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दशरथकृत शनि स्तोत्र

पद्मपुराण की कथा में राजा दशरथ द्वारा की गई शनि देव की स्तुति "नमः कृष्णाय नीलाय": दस श्लोक, कथा, अर्थ और शब्दार्थ सहित।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. कब पढ़ें
  5. विधि
  6. पाठ-भेद
  7. रचयिता और स्रोत
  8. ये भी पढ़ें
  9. सवाल-जवाब
  10. सुधार सुझाएँ

दशरथ उवाच

नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च ।नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः ॥२८॥

namaḥ kṛṣṇāya nīlāya śitikaṇṭhanibhāya ca |
namaḥ kālāgnirūpāya kṛtāntāya ca vai namaḥ ||

अर्थ: राजा दशरथ कहते हैं: जो श्याम और नील वर्ण के हैं, जिनकी आभा नीलकंठ जैसी है, उन्हें नमस्कार; जो कालाग्नि के रूप हैं और कृतान्त (सबका अंत करने वाले) हैं, उन्हें नमस्कार।

कृष्णाय
श्याम वर्ण वाले को
नीलाय
नीले वर्ण वाले को
शितिकण्ठनिभाय
नीलकंठ जैसी आभा वाले को
कालाग्निरूपाय
प्रलय की अग्नि के रूप वाले को
कृतान्ताय
अंत करने वाले को

नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते ॥२९॥

namo nirmāṃsadehāya dīrghaśmaśrujaṭāya ca |
namo viśālanetrāya śuṣkodarabhayākṛte ||

अर्थ: जिनका शरीर दुबला है, जिनकी लंबी दाढ़ी-मूँछ और जटाएँ हैं, उन्हें नमस्कार; जिनके नेत्र बड़े हैं, पेट सूखा है और रूप भय जगाने वाला है, उन्हें नमस्कार।

निर्मांसदेहाय
दुबले शरीर वाले को
दीर्घश्मश्रुजटाय
लंबी दाढ़ी और जटा वाले को
विशालनेत्राय
बड़े नेत्रों वाले को
शुष्कोदर
सूखे पेट वाले
भयाकृते
भयानक आकृति वाले को

नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नमः ।नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥३०॥

namaḥ puṣkalagātrāya sthūlaromṇe’tha vai namaḥ |
namo dīrghāya śuṣkāya kāladaṃṣṭra namo’stu te ||

अर्थ: विशाल शरीर वाले को नमस्कार, मोटे रोमों वाले को नमस्कार; लंबे और सूखे शरीर वाले को नमस्कार; हे काल जैसी दाढ़ों वाले, आपको नमस्कार।

पुष्कलगात्राय
विशाल शरीर वाले को
स्थूलरोम्णे
मोटे रोमों वाले को
दीर्घाय
लंबे को
कालदंष्ट्र
हे काल जैसी दाढ़ों वाले

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः ।नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥३१॥

namaste koṭarākṣāya durnirīkṣyāya vai namaḥ |
namo ghorāya raudrāya bhīṣaṇāya kapāline ||

अर्थ: गहरी (कोटर जैसी) आँखों वाले आपको नमस्कार, जिन्हें देख पाना कठिन है उन्हें नमस्कार; घोर, रौद्र, भीषण और कपाल धारण करने वाले को नमस्कार।

कोटराक्षाय
गहरी आँखों वाले को
दुर्निरीक्ष्याय
जिन्हें देखना कठिन है उन्हें
रौद्राय
उग्र रूप वाले को
कपालिने
कपाल धारण करने वाले को

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुख नमोऽस्तु ते ।सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥३२॥

namaste sarvabhakṣāya valīmukha namo’stu te |
sūryaputra namaste’stu bhāskare’bhayadāya ca ||

अर्थ: सबको (काल रूप में) भक्षण करने वाले आपको नमस्कार; हे झुर्रियों वाले मुख वाले, आपको नमस्कार। हे सूर्यपुत्र, आपको नमस्कार; हे भास्कर-पुत्र, अभय देने वाले, आपको नमस्कार।

