शनि

चालीसा · शनि

शनि चालीसा

“जयति जयति शनिदेव दयाला” वाली शनि चालीसा का मूल पाठ, हर चौपाई का सरल अर्थ और कथा, कठिन शब्द, भावार्थ और पाठभेद।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. चौपाई-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. फलश्रुति
  7. कब पढ़ें
  8. विधि
  9. महत्व
  10. पाठ-भेद
  11. रचयिता और स्रोत
  12. ये भी पढ़ें
  13. सवाल-जवाब
  14. सुधार सुझाएँ

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

अर्थ: हे गिरिजा के पुत्र, मंगल करने वाले कृपालु गणेश जी, आपकी जय हो। हे नाथ, दीनों के दुःख दूर करके उन्हें निहाल कीजिए।

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

अर्थ: हे प्रभु शनिदेव, आपकी जय हो, जय हो; हे महाराज, मेरी विनती सुनिए। हे सूर्यपुत्र, कृपा कीजिए और अपने भक्त की लाज रखिए।

॥ चौपाई ॥

जयति जयति शनिदेव दयाला।करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥१॥

अर्थ: हे दयालु शनिदेव, आपकी जय हो, जय हो! आप सदा अपने भक्तों का पालन करते हैं।

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै।माथे रतन मुकुट छबि छाजै ॥२॥

अर्थ: आपकी चार भुजाएँ हैं और शरीर श्याम वर्ण का है; माथे पर रत्नों का मुकुट शोभा देता है।

परम विशाल मनोहर भाला।टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥३॥

अर्थ: आपका माथा विशाल और मनोहर है; आपकी दृष्टि तिरछी है और भौंहें विकराल हैं।

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।हिये माल मुक्तन मणि दमकै ॥४॥

अर्थ: कानों में कुंडल चमाचम चमकते हैं, और छाती पर मोतियों और मणियों की माला दमकती है।

कर में गदा त्रिशूल कुठारा।पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥५॥

अर्थ: आपके हाथों में गदा, त्रिशूल और फरसा हैं; आप पल भर में शत्रुओं का संहार करते हैं।

पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन।यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन ॥६॥

अर्थ: पिंगल, कृष्ण, छायानंदन, यम, कोणस्थ, रौद्र और दुःखभंजन, ये आपके नाम हैं।

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा।भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥७॥

अर्थ: सौरि, मंद और शनि, इनके साथ ये आपके दस नाम हैं। हे सूर्यपुत्र, सब अपने कामों की सिद्धि के लिए आपको पूजते हैं।

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं।रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं ॥८॥

अर्थ: जिस पर प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं, उसे क्षण भर में रंक से राजा बना देते हैं।

पर्वतहू तृण होइ निहारत।तृणहू को पर्वत करि डारत ॥९॥

अर्थ: आपकी दृष्टि से पर्वत भी तिनका हो जाता है, और तिनका भी पर्वत बन जाता है।

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो।कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥१०॥

अर्थ: यहाँ से चालीसा परंपरा की वे कथाएँ कहती है जिनमें कठिन समय को शनि की दशा से जोड़ा गया है। श्री राम को राज्य मिलने वाला था, पर उन्हें वनवास मिला, और कैकेयी की बुद्धि भी फिर गई।

बनहूँ में मृग कपट दिखाई।मातु जानकी गई चुराई ॥११॥

अर्थ: वन में कपट का मृग दिखाई दिया, और माता जानकी का हरण हो गया।

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा।मचिगा दल में हाहाकारा ॥१२॥

अर्थ: लक्ष्मण जी शक्ति लगने से मूर्छित हो गए, और सेना में हाहाकार मच गया।

रावण की गति-मति बौराई।रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥१३॥

अर्थ: रावण की चाल और बुद्धि बौरा गई, और उसने श्री रामचंद्र से बैर बढ़ा लिया।

दियो कीट करि कंचन लंका।बजि बजरंग बीर की डंका ॥१४॥

अर्थ: सोने की लंका मिट्टी हो गई, और वीर बजरंगबली का डंका बजा।

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥१५॥

अर्थ: जब राजा विक्रमादित्य पर आपकी दशा आई, तो दीवार पर बने चित्र का मोर हार निगल गया।

