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आरती · शनि

जय जय श्री शनिदेव

शनिदेव की प्रसिद्ध आरती 'जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी': पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ, कठिन शब्द और पाठांतर।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. कब पढ़ें
  7. विधि
  8. पाठ-भेद
  9. रचयिता और स्रोत
  10. ये भी पढ़ें
  11. सवाल-जवाब
  12. सुधार सुझाएँ

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥

अर्थ: हे भक्तों का हित करने वाले श्री शनिदेव, आपकी जय हो, जय हो। हे प्रभु, आप सूर्यदेव के पुत्र हैं और छाया आपकी माता हैं।

श्याम अंग वक्र-दृष्टि चतुर्भुजा धारी।नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥

॥ जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ॥

अर्थ: आपका शरीर साँवला है, दृष्टि तिरछी है और आप चार भुजाएँ धारण करते हैं। हे नाथ, आप नीले वस्त्र पहनते हैं और हाथी की सवारी करते हैं।

क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी।मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥

॥ जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ॥

अर्थ: आपके सिर पर किरीट-मुकुट सुशोभित है और माथा चमक रहा है। गले में मोतियों की माला शोभा देती है; आपके इस रूप पर भक्त न्योछावर है।

मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी।लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥

॥ जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ॥

अर्थ: आपको लड्डू, मिठाई, पान और सुपारी चढ़ाई जाती है। लोहा, तिल, तेल, उड़द और महिषी (भैंस) आपको बहुत प्रिय हैं; परंपरा में शनिदेव के दान में इन्हीं वस्तुओं का नाम आता है।

देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी।विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी॥

॥ जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ॥

अर्थ: देवता, दानव, ऋषि-मुनि और सभी नर-नारी आपका स्मरण करते हैं। विश्वनाथ आपका ध्यान धरते हैं और आपकी शरण में हैं।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

'जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी' शनिदेव की सबसे अधिक गाई जाने वाली आरती है। इसमें शनिदेव को सूर्य और छाया का पुत्र और भक्तों का हित करने वाला देव कहकर उनका रूप, उनकी सवारी और उन्हें प्रिय वस्तुएँ गिनाई गई हैं।

आरती छोटी है: टेक के बाद चार अंतरे। शनिवार की पूजा के अंत में और शनि जयंती पर इसे घरों और शनि मंदिरों में गाया जाता है।

अंतरा-वार अर्थ

  1. मुखड़ा जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी…

    हे भक्तों का हित करने वाले श्री शनिदेव, आपकी जय हो, जय हो। हे प्रभु, आप सूर्यदेव के पुत्र हैं और छाया आपकी माता हैं।

  2. अंतरा १ श्याम अंग वक्र-दृष्टि चतुर्भुजा धारी…

    आपका शरीर साँवला है, दृष्टि तिरछी है और आप चार भुजाएँ धारण करते हैं। हे नाथ, आप नीले वस्त्र पहनते हैं और हाथी की सवारी करते हैं।

  3. अंतरा २ क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी…

    आपके सिर पर किरीट-मुकुट सुशोभित है और माथा चमक रहा है। गले में मोतियों की माला शोभा देती है; आपके इस रूप पर भक्त न्योछावर है।

  4. अंतरा ३ मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी…

    आपको लड्डू, मिठाई, पान और सुपारी चढ़ाई जाती है। लोहा, तिल, तेल, उड़द और महिषी (भैंस) आपको बहुत प्रिय हैं; परंपरा में शनिदेव के दान में इन्हीं वस्तुओं का नाम आता है।

  5. अंतरा ४ देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी…

    देवता, दानव, ऋषि-मुनि और सभी नर-नारी आपका स्मरण करते हैं। विश्वनाथ आपका ध्यान धरते हैं और आपकी शरण में हैं।

भावार्थ

यह आरती शनिदेव का सीधा और सुंदर चित्र खींचती है: सूर्य और छाया के पुत्र, साँवले शरीर वाले, चार भुजाओं वाले, नीले वस्त्र पहने और हाथी पर सवार। सिर पर मुकुट है, माथे पर तेज है और गले में मोतियों की माला है।

फिर आरती उन वस्तुओं को गिनाती है जो शनिदेव की पूजा और दान में चढ़ाई जाती हैं, और अंत में कहती है कि देवता, दानव, ऋषि-मुनि और सब नर-नारी उनका स्मरण करते हैं। पहली ही पंक्ति में उन्हें 'भक्तन हितकारी', यानी भक्तों का भला करने वाला कहा गया है; इस आरती का भाव भय का नहीं, शरण और भक्ति का है।

कठिन शब्दों के अर्थ

हितकारी
भला करने वाला
महतारी
माता
श्याम अंग
साँवला शरीर
वक्र-दृष्टि
तिरछी दृष्टि
चतुर्भुजा
चार भुजाओं वाले
नीलाम्बर
नीला वस्त्र
गज
हाथी
असवारी
सवारी
क्रीट
किरीट, मुकुट
राजित
सुशोभित
दिपत
चमकता है
लिलारी
ललाट, माथा
मुक्तन
मोतियों की
बलिहारी
न्योछावर
मोदक
लड्डू
मिष्ठान
मिठाई
महिषी
भैंस
दनुज
दानव
सुमिरत
स्मरण करते हैं

