सूर्य को अर्घ्य देने की विधि
सूर्य · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
रोज़ सुबह सूर्य देव को जल देने की सरल विधि: लोटा, सूर्योदय का समय, गिरती धार, अर्घ्य का मंत्र और सूर्य के बारह नाम; सूर्य को सीधे न देखने की सावधानी के साथ।

जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन।त्रिभुवन-तिमिर-निकन्दन, भक्त-हृदय-चन्दन॥
अर्थ: हे कश्यप ऋषि के पुत्र, आपकी जय हो; हे अदिति माता के पुत्र, आपकी जय हो। आप तीनों लोकों का अंधकार मिटाने वाले हैं और भक्तों के हृदय को चन्दन की तरह शीतल करने वाले हैं।
सप्त-अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।दुःखहारी, सुखकारी, मानस-मल-हारी॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥
अर्थ: आप सात घोड़ों वाले रथ पर सुशोभित हैं, जिसमें एक ही पहिया है। आप दुःख हरने वाले, सुख देने वाले और मन का मैल दूर करने वाले हैं।
सुर-मुनि-भूसुर-वन्दित, विमल विभवशाली।अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥
अर्थ: देवता, मुनि और ब्राह्मण आपकी वन्दना करते हैं; आप निर्मल हैं और ऐश्वर्य से भरे हैं। हे दिवाकर, आप पापों के समूह को नष्ट करने वाले हैं और दिव्य किरणों की माला धारण करते हैं।
सकल-सुकर्म-प्रसविता, सविता शुभकारी।विश्व-विलोचन मोचन, भव-बन्धन भारी॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥
अर्थ: हे सविता, आप सब अच्छे कर्मों को जन्म देने वाले (उनकी प्रेरणा देने वाले) और शुभ करने वाले हैं। आप संसार की आँख हैं और संसार के भारी बन्धनों से छुड़ाने वाले हैं।
कमल-समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।सेवत सहज हरत अति मनसिज-संतापा॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥
अर्थ: आप कमलों के समूह को खिलाने वाले और तीनों तापों (शरीर, दैव और संसार से आने वाले दुःखों) का नाश करने वाले हैं। आपकी सेवा करने से मन की कामनाओं से उपजा भारी संताप सहज ही दूर हो जाता है।
नेत्र-व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा-हारी।वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥
अर्थ: हे देवश्रेष्ठ, आरती आपको आँखों के रोग हरने वाला और धरती की पीड़ा दूर करने वाला कहती है। आप निरंतर वर्षा कराते हैं और दूसरों के हित का व्रत धारण किए रहते हैं।
सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।हर अज्ञान-मोह सब, तत्त्वज्ञान दीजै॥
॥ जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन ॥
अर्थ: हे करुणा के भंडार सूर्यदेव, अब मुझ पर करुणा कीजिए। मेरा सारा अज्ञान और मोह हरकर मुझे तत्त्वज्ञान (सत्य का ज्ञान) दीजिए।
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'जय कश्यप-नन्दन' भगवान सूर्य की आरती है, जो गीता प्रेस, गोरखपुर के 'श्रीआरती-संग्रह' में 'भगवान् सूर्य' शीर्षक से छपी है। इसमें सूर्य को महर्षि कश्यप और देवमाता अदिति का पुत्र कहकर प्रणाम किया गया है।
इसकी भाषा संस्कृतनिष्ठ हिन्दी है। सात घोड़ों के रथ वाले सूर्य को यह आरती अंधकार मिटाने वाला, कमलों को खिलाने वाला, वर्षा कराने वाला और दूसरों का हित करने वाला बताती है, और अंत में उनसे अज्ञान और मोह दूर करके तत्त्वज्ञान देने की प्रार्थना करती है।
हे कश्यप ऋषि के पुत्र, आपकी जय हो; हे अदिति माता के पुत्र, आपकी जय हो। आप तीनों लोकों का अंधकार मिटाने वाले हैं और भक्तों के हृदय को चन्दन की तरह शीतल करने वाले हैं।
आप सात घोड़ों वाले रथ पर सुशोभित हैं, जिसमें एक ही पहिया है। आप दुःख हरने वाले, सुख देने वाले और मन का मैल दूर करने वाले हैं।
देवता, मुनि और ब्राह्मण आपकी वन्दना करते हैं; आप निर्मल हैं और ऐश्वर्य से भरे हैं। हे दिवाकर, आप पापों के समूह को नष्ट करने वाले हैं और दिव्य किरणों की माला धारण करते हैं।
हे सविता, आप सब अच्छे कर्मों को जन्म देने वाले (उनकी प्रेरणा देने वाले) और शुभ करने वाले हैं। आप संसार की आँख हैं और संसार के भारी बन्धनों से छुड़ाने वाले हैं।
आप कमलों के समूह को खिलाने वाले और तीनों तापों (शरीर, दैव और संसार से आने वाले दुःखों) का नाश करने वाले हैं। आपकी सेवा करने से मन की कामनाओं से उपजा भारी संताप सहज ही दूर हो जाता है।
