लक्ष्मी पूजा विधि
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।

स्तोत्र · काली · अष्टकम्
माँ काली की स्तुति: तीन श्लोकों में उनके उग्र रूप का ध्यान और आठ श्लोकों में यह भाव कि उनके असली स्वरूप को देवता भी नहीं जानते। पाठ, अर्थ और शब्दार्थ।
ध्यानम्
गलद्रक्तमुण्डावलीकण्ठमालामहाघोररावा सुदंष्ट्रा कराला ।विवस्त्रा श्मशानालया मुक्तकेशीमहाकालकामाकुला कालिकेयम् ॥१॥
galadraktamuṇḍāvalīkaṇṭhamālā
mahāghorarāvā sudaṃṣṭrā karālā |
vivastrā śmaśānālayā muktakeśī
mahākālakāmākulā kālikeyam ||
अर्थ: जिनके गले में रक्त टपकते मुण्डों की माला है, जो बहुत भयानक गर्जना करती हैं, जिनके दाँत बड़े और रूप विकराल है, जो वस्त्रहीन हैं, श्मशान में रहती हैं, जिनके केश खुले हैं और जो महाकाल के प्रेम में मग्न हैं, वे ये माँ कालिका हैं।
भुजेवामयुग्मे शिरोऽसिं दधानावरं दक्षयुग्मेऽभयं वै तथैव ।सुमध्याऽपि तुङ्गस्तना भारनम्रालसद्रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या ॥२॥
bhujevāmayugme śiro’siṃ dadhānā
varaṃ dakṣayugme’bhayaṃ vai tathaiva |
sumadhyā’pi tuṅgastanā bhāranamrā
lasadraktasṛkkadvayā susmitāsyā ||
अर्थ: वे बाएँ दोनों हाथों में कटा सिर और तलवार लिए हैं और दाएँ दोनों हाथों में वर और अभय की मुद्रा। उनकी कमर पतली है, ऊँचे वक्ष के भार से वे कुछ झुकी हैं, उनके होठों के दोनों कोनों पर रक्त चमक रहा है और मुख पर मधुर मुस्कान है।
शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशीलसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककाञ्ची ।शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभिश्-चतुर्दिक्षुशब्दायमानाऽभिरेजे ॥३॥
śavadvandvakarṇāvataṃsā sukeśī
lasatpretapāṇiṃ prayuktaikakāñcī |
śavākāramañcādhirūḍhā śivābhiś-
caturdikṣuśabdāyamānā’bhireje ||
अर्थ: दो शव जिनके कानों के आभूषण हैं, जिनके केश सुंदर हैं, जिन्होंने प्रेतों के हाथों की करधनी पहनी है, जो शव जैसे आसन पर आरूढ़ हैं, वे देवी चारों दिशाओं में शब्द करती सियारिनों के बीच शोभित हैं।
॥ अथ स्तुतिः ॥
विरञ्च्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीन्समाराध्य कालीं प्रधाना बभूवुः ।अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिंस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥१॥
virañcyādidevāstrayaste guṇāstrīn
samārādhya kālīṃ pradhānā babhūvuḥ |
anādiṃ surādiṃ makhādiṃ bhavādiṃ
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||
अर्थ: ब्रह्मा आदि वे तीनों देवता तीनों गुणों वाली काली की आराधना करके ही प्रधान बने। हे माँ, तुम्हारा स्वरूप अनादि है, देवताओं का भी आदि, यज्ञ का आदि और संसार का आदि है; उस स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते।
जगन्मोहिनीयं तु वाग्वादिनीयंसुहृत्पोषिणीशत्रुसंहारणीयम् ।वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयंस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥२॥
jaganmohinīyaṃ tu vāgvādinīyaṃ
suhṛtpoṣiṇīśatrusaṃhāraṇīyam |
vacastambhanīyaṃ kimuccāṭanīyaṃ
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||
अर्थ: यह देवी जगत को मोहित करने वाली है, वाणी को बोलने की शक्ति देने वाली है, मित्रों का पोषण और शत्रुओं का संहार करने वाली है, वाणी को रोक देने वाली और दूर भगा देने वाली भी है। फिर भी तुम्हारे असली स्वरूप को देवता नहीं जान पाते।
इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्लीमनोजास्तु कामान् यथार्थं प्रकुर्यात् ।तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यंस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥३॥
iyaṃ svargadātrī punaḥ kalpavallī
manojāstu kāmān yathārthaṃ prakuryāt |
tathā te kṛtārthā bhavantīti nityaṃ
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||
अर्थ: यह देवी स्वर्ग देने वाली है और कल्पलता की तरह मन में उठी कामनाओं को सच्चे रूप में पूरा करती है, और इस तरह भक्त सदा कृतार्थ होते हैं। फिर भी तुम्हारे स्वरूप को देवता नहीं जान पाते।
सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्तालसत्पूतचित्ते सदाविर्भवत्ते ।जपध्यानपूजासुधाधौतपङ्कास्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥४॥
surāpānamattā subhaktānuraktā
lasatpūtacitte sadāvirbhavatte |
japadhyānapūjāsudhādhautapaṅkā
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||
अर्थ: तुम दिव्य रस के पान से मत्त, यानी आनंद में डूबी हो, अपने सच्चे भक्तों पर प्रेम रखती हो, उजले और पवित्र मन में सदा प्रकट होती हो, और जप, ध्यान और पूजा के अमृत से भक्तों का मैल धो देती हो। फिर भी तुम्हारे स्वरूप को देवता नहीं जान पाते।
चिदानन्दकन्दं हसन् मन्दमन्दंशरच्चन्द्रकोटिप्रभापुञ्जबिम्बम् ।मुनीनां कवीनां हृदि द्योतयन्तंस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥५॥
cidānandakandaṃ hasan mandamandaṃ
śaraccandrakoṭiprabhāpuñjabimbam |
munīnāṃ kavīnāṃ hṛdi dyotayantaṃ
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||
अर्थ: तुम्हारा स्वरूप चेतना और आनंद का मूल है, धीरे-धीरे मुस्कुराता है, शरद ऋतु के करोड़ों चन्द्रमाओं की प्रभा के पुंज जैसा है और मुनियों तथा कवियों के हृदय में प्रकाशित होता है; उस स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते।
महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्राकदाचिद् विचित्राकृतिर्योगमाया ।न बाला न वृद्धा न कामातुरापिस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥६॥
mahāmeghakālī suraktāpi śubhrā
kadācid vicitrākṛtiryogamāyā |
na bālā na vṛddhā na kāmāturāpi
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||
अर्थ: तुम कभी महामेघ जैसी काली, कभी लाल, कभी उजली और कभी विचित्र आकृति वाली योगमाया हो; न बालिका हो, न वृद्धा, न कामना से व्याकुल। तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते।
क्षमस्वापराधं महागुप्तभावंमया लोकमध्ये प्रकाशीकृतं यत् ।तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात्स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥७॥
kṣamasvāparādhaṃ mahāguptabhāvaṃ
mayā lokamadhye prakāśīkṛtaṃ yat |
tava dhyānapūtena cāpalyabhāvāt
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||
अर्थ: हे माँ, तुम्हारे ध्यान से पवित्र हुए मन की चंचलता के कारण मैंने तुम्हारे अत्यंत गुप्त भाव को संसार के बीच प्रकट कर दिया; मेरे इस अपराध को क्षमा करो। तुम्हारे स्वरूप को तो देवता भी नहीं जान पाते।
यदि ध्यानयुक्तं पठेद् यो मनुष्यस्-तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च ।गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिःस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥८॥
yadi dhyānayuktaṃ paṭhed yo manuṣyas-
tadā sarvaloke viśālo bhavecca |
gṛhe cāṣṭasiddhirmṛte cāpi muktiḥ
svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ ||
अर्थ: यह श्लोक कहता है: जो मनुष्य ध्यान के साथ इसका पाठ करता है, वह सब लोकों में बड़ा होता है, उसके घर में आठों सिद्धियाँ रहती हैं और मृत्यु के बाद उसे मुक्ति मिलती है। और अंत में फिर वही बात: तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते।
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीकालिकाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
|| iti śrīmacchaṅkarācāryaviracitaṃ śrīkālikāṣṭakaṃ sampūrṇam ||
अर्थ: इस प्रकार श्री शंकराचार्य द्वारा रचा श्री कालिकाष्टक पूरा हुआ।
कालिकाष्टकम् माँ काली की स्तुति है, जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। पहले तीन श्लोक ध्यान के हैं, जिनमें श्मशान में विराजने वाली, मुण्डमाला पहने, उग्र रूप वाली काली का चित्र खींचा गया है। फिर आठ श्लोकों की स्तुति आती है।
स्तुति के हर श्लोक का अंत एक ही पंक्ति पर होता है: "स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः", यानी हे माँ, तुम्हारे असली स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते। बाहर से भयानक दिखने वाला रूप भीतर से चेतना और आनंद का स्रोत है, और अंत में भक्त अपनी चंचलता के लिए क्षमा माँगता है।
