नवग्रह

स्तोत्र · नवग्रह, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु · स्तोत्र

नवग्रह स्तोत्रम्

"जपाकुसुमसंकाशं" से शुरू होने वाला व्यास जी के नाम से प्रचलित नवग्रह स्तोत्र: नौ ग्रहों के लिए नौ प्रणाम-श्लोक और तीन श्लोकों की फलश्रुति।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् ।तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥१॥

japākusumasaṃkāśaṃ kāśyapeyaṃ mahādyutim |
tamo’riṃ sarvapāpaghnaṃ praṇato’smi divākaram ||

अर्थ: (सूर्य) जो जपा (गुड़हल) के फूल जैसे लाल हैं, कश्यप ऋषि के पुत्र हैं, महान तेज वाले हैं, अंधकार के शत्रु हैं और सब पापों को नष्ट करते हैं, उन दिवाकर को मैं प्रणाम करता हूँ।

जपाकुसुमसंकाशं
गुड़हल के फूल जैसे लाल
काश्यपेयं
कश्यप के पुत्र
महाद्युतिम्
महान तेज वाले
तमोऽरिं
अंधकार के शत्रु
सर्वपापघ्नं
सब पापों का नाश करने वाले
दिवाकरम्
सूर्य को

दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसंभवम् ।नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ॥२॥

dadhiśaṅkhatuṣārābhaṃ kṣīrodārṇavasaṃbhavam |
namāmi śaśinaṃ somaṃ śambhormukuṭabhūṣaṇam ||

अर्थ: (चंद्र) जिनकी आभा दही, शंख और बर्फ़ जैसी उजली है, जो क्षीरसागर से उत्पन्न हुए और जो शिव के मुकुट के आभूषण हैं, उन शशी सोम को मैं नमस्कार करता हूँ।

दधिशङ्खतुषाराभं
दही, शंख और बर्फ़ जैसी आभा वाले
क्षीरोदार्णवसंभवम्
क्षीरसागर से उत्पन्न
शशिनं
चंद्रमा को
शम्भोर्मुकुटभूषणम्
शिव के मुकुट के आभूषण

धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् ।कुमारं शक्तिहस्तं तं मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥३॥

dharaṇīgarbhasaṃbhūtaṃ vidyutkāntisamaprabham |
kumāraṃ śaktihastaṃ taṃ maṅgalaṃ praṇamāmyaham ||

अर्थ: (मंगल) जो पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न हुए, जिनकी प्रभा बिजली की चमक जैसी है, जो युवा कुमार हैं और हाथ में शक्ति (भाला) धारण करते हैं, उन मंगल को मैं प्रणाम करता हूँ।

धरणीगर्भसंभूतं
पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न
विद्युत्कान्तिसमप्रभम्
बिजली जैसी चमक वाले
कुमारं
युवा
शक्तिहस्तं
हाथ में शक्ति (भाला) लिए

प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥४॥

priyaṅgukalikāśyāmaṃ rūpeṇāpratimaṃ budham |
saumyaṃ saumyaguṇopetaṃ taṃ budhaṃ praṇamāmyaham ||

अर्थ: (बुध) जो प्रियंगु की कली जैसे श्याम वर्ण के हैं, जिनका रूप अनुपम है, जो सौम्य हैं और सौम्य गुणों से युक्त हैं, उन बुध को मैं प्रणाम करता हूँ।

प्रियङ्गुकलिकाश्यामं
प्रियंगु की कली जैसे श्याम
अप्रतिमं
अनुपम
सौम्यं
शांत, कोमल स्वभाव वाले (सोम के पुत्र)
सौम्यगुणोपेतं
कोमल गुणों से युक्त

देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसंनिभम् ।बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥५॥

devānāṃ ca ṛṣīṇāṃ ca guruṃ kāñcanasaṃnibham |
buddhibhūtaṃ trilokeśaṃ taṃ namāmi bṛhaspatim ||

अर्थ: (बृहस्पति) जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, सोने जैसी कांति वाले हैं, बुद्धि के स्वरूप और तीनों लोकों के स्वामी हैं, उन बृहस्पति को मैं नमस्कार करता हूँ।

गुरुं
गुरु
काञ्चनसंनिभम्
सोने जैसे
बुद्धिभूतं
बुद्धि के स्वरूप
त्रिलोकेशं
तीनों लोकों के स्वामी

हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् ।सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥६॥

himakundamṛṇālābhaṃ daityānāṃ paramaṃ gurum |
sarvaśāstrapravaktāraṃ bhārgavaṃ praṇamāmyaham ||

अर्थ: (शुक्र) जिनकी आभा बर्फ़, कुंद के फूल और कमल-नाल जैसी श्वेत है, जो दैत्यों के परम गुरु हैं और सब शास्त्रों के उपदेशक हैं, उन भार्गव (शुक्र) को मैं प्रणाम करता हूँ।

हिमकुन्दमृणालाभं
बर्फ़, कुंद-पुष्प और कमल-नाल जैसे श्वेत
दैत्यानां परमं गुरुम्
दैत्यों के परम गुरु
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं
सब शास्त्रों के उपदेशक
भार्गवं
भृगुवंशी शुक्राचार्य को

नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥७॥

nīlāñjanasamābhāsaṃ raviputraṃ yamāgrajam |
chāyāmārtaṇḍasaṃbhūtaṃ taṃ namāmi śanaiścaram ||

अर्थ: (शनि) जिनकी आभा नीले अंजन (काजल) जैसी है, जो सूर्य के पुत्र और यम के बड़े भाई हैं, जो छाया और सूर्य से उत्पन्न हुए, उन शनैश्चर को मैं नमस्कार करता हूँ।

नीलाञ्जनसमाभासं
नीले अंजन जैसी आभा वाले
रविपुत्रं
सूर्य के पुत्र
यमाग्रजम्
यम के बड़े भाई
छायामार्तण्डसंभूतं
छाया और सूर्य से उत्पन्न
शनैश्चरम्
धीरे चलने वाले शनि को

अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् ।सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥८॥

ardhakāyaṃ mahāvīryaṃ candrādityavimardanam |
siṃhikāgarbhasaṃbhūtaṃ taṃ rāhuṃ praṇamāmyaham ||

अर्थ: (राहु) जिनका शरीर आधा है, जो महा पराक्रमी हैं, जो चंद्रमा और सूर्य को ग्रसते हैं, जो सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न हुए, उन राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।

अर्धकायं
आधे शरीर वाले
महावीर्यं
महा पराक्रमी
चन्द्रादित्यविमर्दनम्
चंद्र और सूर्य को ग्रसने वाले (ग्रहण)
सिंहिकागर्भसंभूतं
सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न

पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् ।रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥९॥

palāśapuṣpasaṃkāśaṃ tārakāgrahamastakam |
raudraṃ raudrātmakaṃ ghoraṃ taṃ ketuṃ praṇamāmyaham ||

अर्थ: (केतु) जिनकी आभा पलाश के फूल जैसी है, जो तारों और ग्रहों में मस्तक (शीर्ष) हैं, जो रौद्र, उग्र स्वभाव वाले और भयंकर रूप वाले हैं, उन केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।

पलाशपुष्पसंकाशं
पलाश के फूल जैसे
तारकाग्रहमस्तकम्
तारों और ग्रहों के मस्तक
रौद्रं
उग्र
घोरं
भयंकर रूप वाले

इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत्सुसमाहितः ।दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥१०॥

iti vyāsamukhodgītaṃ yaḥ paṭhetsusamāhitaḥ |
divā vā yadi vā rātrau vighnaśāntirbhaviṣyati ||

अर्थ: व्यास जी के मुख से गाए गए इस स्तोत्र को जो एकाग्र होकर दिन में या रात में पढ़ता है, उसके विघ्न शांत होंगे, ऐसा यह श्लोक कहता है।

व्यासमुखोद्गीतं
व्यास जी के मुख से गाया गया
सुसमाहितः
अच्छी तरह एकाग्र होकर
दिवा
दिन में
विघ्नशान्तिः
विघ्नों की शांति

नरनारीनृपाणां च भवेद्दुःस्वप्ननाशनम् ।ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्धनम् ॥११॥

naranārīnṛpāṇāṃ ca bhavedduḥsvapnanāśanam |
aiśvaryamatulaṃ teṣāmārogyaṃ puṣṭivardhanam ||

अर्थ: पुरुष, स्त्री और राजा, सबके बुरे सपनों का नाश होता है, और उन्हें अतुल ऐश्वर्य, आरोग्य और बल की वृद्धि मिलती है, ऐसा यह श्लोक कहता है।