यह आरती कब गाई जाती है

  • हर शनिवार, शनिदेव की पूजा या दीपदान के बाद
  • शनि जयंती (ज्येष्ठ अमावस्या) पर
  • शनि मंदिर में संध्या आरती के समय

आरती कैसे करें

  • शनिदेव के चित्र के सामने या शनि मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाकर आरती गाएँ; घर में घी का दीपक भी ले सकते हैं।
  • पहले टेक 'जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी' गाएँ, फिर हर अंतरे के बाद यही पंक्ति दोहराएँ।
  • आरती के बाद हाथ जोड़कर अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा माँगें और प्रसाद बाँटें।
पूरी विधिशनि देव पूजा विधिशनिवार को शनि देव की सरल पूजा: सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की परंपरा, मंत्र, आरती, और सबसे बढ़कर सेवा और दान।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
टेक, दूसरी पंक्तिसूर्य पुत्र प्रभु छाया महतारीआज तक और शुभ पंचांग के पाठ में; भक्ति भारत, भारतकोश और द्रिक पंचांग में 'सूरज के पुत्र'
अंतरा 1श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारीभक्ति भारत और भारतकोश के पाठ में; द्रिक पंचांग, आज तक और शुभ पंचांग में 'श्याम अंग वक्र-दृष्टि'
अंतरा 2क्रीट मुकुट शीश सहज दिपत है लिलारी। मुक्तन की माल गले शोभित बलिहारी॥द्रिक पंचांग में; बाकी स्रोतों में 'राजित' (भक्ति भारत और भारतकोश में 'रजित' छपा है) और 'माला'
अंतरा 3मोदक और मिष्ठान चढ़े, चढ़ती पान सुपारी। लोहा, तिल, तेल, उड़द महिषी है अति प्यारी॥द्रिक पंचांग में
अंतरा 4विश्वनाथ धरत ध्यान हम हैं शरण तुम्हारीद्रिक पंचांग में

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
भाषा
हिन्दी

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति भक्ति भारत, द्रिक पंचांग और आज तक के पाठ से मिलाई गई; भारतकोश (bharatdiscovery.org) और शुभ पंचांग का पाठ भी देखा गया। पाँचों में टेक, चारों अंतरे और उनका क्रम एक है। जहाँ शब्द अलग थे, वहाँ बहुमत का पाठ लिया गया: 'सूरज के पुत्र' (भक्ति भारत, भारतकोश, द्रिक पंचांग), 'श्याम अंग वक्र-दृष्टि' (द्रिक पंचांग, आज तक, शुभ पंचांग), 'राजित' (आज तक, शुभ पंचांग; भक्ति भारत और भारतकोश में 'रजित'), 'सुमिरत' (द्रिक पंचांग, आज तक, शुभ पंचांग); बाकी पंक्तियाँ भक्ति भारत, भारतकोश और आज तक के एक जैसे पाठ से। भक्ति भारत और भारतकोश में 'सुमरिन' छपा है, जो 'सुमिरत' का ही बिगड़ा रूप लगता है। शुभ पंचांग के पाठ में अंत में एक और अंतरा ('जिनके शनि दोष भारी...') है जो किसी और स्रोत में नहीं है, इसलिए नहीं लिया गया। रचयिता का नाम किसी स्रोत में नहीं है।

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शनि देव के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शनिदेव की आरती किस दिन गाई जाती है?

शनिवार शनिदेव का दिन माना जाता है, इसलिए यह आरती सबसे अधिक शनिवार की पूजा में गाई जाती है। शनि जयंती पर भी इसे विशेष रूप से गाया जाता है।

आरती में शनिदेव के माता-पिता कौन बताए गए हैं?

पहली ही पंक्तियों में उन्हें सूर्यदेव का पुत्र और छाया को उनकी माता कहा गया है। इसी से उनका एक नाम छायापुत्र भी है।

आरती में लोहा, तिल, तेल और उड़द का उल्लेख क्यों है?

आरती कहती है कि ये वस्तुएँ शनिदेव को प्रिय हैं। शनिवार को तिल, सरसों का तेल, उड़द और लोहे की वस्तुओं का दान शनि-पूजा की प्रचलित परंपरा है; जो सहज हो, वही श्रद्धा से अर्पित करें।

क्या यह आरती केवल साढ़ेसाती या शनि दोष में ही गानी चाहिए?

नहीं। आरती स्वयं शनिदेव को 'भक्तन हितकारी', यानी भक्तों का भला करने वाला कहती है। कोई भी भक्त किसी भी शनिवार इसे श्रद्धा से गा सकता है।

'विश्वनाथ धरत ध्यान' में विश्वनाथ कौन हैं, और आरती किसने लिखी?

विश्वनाथ भगवान शिव का नाम है। यह भी संभव है कि यह आरती के कवि की छाप हो, जैसे कई आरतियों के अंत में कवि का नाम आता है; उपलब्ध स्रोत रचयिता के बारे में कुछ नहीं बताते।

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