शनि

पूजा विधि · शनि · रोज़ की पूजा

शनि देव पूजा विधि

शनिवार को शनि देव की सरल पूजा: सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की परंपरा, मंत्र, आरती, और सबसे बढ़कर सेवा और दान।

इस पेज पर
  1. परिचय
  2. एक नज़र में
  3. कब करें
  4. सामग्री
  5. तैयारी
  6. चित्र या मूर्ति
  7. संकल्प
  8. चरण-दर-चरण विधि
  9. पाठ
  10. भोग
  11. समापन
  12. छोटी विधि
  13. परंपराओं में अंतर
  14. ये भी पढ़ें
  15. स्रोत
  16. सवाल-जवाब
  17. सुधार सुझाएँ
रोज़ की पूजा

यह शनिवार को शनि देव की सरल पूजा है: सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की परंपरा, मंत्र, आरती, और सबसे बढ़कर सेवा और दान। कई परंपराओं में शनि देव की मूर्ति घर में नहीं रखी जाती और उनकी पूजा मंदिर में, पीपल के पास या चित्र के सामने होती है; यह पन्ना तीनों जगहों के लिए है। ग्रह-शांति के जप-हवन, मंदिर का तेल-अभिषेक जैसा अनुष्ठान और ज्योतिष के उपाय यहाँ नहीं हैं; उनके लिए किसी जानकार पुरोहित से पूछें।

परिचय

शनि देव सूर्य और छाया के पुत्र हैं, और उन्हें न्याय और कर्मफल से जोड़ा जाता है: जैसा कर्म, वैसा फल। इसलिए उनकी उपासना का मूल भाव डर नहीं, बल्कि अनुशासन, धैर्य, ईमानदारी और सेवा है। शनिवार उनका दिन है; इस दिन सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की पूजा और ज़रूरतमंदों की मदद की परंपरा है।

शनि देव की पूजा के बारे में परंपराएँ अलग-अलग बातें कहती हैं। बहुत-से परिवार शनि देव की मूर्ति घर के पूजा-स्थान में नहीं रखते; वे शनिवार को मंदिर में या पीपल के पास दीपक जलाते हैं, और घर में चित्र के सामने या नवग्रह के साथ प्रार्थना करते हैं। कई घरों में शनिवार को हनुमान जी की पूजा भी साथ होती है। नीचे की विधि अपनी पारिवारिक रीत के अनुसार घर, मंदिर या पीपल, कहीं भी की जा सकती है।

एक नज़र में

समय
शनिवार; सुबह स्नान के बाद, या शाम को सूर्यास्त के आसपास दीपक के समय
अवधि
लगभग 15–20 मिनट; सेवा और दान अलग से
कौन कर सकता है
कोई भी श्रद्धा रखने वाला: स्त्री, पुरुष, बुज़ुर्ग; बच्चे दीपक और दान में साथ दे सकते हैं
मुख्य सामग्री
सरसों का तेल और दीपक, काले तिल, साबुत उड़द, नीले या काले फूल, दान की वस्तु
आरती
जय जय श्री शनिदेव

पूजा कब करें

  • हर शनिवार। घर की पूजा सुबह स्नान के बाद की जा सकती है; पीपल के पास और मंदिर में दीपक जलाने की रीत ज़्यादातर शाम को, सूर्यास्त के आसपास है। शनिवार व्रत की बातें साइट के शनिवार व्रत पन्ने पर हैं।
  • ज्येष्ठ अमावस्या को शनि जयंती मनाई जाती है। शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या शनि अमावस्या और शनिवार का प्रदोष शनि प्रदोष कहलाता है; इन दिनों भी यह पूजा की जाती है।
  • कई घरों में शनिवार को शनि देव के साथ हनुमान जी की पूजा और हनुमान चालीसा का पाठ भी होता है।

