सूर्य

स्तोत्र · सूर्य · स्तोत्र

आदित्य हृदयम्

वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में अगस्त्य मुनि द्वारा श्री राम को सिखाया गया सूर्य का स्तोत्र। 31 श्लोक, कथा, अर्थ और शब्दार्थ सहित।

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ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥१॥

tato yuddhapariśrāntaṃ samare cintayā sthitam |
rāvaṇaṃ cāgrato dṛṣṭvā yuddhāya samupasthitam ||

अर्थ: उस समय युद्ध से थके हुए, रणभूमि में चिंता में डूबे खड़े श्री राम को, और सामने युद्ध के लिए तैयार खड़े रावण को देखकर (अगस्त्य मुनि आगे बढ़े)।

युद्धपरिश्रान्तं
युद्ध से थके हुए
समरे
रणभूमि में
चिन्तया स्थितम्
चिंता में डूबे
अग्रतः
सामने
समुपस्थितम्
आकर खड़े हुए

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवानृषिः ॥२॥

daivataiśca samāgamya draṣṭumabhyāgato raṇam |
upāgamyābravīdrāmamagastyo bhagavānṛṣiḥ ||

अर्थ: देवताओं के साथ युद्ध देखने आए भगवान अगस्त्य ऋषि राम के पास जाकर बोले।

दैवतैः
देवताओं के साथ
द्रष्टुम्
देखने के लिए
रणम्
युद्ध
उपागम्य
पास जाकर
अब्रवीत्
बोले

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् ।येन सर्वानरीन्वत्स समरे विजयिष्यसि ॥३॥

rāma rāma mahābāho śṛṇu guhyaṃ sanātanam |
yena sarvānarīnvatsa samare vijayiṣyasi ||

अर्थ: हे राम, हे महाबाहु राम! यह सनातन रहस्य सुनो, वत्स, जिससे तुम युद्ध में सब शत्रुओं को जीत लोगे।

महाबाहो
हे विशाल भुजाओं वाले
गुह्यं
रहस्य
सनातनम्
सदा से चला आ रहा
अरीन्
शत्रुओं को
विजयिष्यसि
जीतोगे

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।जयावहं जपेन्नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥४॥

ādityahṛdayaṃ puṇyaṃ sarvaśatruvināśanam |
jayāvahaṃ japennityamakṣayaṃ paramaṃ śivam ||

अर्थ: यह आदित्यहृदय पवित्र है, सब शत्रुओं का नाश करने वाला, विजय देने वाला, अक्षय और परम कल्याणकारी है; इसका नित्य जप करना चाहिए। ऐसा अगस्त्य मुनि कहते हैं।

पुण्यं
पवित्र
सर्वशत्रुविनाशनम्
सब शत्रुओं का नाश करने वाला
जयावहं
विजय दिलाने वाला
अक्षयं
कभी न घटने वाला
शिवम्
कल्याणकारी

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।चिन्ताशोकप्रशमनं आयुर्वर्धनमुत्तमम् ॥५॥

sarvamaṅgalamāṅgalyaṃ sarvapāpapraṇāśanam |
cintāśokapraśamanaṃ āyurvardhanamuttamam ||

अर्थ: यह सब मंगलों का भी मंगल है, सब पापों को नष्ट करने वाला, चिंता और शोक को शांत करने वाला और आयु बढ़ाने वाला उत्तम स्तोत्र है, ऐसा अगस्त्य मुनि कहते हैं।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं
सब मंगलों में मंगल
सर्वपापप्रणाशनम्
सब पापों का नाश करने वाला
चिन्ताशोकप्रशमनं
चिंता और शोक को शांत करने वाला
आयुर्वर्धनम्
आयु बढ़ाने वाला

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥६॥

raśmimantaṃ samudyantaṃ devāsuranamaskṛtam |
pūjayasva vivasvantaṃ bhāskaraṃ bhuvaneśvaram ||

अर्थ: किरणों वाले, उदय होते हुए, देवताओं और असुरों से नमस्कृत, संसार के स्वामी विवस्वान भास्कर (सूर्य) की पूजा करो।

रश्मिमन्तं
किरणों वाले
समुद्यन्तं
उदय होते हुए
विवस्वन्तं
विवस्वान (सूर्य) को
भुवनेश्वरम्
संसार के स्वामी

