काली

स्तोत्र · काली · अष्टकम्

कालिकाष्टकम्

माँ काली की स्तुति: तीन श्लोकों में उनके उग्र रूप का ध्यान और आठ श्लोकों में यह भाव कि उनके असली स्वरूप को देवता भी नहीं जानते। पाठ, अर्थ और शब्दार्थ।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

ध्यानम्

गलद्रक्तमुण्डावलीकण्ठमालामहाघोररावा सुदंष्ट्रा कराला ।विवस्त्रा श्मशानालया मुक्तकेशीमहाकालकामाकुला कालिकेयम् ॥१॥

galadraktamuṇḍāvalīkaṇṭhamālā
mahāghorarāvā sudaṃṣṭrā karālā |
vivastrā śmaśānālayā muktakeśī
mahākālakāmākulā kālikeyam ||

अर्थ: जिनके गले में रक्त टपकते मुण्डों की माला है, जो बहुत भयानक गर्जना करती हैं, जिनके दाँत बड़े और रूप विकराल है, जो वस्त्रहीन हैं, श्मशान में रहती हैं, जिनके केश खुले हैं और जो महाकाल के प्रेम में मग्न हैं, वे ये माँ कालिका हैं।

गलद्रक्त
टपकते रक्त वाले
मुण्डावली
कटे सिरों की पंक्ति
महाघोररावा
बहुत भयानक गर्जना वाली
सुदंष्ट्रा
बड़े दाँतों वाली
कराला
विकराल
श्मशानालया
श्मशान में निवास करने वाली
मुक्तकेशी
खुले केशों वाली
महाकालकामाकुला
महाकाल के प्रेम में मग्न

भुजेवामयुग्मे शिरोऽसिं दधानावरं दक्षयुग्मेऽभयं वै तथैव ।सुमध्याऽपि तुङ्गस्तना भारनम्रालसद्रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या ॥२॥

bhujevāmayugme śiro’siṃ dadhānā
varaṃ dakṣayugme’bhayaṃ vai tathaiva |
sumadhyā’pi tuṅgastanā bhāranamrā
lasadraktasṛkkadvayā susmitāsyā ||

अर्थ: वे बाएँ दोनों हाथों में कटा सिर और तलवार लिए हैं और दाएँ दोनों हाथों में वर और अभय की मुद्रा। उनकी कमर पतली है, ऊँचे वक्ष के भार से वे कुछ झुकी हैं, उनके होठों के दोनों कोनों पर रक्त चमक रहा है और मुख पर मधुर मुस्कान है।

वामयुग्मे
बाएँ दोनों हाथों में
शिरोऽसिं
सिर और तलवार
दक्षयुग्मे
दाएँ दोनों हाथों में
वरं
वर देने की मुद्रा
अभयं
निर्भय करने की मुद्रा
सृक्कद्वया
होठों के दोनों कोने
सुस्मितास्या
मुस्कान भरे मुख वाली

शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशीलसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककाञ्ची ।शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभिश्-चतुर्दिक्षुशब्दायमानाऽभिरेजे ॥३॥

śavadvandvakarṇāvataṃsā sukeśī
lasatpretapāṇiṃ prayuktaikakāñcī |
śavākāramañcādhirūḍhā śivābhiś-
caturdikṣuśabdāyamānā’bhireje ||

अर्थ: दो शव जिनके कानों के आभूषण हैं, जिनके केश सुंदर हैं, जिन्होंने प्रेतों के हाथों की करधनी पहनी है, जो शव जैसे आसन पर आरूढ़ हैं, वे देवी चारों दिशाओं में शब्द करती सियारिनों के बीच शोभित हैं।

शवद्वन्द्व
दो शव
कर्णावतंसा
कानों के आभूषण वाली
प्रेतपाणि
प्रेतों के हाथ
काञ्ची
करधनी
मञ्चाधिरूढा
आसन पर बैठी
शिवाभिः
सियारिनों के साथ
अभिरेजे
शोभित हैं

॥ अथ स्तुतिः ॥

विरञ्च्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीन्समाराध्य कालीं प्रधाना बभूवुः ।अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिंस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥१॥

virañcyādidevāstrayaste guṇāstrīn
samārādhya kālīṃ pradhānā babhūvuḥ |
anādiṃ surādiṃ makhādiṃ bhavādiṃ
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||

अर्थ: ब्रह्मा आदि वे तीनों देवता तीनों गुणों वाली काली की आराधना करके ही प्रधान बने। हे माँ, तुम्हारा स्वरूप अनादि है, देवताओं का भी आदि, यज्ञ का आदि और संसार का आदि है; उस स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते।