हार नौलखा लाग्यो चोरी।हाथ पैर डरवायो तोरी ॥१६॥

अर्थ: उस नौलखा हार की चोरी का दोष उन पर लगा, और उनके हाथ-पैर तुड़वा दिए गए।

भारी दशा निकृष्ट दिखायो।तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो ॥१७॥

अर्थ: ऐसी कठिन दशा आई कि उन्हें तेली के घर कोल्हू चलाना पड़ा।

विनय राग दीपक महँ कीन्हयों।तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥१८॥

अर्थ: फिर जब उन्होंने दीपक राग में आपसे विनती की, तब आपने प्रसन्न होकर उन्हें फिर सुख दिया।

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।आपहुं भरे डोम घर पानी ॥१९॥

अर्थ: राजा हरिश्चंद्र की पत्नी को बिकना पड़ा, और स्वयं उन्हें डोम के घर पानी भरना पड़ा।

तैसे नल पर दशा सिरानी।भूंजी-मीन कूद गई पानी ॥२०॥

अर्थ: इसी तरह राजा नल पर कठिन दशा आई, और भुनी हुई मछली भी पानी में कूद गई।

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई।पारवती को सती कराई ॥२१॥

अर्थ: चालीसा के अनुसार यह दशा भगवान शंकर पर भी आई, जब पार्वती जी को (अपने पूर्व जन्म में सती के रूप में) देह त्यागनी पड़ी।

तनिक विलोकत ही करि रीसा।नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ॥२२॥

अर्थ: आपके तनिक क्रोध से देखते ही गौरी के पुत्र गणेश का सिर आकाश में उड़ गया; यही कथा गणेश चालीसा में भी आती है।

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।बची द्रौपदी होति उघारी ॥२३॥

अर्थ: पांडवों पर आपकी दशा आई, और द्रौपदी भरी सभा में निर्वस्त्र होने से बाल-बाल बचीं।

कौरव के भी गति मति मारयो।युद्ध महाभारत करि डारयो ॥२४॥

अर्थ: कौरवों की भी बुद्धि मारी गई, और महाभारत का युद्ध हुआ।

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला।लेकर कूदि परयो पाताला ॥२५॥

अर्थ: आप तुरंत सूर्य को मुख में दबाकर पाताल में कूद गए।

शेष देव-लखि विनती लाई।रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥२६॥

अर्थ: यह देखकर देवताओं ने विनती की, तब आपने सूर्य को मुख से छोड़ दिया।

वाहन प्रभु के सात सुजाना।जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥२७॥

अर्थ: प्रभु के सात वाहन बताए गए हैं: हाथी, गधा, हिरण, कुत्ता,

जम्बुक सिंह आदि नख धारी।सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥२८॥

अर्थ: सियार और सिंह जैसे नख वाले पशु (और घोड़ा)। इन वाहनों का फल ज्योतिष बताता है; आगे की चौपाइयाँ यही परंपरागत मान्यता दोहराती हैं।

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं ॥२९॥

अर्थ: इस मान्यता के अनुसार हाथी पर आएँ तो घर में लक्ष्मी आती हैं, और घोड़े पर आएँ तो सुख-संपत्ति बढ़ती है।

गर्दभ हानि करै बहु काजा।सिंह सिद्धकर राज समाजा ॥३०॥

अर्थ: गधे पर आएँ तो कामों में हानि कही जाती है, और सिंह पर आएँ तो राज और समाज के काम सिद्ध होते हैं।

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥३१॥

अर्थ: सियार पर आएँ तो बुद्धि बिगड़ने की, और हिरण पर आएँ तो प्राणों तक के कष्ट की बात इस मान्यता में कही गई है।

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।चोरी आदि होय डर भारी ॥३२॥

अर्थ: और कुत्ते पर आएँ तो चोरी जैसी हानि का डर कहा जाता है।

तैसहि चारि चरण यह नामा।स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा ॥३३॥

अर्थ: इसी तरह ज्योतिष में शनि के चार चरण (पाद) बताए गए हैं: सोना, लोहा, चाँदी और ताँबा।

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥३४॥

अर्थ: लोहे के चरण में धन, जन और संपत्ति की हानि कही गई है।

समता ताम्र रजत शुभकारी।स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी ॥३५॥

अर्थ: ताँबे और चाँदी के चरण समान रूप से शुभ माने गए हैं, और सोने का चरण सब सुख और बड़ा मंगल देने वाला।

