संतोषी माता चालीसा
संतोषी माता · चालीसा
बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार

आरती · संतोषी माता
शुक्रवार व्रत में गाई जाने वाली संतोषी माता की आरती 'जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता': पूरा पाठ, सरल अर्थ और पाठांतर।
जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता।अपने सेवक जन को, सुख सम्पत्ति दाता॥
अर्थ: हे संतोषी माता, आपकी जय हो। आप अपने सेवकों को सुख और सम्पत्ति देने वाली हैं।
सुन्दर चीर सुनहरी माँ धारण कीन्हों।हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार कीन्हों॥
॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥
अर्थ: माँ ने सुन्दर सुनहरा वस्त्र धारण किया है। हीरे और पन्ने चमक रहे हैं; माँ ने तन पर शृंगार किया है।
गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे।मन्द हंसत करुणामयी, त्रिभुवन मन मोहे॥
॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥
अर्थ: गेरू जैसी लाल आभा वाली छवि है और कमल जैसा मुख शोभा दे रहा है। करुणा से भरी माँ मंद-मंद मुस्कुराती हैं और तीनों लोकों का मन मोह लेती हैं।
स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरें प्यारे।धूप दीप मधुमेवा, भोग धरें न्यारे॥
॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥
अर्थ: माँ सोने के सिंहासन पर बैठी हैं और सुन्दर चँवर डुलाए जा रहे हैं। धूप, दीप, शहद और मेवे के साथ तरह-तरह के भोग रखे गए हैं।
गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामे संतोष कियो।सन्तोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥
॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥
अर्थ: गुड़ और चना माँ को अत्यन्त प्रिय हैं; उन्हीं में माँ ने संतोष किया। इसी से वे 'संतोषी' कहलाईं, और उन्होंने भक्तों को वैभव दिया।
शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही।भक्त मण्डली छाई, कथा सुनत मोही॥
॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥
अर्थ: माँ शुक्रवार को प्रिय मानती हैं, और आज वही दिन है। भक्तों की मंडली जुटी है और माँ की कथा सुनकर मुग्ध हो रही है।
मन्दिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई।विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई॥
॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥
अर्थ: मंदिर में ज्योति जगमगा रही है और मंगल-ध्वनि गूँज रही है। हम आपके बालक आपके चरणों में सिर झुकाकर विनती करते हैं।
भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै।जो मन बसै हमारे, इच्छा फल दीजै॥
॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥
अर्थ: भक्ति-भाव से की गई यह पूजा स्वीकार कीजिए। हमारे मन में जो इच्छा बसी है, उसका फल दीजिए।
दुखी दरिद्री रोगी, संकट मुक्त किये।बहु धन-धान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिये॥
॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥
अर्थ: आरती कहती है कि माँ ने दुखियों, दरिद्रों और रोगियों को संकट से छुड़ाया, घरों को धन-धान्य से भरा और सुख-सौभाग्य दिया।
ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो।पूजा कथा श्रवण कर, घर आनन्द आयो॥
॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥
अर्थ: आरती कहती है कि जिसने माँ का ध्यान किया, उसने मनचाहा फल पाया, और पूजा करके और कथा सुनकर उसके घर आनंद आया।
शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदम्बे।संकट तू ही निवारे, दयामयी अम्बे॥
॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥
अर्थ: हे जगदम्बे, जिसने आपकी शरण ली है, उसकी लाज रखिए। हे दयामयी अम्बे, संकट आप ही दूर करती हैं।
सन्तोषी माता की आरती, जो कोई जन गावे।ऋद्धि-सिद्धि, सुख-सम्पत्ति, जी भरकर पावे॥
॥ जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता ॥
अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई संतोषी माता की आरती गाता है, वह ऋद्धि-सिद्धि और सुख-सम्पत्ति भरपूर पाता है।
हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।
'जय सन्तोषी माता' संतोषी माँ की आरती है, जो शुक्रवार के व्रत की कथा के बाद गाई जाती है। आरती स्वयं कहती है कि माता को शुक्रवार प्रिय है और गुड़-चना उनका प्रिय भोग है, और इसी गुड़-चने में संतोष करने के कारण वे 'संतोषी' कहलाईं।
आरती में माता के सुनहरे वस्त्र, हीरे-पन्ने के शृंगार, सोने के सिंहासन और मंदिर में कथा सुनती भक्त-मंडली का वर्णन है, और अंत में शरण में आए भक्त की लाज रखने की प्रार्थना है।
हे संतोषी माता, आपकी जय हो। आप अपने सेवकों को सुख और सम्पत्ति देने वाली हैं।
माँ ने सुन्दर सुनहरा वस्त्र धारण किया है। हीरे और पन्ने चमक रहे हैं; माँ ने तन पर शृंगार किया है।
गेरू जैसी लाल आभा वाली छवि है और कमल जैसा मुख शोभा दे रहा है। करुणा से भरी माँ मंद-मंद मुस्कुराती हैं और तीनों लोकों का मन मोह लेती हैं।
माँ सोने के सिंहासन पर बैठी हैं और सुन्दर चँवर डुलाए जा रहे हैं। धूप, दीप, शहद और मेवे के साथ तरह-तरह के भोग रखे गए हैं।
गुड़ और चना माँ को अत्यन्त प्रिय हैं; उन्हीं में माँ ने संतोष किया। इसी से वे 'संतोषी' कहलाईं, और उन्होंने भक्तों को वैभव दिया।
माँ शुक्रवार को प्रिय मानती हैं, और आज वही दिन है। भक्तों की मंडली जुटी है और माँ की कथा सुनकर मुग्ध हो रही है।
मंदिर में ज्योति जगमगा रही है और मंगल-ध्वनि गूँज रही है। हम आपके बालक आपके चरणों में सिर झुकाकर विनती करते हैं।
भक्ति-भाव से की गई यह पूजा स्वीकार कीजिए। हमारे मन में जो इच्छा बसी है, उसका फल दीजिए।
आरती कहती है कि माँ ने दुखियों, दरिद्रों और रोगियों को संकट से छुड़ाया, घरों को धन-धान्य से भरा और सुख-सौभाग्य दिया।
आरती कहती है कि जिसने माँ का ध्यान किया, उसने मनचाहा फल पाया, और पूजा करके और कथा सुनकर उसके घर आनंद आया।
हे जगदम्बे, जिसने आपकी शरण ली है, उसकी लाज रखिए। हे दयामयी अम्बे, संकट आप ही दूर करती हैं।
आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई संतोषी माता की आरती गाता है, वह ऋद्धि-सिद्धि और सुख-सम्पत्ति भरपूर पाता है।
यह आरती संतोषी माता की पूजा का पूरा दृश्य सामने रखती है: सुनहरे वस्त्र और हीरे-पन्ने से सजी माँ, सोने का सिंहासन, धूप-दीप और भोग, शुक्रवार के दिन जुटी भक्त-मंडली और जगमगाता मंदिर। माँ के नाम का अर्थ भी आरती में खुलता है: सादे गुड़-चने में संतोष करने वाली माँ 'संतोषी' कहलाईं।
आरती का दूसरा भाग प्रार्थना है: भक्ति से की गई पूजा स्वीकार हो, मन की इच्छा पूरी हो, और जिसने शरण ली है उसकी लाज रहे। आरती माँ को दुखियों, दरिद्रों और रोगियों का संकट हरने वाली दयामयी अम्बा कहती है।
अंतिम अंतरा कहता है कि संतोषी माता की आरती गाने वाला ऋद्धि-सिद्धि और सुख-सम्पत्ति पाता है। ये आरती के अपने शब्द हैं, जिनमें भक्त का भरोसा बोलता है, कोई निश्चित वादा नहीं। माँ का नाम ही संतोष सिखाता है: जो मिला है, उसमें संतुष्ट रहकर भक्ति करना।
सन्तोषी माता की आरती, जो कोई जन गावे।
