जय सन्तोषी माता
संतोषी माता · आरती
जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता

चालीसा · संतोषी माता
संतोष की देवी संतोषी माता की चालीसा, जो शुक्रवार के व्रत में पढ़ी जाती है। मूल पाठ, हर चौपाई का अर्थ, भावार्थ और कठिन शब्द।
बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार।ध्यान धरत ही होत नर दुःख सागर से पार॥
अर्थ: रिद्धि-सिद्धि देने वाली संतोषी माता के चरणों की मैं वंदना करता हूँ। उनका ध्यान करते ही मनुष्य दुख के सागर से पार हो जाता है।
भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम।कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम॥
अर्थ: भक्तों को संतोष देने के कारण आपका नाम संतोषी है। हे जगदंबा, अब कृपा कीजिए; मैं आपके धाम (शरण) में आया हूँ।
जय सन्तोषी मात अनूपम।शान्ति दायिनी रूप मनोरम ॥१॥
अर्थ: अनुपम संतोषी माता की जय हो; आपका रूप शांति देने वाला और मन को भाने वाला है।
सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा।वेश मनोहर ललित अनुपा ॥२॥
अर्थ: आपका रंग सुंदर है और रूप चार भुजाओं वाला; आपका वेश मनोहर, कोमल और अनुपम है।
श्वेताम्बर रूप मनहारी।माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी ॥३॥
अर्थ: श्वेत वस्त्रों में आपका रूप मन को हर लेता है; हे माँ, आपकी छवि संसार से निराली है।
दिव्य स्वरूपा आयत लोचन।दर्शन से हो संकट मोचन ॥४॥
अर्थ: आपका स्वरूप दिव्य है और आँखें बड़ी-बड़ी हैं; आपके दर्शन से संकट दूर होते हैं।
जय गणेश की सुता भवानी।रिद्धि-सिद्धि की पुत्री ज्ञानी ॥५॥
अर्थ: गणेश जी की पुत्री भवानी की जय हो; आप रिद्धि-सिद्धि की ज्ञानवती पुत्री हैं।
अगम अगोचर तुम्हरी माया।सब पर करो कृपा की छाया ॥६॥
अर्थ: आपकी माया अगम और इंद्रियों से परे है; सब पर अपनी कृपा की छाया कीजिए।
नाम अनेक तुम्हारे माता।अखिल विश्व है तुमको ध्याता ॥७॥
अर्थ: हे माता, आपके अनेक नाम हैं और सारा विश्व आपका ध्यान करता है।
तुमने रूप अनेकों धारे।को कहि सके चरित्र तुम्हारे ॥८॥
अर्थ: आपने अनेक रूप धारण किए हैं; आपके चरित्रों का वर्णन कौन कर सकता है?
धाम अनेक कहाँ तक कहिये।सुमिरन तब करके सुख लहिये ॥९॥
अर्थ: आपके धाम भी अनेक हैं, उन्हें कहाँ तक गिनाएँ; आपका स्मरण करके ही सुख पाया जाता है।
विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी।कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी ॥१०॥
अर्थ: विंध्याचल में आप विंध्यवासिनी हैं, और कोटेश्वर में सुंदर मुस्कान वाली सरस्वती।
कलकत्ते में तू ही काली।दुष्ट नाशिनी महाकराली ॥११॥
अर्थ: कलकत्ते में आप ही काली हैं, दुष्टों का नाश करने वाली महाविकराल देवी।
सम्बल पुर बहुचरा कहाती।भक्तजनों का दुःख मिटाती ॥१२॥
अर्थ: सम्बलपुर में आप बहुचरा कहलाती हैं और भक्तों का दुख मिटाती हैं।
ज्वाला जी में ज्वाला देवी।पूजत नित्य भक्त जन सेवी ॥१३॥
अर्थ: ज्वाला जी में आप ज्वाला देवी हैं, जिनकी सेवा में भक्त रोज़ पूजा करते हैं।