जो यह शनि चरित्र नित गावै।कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥३६॥

अर्थ: चालीसा कहती है कि जो यह शनि-चरित्र रोज़ गाता है, उसे कठिन दशा कभी नहीं सताती।

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ॥३७॥

अर्थ: प्रभु अद्भुत लीला दिखाते हैं, और उसके शत्रुओं का बल ढीला कर देते हैं।

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥३८॥

अर्थ: जो योग्य पंडित को बुलवाकर विधि से शनि ग्रह की शांति कराता है,

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।दीप दान दै बहु सुख पावत ॥३९॥

अर्थ: और शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाता है और दीप-दान करता है, वह बहुत सुख पाता है; ऐसा चालीसा कहती है।

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥४०॥

अर्थ: प्रभु के दास रामसुंदर कहते हैं: शनिदेव का स्मरण करने से सुख का प्रकाश होता है।

॥ दोहा ॥

पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार।करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

अर्थ: शनिश्चर देव का यह पाठ भक्त ने तैयार किया है। चालीसा कहती है कि जो चालीस दिन इसका पाठ करता है, वह भवसागर से पार हो जाता है।

हर चौपाई का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

शनि चालीसा शनिदेव की प्रचलित हिन्दी स्तुति है। आरंभ में दो दोहे हैं, एक गणेश जी की वंदना का और एक शनिदेव से विनती का; फिर चालीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा।

चालीसा शनिदेव को “दयाला” कहकर शुरू होती है और उनका रूप और दस नाम बताती है। फिर वह परंपरा की कथाएँ कहती है, जिनमें बड़े-बड़े लोगों के कठिन समय को शनि की दशा से जोड़ा गया है: श्री राम का वनवास, राजा विक्रमादित्य, हरिश्चंद्र और नल की विपत्ति, पांडवों का कष्ट। साथ में ज्योतिष की परंपरागत मान्यताएँ आती हैं, और अंत में शनिदेव के स्मरण, पीपल पर जल और दीप-दान की बात।

चौपाई-वार अर्थ

  1. दोहा जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल…

    हे गिरिजा के पुत्र, मंगल करने वाले कृपालु गणेश जी, आपकी जय हो। हे नाथ, दीनों के दुःख दूर करके उन्हें निहाल कीजिए।

  2. दोहा जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज…

    हे प्रभु शनिदेव, आपकी जय हो, जय हो; हे महाराज, मेरी विनती सुनिए। हे सूर्यपुत्र, कृपा कीजिए और अपने भक्त की लाज रखिए।

  3. चौपाई १ जयति जयति शनिदेव दयाला…

    हे दयालु शनिदेव, आपकी जय हो, जय हो! आप सदा अपने भक्तों का पालन करते हैं।

  4. चौपाई २ चारि भुजा, तनु श्याम विराजै…

    आपकी चार भुजाएँ हैं और शरीर श्याम वर्ण का है; माथे पर रत्नों का मुकुट शोभा देता है।

  5. चौपाई ३ परम विशाल मनोहर भाला…

    आपका माथा विशाल और मनोहर है; आपकी दृष्टि तिरछी है और भौंहें विकराल हैं।

  6. चौपाई ४ कुण्डल श्रवण चमाचम चमके…

    कानों में कुंडल चमाचम चमकते हैं, और छाती पर मोतियों और मणियों की माला दमकती है।

  7. चौपाई ५ कर में गदा त्रिशूल कुठारा…

    आपके हाथों में गदा, त्रिशूल और फरसा हैं; आप पल भर में शत्रुओं का संहार करते हैं।

  8. चौपाई ६ पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन…

    पिंगल, कृष्ण, छायानंदन, यम, कोणस्थ, रौद्र और दुःखभंजन, ये आपके नाम हैं।

  9. चौपाई ७ सौरी, मन्द, शनी, दश नामा…

    सौरि, मंद और शनि, इनके साथ ये आपके दस नाम हैं। हे सूर्यपुत्र, सब अपने कामों की सिद्धि के लिए आपको पूजते हैं।

  10. चौपाई ८ जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं…

    जिस पर प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं, उसे क्षण भर में रंक से राजा बना देते हैं।

