संतोषी माता

आरती · संतोषी माता

जय सन्तोषी माता

शुक्रवार व्रत में गाई जाने वाली संतोषी माता की आरती 'जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता': पूरा पाठ, सरल अर्थ और पाठांतर।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. फलश्रुति
  7. कब पढ़ें
  8. विधि
  9. पाठ-भेद
  10. रचयिता और स्रोत
  11. ये भी पढ़ें
  12. सवाल-जवाब
  13. सुधार सुझाएँ

जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता।अपने सेवक जन को, सुख सम्पत्ति दाता॥

अर्थ: हे संतोषी माता, आपकी जय हो। आप अपने सेवकों को सुख और सम्पत्ति देने वाली हैं।

सुन्दर चीर सुनहरी माँ धारण कीन्हों।हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार कीन्हों॥

॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥

अर्थ: माँ ने सुन्दर सुनहरा वस्त्र धारण किया है। हीरे और पन्ने चमक रहे हैं; माँ ने तन पर शृंगार किया है।

गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे।मन्द हंसत करुणामयी, त्रिभुवन मन मोहे॥

॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥

अर्थ: गेरू जैसी लाल आभा वाली छवि है और कमल जैसा मुख शोभा दे रहा है। करुणा से भरी माँ मंद-मंद मुस्कुराती हैं और तीनों लोकों का मन मोह लेती हैं।

स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरें प्यारे।धूप दीप मधुमेवा, भोग धरें न्यारे॥

॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥

अर्थ: माँ सोने के सिंहासन पर बैठी हैं और सुन्दर चँवर डुलाए जा रहे हैं। धूप, दीप, शहद और मेवे के साथ तरह-तरह के भोग रखे गए हैं।

गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामे संतोष कियो।सन्तोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥

॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥

अर्थ: गुड़ और चना माँ को अत्यन्त प्रिय हैं; उन्हीं में माँ ने संतोष किया। इसी से वे 'संतोषी' कहलाईं, और उन्होंने भक्तों को वैभव दिया।

शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही।भक्त मण्डली छाई, कथा सुनत मोही॥

॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥

अर्थ: माँ शुक्रवार को प्रिय मानती हैं, और आज वही दिन है। भक्तों की मंडली जुटी है और माँ की कथा सुनकर मुग्ध हो रही है।

मन्दिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई।विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई॥

॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥

अर्थ: मंदिर में ज्योति जगमगा रही है और मंगल-ध्वनि गूँज रही है। हम आपके बालक आपके चरणों में सिर झुकाकर विनती करते हैं।

भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै।जो मन बसै हमारे, इच्छा फल दीजै॥

॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥

अर्थ: भक्ति-भाव से की गई यह पूजा स्वीकार कीजिए। हमारे मन में जो इच्छा बसी है, उसका फल दीजिए।

दुखी दरिद्री रोगी, संकट मुक्त किये।बहु धन-धान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिये॥

॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥

अर्थ: आरती कहती है कि माँ ने दुखियों, दरिद्रों और रोगियों को संकट से छुड़ाया, घरों को धन-धान्य से भरा और सुख-सौभाग्य दिया।

ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो।पूजा कथा श्रवण कर, घर आनन्द आयो॥

॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥

अर्थ: आरती कहती है कि जिसने माँ का ध्यान किया, उसने मनचाहा फल पाया, और पूजा करके और कथा सुनकर उसके घर आनंद आया।

शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदम्बे।संकट तू ही निवारे, दयामयी अम्बे॥

॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥

अर्थ: हे जगदम्बे, जिसने आपकी शरण ली है, उसकी लाज रखिए। हे दयामयी अम्बे, संकट आप ही दूर करती हैं।

सन्तोषी माता की आरती, जो कोई जन गावे।ऋद्धि-सिद्धि, सुख-सम्पत्ति, जी भरकर पावे॥

॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥

अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई संतोषी माता की आरती गाता है, वह ऋद्धि-सिद्धि और सुख-सम्पत्ति भरपूर पाता है।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

'जय सन्तोषी माता' संतोषी माँ की आरती है, जो शुक्रवार के व्रत की कथा के बाद गाई जाती है। आरती स्वयं कहती है कि माता को शुक्रवार प्रिय है और गुड़-चना उनका प्रिय भोग है, और इसी गुड़-चने में संतोष करने के कारण वे 'संतोषी' कहलाईं।

आरती में माता के सुनहरे वस्त्र, हीरे-पन्ने के शृंगार, सोने के सिंहासन और मंदिर में कथा सुनती भक्त-मंडली का वर्णन है, और अंत में शरण में आए भक्त की लाज रखने की प्रार्थना है।