सर्वभक्षाय
सबको भक्षण करने वाले को
वलीमुख
हे झुर्रियों वाले मुख वाले
सूर्यपुत्र
हे सूर्य के पुत्र
भास्करे
हे भास्कर के पुत्र
अभयदाय
अभय देने वाले को

अधोदृष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तु ते ॥३३॥

adhodṛṣṭe namaste’stu saṃvartaka namo’stu te |
namo mandagate tubhyaṃ nistriṃśāya namo’stu te ||

अर्थ: हे नीचे की ओर दृष्टि रखने वाले, आपको नमस्कार; हे संवर्तक (प्रलय करने वाले), आपको नमस्कार। धीमी गति वाले आपको नमस्कार; तलवार जैसे तीक्ष्ण आपको नमस्कार।

अधोदृष्टे
हे नीचे दृष्टि रखने वाले
संवर्तक
हे प्रलय करने वाले
मन्दगते
हे धीमी चाल वाले
निस्त्रिंशाय
तलवार जैसे तीक्ष्ण को

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः ॥३४॥

tapasā dagdhadehāya nityaṃ yogaratāya ca |
namo nityaṃ kṣudhārtāya atṛptāya ca vai namaḥ ||

अर्थ: तपस्या से जिनका शरीर तपा हुआ है और जो सदा योग में लगे रहते हैं, उन्हें नमस्कार; जो सदा भूखे और अतृप्त रहते हैं, उन्हें नमस्कार।

तपसा
तपस्या से
दग्धदेहाय
तपे हुए शरीर वाले को
योगरताय
योग में लगे रहने वाले को
क्षुधार्ताय
भूख से पीड़ित को
अतृप्ताय
जो कभी तृप्त न हों उन्हें

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मजसूनवे ।तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥३५॥

jñānacakṣurnamaste’stu kaśyapātmajasūnave |
tuṣṭo dadāsi vai rājyaṃ ruṣṭo harasi tatkṣaṇāt ||

अर्थ: हे ज्ञान रूपी नेत्र वाले, कश्यप के पुत्र (सूर्य) के पुत्र, आपको नमस्कार। आप प्रसन्न होकर राज्य दे देते हैं और रुष्ट होकर उसी क्षण छीन लेते हैं।

ज्ञानचक्षुः
ज्ञान रूपी नेत्र वाले
कश्यपात्मजसूनवे
कश्यप के पुत्र (सूर्य) के पुत्र को
तुष्टः
प्रसन्न होकर
रुष्टः
रुष्ट होकर
तत्क्षणात्
उसी क्षण

देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः ।त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः ॥३६॥

devāsuramanuṣyāśca siddhavidyādharoragāḥ |
tvayā vilokitāḥ sarve nāśaṃ yānti samūlataḥ ||

अर्थ: देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और नाग, आपकी (कोप भरी) दृष्टि पड़ने पर सब जड़ से नष्ट हो जाते हैं। यहाँ दशरथ शनि देव की शक्ति का वर्णन करके उनसे कृपा माँगने की भूमिका बनाते हैं।

सिद्धविद्याधरोरगाः
सिद्ध, विद्याधर और नाग
विलोकिताः
देखे गए
नाशं यान्ति
नष्ट हो जाते हैं
समूलतः
जड़ से

प्रसादं कुरु मे देव वरार्होऽहमुपागतः ।एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः ॥३७॥

prasādaṃ kuru me deva varārho’hamupāgataḥ |
evaṃ stutastadā saurirgraharājo mahābalaḥ ||

अर्थ: हे देव, मुझ पर प्रसन्न होइए; मैं वर पाने की आशा लेकर आपके पास आया हूँ। (कथा आगे कहती है:) इस प्रकार स्तुति किए जाने पर ग्रहों के राजा, महाबली शनि देव (प्रसन्न होकर फिर बोले)।

प्रसादं कुरु
कृपा कीजिए
वरार्हः
वर पाने योग्य
उपागतः
पास आया हूँ
सौरिः
सूर्यपुत्र शनि
ग्रहराजः
ग्रहों के राजा