नरनारीनृपाणां
पुरुषों, स्त्रियों और राजाओं के
दुःस्वप्ननाशनम्
बुरे सपनों का नाश
अतुलं
जिसकी तुलना न हो
पुष्टिवर्धनम्
बल और पोषण की वृद्धि

ग्रहनक्षत्रजाः पीडास्तस्कराग्निसमुद्भवाः ।ताः सर्वाः प्रशमं यान्ति व्यासो ब्रूते न संशयः ॥१२॥

grahanakṣatrajāḥ pīḍāstaskarāgnisamudbhavāḥ |
tāḥ sarvāḥ praśamaṃ yānti vyāso brūte na saṃśayaḥ ||

अर्थ: ग्रहों और नक्षत्रों से होने वाली पीड़ाएँ, और चोर व आग से होने वाले कष्ट, सब शांत हो जाते हैं; व्यास जी कहते हैं कि इसमें संशय नहीं। यह इस श्लोक का कथन है।

ग्रहनक्षत्रजाः
ग्रहों और नक्षत्रों से उत्पन्न
पीडाः
कष्ट
तस्कराग्निसमुद्भवाः
चोर और आग से होने वाले
प्रशमं यान्ति
शांत हो जाते हैं

॥ इति श्रीव्यासविरचितं नवग्रहस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

|| iti śrīvyāsaviracitaṃ navagrahastotraṃ sampūrṇam ||

अर्थ: इस प्रकार श्री व्यास द्वारा रचित नवग्रह स्तोत्र पूरा हुआ।

व्यासविरचितं
व्यास द्वारा रचा गया
सम्पूर्णम्
पूरा हुआ

परिचय

नवग्रह स्तोत्र में नौ ग्रहों, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु, के लिए एक-एक श्लोक है। हर श्लोक उस ग्रह के रंग, रूप या जन्म-कथा का स्मरण करके उसे प्रणाम करता है, जैसे सूर्य गुड़हल (जपा) के फूल जैसे लाल हैं और चंद्रमा दही, शंख और बर्फ़ जैसे उजले।

अंत के तीन श्लोक फलश्रुति हैं, जिनमें व्यास जी का नाम आता है, और स्तोत्र का अंतिम वाक्य इसे व्यास की रचना कहता है। नवग्रह पूजा, ग्रह-शांति और रोज़ की प्रार्थना में यह स्तोत्र बहुत पढ़ा जाता है।

भावार्थ

यह स्तोत्र नौ ग्रहों को नौ देवताओं के रूप में देखता है और हर एक को उसकी पहचान से याद करके प्रणाम करता है। सूर्य कश्यप के पुत्र और अंधकार के शत्रु हैं; चंद्रमा क्षीरसागर से निकले और शिव के मुकुट पर सजे हैं; मंगल पृथ्वी के पुत्र हैं; बुध सौम्य हैं; बृहस्पति देवताओं के और शुक्र दैत्यों के गुरु हैं; शनि सूर्य और छाया के पुत्र हैं; और राहु-केतु अपनी कथाओं वाले छाया ग्रह हैं।

हर श्लोक का अंत "प्रणमाम्यहम्" या "नमामि" पर होता है: मैं प्रणाम करता हूँ। इसका भाव डर नहीं, आदर है: जो शक्तियाँ समय, ऋतु और जीवन की गति से जुड़ी मानी जाती हैं, उन सबको एक साथ नमस्कार। अंत के तीन श्लोक फलश्रुति हैं।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि जो इसे दिन या रात में एकाग्र होकर पढ़ता है, उसके विघ्न शांत होते हैं, बुरे सपने दूर होते हैं, ऐश्वर्य, आरोग्य और बल बढ़ता है, और ग्रह-नक्षत्र, चोर या आग से होने वाले कष्ट शांत होते हैं। ये स्तोत्र के अपने वचन हैं; इसे भय से नहीं, श्रद्धा और प्रणाम के भाव से पढ़ें।

इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत्सुसमाहितः ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥

व्यास जी के मुख से गाए गए इस स्तोत्र को जो एकाग्र होकर दिन में या रात में पढ़ता है, उसके विघ्न शांत होंगे, ऐसा यह श्लोक कहता है।

नरनारीनृपाणां च भवेद्दुःस्वप्ननाशनम् ।
ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्धनम् ॥

पुरुष, स्त्री और राजा, सबके बुरे सपनों का नाश होता है, और उन्हें अतुल ऐश्वर्य, आरोग्य और बल की वृद्धि मिलती है, ऐसा यह श्लोक कहता है।