पूजा सामग्री

  • आवश्यक इसके बिना यह विधि नहीं होती
  • वैकल्पिक हो तो अच्छा; न हो तो विकल्प दिया है
  • परंपरा-विशेष कुछ परंपराओं में ही
सामग्रीउपयोगस्थितिविकल्प / टिप्पणी
सरसों का तेलदीपक जलाने के लिए, और मंदिर में अर्पण के लिएपरंपरा-विशेषदक्षिण भारत में शनि के लिए तिल के तेल का दीपक जलाया जाता है; जो तेल आपकी परंपरा में हो, वही।
मिट्टी या लोहे का दीपकतेल का दीपक जलाने के लिएपरंपरा-विशेषकई जगह शनि के लिए लोहे का दीपक प्रचलित है; मिट्टी का साधारण दीया भी उतना ही ठीक है।
काले तिलअर्पण, दीपक में डालने और दान के लिएपरंपरा-विशेषन हों तो छोड़ दें; दान किसी और रूप में करें।
साबुत काली उड़दअर्पण और दान के लिएपरंपरा-विशेषन हो तो छोड़ दें।
नीले या काले फूल (जैसे अपराजिता)पुष्प अर्पण के लिएवैकल्पिकजो भी फूल मिले; न हो तो केवल दीपक और प्रणाम।
शनि देव या नवग्रह का चित्रघर में ध्यान और पूजा के लिएवैकल्पिकजिन घरों में चित्र न रखने की रीत है, वहाँ दीपक जलाकर मन में ध्यान करें, या मंदिर अथवा पीपल के पास पूजा करें।
जल का लोटापीपल को जल देने के लिएवैकल्पिकघर में पूजा हो तो आचमन के लिए।
धूपधूप अर्पणवैकल्पिकन हो तो छोड़ दें।
दान की वस्तु: काले तिल, उड़द, तेल, भोजन, कंबल, जूते-चप्पल या कपड़ेज़रूरतमंद को देने के लिएवैकल्पिककोई वस्तु न हो तो किसी बुज़ुर्ग, बीमार या मेहनत करने वाले की मदद में अपना समय दें।
नीला या काला वस्त्रचौकी पर बिछाने या पहनने के लिएपरंपरा-विशेषकोई भी साफ़ कपड़ा चलेगा।

स्थान और अपनी तैयारी

  • घर में: शनिवार को स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। अगर आपके घर में शनि देव या नवग्रह का चित्र रखने की रीत है, तो उसके सामने पूजा करें; अगर नहीं है, तो पूजा-स्थान पर तेल का दीपक जलाकर मन में ध्यान करें।
  • मंदिर में: शनि मंदिर या नवग्रह मंदिर में मंदिर की रीत के अनुसार दीपक, तिल और तेल चढ़ाएँ। भीड़ में दूसरों का ध्यान रखें और तेल इधर-उधर न बहाएँ।
  • पीपल के पास: पेड़ के आसपास की जगह साफ़ हो। दीपक ऐसी जगह रखें जहाँ हवा से न गिरे और पेड़ को नुक़सान न पहुँचे; पन्नी या कचरा वहाँ न छोड़ें।

चित्र या मूर्ति कैसे रखें

  • घर में पूजा हो तो चौकी पर नीला या काला साफ़ कपड़ा बिछाकर शनि देव या नवग्रह का चित्र रखें।
  • गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के अनुसार तेल का दीपक पूजा करने वाले की बाईं ओर रखा जाता है (घी का दीपक दाहिनी ओर)। तिल, उड़द और फूल सामने रहें।
  • दिशा के बारे में परंपराओं में अंतर है; घर की बनावट के अनुसार जैसा सुविधाजनक हो, वैसे बैठें।

संकल्प

पूजा से पहले मन में साफ़ निश्चय करना कि किसकी, किस भाव से पूजा कर रहे हैं। दाहिने हाथ में थोड़ा जल, फूल और काले तिल लेकर संकल्प बोलें और जल नीचे छोड़ दें।

हे शनि देव, आज शनिवार को मैं (अपना नाम) आपकी पूजा कर रहा/रही हूँ। मुझे धैर्य, ईमानदारी और मेहनत की शक्ति दें, और आज मेरे हाथों से किसी ज़रूरतमंद की सेवा हो।

ग्रह-शांति के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों का संकल्प अलग होता है, जो पुरोहित करवाते हैं। शनिवार की सरल पूजा के लिए अपनी भाषा का यह संकल्प काफ़ी है।