परिचय

दशरथकृत शनि स्तोत्र पद्मपुराण के उत्तरखण्ड (अध्याय 33) की एक कथा से है। ज्योतिषियों ने राजा दशरथ को बताया कि शनि रोहिणी नक्षत्र को भेदने वाले हैं, जिससे बारह वर्ष का अकाल पड़ेगा। प्रजा की रक्षा के लिए दशरथ दिव्य रथ पर नक्षत्र-मंडल तक गए और शनि के सामने खड़े हो गए। उनके साहस से प्रसन्न होकर शनि ने वर दिया, और तब दशरथ ने यह स्तुति की।

स्तुति में शनि देव के रूप का वर्णन है: श्याम-नील वर्ण, दुबला शरीर, लंबी जटाएँ, धीमी चाल और नीचे की ओर दृष्टि। साथ ही उनकी शक्ति का भी, कि वे प्रसन्न हों तो राज्य दे दें और रुष्ट हों तो उसी क्षण छीन लें। अंत में दशरथ विनम्रता से उनकी कृपा माँगते हैं।

भावार्थ

यह स्तुति एक राजा की है जो अपनी प्रजा के लिए अकाल टालने निकला था। दशरथ शनि देव के रूप को बिना कुछ छिपाए देखते हैं: श्याम वर्ण, दुबला शरीर, लंबी जटाएँ, धीमी चाल, नीचे झुकी दृष्टि, तप से तपा हुआ शरीर। फिर उनकी शक्ति को मानते हैं कि वे प्रसन्न हों तो राज्य दे सकते हैं और रुष्ट हों तो छीन सकते हैं, और देवता भी उनकी दृष्टि से बच नहीं पाते।

इतना कहकर दशरथ कोई अहंकार नहीं, केवल विनम्र प्रार्थना करते हैं: मुझ पर कृपा कीजिए। पुराण में शनि देव इस स्तुति से प्रसन्न होते हैं। स्तोत्र का भाव यही है कि शनि देव को न्याय और कर्मफल की शक्ति के रूप में आदर से प्रणाम किया जाए, भय से नहीं।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • शनिवार को
  • शनि जयंती पर
  • शनिवार के व्रत या शनि देव की पूजा में
  • जब मन भारी हो और धैर्य की प्रार्थना करनी हो

पढ़ने की विधि

  • शनिवार को स्नान के बाद शनि देव या हनुमान जी के चित्र के सामने, या पीपल के पास, दीप जलाकर बैठें।
  • स्तोत्र धीरे-धीरे, विनम्र भाव से पढ़ें; हर "नमः" के साथ मन में प्रणाम करें।
  • पुराण की कथा में शनि देव शमी के पत्तों से पूजा, तिल-उड़द और लोहे के दान की बात कहते हैं; जो कर सकें करें, पर पाठ के लिए ये आवश्यक नहीं हैं।
पूरी विधिशनि देव पूजा विधिशनिवार को शनि देव की सरल पूजा: सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की परंपरा, मंत्र, आरती, और सबसे बढ़कर सेवा और दान।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
पूरा स्तोत्रनमः कृष्णाय नीलाय शिखिकण्ठनिभाय च । नमो नीलमुखाब्जाय नीलोत्पलनिभाय च ॥sanskritdocuments.org का पाठ (11 श्लोक) इस तरह शुरू होता है; उसमें "नमः कालाग्निरूपाय" वाली पंक्ति नहीं है और कई पंक्तियों का क्रम व शब्द पद्मपुराण के पाठ से अलग हैं। vignanam.org का पाठ भी इसी दूसरी परंपरा का है ("शिखिखण्डनिभाय", "नीलमधूकाय")।
श्लोक 32भास्करे भयदाय चsa.wikisource.org के पद्मपुराण-पाठ में अवग्रह के बिना छपा है। यहाँ "भास्करेऽभयदाय" (अभय देने वाले) पढ़ा गया है, जो sanskritdocuments.org ("भास्कराभयदायिने") और vignanam.org ("भास्वरोभयदायिने") के अर्थ से मेल खाता है।
श्लोक 37प्रसादं कुरु मे सौरे वरदोऽसि महाबलsanskritdocuments.org का पाठ; vignanam.org में "प्रसादं कुरु मे सौरे प्रणत्वाहित्वमर्थितः" है।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
राजा दशरथ (पद्मपुराण की कथा में वक्ता)
ग्रंथ / स्रोत
पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 33, श्लोक 28–37
भाषा
संस्कृत