हे देवश्रेष्ठ, आरती आपको आँखों के रोग हरने वाला और धरती की पीड़ा दूर करने वाला कहती है। आप निरंतर वर्षा कराते हैं और दूसरों के हित का व्रत धारण किए रहते हैं।
हे करुणा के भंडार सूर्यदेव, अब मुझ पर करुणा कीजिए। मेरा सारा अज्ञान और मोह हरकर मुझे तत्त्वज्ञान (सत्य का ज्ञान) दीजिए।
यह आरती सूर्य के दोनों रूपों को साथ रखती है: आकाश में चमकने वाला सूर्य, जो अंधकार मिटाता है, कमल खिलाता है, वर्षा कराता है और धरती की पीड़ा हरता है; और सविता, जो सब अच्छे कर्मों का प्रेरक है और मन के मैल, पाप और संसार के बन्धन से छुड़ाता है।
आरती का अंत एक सीधी प्रार्थना पर होता है: हे करुणाकर सूर्यदेव, मेरा अज्ञान और मोह हरकर मुझे तत्त्वज्ञान दीजिए। इस तरह सूर्य की पूजा केवल प्रकाश और स्वास्थ्य की कामना तक नहीं रहती, भीतर के उजाले की प्रार्थना बन जाती है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| टेक | ऊँ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन | भक्ति भारत के पाठ में; गीता प्रेस और द्रिक पंचांग में 'जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन' |
| अंतरा 6 | हर अज्ञान मोह सब, तत्वज्ञान दीजै | भक्ति भारत में ('तत्त्वज्ञान' की जगह 'तत्वज्ञान') |
इस संग्रह में यह आरती 'श्रीसूर्य-वन्दना' श्लोक के बाद 'भगवान् सूर्य' शीर्षक से छपी है; रचयिता का नाम वहाँ नहीं दिया गया।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति गीता प्रेस के 'श्रीआरती-संग्रह' (archive.org पर उपलब्ध स्कैन का OCR पाठ, 'भगवान् सूर्य' वाला पृष्ठ) से मिलाई गई, और द्रिक पंचांग व भक्ति भारत के पाठ से भी। द्रिक पंचांग का पाठ गीता प्रेस से शब्दशः मिलता है ('ॐ जय अदिति-नन्दन' समेत); OCR की भूलें ('३०' = ॐ, 'हुदय', 'सूर्येव', 'दीजे') द्रिक पंचांग के साफ़ पाठ से जाँची गईं। चौथे अंतरे की दूसरी पंक्ति गीता प्रेस के पाठ से ली गई। द्रिक पंचांग में 'सेवत साहज' छपा है; गीता प्रेस और भक्ति भारत में 'सेवत सहज' है, वही लिया गया। भक्ति भारत टेक को 'ऊँ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन' लिखता है। ref फ़ाइल -2 में OCR से छपे पृष्ठ-शीर्षक ('५२ श्रीआरती-संग्रह') की पंक्ति हटाई गई है, क्योंकि वह आरती का भाग नहीं।
सूर्य · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
रोज़ सुबह सूर्य देव को जल देने की सरल विधि: लोटा, सूर्योदय का समय, गिरती धार, अर्घ्य का मंत्र और सूर्य के बारह नाम; सूर्य को सीधे न देखने की सावधानी के साथ।
सूर्य · आरती
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान
सूर्य · स्तोत्र · संस्कृत
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्
नवग्रह, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु · स्तोत्र · संस्कृत
जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्
शनि · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शनिवार को शनि देव की सरल पूजा: सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की परंपरा, मंत्र, आरती, और सबसे बढ़कर सेवा और दान।
शनि · चालीसा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल
सूर्यदेव को। पुराणों के अनुसार सूर्य महर्षि कश्यप और देवमाता अदिति के पुत्र हैं, इसलिए उन्हें आदित्य भी कहते हैं।
हाँ। गीता प्रेस, गोरखपुर के 'श्रीआरती-संग्रह' में यह 'भगवान् सूर्य' शीर्षक से छपी है; यहाँ का पाठ उसी से मिलाया गया है।
पुराणों में सूर्य के रथ का एक ही पहिया बताया गया है। आरती कहती है कि सात घोड़ों वाला यह एक पहिये का रथ सूर्यदेव का है।
रविवार सूर्यदेव का दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन आरती का चलन अधिक है। रोज़ सुबह अर्घ्य के बाद भी यह आरती गाई जा सकती है।
दोनों सूर्यदेव की आरतियाँ हैं। यह आरती गीता प्रेस के संग्रह में है और इसकी भाषा संस्कृतनिष्ठ है, जबकि 'ॐ जय सूर्य भगवान' सरल हिन्दी में है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।