नगर बम्बई की महारानी।महा लक्ष्मी तुम कल्याणी ॥१४॥
अर्थ: बम्बई नगर की महारानी, कल्याण करने वाली महालक्ष्मी आप ही हैं।
मदुरा में मीनाक्षी तुम हो।सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो ॥१५॥
अर्थ: मदुरा (मदुरै) में आप मीनाक्षी हैं; सबके सुख-दुख की साक्षी आप ही हैं।
राजनगर में तुम जगदम्बे।बनी भद्रकाली तुम अम्बे ॥१६॥
अर्थ: राजनगर में आप जगदंबा हैं; हे अंबे, वहाँ आप भद्रकाली बनी हैं।
पावागढ़ में दुर्गा माता।अखिल विश्व तेरा यश गाता ॥१७॥
अर्थ: पावागढ़ में आप दुर्गा माता हैं; सारा विश्व आपका यश गाता है।
काशी पुराधीश्वरी माता।अन्नपूर्णा नाम सुहाता ॥१८॥
अर्थ: काशी नगरी की स्वामिनी माता का अन्नपूर्णा नाम शोभा देता है।
सर्वानन्द करो कल्याणी।तुम्हीं शारदा अमृत वाणी ॥१९॥
अर्थ: हे कल्याणी, सबको आनंद दीजिए; अमृत जैसी वाणी वाली शारदा (सरस्वती) भी आप ही हैं।
तुम्हरी महिमा जल में थल में।दुःख दारिद्र सब मेटो पल में ॥२०॥
अर्थ: आपकी महिमा जल में भी है और थल में भी; हमारे सारे दुख और दरिद्रता पल भर में मिटा दीजिए।
जेते ऋषि और मुनीशा।नारद देव और देवेशा ॥२१॥
अर्थ: जितने भी ऋषि और श्रेष्ठ मुनि हैं, नारद और देवताओं के स्वामी तक —
इस जगती के नर और नारी।ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी ॥२२॥
अर्थ: — और इस संसार के सब नर-नारी, हे माता, आपका ही ध्यान करते हैं।
जापर कृपा तुम्हारी होती।वह पाता भक्ति का मोती ॥२३॥
अर्थ: जिस पर आपकी कृपा होती है, वह भक्ति रूपी मोती पाता है।
दुःख दारिद्र संकट मिट जाता।ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता ॥२४॥
अर्थ: जो व्यक्ति आपका ध्यान करता है, उसके दुख, दरिद्रता और संकट मिट जाते हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
जो जन तुम्हरी महिमा गावै।ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै ॥२५॥
अर्थ: जो आपकी महिमा गाता है, वह आपका ध्यान करके सुख पाता है।
जो मन राखे शुद्ध भावना।ताकी पूरण करो कामना ॥२६॥
अर्थ: जो मन में शुद्ध भावना रखता है, उसकी कामना आप पूरी कीजिए।
कुमति निवारि सुमति की दात्री।जयति जयति माता जगधात्री ॥२७॥
अर्थ: बुरी बुद्धि को दूर करके अच्छी बुद्धि देने वाली, संसार को धारण करने वाली माता की जय हो, जय हो।
शुक्रवार का दिवस सुहावन।जो व्रत करे तुम्हारा पावन ॥२८॥
अर्थ: शुक्रवार का दिन (आपके लिए) शुभ है; जो उस दिन आपका पावन व्रत करता है —
गुड़ छोले का भोग लगावै।कथा तुम्हारी सुने सुनावै ॥२९॥
अर्थ: — गुड़ और चने का भोग लगाता है, और आपकी कथा सुनता और सुनाता है —
विधिवत पूजा करे तुम्हारी।फिर प्रसाद पावे शुभकारी ॥३०॥
अर्थ: — विधि से आपकी पूजा करता है और फिर शुभ प्रसाद ग्रहण करता है —
शक्ति-सामरथ हो जो धनको।दान-दक्षिणा दे विप्रन को ॥३१॥
अर्थ: — और जिसके पास धन का सामर्थ्य हो, वह ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देता है —
वे जगती के नर औ नारी।मनवांछित फल पावें भारी ॥३२॥
अर्थ: — संसार के ऐसे नर-नारी मनचाहा फल भरपूर पाते हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