  11. चौपाई ९ पर्वतहू तृण होइ निहारत…

    आपकी दृष्टि से पर्वत भी तिनका हो जाता है, और तिनका भी पर्वत बन जाता है।

  12. चौपाई १० राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो…

    यहाँ से चालीसा परंपरा की वे कथाएँ कहती है जिनमें कठिन समय को शनि की दशा से जोड़ा गया है। श्री राम को राज्य मिलने वाला था, पर उन्हें वनवास मिला, और कैकेयी की बुद्धि भी फिर गई।

  13. चौपाई ११ बनहूँ में मृग कपट दिखाई…

    वन में कपट का मृग दिखाई दिया, और माता जानकी का हरण हो गया।

  14. चौपाई १२ लखनहिं शक्ति विकल करिडारा…

    लक्ष्मण जी शक्ति लगने से मूर्छित हो गए, और सेना में हाहाकार मच गया।

  15. चौपाई १३ रावण की गति-मति बौराई…

    रावण की चाल और बुद्धि बौरा गई, और उसने श्री रामचंद्र से बैर बढ़ा लिया।

  16. चौपाई १४ दियो कीट करि कंचन लंका…

    सोने की लंका मिट्टी हो गई, और वीर बजरंगबली का डंका बजा।

  17. चौपाई १५ नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा…

    जब राजा विक्रमादित्य पर आपकी दशा आई, तो दीवार पर बने चित्र का मोर हार निगल गया।

  18. चौपाई १६ हार नौलखा लाग्यो चोरी…

    उस नौलखा हार की चोरी का दोष उन पर लगा, और उनके हाथ-पैर तुड़वा दिए गए।

  19. चौपाई १७ भारी दशा निकृष्ट दिखायो…

    ऐसी कठिन दशा आई कि उन्हें तेली के घर कोल्हू चलाना पड़ा।

  20. चौपाई १८ विनय राग दीपक महँ कीन्हयों…

    फिर जब उन्होंने दीपक राग में आपसे विनती की, तब आपने प्रसन्न होकर उन्हें फिर सुख दिया।

  21. चौपाई १९ हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी…

    राजा हरिश्चंद्र की पत्नी को बिकना पड़ा, और स्वयं उन्हें डोम के घर पानी भरना पड़ा।

  22. चौपाई २० तैसे नल पर दशा सिरानी…

    इसी तरह राजा नल पर कठिन दशा आई, और भुनी हुई मछली भी पानी में कूद गई।

  23. चौपाई २१ श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई…

    चालीसा के अनुसार यह दशा भगवान शंकर पर भी आई, जब पार्वती जी को (अपने पूर्व जन्म में सती के रूप में) देह त्यागनी पड़ी।

  24. चौपाई २२ तनिक विलोकत ही करि रीसा…

    आपके तनिक क्रोध से देखते ही गौरी के पुत्र गणेश का सिर आकाश में उड़ गया; यही कथा गणेश चालीसा में भी आती है।

  25. चौपाई २३ पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी…

    पांडवों पर आपकी दशा आई, और द्रौपदी भरी सभा में निर्वस्त्र होने से बाल-बाल बचीं।

  26. चौपाई २४ कौरव के भी गति मति मारयो…

    कौरवों की भी बुद्धि मारी गई, और महाभारत का युद्ध हुआ।

  27. चौपाई २५ रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला…

    आप तुरंत सूर्य को मुख में दबाकर पाताल में कूद गए।

  28. चौपाई २६ शेष देव-लखि विनती लाई…

    यह देखकर देवताओं ने विनती की, तब आपने सूर्य को मुख से छोड़ दिया।

  29. चौपाई २७ वाहन प्रभु के सात सुजाना…

    प्रभु के सात वाहन बताए गए हैं: हाथी, गधा, हिरण, कुत्ता,

  30. चौपाई २८ जम्बुक सिंह आदि नख धारी…

    सियार और सिंह जैसे नख वाले पशु (और घोड़ा)। इन वाहनों का फल ज्योतिष बताता है; आगे की चौपाइयाँ यही परंपरागत मान्यता दोहराती हैं।

  31. चौपाई २९ गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं…

    इस मान्यता के अनुसार हाथी पर आएँ तो घर में लक्ष्मी आती हैं, और घोड़े पर आएँ तो सुख-संपत्ति बढ़ती है।

  32. चौपाई ३० गर्दभ हानि करै बहु काजा…

    गधे पर आएँ तो कामों में हानि कही जाती है, और सिंह पर आएँ तो राज और समाज के काम सिद्ध होते हैं।

