नवग्रह स्तोत्रम्
नवग्रह, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु · स्तोत्र · संस्कृत
ध्यान का श्लोक इसी से है (चरण 4)

पूजा विधि · शनि · रोज़ की पूजा
शनिवार को शनि देव की सरल पूजा: सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की परंपरा, मंत्र, आरती, और सबसे बढ़कर सेवा और दान।
यह शनिवार को शनि देव की सरल पूजा है: सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की परंपरा, मंत्र, आरती, और सबसे बढ़कर सेवा और दान। कई परंपराओं में शनि देव की मूर्ति घर में नहीं रखी जाती और उनकी पूजा मंदिर में, पीपल के पास या चित्र के सामने होती है; यह पन्ना तीनों जगहों के लिए है। ग्रह-शांति के जप-हवन, मंदिर का तेल-अभिषेक जैसा अनुष्ठान और ज्योतिष के उपाय यहाँ नहीं हैं; उनके लिए किसी जानकार पुरोहित से पूछें।
शनि देव सूर्य और छाया के पुत्र हैं, और उन्हें न्याय और कर्मफल से जोड़ा जाता है: जैसा कर्म, वैसा फल। इसलिए उनकी उपासना का मूल भाव डर नहीं, बल्कि अनुशासन, धैर्य, ईमानदारी और सेवा है। शनिवार उनका दिन है; इस दिन सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की पूजा और ज़रूरतमंदों की मदद की परंपरा है।
शनि देव की पूजा के बारे में परंपराएँ अलग-अलग बातें कहती हैं। बहुत-से परिवार शनि देव की मूर्ति घर के पूजा-स्थान में नहीं रखते; वे शनिवार को मंदिर में या पीपल के पास दीपक जलाते हैं, और घर में चित्र के सामने या नवग्रह के साथ प्रार्थना करते हैं। कई घरों में शनिवार को हनुमान जी की पूजा भी साथ होती है। नीचे की विधि अपनी पारिवारिक रीत के अनुसार घर, मंदिर या पीपल, कहीं भी की जा सकती है।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| सरसों का तेल | दीपक जलाने के लिए, और मंदिर में अर्पण के लिए | परंपरा-विशेष | दक्षिण भारत में शनि के लिए तिल के तेल का दीपक जलाया जाता है; जो तेल आपकी परंपरा में हो, वही। |
| मिट्टी या लोहे का दीपक | तेल का दीपक जलाने के लिए | परंपरा-विशेष | कई जगह शनि के लिए लोहे का दीपक प्रचलित है; मिट्टी का साधारण दीया भी उतना ही ठीक है। |
| काले तिल | अर्पण, दीपक में डालने और दान के लिए | परंपरा-विशेष | न हों तो छोड़ दें; दान किसी और रूप में करें। |
| साबुत काली उड़द | अर्पण और दान के लिए | परंपरा-विशेष | न हो तो छोड़ दें। |
| नीले या काले फूल (जैसे अपराजिता) | पुष्प अर्पण के लिए | वैकल्पिक | जो भी फूल मिले; न हो तो केवल दीपक और प्रणाम। |
| शनि देव या नवग्रह का चित्र | घर में ध्यान और पूजा के लिए | वैकल्पिक | जिन घरों में चित्र न रखने की रीत है, वहाँ दीपक जलाकर मन में ध्यान करें, या मंदिर अथवा पीपल के पास पूजा करें। |
| जल का लोटा | पीपल को जल देने के लिए | वैकल्पिक | घर में पूजा हो तो आचमन के लिए। |
| धूप | धूप अर्पण | वैकल्पिक | न हो तो छोड़ दें। |
| दान की वस्तु: काले तिल, उड़द, तेल, भोजन, कंबल, जूते-चप्पल या कपड़े | ज़रूरतमंद को देने के लिए | वैकल्पिक | कोई वस्तु न हो तो किसी बुज़ुर्ग, बीमार या मेहनत करने वाले की मदद में अपना समय दें। |
| नीला या काला वस्त्र | चौकी पर बिछाने या पहनने के लिए | परंपरा-विशेष | कोई भी साफ़ कपड़ा चलेगा। |
पूजा से पहले मन में साफ़ निश्चय करना कि किसकी, किस भाव से पूजा कर रहे हैं। दाहिने हाथ में थोड़ा जल, फूल और काले तिल लेकर संकल्प बोलें और जल नीचे छोड़ दें।
हे शनि देव, आज शनिवार को मैं (अपना नाम) आपकी पूजा कर रहा/रही हूँ। मुझे धैर्य, ईमानदारी और मेहनत की शक्ति दें, और आज मेरे हाथों से किसी ज़रूरतमंद की सेवा हो।
ग्रह-शांति के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों का संकल्प अलग होता है, जो पुरोहित करवाते हैं। शनिवार की सरल पूजा के लिए अपनी भाषा का यह संकल्प काफ़ी है।
दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं सांध्यदीप नमोऽस्तु ते॥
अर्थ: दीपक की ज्योति परब्रह्म है, दीपक की ज्योति जनार्दन है। दीपक मेरे पापों को दूर करे; हे संध्या के दीपक, तुम्हें नमस्कार।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: सांध्यदीप
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
अर्थ: जिनकी आभा नीले अंजन (काजल) जैसी है, जो सूर्य के पुत्र और यम के बड़े भाई हैं, जो छाया और सूर्य से उत्पन्न हुए हैं, उन शनैश्चर (धीरे चलने वाले) देव को मैं नमस्कार करता हूँ।
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे।