ऋद्धि-सिद्धि, सुख-सम्पत्ति, जी भरकर पावे॥आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई संतोषी माता की आरती गाता है, वह ऋद्धि-सिद्धि और सुख-सम्पत्ति भरपूर पाता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| टेक | अपने सेवक जन की, सुख सम्पति दाता | sanskritdocuments.org और भक्ति भारत के पाठ में; द्रिक पंचांग और भारतकोश में 'जन को' |
| अंतरा 1 | तन श्रृंगार लीन्हो | भक्ति भारत और भारतकोश में |
| अंतरा 2 | त्रिभुवन जन मोहे | भक्ति भारत और भारतकोश में |
| अंतरा 3 | धूप दीप मधु मेवा, भोज धरे न्यारे | sanskritdocuments.org और भक्ति भारत में |
| अंतरा 6 | विनय करें हम सेवक | sanskritdocuments.org और भक्ति भारत में |
| अंतरा 7 | जो मन बसे हमारे, इच्छित फल दीजै | sanskritdocuments.org और भक्ति भारत में |
| अंतरा 9 | ध्यान धरे जो तेरा, वांछित फल पायो | sanskritdocuments.org और भक्ति भारत में |
| अंतरा 10 | चरण गहे की लज्जा, रखियो जगदम्बे | sanskritdocuments.org और भक्ति भारत में |
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति चार पाठों से मिलाई गई: द्रिक पंचांग, sanskritdocuments.org (हिंदी आरती संग्रह), भारतकोश (bharatdiscovery.org) और भक्ति भारत। चारों में टेक, ग्यारह अंतरे और उनका क्रम एक है; शब्दों के छोटे अंतर दो धाराओं में बँटते हैं: द्रिक पंचांग और भारतकोश एक ओर, sanskritdocuments.org और भक्ति भारत दूसरी ओर। आधार द्रिक पंचांग का पाठ है; जहाँ वह बाकी तीनों से अकेला अलग था (आठवें अंतरे में 'रोग' बनाम 'रोगी'), वहाँ बहुमत का पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया। दूसरी धारा के अंतर पाठांतर में हैं। sanskritdocuments.org का पाठ गाने के ढंग से लिखा है (हर अंतरे की पहली पंक्ति का अंश 'मैया ...' के साथ दोहराया गया है); वे दोहराव यहाँ नहीं लिखे गए। रचयिता अज्ञात।
संतोषी माता · चालीसा
बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।
दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।
लक्ष्मी · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
दीपावली की शाम घर में लक्ष्मी-गणेश पूजा: सफ़ाई, प्रदोष काल का समय, चौकी सजाना, गणेश पूजन, लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका, बही-खाता, तिजोरी और आरती।
सरस्वती · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
वसंत पंचमी पर घर में माँ सरस्वती की पूजा: पीले फूल, किताबें और वाद्य माँ के सामने, बच्चों का विद्यारंभ, मंत्र, आरती और प्रसाद, सरल विकल्पों के साथ।
दुर्गा · चालीसा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी
मुख्य रूप से शुक्रवार के व्रत में, संतोषी माता की व्रत-कथा पढ़ने या सुनने के बाद। आरती में भी कहा गया है कि माता को शुक्रवार प्रिय है।
आरती कहती है कि गुड़ और चना माता को अत्यन्त प्रिय हैं और उन्हीं में संतोष करने से वे 'संतोषी' कहलाईं। इसलिए व्रत में गुड़-चने के भोग और प्रसाद की परंपरा है।
संतोषी माता के व्रत की प्रचलित परंपरा में उस दिन खट्टी चीज़ें न खाने और न बाँटने का नियम माना जाता है। यह नियम व्रत-कथा की परंपरा से आता है; आरती के पाठ में इसका उल्लेख नहीं है।
यह आरती लोक-परंपरा में गाई जाती रही है, इसलिए 'जन को / जन की', 'बालक / सेवक' जैसे छोटे अंतर मिलते हैं। यहाँ द्रिक पंचांग और भारतकोश का पाठ लिया गया है और दूसरे पाठ पाठांतर में दिए गए हैं।
स्रोतों में रचयिता का नाम नहीं मिलता और आरती में किसी कवि की छाप भी नहीं है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।