सूर्य

आरती · सूर्य

ॐ जय सूर्य भगवान

सूर्यदेव की आरती 'ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान': पूरा पाठ, हर अंतरे का सरल अर्थ, कठिन शब्द और पाठांतर।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. अंतरा-वार अर्थ
  4. भावार्थ
  5. कठिन शब्द
  6. कब पढ़ें
  7. विधि
  8. पाठ-भेद
  9. रचयिता और स्रोत
  10. ये भी पढ़ें
  11. सवाल-जवाब
  12. सुधार सुझाएँ

ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान॥

अर्थ: हे सूर्य भगवान, आपकी जय हो; हे दिन करने वाले (दिनकर) भगवान, आपकी जय हो। आप संसार की आँख के समान हैं और तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) के स्वरूप हैं। सब लोग आपका ध्यान करते हैं।

सारथी अरुण हैं प्रभु तुम, श्वेत कमलधारी।तुम चार भुजाधारी॥अश्व हैं सात तुम्हारे, कोटि किरण पसारे।तुम हो देव महान॥

॥ ॐ जय सूर्य भगवान ॥

अर्थ: हे प्रभु, अरुण आपके सारथी हैं; आप सफ़ेद कमल धारण करते हैं और आपकी चार भुजाएँ हैं। आपके रथ में सात घोड़े हैं, आप करोड़ों किरणें फैलाते हैं; आप महान देव हैं।

ऊषाकाल में जब तुम, उदयाचल आते।सब तब दर्शन पाते॥फैलाते उजियारा, जागता तब जग सारा।करे सब तब गुणगान॥

॥ ॐ जय सूर्य भगवान ॥

अर्थ: भोर के समय जब आप उदयाचल (पूर्व के पर्वत) पर आते हैं, तब सब आपके दर्शन पाते हैं। आप उजाला फैलाते हैं, तब सारा संसार जाग उठता है और सब आपके गुण गाते हैं।

संध्या में भुवनेश्वर, अस्ताचल जाते।गोधन तब घर आते॥गोधूलि बेला में, हर घर हर आंगन में।हो तव महिमा गान॥

॥ ॐ जय सूर्य भगवान ॥

अर्थ: हे लोकों के स्वामी, संध्या में जब आप अस्ताचल (पश्चिम के पर्वत) की ओर जाते हैं, तब गायें घर लौटती हैं। गोधूलि की उस बेला में हर घर और हर आँगन में आपकी महिमा गाई जाती है।

देव-दनुज नर-नारी, ऋषि-मुनिवर भजते।आदित्य हृदय जपते॥स्तोत्र ये मंगलकारी, इसकी है रचना न्यारी।दे नव जीवनदान॥

॥ ॐ जय सूर्य भगवान ॥

अर्थ: देवता, दानव, नर-नारी और ऋषि-मुनि आपको भजते हैं और आदित्य हृदय स्तोत्र का जप करते हैं। आरती कहती है कि यह स्तोत्र मंगल करने वाला है, इसकी रचना अनोखी है और यह नया जीवन देता है।

तुम हो त्रिकाल रचयिता, तुम जग के आधार।महिमा तब अपरम्पार॥प्राणों का सिंचन करके, भक्तों को अपने देते।बल, बुद्धि और ज्ञान॥

॥ ॐ जय सूर्य भगवान ॥

अर्थ: आप तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) के रचयिता और संसार के आधार हैं; आपकी महिमा का कोई पार नहीं। आप प्राणों को सींचकर अपने भक्तों को बल, बुद्धि और ज्ञान देते हैं।

भूचर जलचर खेचर, सबके हो प्राण तुम्हीं।सब जीवों के प्राण तुम्हीं॥वेद-पुराण बखाने, धर्म सभी तुम्हें माने।तुम ही सर्वशक्तिमान॥

॥ ॐ जय सूर्य भगवान ॥

अर्थ: धरती पर चलने वाले, जल में रहने वाले और आकाश में उड़ने वाले, सबके प्राण आप ही हैं; सब जीवों के प्राण आप ही हैं। वेद-पुराण आपका बखान करते हैं, सभी धर्म आपको मानते हैं; आप ही सर्वशक्तिमान हैं।

पूजन करती दिशाएं, पूजे दश दिक्पाल।तुम भुवनों के प्रतिपाल॥ऋतुएं तुम्हारी दासी, तुम शाश्वत अविनाशी।शुभकारी अंशुमान॥

॥ ॐ जय सूर्य भगवान ॥

अर्थ: दिशाएँ आपकी पूजा करती हैं और दसों दिक्पाल आपको पूजते हैं; आप सब लोकों के पालनहार हैं। ऋतुएँ आपकी दासी हैं, आप सदा रहने वाले और अविनाशी हैं; हे किरणों वाले (अंशुमान), आप शुभ करने वाले हैं।