पूजा की विधि, चरण-दर-चरण

  1. १स्नान और तैयारी

    क्या करें
    शनिवार को स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और पूजा की जगह तैयार करें।
    कैसे करें
    घर में चौकी तैयार करें, या मंदिर अथवा पीपल के पास जाने के लिए दीपक, तेल, तिल, उड़द और फूल एक थैली में रख लें।
    भाव
    आज का दिन अनुशासन और सेवा का है।
    विकल्प
    बाहर न जा सकें तो घर में ही दीपक जलाएँ; वह भी पूरी पूजा है।
  2. २सरसों के तेल का दीपक

    क्या करें
    सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
    कैसे करें
    दीपक में तेल भरें, चाहें तो उसमें काले तिल के कुछ दाने डाल दें, और बत्ती जलाएँ। घर में दीपक अपनी बाईं ओर, मंदिर में दीपक-स्थान पर और पीपल के पास जड़ के पास रखें। फिर नीचे का श्लोक पढ़कर दीपक को प्रणाम करें।
    भाव
    दीपक का प्रकाश मन के अँधेरे को दूर करे।
    पाठ

    दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
    दीपो हरतु मे पापं सांध्यदीप नमोऽस्तु ते॥

    अर्थ: दीपक की ज्योति परब्रह्म है, दीपक की ज्योति जनार्दन है। दीपक मेरे पापों को दूर करे; हे संध्या के दीपक, तुम्हें नमस्कार।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: सांध्यदीप

    विकल्प
    सरसों का तेल न हो तो तिल का तेल; श्लोक न आए तो प्रणाम ही काफ़ी है।
  3. ३संकल्प

    क्या करें
    हाथ में जल, फूल और काले तिल लेकर ऊपर दिया सरल संकल्प बोलें।
    कैसे करें
    संकल्प बोलकर जल और तिल नीचे छोड़ दें।
    भाव
    यह पूजा डर से नहीं, धैर्य और सच्चाई की प्रार्थना से है।
    विकल्प
    शब्द याद न रहें तो मन में कहें: हे शनि देव, मुझे धैर्य दें।
  4. ४ध्यान

    क्या करें
    शनि देव के रूप का ध्यान करें।
    कैसे करें
    हाथ जोड़कर नीचे का श्लोक पढ़ें।
    भाव
    सूर्य के पुत्र, धीरे और स्थिर चलने वाले न्यायप्रिय शनि देव का स्मरण।
    पाठ

    नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
    छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥

    अर्थ: जिनकी आभा नीले अंजन (काजल) जैसी है, जो सूर्य के पुत्र और यम के बड़े भाई हैं, जो छाया और सूर्य से उत्पन्न हुए हैं, उन शनैश्चर (धीरे चलने वाले) देव को मैं नमस्कार करता हूँ।

    नवग्रह स्तोत्रम्: पूरा पाठ और अर्थ

    विकल्प
    श्लोक न पढ़ सकें तो 'जय शनि देव' कहकर प्रणाम करें।
  5. ५तिल, उड़द और फूल

    क्या करें
    काले तिल, साबुत उड़द और नीले या काले फूल अर्पित करें।
    कैसे करें
    घर में चित्र के सामने एक छोटी कटोरी में तिल और उड़द रखें और फूल चढ़ाएँ; मंदिर में अर्पण-स्थान पर। हर चीज़ अर्पित करते समय नीचे का मंत्र बोलें।
    भाव
    जो कुछ हम सामान्य मानते हैं, वही प्रेम से अर्पित।
    पाठ

    ॐ शं शनैश्चराय नमः

    अर्थ: धीरे चलने वाले शनि देव को नमस्कार।

    मंत्र का अर्थ और उच्चारण

    विकल्प
    तिल-उड़द न हों तो केवल फूल; फूल भी न हों तो प्रणाम।
  6. ६तेल अर्पण (मंदिर में)

    क्या करें
    शनि मंदिर में मंदिर की रीत के अनुसार थोड़ा सरसों का तेल चढ़ाएँ।
    कैसे करें
    कई मंदिरों में शनि की शिला या प्रतिमा पर तेल चढ़ाने की रीत है, तो कई में तेल एक पात्र में इकट्ठा किया जाता है। थोड़ा तेल काफ़ी है; उसे बर्बाद न करें। घर में चित्र पर तेल न चढ़ाएँ; घर में तेल केवल दीपक में।
    भाव
    अर्पण की मात्रा नहीं, भाव मायने रखता है।
    विकल्प
    मंदिर न जा सकें तो यह चरण छोड़ दें; घर का दीपक ही अर्पण है।
  7. ७पीपल को जल और दीपक