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥७॥

sarvadevātmako hyeṣa tejasvī raśmibhāvanaḥ |
eṣa devāsuragaṇām̐llokān pāti gabhastibhiḥ ||

अर्थ: ये सब देवताओं के स्वरूप हैं, तेजस्वी हैं और अपनी किरणों से सबको जीवन देते हैं। ये अपनी किरणों से देवताओं, असुरों और सब लोकों का पालन करते हैं।

सर्वदेवात्मकः
सब देवताओं के स्वरूप
रश्मिभावनः
किरणों से सबको उत्पन्न और पुष्ट करने वाले
पाति
रक्षा करते हैं
गभस्तिभिः
किरणों से

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥८॥

eṣa brahmā ca viṣṇuśca śivaḥ skandaḥ prajāpatiḥ |
mahendro dhanadaḥ kālo yamaḥ somo hyapāṃ patiḥ ||

अर्थ: यही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द और प्रजापति हैं; यही इन्द्र, कुबेर, काल, यम, सोम और जल के स्वामी वरुण हैं।

महेन्द्रः
इन्द्र
धनदः
धन देने वाले कुबेर
कालः
समय
अपां पतिः
जल के स्वामी वरुण

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः ।वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥९॥

pitaro vasavaḥ sādhyā hyaśvinau maruto manuḥ |
vāyurvahniḥ prajāprāṇa ṛtukartā prabhākaraḥ ||

अर्थ: यही पितर, वसु, साध्य, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण और मनु हैं; यही वायु, अग्नि, प्रजा के प्राण, ऋतुओं को बनाने वाले और प्रकाश फैलाने वाले हैं।

पितरः
पितर
अश्विनौ
दोनों अश्विनीकुमार
वह्निः
अग्नि
प्रजाप्राण
प्राणियों के प्राण
ऋतुकर्ता
ऋतुओं को बनाने वाले
प्रभाकरः
प्रकाश करने वाले

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् ।सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥१०॥

ādityaḥ savitā sūryaḥ khagaḥ pūṣā gabhastimān |
suvarṇasadṛśo bhānurhiraṇyaretā divākaraḥ ||

अर्थ: ये आदित्य (अदिति के पुत्र), सविता (जन्म देने वाले), सूर्य, खग (आकाश में चलने वाले), पूषा (पोषण करने वाले), गभस्तिमान् (किरणों वाले), सोने जैसे, भानु (प्रकाशमान), हिरण्यरेता (सृष्टि के तेजस्वी बीज वाले) और दिवाकर (दिन करने वाले) हैं।

सविता
जन्म और प्रेरणा देने वाले
खगः
आकाश में चलने वाले
पूषा
पोषण करने वाले
हिरण्यरेता
सुनहरे तेज के बीज वाले
दिवाकरः
दिन करने वाले

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ॥११॥

haridaśvaḥ sahasrārciḥ saptasaptirmarīcimān |
timironmathanaḥ śambhustvaṣṭā mārtāṇḍa aṃśumān ||

अर्थ: ये हरिदश्व (हरे घोड़ों वाले), सहस्रार्चि (हज़ार किरणों वाले), सप्तसप्ति (सात घोड़ों वाले), मरीचिमान्, तिमिरोन्मथन (अंधकार मिटाने वाले), शम्भु (कल्याणकारी), त्वष्टा (रचने वाले), मार्तण्ड और अंशुमान् (किरणों वाले) हैं।

हरिदश्वः
हरे घोड़ों वाले
सहस्रार्चिः
हज़ार किरणों वाले
सप्तसप्तिः
सात घोड़ों वाले
तिमिरोन्मथनः
अंधकार मिटाने वाले
त्वष्टा
रचने वाले

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः ।अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥१२॥

hiraṇyagarbhaḥ śiśirastapano bhāskaro raviḥ |
agnigarbho’diteḥ putraḥ śaṅkhaḥ śiśiranāśanaḥ ||

अर्थ: ये हिरण्यगर्भ, शिशिर (शीतलता भी देने वाले), तपन (तपाने वाले), भास्कर, रवि, अग्निगर्भ (भीतर अग्नि धारण करने वाले), अदिति के पुत्र, शंख और शिशिरनाशन (ठंड मिटाने वाले) हैं।

हिरण्यगर्भः
जिनके गर्भ में सुनहरा तेज है
तपनः
तपाने वाले
अग्निगर्भः
भीतर अग्नि धारण करने वाले
अदितेः पुत्रः
अदिति के पुत्र
शिशिरनाशनः
ठंड मिटाने वाले