ग्रहनक्षत्रजाः पीडास्तस्कराग्निसमुद्भवाः ।
ताः सर्वाः प्रशमं यान्ति व्यासो ब्रूते न संशयः ॥

ग्रहों और नक्षत्रों से होने वाली पीड़ाएँ, और चोर व आग से होने वाले कष्ट, सब शांत हो जाते हैं; व्यास जी कहते हैं कि इसमें संशय नहीं। यह इस श्लोक का कथन है।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • नवग्रह पूजा और ग्रह-शांति के अनुष्ठान में
  • रोज़ सुबह की प्रार्थना में
  • किसी ग्रह के वार को (जैसे रविवार को सूर्य, शनिवार को शनि) उस ग्रह के श्लोक के साथ पूरा स्तोत्र
  • नए काम या यात्रा की शुरुआत में

पढ़ने की विधि

  • स्नान के बाद पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें और दीप जलाएँ।
  • हर श्लोक पढ़ते समय उस ग्रह के रंग और रूप का ध्यान करें; नवग्रह के चित्र या मंदिर के सामने भी पढ़ सकते हैं।
  • नौ श्लोकों के बाद फलश्रुति के तीन श्लोक पढ़ें। स्तोत्र स्वयं कहता है कि इसे दिन में या रात में, एकाग्र होकर पढ़ा जा सकता है।
पूरी विधिशनि देव पूजा विधिशनिवार को शनि देव की सरल पूजा: सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की परंपरा, मंत्र, आरती, और सबसे बढ़कर सेवा और दान।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
श्लोक 2क्षीरार्णवसमुद्भवम्vignanam.org का पाठ; वह "क्षीरोदार्णवसम्भवम्" को दूसरे पाठ के रूप में देता है। अर्थ वही है।
श्लोक 3कुमारं शक्तिहस्तं तं कुजं प्रणमाम्यहम्vignanam.org का पाठ; कुज भी मंगल का ही नाम है।
श्लोक 5बुद्धिमन्तं त्रिलोकेशंvignanam.org का पाठ: "बुद्धिमान"।
श्लोक 8अर्धकायं महावीरंvignanam.org का पाठ।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
वेदव्यास (परंपरा के अनुसार) (परंपरा के अनुसार)
भाषा
संस्कृत

स्तोत्र श्लोक 10 और 12 में स्वयं व्यास जी का नाम लेता है ("व्यासमुखोद्गीतं", "व्यासो ब्रूते") और अंतिम वाक्य इसे "श्रीव्यासविरचितं" कहता है। यह परंपरा की मान्यता है; किसी पुराण में इसका निश्चित स्थान नहीं बताया गया।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और sa.wikisource.org तथा vignanam.org से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया। sanskritdocuments.org और sa.wikisource.org का पाठ एक-सा है; vignanam.org के कुछ अलग शब्द पाठ-भेद में दिए गए हैं। स्रोत फलश्रुति के अंतिम दो श्लोकों पर संख्या नहीं देते; यहाँ उन्हें क्रम से 11 और 12 कहा गया है।

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नवग्रह के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नवग्रह स्तोत्र किसकी रचना है?

स्तोत्र स्वयं व्यास जी का नाम लेता है और अंतिम वाक्य इसे व्यास की रचना बताता है। यह परंपरा की मान्यता है; किसी पुराण में इसका निश्चित स्थान नहीं बताया गया।

नौ ग्रह कौन से हैं?

सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति (गुरु), शुक्र, शनि, राहु और केतु। राहु और केतु को छाया ग्रह कहा जाता है।

क्या केवल एक ग्रह का श्लोक पढ़ सकते हैं?

हाँ, कई लोग किसी ग्रह के वार को उसका श्लोक अलग से पढ़ते हैं। फिर भी पूरा स्तोत्र पढ़ना अधिक प्रचलित है।

क्या यह स्तोत्र ग्रह-दोष दूर करता है?

स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि ग्रह-नक्षत्र से होने वाले कष्ट शांत होते हैं। यह प्रणाम और प्रार्थना का पाठ है; इसे किसी डर से नहीं, श्रद्धा से पढ़ें।

इसे कब पढ़ें?

स्तोत्र दिन या रात, किसी भी समय एकाग्र होकर पढ़ने की बात कहता है। बहुत से लोग इसे सुबह की पूजा में पढ़ते हैं।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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