नवग्रह स्तोत्रम्
नवग्रह, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु · स्तोत्र · संस्कृत
जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्

आरती · बृहस्पति
गुरुवार व्रत में गाई जाने वाली बृहस्पति देव की आरती 'ॐ जय बृहस्पति देवा': पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ और कठिन शब्द।
ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा।छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा॥
अर्थ: हे बृहस्पति देव, आपकी जय हो। मैं क्षण-क्षण (बार-बार) आपको केले और मेवे का भोग लगाता हूँ।
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी॥
॥ ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
अर्थ: आप पूर्ण परमात्मा हैं और सबके मन की जानने वाले (अन्तर्यामी) हैं। आप जगत के पिता, जगत के ईश्वर और सबके स्वामी हैं।
चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता।सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता॥
॥ ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
अर्थ: आपका निर्मल चरणामृत सब पापों को हरने वाला है। आप सब इच्छाएँ पूरी करने वाले हैं; हे पालनहार, कृपा कीजिए।
तन मन धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े।प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े॥
॥ ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
अर्थ: आरती कहती है कि जो व्यक्ति तन, मन और धन अर्पित करके आपकी शरण में आता है, प्रभु प्रकट होकर उसके द्वार पर आ खड़े होते हैं।
दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी।पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी॥
॥ ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
अर्थ: आप दीनों पर दया करने वाले, दया के भंडार और भक्तों का हित करने वाले हैं। आप सब पाप और दोष हरते हैं और संसार के बन्धन काटते हैं।
सकल मनोरथ दायक, सब संशय हारो।विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी॥
॥ ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
अर्थ: हे सब इच्छाएँ पूरी करने वाले, मेरे सब संशय दूर कीजिए। हे संतों को सुख देने वाले, इन्द्रियों के सुखों से उपजे विकार मिटाइए।
जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे।जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे॥
॥ ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
अर्थ: आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई प्रेम से आपकी आरती गाता है, वह निश्चय ही आनन्द पाता है। 'जेठानन्द' यहाँ कवि की छाप लगता है।
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'ॐ जय बृहस्पति देवा' देवताओं के गुरु बृहस्पति देव की आरती है, जो गुरुवार (बृहस्पतिवार) के व्रत की कथा के बाद गाई जाती है। इसकी पंक्तियों की बनावट 'ॐ जय जगदीश हरे' जैसी है और यह प्रायः उसी लय में गाई जाती है।
आरती में बृहस्पति देव को पूर्ण परमात्मा, अन्तर्यामी, जगतपिता और जगदीश्वर कहा गया है, यानी गुरु के रूप में स्वयं भगवान की वन्दना की गई है। पहली ही पंक्ति में केले (कदली फल) और मेवे के भोग का उल्लेख है।
हे बृहस्पति देव, आपकी जय हो। मैं क्षण-क्षण (बार-बार) आपको केले और मेवे का भोग लगाता हूँ।
आप पूर्ण परमात्मा हैं और सबके मन की जानने वाले (अन्तर्यामी) हैं। आप जगत के पिता, जगत के ईश्वर और सबके स्वामी हैं।
आपका निर्मल चरणामृत सब पापों को हरने वाला है। आप सब इच्छाएँ पूरी करने वाले हैं; हे पालनहार, कृपा कीजिए।
आरती कहती है कि जो व्यक्ति तन, मन और धन अर्पित करके आपकी शरण में आता है, प्रभु प्रकट होकर उसके द्वार पर आ खड़े होते हैं।
आप दीनों पर दया करने वाले, दया के भंडार और भक्तों का हित करने वाले हैं। आप सब पाप और दोष हरते हैं और संसार के बन्धन काटते हैं।
हे सब इच्छाएँ पूरी करने वाले, मेरे सब संशय दूर कीजिए। हे संतों को सुख देने वाले, इन्द्रियों के सुखों से उपजे विकार मिटाइए।
आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई प्रेम से आपकी आरती गाता है, वह निश्चय ही आनन्द पाता है। 'जेठानन्द' यहाँ कवि की छाप लगता है।
बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं, पर यह आरती उन्हें केवल एक ग्रह या गुरु के रूप में नहीं, पूर्ण परमात्मा और जगदीश्वर के रूप में पूजती है। गुरुवार के व्रत में बृहस्पति देव के साथ भगवान विष्णु की पूजा की परंपरा भी है।
आरती भक्त की सीधी माँगें रखती है: पाप-दोष दूर हों, संशय मिटें, विषयों का विकार हटे। और उसका भरोसा यह है कि जो तन-मन-धन अर्पित करके शरण आता है, प्रभु स्वयं उसके द्वार पर आ खड़े होते हैं।
अंतिम अंतरा कहता है कि प्रेम से यह आरती गाने वाला निश्चय ही आनन्द पाता है। ये आरती के अपने शब्द हैं, जो भक्त की श्रद्धा बताते हैं; इन्हें किसी फल का वादा न समझें।
जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे।
जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे॥आरती की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि जो कोई प्रेम से आपकी आरती गाता है, वह निश्चय ही आनन्द पाता है। 'जेठानन्द' यहाँ कवि की छाप लगता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| टेक | जय वृहस्पति देवा, ऊँ जय वृहस्पति देवा | भक्ति भारत और भारतकोश में टेक इसी क्रम से शुरू होती है; हर अंतरे के बाद भक्ति भारत भी 'ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा' दोहराता है |
अंतिम अंतरे की पंक्ति 'जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे' में यह नाम आता है, जो आरती के कवि की छाप लगती है। रचयिता के बारे में और कोई जानकारी नहीं मिली।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति भक्ति भारत, शुभ पंचांग और भारतकोश (bharatdiscovery.org) के पाठ से मिलाई गई। तीनों में टेक, छहों अंतरे, उनका क्रम और शब्द एक जैसे हैं; अंतर केवल वर्तनी का है ('वृहस्पति/बृहस्पति', 'द्घार/द्वार', भारतकोश में 'छि छिन' और 'प्रेम सहत')। पाठ शुभ पंचांग की शुद्ध वर्तनी में लिया गया। भक्ति भारत में अंत का जयकारा ('सब बोलो विष्णु भगवान की जय...') आरती का भाग नहीं, इसलिए नहीं लिया गया। द्रिक पंचांग और आज तक में यह आरती नहीं मिली। टेक के क्रम का अंतर पाठांतर में है।
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जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल
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ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्
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नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च
गुरुवार के व्रत में, बृहस्पतिवार व्रत-कथा पढ़ने या सुनने के बाद। व्रत के उद्यापन पर भी यह आरती गाई जाती है।
गुरुवार के व्रत की परंपरा में केले के पौधे की पूजा होती है और चने की दाल, गुड़, केले जैसी पीली वस्तुएँ चढ़ाई जाती हैं। आरती की पहली पंक्ति में ही कदली फल और मेवे का भोग आता है।
अंतिम अंतरे में 'जेठानन्द आनन्दकर' आता है; पुरानी आरतियों की तरह यह कवि की छाप लगती है। कवि के बारे में और कोई जानकारी उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिली।
हाँ, इसकी पंक्तियों की बनावट 'ॐ जय जगदीश हरे' जैसी है और यह प्रायः उसी लय में गाई जाती है।
बृहस्पतिवार की व्रत-कथा पढ़ी या सुनी जाती है, और कई घरों में इसके बाद 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती भी गाई जाती है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।