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः ।घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथी प्लवङ्गमः ॥१३॥

vyomanāthastamobhedī ṛgyajuḥsāmapāragaḥ |
ghanavṛṣṭirapāṃ mitro vindhyavīthī plavaṅgamaḥ ||

अर्थ: ये आकाश के स्वामी, अंधकार को भेदने वाले, ऋग्, यजुः और साम वेद के पारंगत, घनी वर्षा कराने वाले, जल के मित्र और विंध्य के मार्ग (आकाश-पथ) पर तेज़ी से चलने वाले हैं।

व्योमनाथः
आकाश के स्वामी
तमोभेदी
अंधकार भेदने वाले
सामपारगः
वेदों के पारंगत
घनवृष्टिः
घनी वर्षा कराने वाले
प्लवङ्गमः
तेज़ी से चलने वाले

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः ।कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥१४॥

ātapī maṇḍalī mṛtyuḥ piṅgalaḥ sarvatāpanaḥ |
kavirviśvo mahātejāḥ raktaḥ sarvabhavodbhavaḥ ||

अर्थ: ये आतपी (गर्मी देने वाले), मण्डली (गोल मंडल वाले), मृत्यु (अंत करने वाले), पिंगल (पीले-भूरे), सबको तपाने वाले, कवि (ज्ञानी), विश्वरूप, महातेजस्वी, रक्त वर्ण और सबकी उत्पत्ति के कारण हैं।

आतपी
गर्मी देने वाले
मण्डली
गोल मंडल वाले
पिङ्गलः
पीले-भूरे वर्ण वाले
कविः
ज्ञानी
सर्वभवोद्भवः
सबकी उत्पत्ति के कारण

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः ।तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ॥१५॥

nakṣatragrahatārāṇāmadhipo viśvabhāvanaḥ |
tejasāmapi tejasvī dvādaśātmannamo’stu te ||

अर्थ: आप नक्षत्रों, ग्रहों और तारों के स्वामी हैं, विश्व को उत्पन्न करने वाले हैं, तेजस्वियों में भी तेजस्वी हैं; हे बारह रूपों वाले (बारह आदित्य), आपको नमस्कार।

अधिपः
स्वामी
विश्वभावनः
विश्व को उत्पन्न करने वाले
तेजसामपि तेजस्वी
तेजस्वियों में भी तेजस्वी
द्वादशात्मन्
हे बारह रूपों वाले

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥१६॥

namaḥ pūrvāya giraye paścimāyādraye namaḥ |
jyotirgaṇānāṃ pataye dinādhipataye namaḥ ||

अर्थ: पूर्व के पर्वत (उदयाचल) रूप को नमस्कार, पश्चिम के पर्वत (अस्ताचल) रूप को नमस्कार; ज्योतिर्गणों के स्वामी और दिन के अधिपति को नमस्कार।

पूर्वाय गिरये
पूर्व के पर्वत (जहाँ उदय होते हैं)
पश्चिमायाद्रये
पश्चिम के पर्वत (जहाँ अस्त होते हैं)
ज्योतिर्गणानां पतये
प्रकाश-पिंडों के स्वामी को
दिनाधिपतये
दिन के स्वामी को

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥१७॥

jayāya jayabhadrāya haryaśvāya namo namaḥ |
namo namaḥ sahasrāṃśo ādityāya namo namaḥ ||

अर्थ: विजय रूप, विजय से मिलने वाले कल्याण रूप और हरे घोड़ों वाले को बार-बार नमस्कार; हे हज़ार किरणों वाले, आदित्य को बार-बार नमस्कार।

जयाय
विजय रूप को
जयभद्राय
विजय और कल्याण देने वाले को
हर्यश्वाय
हरे घोड़ों वाले को
सहस्रांशो
हे हज़ार किरणों वाले

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः ।नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ॥१८॥

nama ugrāya vīrāya sāraṅgāya namo namaḥ |
namaḥ padmaprabodhāya mārtāṇḍāya namo namaḥ ||

अर्थ: उग्र, वीर और तेज़ गति वाले (सारंग) को बार-बार नमस्कार; कमलों को खिलाने वाले मार्तण्ड को बार-बार नमस्कार।