ध्यान के तीन श्लोक माँ काली का वह रूप दिखाते हैं जिससे सामान्य मन डरता है: श्मशान, मुण्डमाला, खुले केश, शव का आसन। पर इसी रूप में उनके दाएँ हाथ वर और अभय की मुद्रा में हैं और मुख पर मुस्कान है। यानी जो रूप बाहर से भयानक है, वह भक्त के लिए निर्भयता देने वाला है।
स्तुति के आठ श्लोक बार-बार एक ही बात दोहराते हैं: तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जानते। ब्रह्मा आदि देवता उन्हीं की आराधना से बड़े बने; वे कभी काली, कभी लाल, कभी उजली दिखती हैं; न बालिका हैं न वृद्धा। वे चेतना और आनंद का मूल हैं जो मुनियों और कवियों के हृदय में चमकता है। जिसे कोई पूरा नहीं जान सकता, उसके सामने भक्त केवल नमन कर सकता है।
सातवें श्लोक में भक्त क्षमा माँगता है कि उसने ध्यान से उपजी भावना में देवी के गुप्त भाव को सबके सामने कह दिया। आठवाँ श्लोक फलश्रुति है, जो ध्यान के साथ पाठ करने का फल बताता है।
इस स्तोत्र की फलश्रुति (आठवाँ श्लोक) कहती है कि जो मनुष्य ध्यान के साथ इसका पाठ करे, वह सब लोकों में प्रतिष्ठा पाता है, उसके घर में आठों सिद्धियाँ रहती हैं और अंत में मुक्ति मिलती है। ये स्तोत्र के अपने शब्द हैं; यहाँ इन्हें स्तोत्र की बात के रूप में ही दिया गया है।
यदि ध्यानयुक्तं पठेद् यो मनुष्यस्-
तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च ।
गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिः
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥यह श्लोक कहता है: जो मनुष्य ध्यान के साथ इसका पाठ करता है, वह सब लोकों में बड़ा होता है, उसके घर में आठों सिद्धियाँ रहती हैं और मृत्यु के बाद उसे मुक्ति मिलती है। और अंत में फिर वही बात: तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जान पाते।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| ध्यान 1 | महोघोररावा | sanskritdocuments.org और drikpanchang.com पर यही छपा है; stotranidhi.com पर "महाघोररावा" है, जिसे शुद्ध रूप मानकर ऊपर रखा गया है। |
| स्तुति, श्लोक 1 | गुणांस्त्रीन् | drikpanchang.com का पाठ; अर्थ वही है (तीनों गुणों को)। |
| स्तुति, श्लोक 3 | मनोजांस्तु कामान् | drikpanchang.com का पाठ; अर्थ वही है। |
पाठ की समापन-पंक्ति इसे श्रीमच्छङ्कराचार्य की रचना कहती है; यह परंपरा की मान्यता है। sanskritdocuments.org की टिप्पणी के अनुसार यह स्तोत्र कालीरहस्य नामक ग्रंथ में भी मिलता बताया जाता है, जिसकी पुष्टि हम नहीं कर सके।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): ध्यान के तीन और स्तुति के आठ श्लोक sanskritdocuments.org, stotranidhi.com और drikpanchang.com के पाठ से मिलाए गए। तीनों में श्लोकों का क्रम और शब्द लगभग एक जैसे हैं। तीन जगह sanskritdocuments.org और drikpanchang.com में छपाई की भूल दिखती है (महोघोर, बभूबुः, प्रकाशिकृतं); वहाँ stotranidhi.com का शुद्ध रूप (महाघोर, बभूवुः, प्रकाशीकृतं) रखा गया है।
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ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता
पाठ की समापन-पंक्ति इसे आदि शंकराचार्य की रचना कहती है, और परंपरा भी यही मानती है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण हमें नहीं मिला, इसलिए इसे परंपरा की मान्यता ही समझें।
पहले तीन श्लोक ध्यान के हैं, जिनमें देवी के रूप का वर्णन है। उसके बाद आठ श्लोकों की स्तुति है; इन्हीं आठ के कारण इसे अष्टक कहा जाता है।
इसका अर्थ है: तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जानते। यह पंक्ति हर श्लोक के अंत में आती है और बताती है कि माँ काली का असली स्वरूप शब्दों और समझ से परे है।
स्तोत्र के ध्यान में ही उनके दाएँ हाथ वर और अभय की मुद्रा में हैं और मुख पर मुस्कान है। परंपरा में उग्र रूप बुराई और भय के नाश का प्रतीक है, भक्त को डराने का नहीं।
अमावस्या, दीपावली की रात की काली पूजा और नवरात्रि में इसे विशेष रूप से पढ़ा जाता है। माँ काली के भक्त इसे रोज़ की पूजा में भी पढ़ते हैं।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।