    क्या करें
    शाम को पीपल की जड़ में जल दें और उसके पास सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
    कैसे करें
    जड़ में धीरे-धीरे जल चढ़ाएँ, फिर दीपक जलाकर हाथ जोड़ें और नीचे का श्लोक पढ़ें। कई लोग पीपल की सात परिक्रमा करते हैं; करें तो धीरे, शांत मन से।
    भाव
    पीपल को परंपरा में देवताओं का वास माना गया है; पेड़ की सेवा प्रकृति की सेवा भी है।
    पाठ

    मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे।
    अग्रतः शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नमः॥

    अर्थ: जिनकी जड़ में ब्रह्मा, बीच में विष्णु और ऊपर के भाग में शिव का रूप है, उन वृक्षों के राजा पीपल को नमस्कार।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: अश्वत्थस्तोत्रम् (ब्रह्म-नारद संवाद), श्लोक 16

    विकल्प
    पास में पीपल न हो तो यह चरण छोड़ दें; घर का दीपक काफ़ी है।
  8. ८हनुमान जी का स्मरण

    क्या करें
    शनिवार को कई घरों में हनुमान जी को भी प्रणाम किया जाता है।
    कैसे करें
    हनुमान जी के चित्र के सामने या मन में नीचे का श्लोक पढ़ें; समय हो तो हनुमान चालीसा पढ़ें।
    भाव
    राम-भक्त हनुमान जी की तरह निडर होकर सेवा करना।
    पाठ

    मनोजवं मारुततुल्यवेगं
    जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
    वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
    श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

    अर्थ: जो मन जैसी गति वाले और पवन जैसे वेग वाले हैं, जिन्होंने इंद्रियों को जीत लिया है और जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन पवनपुत्र, वानरों के प्रमुख, श्री राम के दूत की मैं शरण लेता हूँ।

    मनोजवं मारुततुल्यवेगं (हनुमान वन्दना): पूरा पाठ और अर्थ

    विकल्प
    आपकी परंपरा में यह न हो तो यह चरण छोड़ दें।
  9. ९जप या पाठ

    क्या करें
    शनि देव के मंत्र का जप करें, या शनि चालीसा अथवा दशरथकृत शनि स्तोत्र पढ़ें।
    कैसे करें
    11, 21 या 108 बार, धीमी आवाज़ में या मन में।
    भाव
    धैर्य और स्थिर मन की प्रार्थना।
    पाठ

    ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात्॥

    अर्थ: हम कौए के ध्वज वाले को जानते हैं, हाथ में खड्ग वाले का ध्यान करते हैं; वे शनि देव हमें प्रेरणा दें।

    मंत्र का अर्थ और उच्चारण

    विकल्प
    मंत्र कठिन लगे तो 'जय शनि देव' या 'ॐ शं शनैश्चराय नमः' ही जपें।
  10. १०आरती

    क्या करें
    'जय जय श्री शनिदेव' गाते हुए आरती करें।
    कैसे करें
    तेल के दीपक से, दीपक को पहले चरणों के सामने चार बार, नाभि के सामने दो बार, मुख के सामने एक बार और फिर पूरे रूप के सामने सात बार घुमाएँ। आरती के बाद थोड़ा जल गिराएँ और दोनों हथेलियों से आरती लें।
    भाव
    शनि देव का गुणगान, शांत और भरोसे भरे मन से।
    विकल्प
    बोल याद न हों तो दीपक घुमाते हुए 'जय शनि देव' कहें।
    आरतीजय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारीपूरी शनि देव की आरती पढ़ें
  11. ११सेवा और दान

    क्या करें
    आज किसी ज़रूरतमंद की सेवा करें या कुछ दान दें।
    कैसे करें
    काले तिल, उड़द, सरसों का तेल, भोजन, कंबल, जूते-चप्पल या कपड़े किसी ज़रूरतमंद को दें। किसी बुज़ुर्ग, बीमार या मेहनत-मज़दूरी करने वाले की मदद करें, उनसे आदर से बात करें। कई लोग शनिवार को कौओं और कुत्तों को भी खाना खिलाते हैं। दान बिना दिखावे के, बदले में कुछ चाहे बिना दें।
    भाव
    परंपरा में शनि देव को मेहनत करने वालों, बुज़ुर्गों और कमज़ोर लोगों से जोड़ा जाता है; उनकी सेवा और सम्मान ही सबसे बड़ी शनि-पूजा है।
    विकल्प
    देने को कुछ न हो तो अपना समय और मीठी वाणी दें; यह भी दान है।