जो जन शरण तुम्हारी जावे।सो निश्चय भव से तर जावे ॥३३॥
अर्थ: जो व्यक्ति आपकी शरण में जाता है, वह निश्चय ही संसार-सागर से तर जाता है।
तुम्हरो ध्यान कुमारी ध्यावे।निश्चय मनवांछित वर पावै ॥३४॥
अर्थ: जो कुमारी कन्या आपका ध्यान करती है, वह निश्चय ही मनचाहा वर पाती है।
सधवा पूजा करे तुम्हारी।अमर सुहागिन हो वह नारी ॥३५॥
अर्थ: जो सुहागिन स्त्री आपकी पूजा करती है, उसका सौभाग्य अमर रहता है।
विधवा धर के ध्यान तुम्हारा।भवसागर से उतरे पारा ॥३६॥
अर्थ: विधवा स्त्री आपका ध्यान करके भवसागर से पार उतरती है।
जयति जयति जय संकट हरणी।विघ्न विनाशन मंगल करनी ॥३७॥
अर्थ: संकट हरने वाली माँ की जय हो, जय हो; आप विघ्नों का नाश करने वाली और मंगल करने वाली हैं।
हम पर संकट है अति भारी।वेगि खबर लो मात हमारी ॥३८॥
अर्थ: हम पर बहुत भारी संकट है; हे माता, जल्दी हमारी सुधि लीजिए।
निशिदिन ध्यान तुम्हारो ध्याता।देह भक्ति वर हम को माता ॥३९॥
अर्थ: मैं रात-दिन आपका ध्यान करता हूँ; हे माता, हमें भक्ति का वर दीजिए।
यह चालीसा जो नित गावे।सो भवसागर से तर जावे ॥४०॥
अर्थ: जो यह चालीसा रोज़ गाता है, वह भवसागर से तर जाता है, ऐसा चालीसा कहती है।
हर चौपाई का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।
संतोषी माता चालीसा “बन्दौं सन्तोषी चरण” दोहे से शुरू होती है। इसमें दो आरंभिक दोहे और चालीस चौपाइयाँ हैं। चालीसा संतोषी माता के रूप का वर्णन करती है, उन्हें गणेश जी और रिद्धि-सिद्धि की पुत्री कहती है, देश के अनेक शक्ति-स्थलों की देवियों को उन्हीं का रूप बताती है, और शुक्रवार के व्रत की सरल विधि भी बताती है।
इसकी भाषा सरल हिंदी है। रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। इसमें कलकत्ता, बम्बई, मदुरा और राजनगर जैसे नगरों के नाम आते हैं, जिससे यह अपेक्षाकृत नई रचना लगती है। संतोषी माता की एक दूसरी चालीसा भी प्रचलित है (“जय संतोषी मां जग जननी”); यहाँ “बन्दौं सन्तोषी चरण” वाली चालीसा है।
रिद्धि-सिद्धि देने वाली संतोषी माता के चरणों की मैं वंदना करता हूँ। उनका ध्यान करते ही मनुष्य दुख के सागर से पार हो जाता है।
भक्तों को संतोष देने के कारण आपका नाम संतोषी है। हे जगदंबा, अब कृपा कीजिए; मैं आपके धाम (शरण) में आया हूँ।
अनुपम संतोषी माता की जय हो; आपका रूप शांति देने वाला और मन को भाने वाला है।
आपका रंग सुंदर है और रूप चार भुजाओं वाला; आपका वेश मनोहर, कोमल और अनुपम है।
श्वेत वस्त्रों में आपका रूप मन को हर लेता है; हे माँ, आपकी छवि संसार से निराली है।
आपका स्वरूप दिव्य है और आँखें बड़ी-बड़ी हैं; आपके दर्शन से संकट दूर होते हैं।
गणेश जी की पुत्री भवानी की जय हो; आप रिद्धि-सिद्धि की ज्ञानवती पुत्री हैं।
आपकी माया अगम और इंद्रियों से परे है; सब पर अपनी कृपा की छाया कीजिए।
हे माता, आपके अनेक नाम हैं और सारा विश्व आपका ध्यान करता है।
आपने अनेक रूप धारण किए हैं; आपके चरित्रों का वर्णन कौन कर सकता है?