उग्राय
प्रचंड को
सारङ्गाय
तेज़ चलने वाले को
पद्मप्रबोधाय
कमलों को खिलाने वाले को
मार्ताण्डाय
मार्तण्ड (सूर्य) को

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे ।भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥१९॥

brahmeśānācyuteśāya sūryāyādityavarcase |
bhāsvate sarvabhakṣāya raudrāya vapuṣe namaḥ ||

अर्थ: ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी ईश्वर, सूर्य, आदित्य के तेज वाले, प्रकाशमान, (प्रलय में) सबको भक्षण करने वाले और रौद्र रूप वाले को नमस्कार।

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय
ब्रह्मा, शिव और विष्णु के ईश्वर को
आदित्यवर्चसे
आदित्य के तेज वाले को
भास्वते
प्रकाशमान को
सर्वभक्षाय
सबको भक्षण करने वाले को

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥२०॥

tamoghnāya himaghnāya śatrughnāyāmitātmane |
kṛtaghnaghnāya devāya jyotiṣāṃ pataye namaḥ ||

अर्थ: अंधकार, ठंड और शत्रुओं का नाश करने वाले, अपरिमित आत्मा वाले, कृतघ्नों का नाश करने वाले देव, ज्योतियों के स्वामी को नमस्कार।

तमोघ्नाय
अंधकार मिटाने वाले को
हिमघ्नाय
ठंड मिटाने वाले को
अमितात्मने
अपरिमित आत्मा वाले को
कृतघ्नघ्नाय
कृतघ्नों का नाश करने वाले को

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे ।नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥२१॥

taptacāmīkarābhāya vahnaye viśvakarmaṇe |
namastamo’bhinighnāya rucaye lokasākṣiṇe ||

अर्थ: तपे हुए सोने जैसी आभा वाले, अग्नि रूप, विश्व के रचयिता, अंधकार को मिटाने वाले, कांति रूप और संसार के साक्षी को नमस्कार।

तप्तचामीकराभाय
तपे सोने जैसी आभा वाले को
वह्नये
अग्नि रूप को
विश्वकर्मणे
विश्व के रचयिता को
लोकसाक्षिणे
संसार के साक्षी को

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः ।पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥२२॥

nāśayatyeṣa vai bhūtaṃ tadeva sṛjati prabhuḥ |
pāyatyeṣa tapatyeṣa varṣatyeṣa gabhastibhiḥ ||

अर्थ: यही प्रभु प्राणियों का नाश करते हैं और फिर उन्हें रचते हैं; यही अपनी किरणों से (जल को) सोखते, तपाते और बरसाते हैं।

नाशयति
नष्ट करते हैं
सृजति
रचते हैं
पायति
सोखते हैं
वर्षति
बरसाते हैं

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥२३॥

eṣa supteṣu jāgarti bhūteṣu pariniṣṭhitaḥ |
eṣa evāgnihotraṃ ca phalaṃ caivāgnihotriṇām ||

अर्थ: ये प्राणियों के भीतर स्थित रहकर उनके सोते समय भी जागते रहते हैं; यही अग्निहोत्र हैं और अग्निहोत्र करने वालों का फल भी यही हैं।

सुप्तेषु
सोते हुओं में
जागर्ति
जागते हैं
परिनिष्ठितः
भीतर स्थित
अग्निहोत्रिणाम्
अग्निहोत्र करने वालों का

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च ।यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥२४॥

vedāśca kratavaścaiva kratūnāṃ phalameva ca |
yāni kṛtyāni lokeṣu sarva eṣa raviḥ prabhuḥ ||

अर्थ: वेद, यज्ञ और यज्ञों का फल भी यही हैं; लोकों में जितने भी कर्म होते हैं, उन सबके प्रभु ये रवि ही हैं।

क्रतवः
यज्ञ
क्रतूनां फलम्
यज्ञों का फल
कृत्यानि
कर्म
रविः प्रभुः
प्रभु सूर्य

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥२५॥

enamāpatsu kṛcchreṣu kāntāreṣu bhayeṣu ca |
kīrtayan puruṣaḥ kaścinnāvasīdati rāghava ||

अर्थ: हे राघव, विपत्तियों में, कष्टों में, दुर्गम वनों में और भय के समय इनका कीर्तन करने वाला कोई भी व्यक्ति दुःख में नहीं डूबता, ऐसा अगस्त्य मुनि कहते हैं।