पद्मपुराण के उत्तरखण्ड, अध्याय 33 में यह स्तुति राजा दशरथ करते हैं; यह कथा वहाँ शिव जी नारद को सुनाते हैं। पुराण की रचना परंपरा से वेदव्यास की मानी जाती है।

sa.wikisource.org पर दिए पद्मपुराण के पाठ में यह अध्याय "दशरथकृतशनिस्तोत्रं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः" कहलाता है। इसी नाम से एक दूसरा पाठ भी प्रचलित है (sanskritdocuments.org, vignanam.org), जिसकी कई पंक्तियाँ और उनका क्रम अलग है; यहाँ पद्मपुराण का अपना पाठ दिया गया है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sa.wikisource.org पर दिए पद्मपुराण (उत्तरखण्ड, अध्याय 33, श्लोक 28–37) से लिया गया और sanskritdocuments.org तथा vignanam.org के दशरथकृत शनि स्तोत्र से मिलाया गया। sanskritdocuments.org और vignanam.org का पाठ दूसरी परंपरा का है और पद्मपुराण के छपे पाठ से कई पंक्तियों में अलग है, इसलिए मुख्य पाठ स्वयं पद्मपुराण से लिया गया, जिसका नाम यह स्तोत्र धारण करता है। श्लोक-संख्या पुराण के अध्याय की है (28–37)। पुराण-पाठ में अवग्रह नहीं छपे; यहाँ सामान्य वर्तनी में अवग्रह लगाया गया है (नमोऽस्तु, भास्करेऽभयदाय), शब्द नहीं बदले।

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शनि देव के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दशरथकृत शनि स्तोत्र किस ग्रंथ से है?

पद्मपुराण के उत्तरखण्ड, अध्याय 33 से। वहाँ शिव जी नारद को राजा दशरथ और शनि देव की कथा सुनाते हैं, और यह स्तुति उसी कथा में (श्लोक 28–37) आती है।

राजा दशरथ ने यह स्तुति क्यों की?

शनि रोहिणी नक्षत्र को भेदने वाले थे, जिससे बारह वर्ष का अकाल पड़ता। प्रजा को बचाने के लिए दशरथ शनि के सामने गए; उनके साहस से प्रसन्न होकर शनि ने वर दिया, और तब दशरथ ने यह स्तुति की।

क्या इस स्तोत्र की कोई फलश्रुति है?

पद्मपुराण की कथा में आगे (श्लोक 41) शनि देव कहते हैं कि जो इस स्तोत्र को दिन में एक या दो बार पढ़ेगा, वह पीड़ा से मुक्त होगा। यह पुराण का कथन है, जो यहाँ दिए दस श्लोकों के बाद आता है।

क्या यह साढ़ेसाती में ही पढ़ा जाता है?

बहुत से लोग साढ़ेसाती या ढैय्या के समय इसे पढ़ते हैं, पर स्तोत्र ऐसा कोई नियम नहीं बनाता। यह शनि देव को प्रणाम और प्रार्थना है, जिसे कोई भी, कभी भी श्रद्धा से पढ़ सकता है; इसके लिए किसी भय की ज़रूरत नहीं।

इस स्तोत्र के अलग-अलग पाठ क्यों मिलते हैं?

इसी नाम से दो परंपराएँ प्रचलित हैं। एक पद्मपुराण का पाठ है ("नमः कालाग्निरूपाय" वाला), जो यहाँ दिया गया है; दूसरा पाठ ("नमो नीलमुखाब्जाय" वाला) कुछ स्तोत्र-संग्रहों में है। अंतर पाठ-भेद में बताया गया है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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