अग्रतः शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नमः॥
अर्थ: जिनकी जड़ में ब्रह्मा, बीच में विष्णु और ऊपर के भाग में शिव का रूप है, उन वृक्षों के राजा पीपल को नमस्कार।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: अश्वत्थस्तोत्रम् (ब्रह्म-नारद संवाद), श्लोक 16
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
अर्थ: जो मन जैसी गति वाले और पवन जैसे वेग वाले हैं, जिन्होंने इंद्रियों को जीत लिया है और जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन पवनपुत्र, वानरों के प्रमुख, श्री राम के दूत की मैं शरण लेता हूँ।
ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम कौए के ध्वज वाले को जानते हैं, हाथ में खड्ग वाले का ध्यान करते हैं; वे शनि देव हमें प्रेरणा दें।
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शनिवार को हनुमान जी के स्मरण के साथ (चरण 8)
शनि · आरती
आरती (चरण 10)
शनिवार को भोग से ज़्यादा महत्व दान और सेवा का है। जो भोग लगाएँ, उसका प्रसाद किसी ज़रूरतमंद को भी दें। भोग सात्त्विक हो।
हे शनि देव, इस पूजा में जो कमी रह गई हो, उसे क्षमा करें। मुझे कठिन समय में धैर्य, अच्छे समय में विनम्रता और हर समय सच्चाई से मेहनत करने की शक्ति दें।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अर्थ: हे परमेश्वर, मैं न आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; मुझे क्षमा करें। हे देवों के स्वामी, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: पञ्चदेव-पूजा और देवपूजा के सामान्य विधान की क्षमा-याचना
सूर्य · आरती
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन
बृहस्पति · आरती
ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): सांध्यदीप का श्लोक और पीपल का श्लोक (अश्वत्थस्तोत्रम् 16) गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के archive.org स्कैन से; शनि का ध्यान-श्लोक sanskritdocuments के नवग्रहस्तोत्र से; हनुमान-वंदना sanskritdocuments के रामरक्षास्तोत्र से; मंत्र साइट के मंत्र पन्नों से। 'घर में शनि की मूर्ति न रखना' एक व्यापक लोक-मान्यता है जो हिंदी के कई धार्मिक लेखों में मिलती है, पर उसका कोई एक शास्त्रीय नियम नहीं मिला; इसलिए उसे परंपरा के रूप में, बिना किसी डर वाले कारण के, लिखा गया। साढ़ेसाती का प्रश्न केवल डर कम करने के लिए रखा है; कोई ज्योतिषीय उपाय नहीं दिया।
नहीं। शनि देव को न्याय और कर्मफल का देवता माना जाता है: वे वही देते हैं जो हमारे कर्म से बनता है। इसलिए उनकी पूजा का भाव डर नहीं, बल्कि ईमानदारी, धैर्य, मेहनत और कमज़ोर लोगों की सेवा है। श्रद्धा और अच्छे आचरण से की गई साधारण पूजा ही सबसे अच्छी है।
इस पर परंपराएँ अलग हैं। बहुत-से परिवार शनि देव की मूर्ति घर के पूजा-स्थान में नहीं रखते और उनकी पूजा मंदिर, पीपल या नवग्रह के साथ करते हैं; कुछ घरों में चित्र रखा जाता है। आपके परिवार में जो रीत है, वही मानें। चित्र न हो तो भी शनिवार को दीपक जलाकर और सेवा करके पूजा पूरी है।
ये ज्योतिष की बातें हैं, और यह पन्ना ज्योतिष के उपाय नहीं बताता। परंपरा जो सबसे सरल राह दिखाती है, वह यही है: शनिवार को दीपक, ईमानदार मेहनत, धैर्य, बुज़ुर्गों और ज़रूरतमंदों की सेवा। किसी से सलाह लें तो ऐसी सलाह से सावधान रहें जो डर दिखाकर महँगे उपाय बताए। कठिन समय सबके जीवन में आता है और बीत भी जाता है।
मंदिर में, मंदिर की रीत के अनुसार, शिला या प्रतिमा पर या तेल के पात्र में। घर में चित्र पर तेल नहीं चढ़ाया जाता; घर में तेल केवल दीपक में जलाएँ। थोड़ा तेल काफ़ी है; उसे बर्बाद न करें।
हाँ। शनिवार का दीपक, पीपल की पूजा, मंत्र, आरती और दान कोई भी कर सकता है। कुछ मंदिरों की अपनी अलग रीतें रही हैं; मंदिर जाएँ तो वहाँ की व्यवस्था देख लें।
इस पर परिवारों में अलग-अलग रीत है। कई घरों में उन दिनों मंदिर जाना और पूजा-स्थान छूना टाला जाता है, जबकि बहुत-से लोग ऐसा कोई नियम नहीं मानते। जो भी रीत हो, दान, सेवा और मन से प्रार्थना हर दिन की जा सकती है; इसमें डरने की कोई बात नहीं है।
नहीं। जो रखना चाहें, वे परंपरा के अनुसार दिन में एक बार भोजन या फलाहार कर सकते हैं, अपनी सेहत देखकर। बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती स्त्रियाँ और दवा लेने वाले व्रत न रखें। व्रत के बिना भी शनिवार की पूजा और दान पूरे हैं।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।