आपके धाम भी अनेक हैं, उन्हें कहाँ तक गिनाएँ; आपका स्मरण करके ही सुख पाया जाता है।
विंध्याचल में आप विंध्यवासिनी हैं, और कोटेश्वर में सुंदर मुस्कान वाली सरस्वती।
कलकत्ते में आप ही काली हैं, दुष्टों का नाश करने वाली महाविकराल देवी।
सम्बलपुर में आप बहुचरा कहलाती हैं और भक्तों का दुख मिटाती हैं।
ज्वाला जी में आप ज्वाला देवी हैं, जिनकी सेवा में भक्त रोज़ पूजा करते हैं।
बम्बई नगर की महारानी, कल्याण करने वाली महालक्ष्मी आप ही हैं।
मदुरा (मदुरै) में आप मीनाक्षी हैं; सबके सुख-दुख की साक्षी आप ही हैं।
राजनगर में आप जगदंबा हैं; हे अंबे, वहाँ आप भद्रकाली बनी हैं।
पावागढ़ में आप दुर्गा माता हैं; सारा विश्व आपका यश गाता है।
काशी नगरी की स्वामिनी माता का अन्नपूर्णा नाम शोभा देता है।
हे कल्याणी, सबको आनंद दीजिए; अमृत जैसी वाणी वाली शारदा (सरस्वती) भी आप ही हैं।
आपकी महिमा जल में भी है और थल में भी; हमारे सारे दुख और दरिद्रता पल भर में मिटा दीजिए।
जितने भी ऋषि और श्रेष्ठ मुनि हैं, नारद और देवताओं के स्वामी तक —
— और इस संसार के सब नर-नारी, हे माता, आपका ही ध्यान करते हैं।
जिस पर आपकी कृपा होती है, वह भक्ति रूपी मोती पाता है।
जो व्यक्ति आपका ध्यान करता है, उसके दुख, दरिद्रता और संकट मिट जाते हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
जो आपकी महिमा गाता है, वह आपका ध्यान करके सुख पाता है।
जो मन में शुद्ध भावना रखता है, उसकी कामना आप पूरी कीजिए।
बुरी बुद्धि को दूर करके अच्छी बुद्धि देने वाली, संसार को धारण करने वाली माता की जय हो, जय हो।
शुक्रवार का दिन (आपके लिए) शुभ है; जो उस दिन आपका पावन व्रत करता है —
— गुड़ और चने का भोग लगाता है, और आपकी कथा सुनता और सुनाता है —
— विधि से आपकी पूजा करता है और फिर शुभ प्रसाद ग्रहण करता है —
— और जिसके पास धन का सामर्थ्य हो, वह ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देता है —
— संसार के ऐसे नर-नारी मनचाहा फल भरपूर पाते हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
जो व्यक्ति आपकी शरण में जाता है, वह निश्चय ही संसार-सागर से तर जाता है।
जो कुमारी कन्या आपका ध्यान करती है, वह निश्चय ही मनचाहा वर पाती है।
जो सुहागिन स्त्री आपकी पूजा करती है, उसका सौभाग्य अमर रहता है।
विधवा स्त्री आपका ध्यान करके भवसागर से पार उतरती है।
संकट हरने वाली माँ की जय हो, जय हो; आप विघ्नों का नाश करने वाली और मंगल करने वाली हैं।
हम पर बहुत भारी संकट है; हे माता, जल्दी हमारी सुधि लीजिए।
मैं रात-दिन आपका ध्यान करता हूँ; हे माता, हमें भक्ति का वर दीजिए।
जो यह चालीसा रोज़ गाता है, वह भवसागर से तर जाता है, ऐसा चालीसा कहती है।
चालीसा संतोषी माता के रूप से शुरू होती है: शांति देने वाली, चार भुजाओं वाली, श्वेत वस्त्र पहने, बड़ी आँखों वाली माँ, जिनके दर्शन से संकट दूर होते हैं। उन्हें गणेश जी और रिद्धि-सिद्धि की पुत्री कहा गया है।