  33. चौपाई ३१ जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै…

    सियार पर आएँ तो बुद्धि बिगड़ने की, और हिरण पर आएँ तो प्राणों तक के कष्ट की बात इस मान्यता में कही गई है।

  34. चौपाई ३२ जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी…

    और कुत्ते पर आएँ तो चोरी जैसी हानि का डर कहा जाता है।

  35. चौपाई ३३ तैसहि चारि चरण यह नामा…

    इसी तरह ज्योतिष में शनि के चार चरण (पाद) बताए गए हैं: सोना, लोहा, चाँदी और ताँबा।

  36. चौपाई ३४ लौह चरण पर जब प्रभु आवैं…

    लोहे के चरण में धन, जन और संपत्ति की हानि कही गई है।

  37. चौपाई ३५ समता ताम्र रजत शुभकारी…

    ताँबे और चाँदी के चरण समान रूप से शुभ माने गए हैं, और सोने का चरण सब सुख और बड़ा मंगल देने वाला।

  38. चौपाई ३६ जो यह शनि चरित्र नित गावै…

    चालीसा कहती है कि जो यह शनि-चरित्र रोज़ गाता है, उसे कठिन दशा कभी नहीं सताती।

  39. चौपाई ३७ अद्भुत नाथ दिखावैं लीला…

    प्रभु अद्भुत लीला दिखाते हैं, और उसके शत्रुओं का बल ढीला कर देते हैं।

  40. चौपाई ३८ जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई…

    जो योग्य पंडित को बुलवाकर विधि से शनि ग्रह की शांति कराता है,

  41. चौपाई ३९ पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत…

    और शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाता है और दीप-दान करता है, वह बहुत सुख पाता है; ऐसा चालीसा कहती है।

  42. चौपाई ४० कहत राम सुन्दर प्रभु दासा…

    प्रभु के दास रामसुंदर कहते हैं: शनिदेव का स्मरण करने से सुख का प्रकाश होता है।

  43. दोहा पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार…

    शनिश्चर देव का यह पाठ भक्त ने तैयार किया है। चालीसा कहती है कि जो चालीस दिन इसका पाठ करता है, वह भवसागर से पार हो जाता है।

विषय और भावार्थ

शनि चालीसा का आरंभ और अंत दोनों भरोसे के हैं: पहली चौपाई शनिदेव को “दयाला” और भक्तों का पालन करने वाला कहती है, और अंतिम चौपाई कहती है कि उनके स्मरण से सुख का प्रकाश होता है। बीच में चालीसा यह दिखाती है कि कठिन समय किसी पर भी आ सकता है: श्री राम, राजा विक्रमादित्य, हरिश्चंद्र, नल, पांडव, यहाँ तक कि देवता भी इससे नहीं बचे।

इन कथाओं का भाव डराना नहीं, धैर्य देना है। विक्रमादित्य की कथा में राजा कठिन दशा में भी विनती करते हैं और शनिदेव प्रसन्न होकर सुख लौटा देते हैं; हरिश्चंद्र और नल भी अंत में अपनी विपत्ति से उबरते हैं। वाहन और चरणों वाली चौपाइयाँ ज्योतिष की परंपरागत मान्यताएँ हैं जिन्हें चालीसा दोहराती है। अंत में वह स्मरण, पीपल पर जल और दीप-दान जैसे सरल उपाय बताती है, यानी शरण और श्रद्धा।

कठिन शब्दों के अर्थ

रवि तनय
सूर्य के पुत्र, शनिदेव
प्रतिपाला
पालन, रक्षा
भाला
माथा
भृकुटि
भौंह
कुठारा
फरसा
अरिहिं
शत्रुओं को
पिंगल, कोणस्थ, सौरि, मंद
शनिदेव के नाम
छाया नन्दन
माता छाया के पुत्र
रंक
गरीब
राव
राजा
तृण
तिनका
मृग कपट
माया का हिरण
विकल
मूर्छित, व्याकुल
कीट
तुच्छ, नष्ट
नौलखा
नौ लाख का (हार)
कोल्हू
तेल पेरने का यंत्र
डोम
श्मशान में काम करने वाला
भूंजी-मीन
भुनी हुई मछली
रीसा
क्रोध
उघारी
निर्वस्त्र
दिग्गज
हाथी
गर्दभ
गधा
स्वाना
कुत्ता
जम्बुक
सियार
हय
घोड़ा
चरण
यहाँ ज्योतिष में शनि का पाद
निकृष्ट
बहुत कठिन, बुरी
भवसागर
संसार रूपी सागर