पूजा में पढ़े जाने वाले पाठ

नवग्रह

नवग्रह स्तोत्रम्

नवग्रह, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु · स्तोत्र · संस्कृत

ध्यान का श्लोक इसी से है (चरण 4)

हनुमान

हनुमान चालीसा

हनुमान · चालीसा · अवधी

शनिवार को हनुमान जी के स्मरण के साथ (चरण 8)

भोग

  • तिल और गुड़ से बनी चीज़ें, जैसे तिल के लड्डू
  • उड़द की दाल की खिचड़ी
  • मौसम के फल

शनिवार को भोग से ज़्यादा महत्व दान और सेवा का है। जो भोग लगाएँ, उसका प्रसाद किसी ज़रूरतमंद को भी दें। भोग सात्त्विक हो।

प्रार्थना और समापन

हे शनि देव, इस पूजा में जो कमी रह गई हो, उसे क्षमा करें। मुझे कठिन समय में धैर्य, अच्छे समय में विनम्रता और हर समय सच्चाई से मेहनत करने की शक्ति दें।

क्षमा प्रार्थना

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥

अर्थ: हे परमेश्वर, मैं न आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; मुझे क्षमा करें। हे देवों के स्वामी, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें।

स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: पञ्चदेव-पूजा और देवपूजा के सामान्य विधान की क्षमा-याचना

पूजा के बाद

  • पूजा में रखे तिल और उड़द दान कर दें या पक्षियों को डाल दें; फेंकें नहीं।
  • पीपल के पास जलाए दीपक के बुझने के बाद, अगली बार जाएँ तो पुराने दीये उठाकर साफ़ जगह रख दें, ताकि पेड़ के पास गंदगी न हो।
  • दान और सेवा को शनिवार की पूजा का हिस्सा ही मानें; उसे गिनकर या दिखाकर न करें।

समय कम हो तो: छोटी विधि

  1. शनिवार को स्नान करके सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
  2. मन में संकल्प करके 'नीलांजनसमाभासं' पढ़ें या 'जय शनि देव' कहें।
  3. काले तिल, उड़द और फूल अर्पित करें; 'ॐ शं शनैश्चराय नमः' बोलें।
  4. शाम को पीपल की जड़ में जल देकर दीपक जलाएँ, यदि आपकी रीत हो।
  5. 'जय जय श्री शनिदेव' से आरती करें।
  6. किसी ज़रूरतमंद को तिल, उड़द, तेल, भोजन या कपड़े दें, या किसी की मदद करें।

परंपराओं में अंतर

  • घर में मूर्ति: बहुत-से परिवार और परंपराएँ शनि देव की मूर्ति घर के पूजा-स्थान में नहीं रखतीं और पूजा मंदिर या पीपल के पास करती हैं; कुछ घरों में चित्र या नवग्रह का चित्र रखा जाता है। इसका कोई एक नियम सबके लिए नहीं है; अपनी पारिवारिक रीत मानें।
  • उत्तर भारत में सरसों के तेल का दीपक और शिला पर तेल चढ़ाना प्रचलित है; दक्षिण भारत में नवग्रह मंदिरों में शनि (शनैश्चर) के लिए तिल के तेल का दीपक और काले वस्त्र व तिल चढ़ाने की रीत है।
  • कई जगह 'छाया-दान' की रीत है: कटोरी में सरसों का तेल लेकर उसमें अपना चेहरा देखकर वह तेल दान कर दिया जाता है।
  • उत्तर भारत में शनिवार को हनुमान जी की पूजा भी होती है; बहुत-से लोग इस दिन हनुमान चालीसा या सुंदरकांड पढ़ते हैं।
  • महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर जैसे प्रसिद्ध स्थानों पर खुले आसमान के नीचे शनि की शिला है; वहाँ की पूजा उस मंदिर की अपनी रीत से होती है।