फिर चालीसा कहती है कि माँ के नाम, रूप और धाम अनेक हैं: विंध्याचल की विंध्यवासिनी, कलकत्ते की काली, ज्वाला जी की ज्वाला देवी, बम्बई की महालक्ष्मी, मदुरा की मीनाक्षी, राजनगर की भद्रकाली, पावागढ़ की दुर्गा और काशी की अन्नपूर्णा, सब वही हैं। ऋषि-मुनि, देवता और संसार के सब नर-नारी उनका ध्यान करते हैं।
अंतिम भाग में शुक्रवार के व्रत की सरल विधि है: गुड़-चने का भोग, कथा सुनना-सुनाना, विधि से पूजा, प्रसाद, और सामर्थ्य हो तो दान। चालीसा कहती है कि शुद्ध भावना से ध्यान करने वालों की कामना माँ पूरी करती हैं। अंत में भक्त अपना संकट सामने रखकर माँ से जल्दी सुधि लेने और भक्ति का वर देने की प्रार्थना करता है।
चौपाई 23 से 25, 32 से 36 और 40 इस चालीसा की फलश्रुति हैं। चालीसा के अपने वचनों में: जिस पर माँ की कृपा होती है उसे भक्ति मिलती है, ध्यान करने वाले के दुख-दारिद्र्य मिटते हैं, व्रत और पूजा करने वाले मनचाहा फल पाते हैं, और जो नित्य यह चालीसा गाता है वह भवसागर से तर जाता है। ये पाठ के वचन हैं; यहाँ इन्हें उसी रूप में दिया गया है।
जापर कृपा तुम्हारी होती।
वह पाता भक्ति का मोती॥जिस पर आपकी कृपा होती है, वह भक्ति रूपी मोती पाता है।
दुःख दारिद्र संकट मिट जाता।
ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता॥जो व्यक्ति आपका ध्यान करता है, उसके दुख, दरिद्रता और संकट मिट जाते हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
जो जन तुम्हरी महिमा गावै।
ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै॥जो आपकी महिमा गाता है, वह आपका ध्यान करके सुख पाता है।
वे जगती के नर औ नारी।
मनवांछित फल पावें भारी॥— संसार के ऐसे नर-नारी मनचाहा फल भरपूर पाते हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
जो जन शरण तुम्हारी जावे।
सो निश्चय भव से तर जावे॥जो व्यक्ति आपकी शरण में जाता है, वह निश्चय ही संसार-सागर से तर जाता है।
तुम्हरो ध्यान कुमारी ध्यावे।
निश्चय मनवांछित वर पावै॥जो कुमारी कन्या आपका ध्यान करती है, वह निश्चय ही मनचाहा वर पाती है।
सधवा पूजा करे तुम्हारी।
अमर सुहागिन हो वह नारी॥जो सुहागिन स्त्री आपकी पूजा करती है, उसका सौभाग्य अमर रहता है।
विधवा धर के ध्यान तुम्हारा।
भवसागर से उतरे पारा॥विधवा स्त्री आपका ध्यान करके भवसागर से पार उतरती है।
यह चालीसा जो नित गावे।
सो भवसागर से तर जावे॥जो यह चालीसा रोज़ गाता है, वह भवसागर से तर जाता है, ऐसा चालीसा कहती है।
संतोषी माता को संतोष की देवी माना जाता है, और लोक-परंपरा उन्हें गणेश जी और रिद्धि-सिद्धि की पुत्री बताती है, जैसा इस चालीसा की चौपाई 5 में भी है। उनकी उपासना पिछली सदी में उत्तर और पश्चिम भारत में बहुत फैली, विशेषकर शुक्रवार के व्रत के रूप में।
चालीसा में शुक्रवार के व्रत, गुड़-चने के भोग, कथा सुनने-सुनाने और प्रसाद की बात है (चौपाई 28 से 31), इसलिए व्रत की पूजा में कथा और आरती के साथ यह चालीसा पढ़ी जाती है।