फलश्रुति

चौपाई 36 से 39 और अंतिम दोहा शनि चालीसा की फलश्रुति हैं। चालीसा अपने वचनों में कहती है कि यह शनि-चरित्र रोज़ गाने वाले को कठिन दशा नहीं सताती, शनिवार को पीपल पर जल और दीप-दान करने वाला सुख पाता है, और चालीस दिन पाठ करने वाला भवसागर पार करता है। यहाँ ये चालीसा के अपने वचन के रूप में दिए गए हैं, किसी परिणाम के वादे के रूप में नहीं।

जो यह शनि चरित्र नित गावै।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥

चालीसा कहती है कि जो यह शनि-चरित्र रोज़ गाता है, उसे कठिन दशा कभी नहीं सताती।

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

प्रभु अद्भुत लीला दिखाते हैं, और उसके शत्रुओं का बल ढीला कर देते हैं।

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

जो योग्य पंडित को बुलवाकर विधि से शनि ग्रह की शांति कराता है,

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।
दीप दान दै बहु सुख पावत॥

और शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाता है और दीप-दान करता है, वह बहुत सुख पाता है; ऐसा चालीसा कहती है।

पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

शनिश्चर देव का यह पाठ भक्त ने तैयार किया है। चालीसा कहती है कि जो चालीस दिन इसका पाठ करता है, वह भवसागर से पार हो जाता है।

यह चालीसा कब पढ़ी जाता है

  • शनिवार को शनिदेव की पूजा में
  • शनि जयंती पर
  • शनि मंदिर में दर्शन के समय
  • जब मन कठिन समय में धैर्य और भरोसा चाहता हो

पढ़ने की विधि

  • शांत होकर बैठें। चाहें तो शनिदेव के चित्र के सामने या पीपल के पास दीपक जलाकर पाठ करें।
  • आरंभ के दोनों दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अंत का दोहा एक जैसी, आराम की गति से पढ़ें।
  • इसे डर से नहीं, शरण के भाव से पढ़ें; चालीसा स्वयं शनिदेव को दयालु और भक्तों का पालन करने वाला कहती है।
पूरी विधिशनि देव पूजा विधिशनिवार को शनि देव की सरल पूजा: सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की परंपरा, मंत्र, आरती, और सबसे बढ़कर सेवा और दान।

पारंपरिक महत्व

शनि चालीसा का पाठ प्रायः शनिवार को, शनि जयंती पर और शनि मंदिरों में होता है। बहुत से लोग इसे तब पढ़ते हैं जब जीवन में कठिन समय चल रहा हो, ताकि मन में धैर्य और भरोसा बना रहे।

परंपरा में शनिदेव को कर्म का फल देने वाले और न्याय के देवता के रूप में देखा जाता है। यह चालीसा उसी भाव से उनकी शरण लेती है: वह उन्हें दयालु कहती है, कठिन समय की कथाओं में विनती और धैर्य का महत्व दिखाती है, और स्मरण तथा सरल पूजा की बात करती है। इसमें आई ज्योतिष की बातें परंपरागत मान्यताएँ हैं; इन्हें किसी निश्चित भविष्यवाणी या डर के कारण के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
चौपाई 4हिय माल मुक्तन मणि दमकेभक्ति भारत में “हिये … दमकै” की जगह।
चौपाई 12लषणहिं शक्ति विकल करिडाराsanskritdocuments.org और रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में “लखनहिं” की जगह “लषणहिं”; दोनों का अर्थ लक्ष्मण है।
चौपाई 16हाथ पैर डरवाय तोरीभक्ति भारत में।
चौपाई 17तेलहिं घर कोल्हू चलवायोsanskritdocuments.org और रणधीर प्रकाशन में “तेलिहिं” की जगह “तेलहिं”।
चौपाई 27वाहन प्रभु के सात सजानाभक्ति भारत में “सुजाना” की जगह “सजाना”।
चौपाई 35स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारीभक्ति भारत और रणधीर प्रकाशन में “सर्व” दो बार।
अंतिम दोहापाठ शनीश्चर देव को कीन्हों विमल तैयारsanskritdocuments.org में “भक्त” की जगह “विमल” (वहाँ इस पंक्ति में छपाई के कुछ बिगड़े अक्षर भी हैं), और उसके बाद एक और दोहा “जो स्तुति दशरथ जी कियो सम्मुख शनि निहार…” है, जो आगे दशरथकृत शनि स्तोत्र की ओर संकेत करता है। भक्ति भारत और रणधीर प्रकाशन में इस चालीसा के अंत में “भक्त” वाला एक ही दोहा है।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
रामसुन्दर (परंपरा के अनुसार)
भाषा
हिन्दी