विरञ्च्यादिदेवाः
ब्रह्मा आदि देवता
त्रयः
तीनों
समाराध्य
आराधना करके
प्रधानाः
श्रेष्ठ, मुख्य
अनादिं
जिसका आदि नहीं
मखादिं
यज्ञ का आदि
भवादिं
संसार का आदि
न विन्दन्ति
नहीं जानते

जगन्मोहिनीयं तु वाग्वादिनीयंसुहृत्पोषिणीशत्रुसंहारणीयम् ।वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयंस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥२॥

jaganmohinīyaṃ tu vāgvādinīyaṃ
suhṛtpoṣiṇīśatrusaṃhāraṇīyam |
vacastambhanīyaṃ kimuccāṭanīyaṃ
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||

अर्थ: यह देवी जगत को मोहित करने वाली है, वाणी को बोलने की शक्ति देने वाली है, मित्रों का पोषण और शत्रुओं का संहार करने वाली है, वाणी को रोक देने वाली और दूर भगा देने वाली भी है। फिर भी तुम्हारे असली स्वरूप को देवता नहीं जान पाते।

जगन्मोहिनी
जगत को मोहित करने वाली
वाग्वादिनी
वाणी को बोलने की शक्ति देने वाली
सुहृत्पोषिणी
मित्रों का पोषण करने वाली
शत्रुसंहारणी
शत्रुओं का संहार करने वाली
वचस्तम्भनी
वाणी को रोक देने वाली
उच्चाटनी
दूर भगा देने वाली

इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्लीमनोजास्तु कामान् यथार्थं प्रकुर्यात् ।तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यंस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥३॥

iyaṃ svargadātrī punaḥ kalpavallī
manojāstu kāmān yathārthaṃ prakuryāt |
tathā te kṛtārthā bhavantīti nityaṃ
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||

अर्थ: यह देवी स्वर्ग देने वाली है और कल्पलता की तरह मन में उठी कामनाओं को सच्चे रूप में पूरा करती है, और इस तरह भक्त सदा कृतार्थ होते हैं। फिर भी तुम्हारे स्वरूप को देवता नहीं जान पाते।

स्वर्गदात्री
स्वर्ग देने वाली
कल्पवल्ली
इच्छा पूरी करने वाली कल्पलता
मनोजाः कामाः
मन में उठी कामनाएँ
यथार्थं
सच्चे रूप में
कृतार्थाः
सफल, संतुष्ट

सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्तालसत्पूतचित्ते सदाविर्भवत्ते ।जपध्यानपूजासुधाधौतपङ्कास्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥४॥

surāpānamattā subhaktānuraktā
lasatpūtacitte sadāvirbhavatte |
japadhyānapūjāsudhādhautapaṅkā
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||

अर्थ: तुम दिव्य रस के पान से मत्त, यानी आनंद में डूबी हो, अपने सच्चे भक्तों पर प्रेम रखती हो, उजले और पवित्र मन में सदा प्रकट होती हो, और जप, ध्यान और पूजा के अमृत से भक्तों का मैल धो देती हो। फिर भी तुम्हारे स्वरूप को देवता नहीं जान पाते।

सुरापानमत्ता
दिव्य रस के पान से मत्त, आनंद में डूबी
सुभक्तानुरक्ता
सच्चे भक्तों से प्रेम करने वाली
पूतचित्ते
पवित्र मन में
आविर्भवत्
प्रकट होता हुआ
सुधा
अमृत
धौतपङ्का
कीचड़ (मैल) धो देने वाली

चिदानन्दकन्दं हसन् मन्दमन्दंशरच्चन्द्रकोटिप्रभापुञ्जबिम्बम् ।मुनीनां कवीनां हृदि द्योतयन्तंस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥५॥

cidānandakandaṃ hasan mandamandaṃ
śaraccandrakoṭiprabhāpuñjabimbam |
munīnāṃ kavīnāṃ hṛdi dyotayantaṃ
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||

अर्थ: तुम्हारा स्वरूप चेतना और आनंद का मूल है, धीरे-धीरे मुस्कुराता है, शरद ऋतु के करोड़ों चन्द्रमाओं की प्रभा के पुंज जैसा है और मुनियों तथा कवियों के हृदय में प्रकाशित होता है; उस स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते।

चिदानन्दकन्दं
चेतना और आनंद का मूल
मन्दमन्दं
धीरे-धीरे
शरच्चन्द्रकोटि
शरद के करोड़ों चन्द्रमा
प्रभापुञ्ज
प्रकाश का समूह
द्योतयन्तं
प्रकाशित होता हुआ

महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्राकदाचिद् विचित्राकृतिर्योगमाया ।न बाला न वृद्धा न कामातुरापिस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥६॥

mahāmeghakālī suraktāpi śubhrā
kadācid vicitrākṛtiryogamāyā |
na bālā na vṛddhā na kāmāturāpi
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||