आपत्सु
विपत्तियों में
कृच्छ्रेषु
कष्टों में
कान्तारेषु
दुर्गम वनों में
कीर्तयन्
कीर्तन करता हुआ
नावसीदति
दुःख में नहीं डूबता

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥२६॥

pūjayasvainamekāgro devadevaṃ jagatpatim |
etat triguṇitaṃ japtvā yuddheṣu vijayiṣyasi ||

अर्थ: एकाग्र होकर इन देवों के देव, जगत के स्वामी की पूजा करो; इसे तीन बार जपकर तुम युद्धों में विजय पाओगे, ऐसा अगस्त्य मुनि राम से कहते हैं।

एकाग्रः
एकाग्र होकर
देवदेवं
देवों के देव को
त्रिगुणितं
तीन बार
जप्त्वा
जपकर

अस्मिन्क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि ।एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥२७॥

asminkṣaṇe mahābāho rāvaṇaṃ tvaṃ vadhiṣyasi |
evamuktvā tadā’gastyo jagāma ca yathāgatam ||

अर्थ: हे महाबाहो, इसी क्षण तुम रावण का वध करोगे। ऐसा कहकर अगस्त्य मुनि जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

अस्मिन्क्षणे
इसी क्षण
वधिष्यसि
वध करोगे
एवमुक्त्वा
ऐसा कहकर
यथागतम्
जैसे आए थे वैसे

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा ।धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥२८॥

etacchrutvā mahātejā naṣṭaśoko’bhavattadā |
dhārayāmāsa suprīto rāghavaḥ prayatātmavān ||

अर्थ: यह सुनकर महातेजस्वी राम का शोक दूर हो गया; प्रसन्न और संयमित मन से राघव ने इसे धारण किया (मन में बसा लिया)।

नष्टशोकः
जिनका शोक मिट गया
धारयामास
धारण किया
सुप्रीतः
बहुत प्रसन्न
प्रयतात्मवान्
संयमित मन वाले

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् ।त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥२९॥

ādityaṃ prekṣya japtvā tu paraṃ harṣamavāptavān |
trirācamya śucirbhūtvā dhanurādāya vīryavān ||

अर्थ: सूर्य की ओर देखकर और इसका जप करके वे परम हर्षित हुए; तीन बार आचमन करके, पवित्र होकर, पराक्रमी राम ने धनुष उठाया।

प्रेक्ष्य
देखकर
हर्षम्
आनंद
त्रिराचम्य
तीन बार आचमन करके
शुचिः
पवित्र
धनुरादाय
धनुष लेकर

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् ।सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥३०॥

rāvaṇaṃ prekṣya hṛṣṭātmā yuddhāya samupāgamat |
sarvayatnena mahatā vadhe tasya dhṛto’bhavat ||

अर्थ: रावण को देखकर प्रसन्न मन से वे युद्ध के लिए आगे बढ़े और पूरे प्रयत्न से उसके वध का निश्चय किया।

हृष्टात्मा
प्रसन्न मन वाले
समुपागमत्
आगे बढ़े
सर्वयत्नेन
पूरे प्रयत्न से
धृतः
दृढ़ निश्चय वाले

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामंमुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ।निशिचरपतिसङ्क्षयं विदित्वासुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥३१॥

atha raviravadannirīkṣya rāmaṃ
muditamanāḥ paramaṃ prahṛṣyamāṇaḥ |
niśicarapatisaṅkṣayaṃ viditvā
suragaṇamadhyagato vacastvareti ||

अर्थ: तब देवताओं के बीच स्थित सूर्य देव ने राम को देखा और मन में प्रसन्न, अत्यंत हर्षित होकर, राक्षसराज रावण का अंत निकट जानकर कहा: "जल्दी करो"।

रविः
सूर्य
निरीक्ष्य
देखकर
निशिचरपति
राक्षसों के राजा (रावण)
सङ्क्षयं
अंत
सुरगणमध्यगतः
देवताओं के बीच स्थित
त्वर
जल्दी करो

परिचय

आदित्य हृदयम् सूर्य देव की स्तुति है, जो वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में आती है। रावण से युद्ध करते-करते थके और चिंतित श्री राम के पास अगस्त्य मुनि आते हैं और उन्हें यह "सनातन रहस्य" सिखाते हैं। इसका जप करके राम फिर से उत्साह के साथ युद्ध के लिए उठते हैं।

