण तुम्हारी आवें।
सो सो मन वांछित फल पावें॥जो-जो आपकी शरण में आते हैं, वे-वे मनचाहा फल पाते हैं।
बल बुधि विद्या शील स्वभाउ।
धन वैभव यश तेज उछाउ॥बल, बुद्धि, विद्या, शील, अच्छा स्वभाव, धन, वैभव, यश, तेज और उत्साह —
सकल बढें उपजें सुख नाना।
जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥— ये सब बढ़ते हैं और अनेक सुख उपजते हैं, उसके जो ध्यान लगाकर यह पाठ करता है, ऐसा चालीसा कहती है।
यह चालीसा भक्ति युत, पाठ करै जो कोई।
तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय॥जो कोई भक्ति के साथ इस चालीसा का पाठ करता है, उस पर माँ गायत्री की कृपा और प्रसन्नता होती है।
गायत्री चालीसा गायत्री मंत्र की अधिष्ठात्री देवी, वेदमाता गायत्री की स्तुति है। जो लोग वैदिक गायत्री मंत्र के साथ देवी का सगुण रूप में स्मरण करना चाहते हैं, उनके लिए यह सरल हिंदी में भक्ति का माध्यम है।
इसमें गायत्री को सरस्वती, लक्ष्मी और काली का एक ही रूप, चारों वेदों की माता और सृष्टि की प्रेरक शक्ति कहा गया है; यानी चालीसा एक ही शक्ति के अनेक रूपों को एक साथ देखती है। गायत्री जयंती, नवरात्रि और रोज़ की संध्या में इसका पाठ होता है।
चालीसा स्वयं कहती है कि सद्गुरु से दीक्षा लेकर किया गया साधन सफल होता है (चौपाई 34); इसलिए कई साधक इसे गायत्री मंत्र के जप के साथ पढ़ते हैं।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| चौपाई 6 | ध्यान धरत पुलकित हिय होई | भक्ति भारत के पाठ में “हित” की जगह “हिय” (हृदय), यानी ध्यान करते ही हृदय पुलकित होता है। sanskritdocuments.org, द्रिक पंचांग और भारतडिस्कवरी में “हित”। |
| चौपाई 33 | तुम सम थोर दयालु न दानी | sanskritdocuments.org में “थोर”, द्रिक पंचांग और भारतडिस्कवरी में “ओर”; अर्थ के अनुसार “और” सही है, जो भक्ति भारत के पाठ से लिया गया। |
| चौपाई 4 | हंसारूढ सितंबर धारी | sanskritdocuments.org और भारतडिस्कवरी में “सितंबर”, जो “सिताम्बर” (सफ़ेद वस्त्र) की छपाई की भूल है। |
| चौपाई 20 | जानत तुमहिं तुमहिं है जाई | sanskritdocuments.org में “व्है” (हो जाता है) की जगह “है”। |
| चौपाई 12 | कोई गायत्री सम नाहीं | sanskritdocuments.org में “कोउ” की जगह “कोई”; अर्थ वही है। |
| पहला दोहा | हीं श्रीं, क्लीं, मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड। शांति, क्रांति, जागृति, प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड॥ | भक्ति भारत के पाठ में “कान्ति जागृत” की जगह “क्रांति, जागृति”। |
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org का पाठ (सुंदर हट्टंगडी द्वारा जाँचा हुआ) द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और भारतडिस्कवरी के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया; चारों में चालीस चौपाइयाँ एक ही क्रम में हैं। पंक्तियाँ द्रिक पंचांग से लीं: पाठ वही है, पर sanskritdocuments की छपाई-भूलें (सितंबर, भकत, दूःख, शुबदाई, सुरूयि, स्वभाओ, थोर) उसमें नहीं हैं। चौपाई 33 का “और” भक्ति भारत से और चौपाई 35 का “सुरुचि” भारतडिस्कवरी से। रचयिता अज्ञात।
गायत्री · आरती
जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।
दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।
लक्ष्मी · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
दीपावली की शाम घर में लक्ष्मी-गणेश पूजा: सफ़ाई, प्रदोष काल का समय, चौकी सजाना, गणेश पूजन, लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका, बही-खाता, तिजोरी और आरती।
सरस्वती · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
वसंत पंचमी पर घर में माँ सरस्वती की पूजा: पीले फूल, किताबें और वाद्य माँ के सामने, बच्चों का विद्यारंभ, मंत्र, आरती और प्रसाद, सरल विकल्पों के साथ।
दुर्गा · आरती
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। पाठ में कवि का नाम नहीं आता और sanskritdocuments.org सहित किसी स्रोत में रचयिता नहीं दिया गया।
गायत्री मंत्र ऋग्वेद का संस्कृत मंत्र है। गायत्री चालीसा हिंदी की भक्ति-रचना है, जो उसी मंत्र की देवी माँ गायत्री की स्तुति करती है और मंत्र के “भूर्भुवः स्वः” और चौबीस अक्षरों को याद करती है।
ये देवी-उपासना के प्रसिद्ध बीज-मंत्र हैं। पहला दोहा इनके साथ मेधा, प्रभा, शांति, कांति जैसी शक्तियों को गायत्री का ही रूप बताता है।
गायत्री मंत्र तीन चरणों (पदों) में है, इसलिए गायत्री को त्रिपदा कहते हैं।
लोग इसे रोज़ सुबह या संध्या को, गायत्री जयंती और नवरात्रि में पढ़ते हैं। कोई तय समय या संख्या आवश्यक नहीं; श्रद्धा और शांत मन मुख्य हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।