अर्थ: तुम कभी महामेघ जैसी काली, कभी लाल, कभी उजली और कभी विचित्र आकृति वाली योगमाया हो; न बालिका हो, न वृद्धा, न कामना से व्याकुल। तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते।

महामेघकाली
घने बादल जैसी काली
सुरक्ता
गहरे लाल रंग वाली
शुभ्रा
उजली, श्वेत
कदाचित्
कभी
विचित्राकृतिः
विचित्र आकृति वाली
योगमाया
भगवान की दिव्य शक्ति

क्षमस्वापराधं महागुप्तभावंमया लोकमध्ये प्रकाशीकृतं यत् ।तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात्स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥७॥

kṣamasvāparādhaṃ mahāguptabhāvaṃ
mayā lokamadhye prakāśīkṛtaṃ yat |
tava dhyānapūtena cāpalyabhāvāt
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||

अर्थ: हे माँ, तुम्हारे ध्यान से पवित्र हुए मन की चंचलता के कारण मैंने तुम्हारे अत्यंत गुप्त भाव को संसार के बीच प्रकट कर दिया; मेरे इस अपराध को क्षमा करो। तुम्हारे स्वरूप को तो देवता भी नहीं जान पाते।

क्षमस्व
क्षमा करो
महागुप्तभावं
अत्यंत गुप्त भाव
लोकमध्ये
संसार के बीच
प्रकाशीकृतं
प्रकट कर दिया
ध्यानपूतेन
ध्यान से पवित्र (मन) के कारण
चापल्यभावात्
चंचलता के कारण

यदि ध्यानयुक्तं पठेद् यो मनुष्यस्-तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च ।गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिःस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥८॥

yadi dhyānayuktaṃ paṭhed yo manuṣyas-
tadā sarvaloke viśālo bhavecca |
gṛhe cāṣṭasiddhirmṛte cāpi muktiḥ
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||

अर्थ: यह श्लोक कहता है: जो मनुष्य ध्यान के साथ इसका पाठ करता है, वह सब लोकों में बड़ा होता है, उसके घर में आठों सिद्धियाँ रहती हैं और मृत्यु के बाद उसे मुक्ति मिलती है। और अंत में फिर वही बात: तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते।

ध्यानयुक्तं
ध्यान के साथ
विशालः
बड़ा, प्रतिष्ठित
अष्टसिद्धिः
आठ सिद्धियाँ
मृते
मृत्यु होने पर
मुक्तिः
मोक्ष

॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीकालिकाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

|| iti śrīmacchaṅkarācāryaviracitaṃ śrīkālikāṣṭakaṃ sampūrṇam ||

अर्थ: इस प्रकार श्री शंकराचार्य द्वारा रचा श्री कालिकाष्टक पूरा हुआ।

परिचय

कालिकाष्टकम् माँ काली की स्तुति है, जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। पहले तीन श्लोक ध्यान के हैं, जिनमें श्मशान में विराजने वाली, मुण्डमाला पहने, उग्र रूप वाली काली का चित्र खींचा गया है। फिर आठ श्लोकों की स्तुति आती है।

स्तुति के हर श्लोक का अंत एक ही पंक्ति पर होता है: "स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः", यानी हे माँ, तुम्हारे असली स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते। बाहर से भयानक दिखने वाला रूप भीतर से चेतना और आनंद का स्रोत है, और अंत में भक्त अपनी चंचलता के लिए क्षमा माँगता है।

भावार्थ

ध्यान के तीन श्लोक माँ काली का वह रूप दिखाते हैं जिससे सामान्य मन डरता है: श्मशान, मुण्डमाला, खुले केश, शव का आसन। पर इसी रूप में उनके दाएँ हाथ वर और अभय की मुद्रा में हैं और मुख पर मुस्कान है। यानी जो रूप बाहर से भयानक है, वह भक्त के लिए निर्भयता देने वाला है।

स्तुति के आठ श्लोक बार-बार एक ही बात दोहराते हैं: तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जानते। ब्रह्मा आदि देवता उन्हीं की आराधना से बड़े बने; वे कभी काली, कभी लाल, कभी उजली दिखती हैं; न बालिका हैं न वृद्धा। वे चेतना और आनंद का मूल हैं जो मुनियों और कवियों के हृदय में चमकता है। जिसे कोई पूरा नहीं जान सकता, उसके सामने भक्त केवल नमन कर सकता है।

सातवें श्लोक में भक्त क्षमा माँगता है कि उसने ध्यान से उपजी भावना में देवी के गुप्त भाव को सबके सामने कह दिया। आठवाँ श्लोक फलश्रुति है, जो ध्यान के साथ पाठ करने का फल बताता है।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति (आठवाँ श्लोक) कहती है कि जो मनुष्य ध्यान के साथ इसका पाठ करे, वह सब लोकों में प्रतिष्ठा पाता है, उसके घर में आठों सिद्धियाँ रहती हैं और अंत में मुक्ति मिलती है। ये स्तोत्र के अपने शब्द हैं; यहाँ इन्हें स्तोत्र की बात के रूप में ही दिया गया है।