चौपाई 40 “कहत राम सुन्दर प्रभु दासा” में यह नाम आता है, इसलिए इन्हें रचयिता माना जाता है। अंतिम दोहे में कुछ पुस्तकों में “भक्त” और कुछ में “विमल” शब्द आता है। कवि के बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): sanskritdocuments.org (shani40), भक्ति भारत और रणधीर प्रकाशन की छपी पुस्तक “51 चालीसा संग्रह” (archive.org OCR, “श्री शनि चालीसा (२)”) को पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया। हर पंक्ति इनमें से किसी एक संदर्भ फ़ाइल में ज्यों की त्यों मिलती है; अधिकतर पंक्तियाँ तीनों में मिलती हैं। sanskritdocuments.org के पाठ में छपाई की कई भूलें हैं (“क्शण”, “वोलोकत”, “नशिब”, अंतिम दोहे में बिगड़े अक्षर), इसलिए उन पंक्तियों में भक्ति भारत का पाठ लिया, जो छपी पुस्तक से मेल खाता है। अंतिम दोहे के बाद वाला “जो स्तुति दशरथ जी कियो…” दोहा इस चालीसा का भाग नहीं माना गया: छपी पुस्तक में वह एक दूसरी शनि चालीसा के अंत में है। अर्थ में ज्योतिष की बातें परंपरा की मान्यता के रूप में दी गई हैं, डर के रूप में नहीं।

ये भी पढ़ें

शनि

शनि देव पूजा विधि

शनि · पूजा विधि · रोज़ की पूजा

शनिवार को शनि देव की सरल पूजा: सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की परंपरा, मंत्र, आरती, और सबसे बढ़कर सेवा और दान।

नवग्रह

नवग्रह स्तोत्रम्

नवग्रह, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु · स्तोत्र · संस्कृत

जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्

सूर्य

सूर्य को अर्घ्य देने की विधि

सूर्य · पूजा विधि · रोज़ की पूजा

रोज़ सुबह सूर्य देव को जल देने की सरल विधि: लोटा, सूर्योदय का समय, गिरती धार, अर्घ्य का मंत्र और सूर्य के बारह नाम; सूर्य को सीधे न देखने की सावधानी के साथ।

शनि देव के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शनि चालीसा किसने लिखी?

चौपाई 40 में “राम सुन्दर प्रभु दासा” आता है, इसलिए रामसुंदर को रचयिता माना जाता है। उनके बारे में और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

शनि चालीसा कब पढ़ी जाती है?

प्रायः शनिवार को, शनि जयंती पर और शनि मंदिर में दर्शन के समय। कठिन समय में धैर्य के लिए भी लोग इसे पढ़ते हैं।

क्या शनिदेव केवल कष्ट देते हैं?

चालीसा स्वयं उन्हें “दयाला” और भक्तों का पालन करने वाला कहती है, और कहती है कि वे प्रसन्न होकर रंक को राजा बना देते हैं। कथाओं में भी विनती करने पर उनकी कृपा से सुख लौटता है।

वाहन और चरण वाली चौपाइयों का क्या अर्थ है?

ये ज्योतिष की परंपरागत मान्यताएँ हैं, जिन्हें चालीसा दोहराती है। इन्हें किसी निश्चित भविष्यवाणी के रूप में या डरने के लिए नहीं पढ़ना चाहिए।

क्या पीपल पर जल और दीप-दान आवश्यक है?

चालीसा इसे शनिवार के एक उपाय के रूप में बताती है; यह परंपरा है, अनिवार्य नियम नहीं। श्रद्धा से पाठ और स्मरण ही इसका मूल भाव है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

सुधार भेजें