अंतरा-वार अर्थ

  1. मुखड़ा जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता…

    हे संतोषी माता, आपकी जय हो। आप अपने सेवकों को सुख और सम्पत्ति देने वाली हैं।

  2. अंतरा १ सुन्दर चीर सुनहरी माँ धारण कीन्हों…

    माँ ने सुन्दर सुनहरा वस्त्र धारण किया है। हीरे और पन्ने चमक रहे हैं; माँ ने तन पर शृंगार किया है।

  3. अंतरा २ गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे…

    गेरू जैसी लाल आभा वाली छवि है और कमल जैसा मुख शोभा दे रहा है। करुणा से भरी माँ मंद-मंद मुस्कुराती हैं और तीनों लोकों का मन मोह लेती हैं।

  4. अंतरा ३ स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरें प्यारे…

    माँ सोने के सिंहासन पर बैठी हैं और सुन्दर चँवर डुलाए जा रहे हैं। धूप, दीप, शहद और मेवे के साथ तरह-तरह के भोग रखे गए हैं।

  5. अंतरा ४ गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामे संतोष कियो…

    गुड़ और चना माँ को अत्यन्त प्रिय हैं; उन्हीं में माँ ने संतोष किया। इसी से वे 'संतोषी' कहलाईं, और उन्होंने भक्तों को वैभव दिया।

  6. अंतरा ५ शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही…

    माँ शुक्रवार को प्रिय मानती हैं, और आज वही दिन है। भक्तों की मंडली जुटी है और माँ की कथा सुनकर मुग्ध हो रही है।

  7. अंतरा ६ मन्दिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई…

    मंदिर में ज्योति जगमगा रही है और मंगल-ध्वनि गूँज रही है। हम आपके बालक आपके चरणों में सिर झुकाकर विनती करते हैं।

  8. अंतरा ७ भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै…

    भक्ति-भाव से की गई यह पूजा स्वीकार कीजिए। हमारे मन में जो इच्छा बसी है, उसका फल दीजिए।

  9. अंतरा ८ दुखी दरिद्री रोगी, संकट मुक्त किये…

    आरती कहती है कि माँ ने दुखियों, दरिद्रों और रोगियों को संकट से छुड़ाया, घरों को धन-धान्य से भरा और सुख-सौभाग्य दिया।

  10. अंतरा ९ ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो…

    आरती कहती है कि जिसने माँ का ध्यान किया, उसने मनचाहा फल पाया, और पूजा करके और कथा सुनकर उसके घर आनंद आया।

  11. अंतरा १० शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदम्बे…

    हे जगदम्बे, जिसने आपकी शरण ली है, उसकी लाज रखिए। हे दयामयी अम्बे, संकट आप ही दूर करती हैं।

  12. अंतरा ११ सन्तोषी माता की आरती, जो कोई जन गावे…

    आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई संतोषी माता की आरती गाता है, वह ऋद्धि-सिद्धि और सुख-सम्पत्ति भरपूर पाता है।

भावार्थ

यह आरती संतोषी माता की पूजा का पूरा दृश्य सामने रखती है: सुनहरे वस्त्र और हीरे-पन्ने से सजी माँ, सोने का सिंहासन, धूप-दीप और भोग, शुक्रवार के दिन जुटी भक्त-मंडली और जगमगाता मंदिर। माँ के नाम का अर्थ भी आरती में खुलता है: सादे गुड़-चने में संतोष करने वाली माँ 'संतोषी' कहलाईं।

आरती का दूसरा भाग प्रार्थना है: भक्ति से की गई पूजा स्वीकार हो, मन की इच्छा पूरी हो, और जिसने शरण ली है उसकी लाज रहे। आरती माँ को दुखियों, दरिद्रों और रोगियों का संकट हरने वाली दयामयी अम्बा कहती है।

कठिन शब्दों के अर्थ

सेवक जन
भक्त, सेवा करने वाले
चीर
वस्त्र
दमके
चमकते हैं
छटा
आभा, शोभा
बदन
मुख
मन्द हंसत
धीरे-धीरे मुस्कुराती
त्रिभुवन
तीनों लोक
चंवर
पूजा में डुलाया जाने वाला पंखा
मधुमेवा
शहद और मेवे
न्यारे
अनोखे, तरह-तरह के
अरु
और
तामे
उसमें
वैभव
धन-सम्पदा
सोही
वही
मोही
मुग्ध
चरनन
चरणों में
अंगीकृत
स्वीकार
धन-धान्य
धन और अनाज
गहे
पकड़ी, ली
लज्जा
लाज, मान
निवारे
दूर करती है
ऋद्धि-सिद्धि
समृद्धि और सफलता

फलश्रुति

अंतिम अंतरा कहता है कि संतोषी माता की आरती गाने वाला ऋद्धि-सिद्धि और सुख-सम्पत्ति पाता है। ये आरती के अपने शब्द हैं, जिनमें भक्त का भरोसा बोलता है, कोई निश्चित वादा नहीं। माँ का नाम ही संतोष सिखाता है: जो मिला है, उसमें संतुष्ट रहकर भक्ति करना।