यदि ध्यानयुक्तं पठेद् यो मनुष्यस्-
तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च ।
गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिः
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥

यह श्लोक कहता है: जो मनुष्य ध्यान के साथ इसका पाठ करता है, वह सब लोकों में बड़ा होता है, उसके घर में आठों सिद्धियाँ रहती हैं और मृत्यु के बाद उसे मुक्ति मिलती है। और अंत में फिर वही बात: तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते।

यह अष्टकम् कब पढ़ा जाता है

  • माँ काली की पूजा में, विशेषकर अमावस्या की रात
  • दीपावली की रात होने वाली काली पूजा में
  • नवरात्रि में, विशेषकर सातवें दिन कालरात्रि की पूजा के समय
  • जब मन में भय या बेचैनी हो, माँ के स्मरण के लिए

पढ़ने की विधि

  • माँ काली के चित्र के सामने दीप जलाएँ और लाल फूल, विशेषकर गुड़हल, अर्पित करें।
  • पहले तीन ध्यान-श्लोक पढ़ते समय माँ के रूप का मन में चित्र बनाएँ; फिर आठ श्लोकों की स्तुति पढ़ें।
  • हर श्लोक के अंत की पंक्ति "स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः" पर थोड़ा रुककर नमन करें।
  • अंतिम श्लोक में ध्यान के साथ पाठ की बात कही गई है, इसलिए जल्दबाज़ी के बजाय शांत मन से पढ़ें।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
ध्यान 1महोघोररावाsanskritdocuments.org और drikpanchang.com पर यही छपा है; stotranidhi.com पर "महाघोररावा" है, जिसे शुद्ध रूप मानकर ऊपर रखा गया है।
स्तुति, श्लोक 1गुणांस्त्रीन्drikpanchang.com का पाठ; अर्थ वही है (तीनों गुणों को)।
स्तुति, श्लोक 3मनोजांस्तु कामान्drikpanchang.com का पाठ; अर्थ वही है।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
आदि शंकराचार्य (परंपरा के अनुसार)
भाषा
संस्कृत

पाठ की समापन-पंक्ति इसे श्रीमच्छङ्कराचार्य की रचना कहती है; यह परंपरा की मान्यता है। sanskritdocuments.org की टिप्पणी के अनुसार यह स्तोत्र कालीरहस्य नामक ग्रंथ में भी मिलता बताया जाता है, जिसकी पुष्टि हम नहीं कर सके।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): ध्यान के तीन और स्तुति के आठ श्लोक sanskritdocuments.org, stotranidhi.com और drikpanchang.com के पाठ से मिलाए गए। तीनों में श्लोकों का क्रम और शब्द लगभग एक जैसे हैं। तीन जगह sanskritdocuments.org और drikpanchang.com में छपाई की भूल दिखती है (महोघोर, बभूबुः, प्रकाशिकृतं); वहाँ stotranidhi.com का शुद्ध रूप (महाघोर, बभूवुः, प्रकाशीकृतं) रखा गया है।

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माँ काली के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कालिकाष्टकम् किसने रचा?

पाठ की समापन-पंक्ति इसे आदि शंकराचार्य की रचना कहती है, और परंपरा भी यही मानती है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण हमें नहीं मिला, इसलिए इसे परंपरा की मान्यता ही समझें।

अष्टकम् में ग्यारह श्लोक क्यों हैं?

पहले तीन श्लोक ध्यान के हैं, जिनमें देवी के रूप का वर्णन है। उसके बाद आठ श्लोकों की स्तुति है; इन्हीं आठ के कारण इसे अष्टक कहा जाता है।

"स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः" का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है: तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जानते। यह पंक्ति हर श्लोक के अंत में आती है और बताती है कि माँ काली का असली स्वरूप शब्दों और समझ से परे है।

क्या माँ काली का उग्र रूप डरने के लिए है?

स्तोत्र के ध्यान में ही उनके दाएँ हाथ वर और अभय की मुद्रा में हैं और मुख पर मुस्कान है। परंपरा में उग्र रूप बुराई और भय के नाश का प्रतीक है, भक्त को डराने का नहीं।

कालिकाष्टकम् कब पढ़ा जाता है?

अमावस्या, दीपावली की रात की काली पूजा और नवरात्रि में इसे विशेष रूप से पढ़ा जाता है। माँ काली के भक्त इसे रोज़ की पूजा में भी पढ़ते हैं।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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