चालीसा अनेक शक्ति-स्थलों की देवियों — विंध्यवासिनी, काली, ज्वाला देवी, महालक्ष्मी, मीनाक्षी, भद्रकाली, अन्नपूर्णा — को संतोषी माता का ही रूप बताती है; इसका भाव है कि एक ही माँ अनेक नामों और स्थानों में पूजी जाती है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| पूरी चालीसा | श्री गणपति पद नाय सिर, धरि हिय शारदा ध्यान … जय संतोषी मां जग जननी। | द्रिक पंचांग पर इन पंक्तियों से शुरू होने वाली एक अलग चालीसा मिलती है; वह दूसरी रचना है। यहाँ वाली चालीसा sanskritdocuments.org, भारतडिस्कवरी और भक्ति भारत पर मिलती है। |
| चौपाई 14, 15, 31 | महा लक्श्मी, मीनाक्शी, साक्शी, दक्शिणा | sanskritdocuments.org के पाठ में “क्ष” की जगह “क्श” छपा है; यहाँ भारतडिस्कवरी का शुद्ध पाठ लिया गया। |
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org का पाठ भारतडिस्कवरी और भक्ति भारत के पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया; तीनों में दोनों दोहे और चालीसों चौपाइयाँ एक ही क्रम में हैं। पंक्तियाँ भारतडिस्कवरी से लीं: पाठ वही है, पर sanskritdocuments (जहाँ यह पाठ जाँचा हुआ नहीं बताया गया) की “क्श” वाली छपाई-भूलें उसमें नहीं हैं। sanskritdocuments के पृष्ठ पर चालीसा के बाद आरती भी है; वह इस पृष्ठ का भाग नहीं। रचयिता अज्ञात; रचना अपेक्षाकृत नई।
संतोषी माता · आरती
जय सन्तोषी माता, मैया जय सन्तोषी माता
लक्ष्मी · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शुक्रवार को घर में माँ लक्ष्मी की सरल पूजा: सफ़ाई, घी का दीपक, कमल या लाल फूल, कुमकुम, खीर या मिश्री का भोग, लक्ष्मी मंत्र, आरती और प्रार्थना।
दुर्गा · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
नवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।
लक्ष्मी · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
दीपावली की शाम घर में लक्ष्मी-गणेश पूजा: सफ़ाई, प्रदोष काल का समय, चौकी सजाना, गणेश पूजन, लक्ष्मी पूजन, दीपमालिका, बही-खाता, तिजोरी और आरती।
सरस्वती · पूजा विधि · त्योहार की पूजा
वसंत पंचमी पर घर में माँ सरस्वती की पूजा: पीले फूल, किताबें और वाद्य माँ के सामने, बच्चों का विद्यारंभ, मंत्र, आरती और प्रसाद, सरल विकल्पों के साथ।
दुर्गा · आरती
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। पाठ में कवि का नाम नहीं आता; इसमें बम्बई, कलकत्ता जैसे नगरों के नाम हैं, जिससे यह अपेक्षाकृत नई रचना लगती है।
शुक्रवार को, विशेषकर संतोषी माता के व्रत में, कथा और आरती के साथ। रोज़ भी पढ़ी जा सकती है; कोई तय संख्या आवश्यक नहीं।
संतोषी माता की पूजा में गुड़ और चने का भोग प्रचलित है; चालीसा की चौपाई 29 यही बताती है।
हाँ। “जय संतोषी मां जग जननी” से शुरू होने वाली एक अलग चालीसा भी प्रचलित है। यहाँ “बन्दौं सन्तोषी चरण” वाली चालीसा है, जो sanskritdocuments.org, भारतडिस्कवरी और भक्ति भारत पर मिलती है।
लोक-परंपरा में उन्हें गणेश जी और रिद्धि-सिद्धि की पुत्री माना जाता है; यह चालीसा भी उन्हें “गणेश की सुता” और “रिद्धि-सिद्धि की पुत्री” कहती है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।