हर अंतरे का अर्थ पाठ के बीच में पढ़ने के लिए ऊपर पाठ और अर्थ चुनें, या नीचे पढ़ें।

परिचय

'ॐ जय सूर्य भगवान' सूर्यदेव की एक लोकप्रिय हिन्दी आरती है। इसमें सूर्य को जगत की आँख (नेत्रस्वरूप) कहा गया है और सुबह उगने से लेकर संध्या में अस्त होने तक उनकी महिमा गाई गई है।

आरती में सूर्य के सारथी अरुण, सात घोड़ों और करोड़ों किरणों का वर्णन है, और यह भी कहा गया है कि ऋषि-मुनि आदित्य हृदय स्तोत्र से उनकी स्तुति करते हैं। सूर्यदेव की दूसरी प्रसिद्ध आरती 'जय कश्यप-नन्दन' है, जो गीता प्रेस के आरती-संग्रह में छपी है।

अंतरा-वार अर्थ

  1. मुखड़ा ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान…

    हे सूर्य भगवान, आपकी जय हो; हे दिन करने वाले (दिनकर) भगवान, आपकी जय हो। आप संसार की आँख के समान हैं और तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) के स्वरूप हैं। सब लोग आपका ध्यान करते हैं।

  2. अंतरा १ सारथी अरुण हैं प्रभु तुम, श्वेत कमलधारी…

    हे प्रभु, अरुण आपके सारथी हैं; आप सफ़ेद कमल धारण करते हैं और आपकी चार भुजाएँ हैं। आपके रथ में सात घोड़े हैं, आप करोड़ों किरणें फैलाते हैं; आप महान देव हैं।

  3. अंतरा २ ऊषाकाल में जब तुम, उदयाचल आते…

    भोर के समय जब आप उदयाचल (पूर्व के पर्वत) पर आते हैं, तब सब आपके दर्शन पाते हैं। आप उजाला फैलाते हैं, तब सारा संसार जाग उठता है और सब आपके गुण गाते हैं।

  4. अंतरा ३ संध्या में भुवनेश्वर, अस्ताचल जाते…

    हे लोकों के स्वामी, संध्या में जब आप अस्ताचल (पश्चिम के पर्वत) की ओर जाते हैं, तब गायें घर लौटती हैं। गोधूलि की उस बेला में हर घर और हर आँगन में आपकी महिमा गाई जाती है।

  5. अंतरा ४ देव-दनुज नर-नारी, ऋषि-मुनिवर भजते…

    देवता, दानव, नर-नारी और ऋषि-मुनि आपको भजते हैं और आदित्य हृदय स्तोत्र का जप करते हैं। आरती कहती है कि यह स्तोत्र मंगल करने वाला है, इसकी रचना अनोखी है और यह नया जीवन देता है।

  6. अंतरा ५ तुम हो त्रिकाल रचयिता, तुम जग के आधार…

    आप तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) के रचयिता और संसार के आधार हैं; आपकी महिमा का कोई पार नहीं। आप प्राणों को सींचकर अपने भक्तों को बल, बुद्धि और ज्ञान देते हैं।

  7. अंतरा ६ भूचर जलचर खेचर, सबके हो प्राण तुम्हीं…

    धरती पर चलने वाले, जल में रहने वाले और आकाश में उड़ने वाले, सबके प्राण आप ही हैं; सब जीवों के प्राण आप ही हैं। वेद-पुराण आपका बखान करते हैं, सभी धर्म आपको मानते हैं; आप ही सर्वशक्तिमान हैं।

  8. अंतरा ७ पूजन करती दिशाएं, पूजे दश दिक्पाल…

    दिशाएँ आपकी पूजा करती हैं और दसों दिक्पाल आपको पूजते हैं; आप सब लोकों के पालनहार हैं। ऋतुएँ आपकी दासी हैं, आप सदा रहने वाले और अविनाशी हैं; हे किरणों वाले (अंशुमान), आप शुभ करने वाले हैं।

भावार्थ

यह आरती सूर्य को एक साथ देवता और जीवन देने वाले के रूप में देखती है। सुबह वे उगते हैं तो संसार जागता है, शाम को अस्त होते हैं तो गायें घर लौटती हैं और घर-घर में उनका गुणगान होता है। धरती, जल और आकाश के सब जीवों के प्राण वही हैं, और ऋतुएँ उन्हीं के अधीन हैं।

साथ ही आरती सूर्य के पूजनीय रूप का वर्णन करती है: अरुण सारथी, सात घोड़ों का रथ, चार भुजाएँ और हाथ में सफ़ेद कमल। आरती का मुख्य भाव यह है कि सूर्य अपने भक्तों को बल, बुद्धि और ज्ञान देते हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ

दिनकर
दिन करने वाले, सूर्य
नेत्रस्वरूपा
आँख के समान
त्रिगुण
सत्त्व, रज और तम, तीनों गुण
अरुण
सूर्य के सारथी
अश्व
घोड़ा
कोटि
करोड़
ऊषाकाल
भोर का समय
उदयाचल
पूर्व का पर्वत, जहाँ से सूर्य उगते दिखते हैं
अस्ताचल
पश्चिम का पर्वत, जहाँ सूर्य अस्त होते दिखते हैं
भुवनेश्वर
लोकों के स्वामी
गोधन
गायें
गोधूलि
संध्या का समय, जब गायें लौटती हैं
आदित्य हृदय
सूर्य का प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र
त्रिकाल
भूत, वर्तमान और भविष्य
सिंचन
सींचना
भूचर
धरती पर चलने वाले
जलचर
जल में रहने वाले
खेचर
आकाश में उड़ने वाले
दिक्पाल
दिशाओं के रक्षक देवता
प्रतिपाल
पालन करने वाले
अंशुमान
किरणों वाले, सूर्य

यह आरती कब गाई जाती है

  • रविवार को सूर्यदेव की पूजा के बाद
  • सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद
  • मकर संक्रान्ति, रथ सप्तमी और छठ जैसे सूर्य-पर्वों पर

आरती कैसे करें

  • सूर्योदय के बाद सूर्य को जल का अर्घ्य देकर, या सूर्यदेव के चित्र के सामने दीपक जलाकर आरती गाएँ।
  • पहले टेक की तीनों पंक्तियाँ गाएँ, फिर हर अंतरे के बाद 'ॐ जय सूर्य भगवान' दोहराएँ।
  • अंत में फिर से टेक गाकर आरती पूरी करें और हाथ जोड़कर प्रणाम करें।
पूरी विधिसूर्य को अर्घ्य देने की विधिरोज़ सुबह सूर्य देव को जल देने की सरल विधि: लोटा, सूर्योदय का समय, गिरती धार, अर्घ्य का मंत्र और सूर्य के बारह नाम; सूर्य को सीधे न देखने की सावधानी के साथ।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
टेकजगत के नेत्रस्वरूप, तुम हो त्रिगुण स्वरूप। धरते सब ही तव ध्यानशुभ पंचांग के पाठ में
अंतरा 1तुम चतुर्भुजधारीशुभ पंचांग में
अंतरा 6सबके हों प्राण तुम्हींप्रभात खबर में

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
भाषा
हिन्दी

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): हर पंक्ति प्रभात खबर, भक्ति भारत और शुभ पंचांग के पाठ से मिलाई गई। तीनों में टेक, सातों अंतरे और उनका क्रम एक है। भक्ति भारत की वर्तनी की भूलें ('अरूण', 'स्त्रोत', 'रचियता', 'बृद्धि', 'गोधुली') प्रभात खबर और शुभ पंचांग में शुद्ध रूप में हैं, इसलिए वह रूप लिया गया। 'सबके हो प्राण तुम्हीं' भक्ति भारत और शुभ पंचांग का पाठ है; 'पूजन करती दिशाएं' भक्ति भारत से। यह आरती गीता प्रेस के 'श्रीआरती-संग्रह' में नहीं है और इसका रचयिता अज्ञात है; भाषा और 'आदित्य हृदय' के उल्लेख से यह अपेक्षाकृत नई रचना लगती है। किसी फ़िल्म या एल्बम से इसका संबंध नहीं मिला।

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सूर्य देव के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सूर्यदेव की आरती कब गाई जाती है?

सबसे अधिक रविवार को और सुबह सूर्य को अर्घ्य देने के बाद। मकर संक्रान्ति, रथ सप्तमी और छठ जैसे सूर्य से जुड़े पर्वों पर भी सूर्य की आरती गाई जाती है।

आरती में किस 'आदित्य हृदय' का उल्लेख है?

आदित्य हृदय सूर्य की स्तुति का प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है, जो वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में आता है; वहाँ अगस्त्य मुनि श्री राम को इसका उपदेश देते हैं। आरती कहती है कि ऋषि-मुनि इसका जप करते हैं।

'ॐ जय सूर्य भगवान' और 'जय कश्यप-नन्दन' में क्या अंतर है?

दोनों सूर्यदेव की आरतियाँ हैं। 'जय कश्यप-नन्दन' गीता प्रेस के आरती-संग्रह में छपी है और उसकी भाषा संस्कृतनिष्ठ है; 'ॐ जय सूर्य भगवान' सरल हिन्दी में है। दोनों में से कोई भी गाई जा सकती है।

अर्घ्य और आरती में से पहले क्या करें?

प्रचलित क्रम यह है कि पहले उगते सूर्य को जल का अर्घ्य दें, फिर दीपक जलाकर आरती करें। घर में सुविधा के अनुसार सूर्यदेव के चित्र के सामने भी आरती की जा सकती है।

इस आरती की रचना किसने की?

उपलब्ध स्रोतों में रचयिता का नाम नहीं मिलता, और आरती की पंक्तियों में किसी कवि की छाप भी नहीं है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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