ये भी पढ़ें

शनि देव के लिए और

स्रोत और समीक्षा

समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): सांध्यदीप का श्लोक और पीपल का श्लोक (अश्वत्थस्तोत्रम् 16) गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के archive.org स्कैन से; शनि का ध्यान-श्लोक sanskritdocuments के नवग्रहस्तोत्र से; हनुमान-वंदना sanskritdocuments के रामरक्षास्तोत्र से; मंत्र साइट के मंत्र पन्नों से। 'घर में शनि की मूर्ति न रखना' एक व्यापक लोक-मान्यता है जो हिंदी के कई धार्मिक लेखों में मिलती है, पर उसका कोई एक शास्त्रीय नियम नहीं मिला; इसलिए उसे परंपरा के रूप में, बिना किसी डर वाले कारण के, लिखा गया। साढ़ेसाती का प्रश्न केवल डर कम करने के लिए रखा है; कोई ज्योतिषीय उपाय नहीं दिया।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या शनि देव से डरना चाहिए?

नहीं। शनि देव को न्याय और कर्मफल का देवता माना जाता है: वे वही देते हैं जो हमारे कर्म से बनता है। इसलिए उनकी पूजा का भाव डर नहीं, बल्कि ईमानदारी, धैर्य, मेहनत और कमज़ोर लोगों की सेवा है। श्रद्धा और अच्छे आचरण से की गई साधारण पूजा ही सबसे अच्छी है।

क्या घर में शनि देव की मूर्ति रख सकते हैं?

इस पर परंपराएँ अलग हैं। बहुत-से परिवार शनि देव की मूर्ति घर के पूजा-स्थान में नहीं रखते और उनकी पूजा मंदिर, पीपल या नवग्रह के साथ करते हैं; कुछ घरों में चित्र रखा जाता है। आपके परिवार में जो रीत है, वही मानें। चित्र न हो तो भी शनिवार को दीपक जलाकर और सेवा करके पूजा पूरी है।

साढ़ेसाती या ढैया चल रही है, तो क्या करें?

ये ज्योतिष की बातें हैं, और यह पन्ना ज्योतिष के उपाय नहीं बताता। परंपरा जो सबसे सरल राह दिखाती है, वह यही है: शनिवार को दीपक, ईमानदार मेहनत, धैर्य, बुज़ुर्गों और ज़रूरतमंदों की सेवा। किसी से सलाह लें तो ऐसी सलाह से सावधान रहें जो डर दिखाकर महँगे उपाय बताए। कठिन समय सबके जीवन में आता है और बीत भी जाता है।

तेल कहाँ चढ़ाना चाहिए?

मंदिर में, मंदिर की रीत के अनुसार, शिला या प्रतिमा पर या तेल के पात्र में। घर में चित्र पर तेल नहीं चढ़ाया जाता; घर में तेल केवल दीपक में जलाएँ। थोड़ा तेल काफ़ी है; उसे बर्बाद न करें।

क्या महिलाएँ शनि देव की पूजा कर सकती हैं?

हाँ। शनिवार का दीपक, पीपल की पूजा, मंत्र, आरती और दान कोई भी कर सकता है। कुछ मंदिरों की अपनी अलग रीतें रही हैं; मंदिर जाएँ तो वहाँ की व्यवस्था देख लें।

क्या मासिक धर्म के दिनों में यह पूजा कर सकते हैं?

इस पर परिवारों में अलग-अलग रीत है। कई घरों में उन दिनों मंदिर जाना और पूजा-स्थान छूना टाला जाता है, जबकि बहुत-से लोग ऐसा कोई नियम नहीं मानते। जो भी रीत हो, दान, सेवा और मन से प्रार्थना हर दिन की जा सकती है; इसमें डरने की कोई बात नहीं है।

क्या शनिवार का व्रत ज़रूरी है?

नहीं। जो रखना चाहें, वे परंपरा के अनुसार दिन में एक बार भोजन या फलाहार कर सकते हैं, अपनी सेहत देखकर। बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती स्त्रियाँ और दवा लेने वाले व्रत न रखें। व्रत के बिना भी शनिवार की पूजा और दान पूरे हैं।

सुधार सुझाएँ

इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।

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