सन्तोषी माता की आरती, जो कोई जन गावे।
ऋद्धि-सिद्धि, सुख-सम्पत्ति, जी भरकर पावे॥

आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई संतोषी माता की आरती गाता है, वह ऋद्धि-सिद्धि और सुख-सम्पत्ति भरपूर पाता है।

यह आरती कब गाई जाती है

  • शुक्रवार के व्रत में, संतोषी माता की व्रत-कथा के बाद
  • सोलह शुक्रवार के व्रत के उद्यापन पर
  • रोज़ की पूजा में, विशेष रूप से शुक्रवार को

आरती कैसे करें

  • शुक्रवार को माता के चित्र के सामने दीपक जलाएँ, गुड़ और भुने चने का भोग रखें और व्रत-कथा सुनने या पढ़ने के बाद आरती गाएँ।
  • टेक 'जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता' से शुरू करें और हर अंतरे के बाद यही पंक्ति दोहराएँ।
  • आरती के बाद गुड़-चने का प्रसाद बाँटें। व्रत की परंपरा में उस दिन खट्टी चीज़ें न खाने का नियम माना जाता है।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
टेकअपने सेवक जन की, सुख सम्पति दाताsanskritdocuments.org और भक्ति भारत के पाठ में; द्रिक पंचांग और भारतकोश में 'जन को'
अंतरा 1तन श्रृंगार लीन्होभक्ति भारत और भारतकोश में
अंतरा 2त्रिभुवन जन मोहेभक्ति भारत और भारतकोश में
अंतरा 3धूप दीप मधु मेवा, भोज धरे न्यारेsanskritdocuments.org और भक्ति भारत में
अंतरा 6विनय करें हम सेवकsanskritdocuments.org और भक्ति भारत में
अंतरा 7जो मन बसे हमारे, इच्छित फल दीजैsanskritdocuments.org और भक्ति भारत में
अंतरा 9ध्यान धरे जो तेरा, वांछित फल पायोsanskritdocuments.org और भक्ति भारत में
अंतरा 10चरण गहे की लज्जा, रखियो जगदम्बेsanskritdocuments.org और भक्ति भारत में

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
भाषा
हिन्दी

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति चार पाठों से मिलाई गई: द्रिक पंचांग, sanskritdocuments.org (हिंदी आरती संग्रह), भारतकोश (bharatdiscovery.org) और भक्ति भारत। चारों में टेक, ग्यारह अंतरे और उनका क्रम एक है; शब्दों के छोटे अंतर दो धाराओं में बँटते हैं: द्रिक पंचांग और भारतकोश एक ओर, sanskritdocuments.org और भक्ति भारत दूसरी ओर। आधार द्रिक पंचांग का पाठ है; जहाँ वह बाकी तीनों से अकेला अलग था (आठवें अंतरे में 'रोग' बनाम 'रोगी'), वहाँ बहुमत का पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया। दूसरी धारा के अंतर पाठांतर में हैं। sanskritdocuments.org का पाठ गाने के ढंग से लिखा है (हर अंतरे की पहली पंक्ति का अंश 'मैया ...' के साथ दोहराया गया है); वे दोहराव यहाँ नहीं लिखे गए। रचयिता अज्ञात।

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संतोषी माता के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

संतोषी माता की आरती कब गाई जाती है?

मुख्य रूप से शुक्रवार के व्रत में, संतोषी माता की व्रत-कथा पढ़ने या सुनने के बाद। आरती में भी कहा गया है कि माता को शुक्रवार प्रिय है।

माता को गुड़ और चना ही क्यों चढ़ाते हैं?

आरती कहती है कि गुड़ और चना माता को अत्यन्त प्रिय हैं और उन्हीं में संतोष करने से वे 'संतोषी' कहलाईं। इसलिए व्रत में गुड़-चने के भोग और प्रसाद की परंपरा है।

क्या व्रत के दिन खट्टा खाना मना है?

संतोषी माता के व्रत की प्रचलित परंपरा में उस दिन खट्टी चीज़ें न खाने और न बाँटने का नियम माना जाता है। यह नियम व्रत-कथा की परंपरा से आता है; आरती के पाठ में इसका उल्लेख नहीं है।

आरती के कुछ शब्द अलग-अलग किताबों में अलग क्यों मिलते हैं?

यह आरती लोक-परंपरा में गाई जाती रही है, इसलिए 'जन को / जन की', 'बालक / सेवक' जैसे छोटे अंतर मिलते हैं। यहाँ द्रिक पंचांग और भारतकोश का पाठ लिया गया है और दूसरे पाठ पाठांतर में दिए गए हैं।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

स्रोतों में रचयिता का नाम नहीं मिलता और आरती में किसी कवि की छाप भी नहीं है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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