इसके 31 श्लोकों में पहले कथा है (1–5), फिर सूर्य के रूप और नाम (6–15), नमस्कार (16–21), सूर्य की महिमा (22–24), फलश्रुति (25–27) और अंत में राम का जप करके युद्ध के लिए जाना (28–31)। सूर्य को यहाँ ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सब देवताओं के रूप में देखा गया है।

भावार्थ

आदित्य हृदयम् एक कठिन घड़ी में दिया गया उपदेश है। युद्ध से थके और चिंतित राम से अगस्त्य मुनि कहते हैं कि सूर्य की उपासना करो, क्योंकि सूर्य केवल आकाश का एक तेजस्वी पिंड नहीं, सब देवताओं का स्वरूप हैं: वही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और यम हैं, वही ऋतुएँ बनाते हैं, वर्षा कराते हैं और सोते हुए प्राणियों में भी जागते रहते हैं।

बीच के श्लोकों में सूर्य के नाम और उन्हें बार-बार नमस्कार है: उदय और अस्त के पर्वत, दिन के स्वामी, अंधकार और ठंड मिटाने वाले, संसार के साक्षी। स्तोत्र का भाव यह है कि जो शक्ति रोज़ अंधकार हटाकर दिन लाती है, उसका स्मरण मन से भी निराशा और भय का अंधकार हटाता है। राम का शोक दूर होता है, वे जप करके, आचमन करके, धनुष उठाते हैं और नए उत्साह से आगे बढ़ते हैं।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति, जो अगस्त्य मुनि के वचन हैं, कहती है कि आदित्यहृदय पवित्र, शत्रुओं का नाश करने वाला, विजय देने वाला, पाप, चिंता और शोक मिटाने वाला और आयु बढ़ाने वाला है; विपत्ति, कष्ट या भय में इसका कीर्तन करने वाला दुःख में नहीं डूबता; और इसे तीन बार जपकर राम युद्ध में विजय पाएँगे। ये रामायण की कथा के वचन हैं।

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपेन्नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥

यह आदित्यहृदय पवित्र है, सब शत्रुओं का नाश करने वाला, विजय देने वाला, अक्षय और परम कल्याणकारी है; इसका नित्य जप करना चाहिए। ऐसा अगस्त्य मुनि कहते हैं।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकप्रशमनं आयुर्वर्धनमुत्तमम् ॥

यह सब मंगलों का भी मंगल है, सब पापों को नष्ट करने वाला, चिंता और शोक को शांत करने वाला और आयु बढ़ाने वाला उत्तम स्तोत्र है, ऐसा अगस्त्य मुनि कहते हैं।

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥

हे राघव, विपत्तियों में, कष्टों में, दुर्गम वनों में और भय के समय इनका कीर्तन करने वाला कोई भी व्यक्ति दुःख में नहीं डूबता, ऐसा अगस्त्य मुनि कहते हैं।

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥

एकाग्र होकर इन देवों के देव, जगत के स्वामी की पूजा करो; इसे तीन बार जपकर तुम युद्धों में विजय पाओगे, ऐसा अगस्त्य मुनि राम से कहते हैं।

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • रोज़ सुबह सूर्योदय के समय, सूर्य को अर्घ्य देने के बाद
  • रविवार को
  • रथ सप्तमी, मकर संक्रांति और छठ के समय सूर्य-पूजा में
  • कठिन समय में साहस और मन की स्थिरता के लिए

पढ़ने की विधि

  • सुबह स्नान के बाद, हो सके तो उगते सूर्य की ओर मुँह करके बैठें या खड़े हों।
  • पहले सूर्य को जल का अर्घ्य दें, फिर स्तोत्र पढ़ें; अर्घ्य न दे सकें तो केवल पाठ भी कर सकते हैं।
  • कुछ लोग पाठ से पहले विनियोग (ऋषि अगस्त्य, छंद अनुष्टुप्) और न्यास बोलते हैं; यह बाद की पाठ-परंपरा है, रामायण के श्लोकों का भाग नहीं।
  • श्लोक 26 में इसे तीन बार जपने की बात है; रोज़ एक बार मन लगाकर पढ़ना भी पूरा पाठ है।
पूरी विधिसूर्य को अर्घ्य देने की विधिरोज़ सुबह सूर्य देव को जल देने की सरल विधि: लोटा, सूर्योदय का समय, गिरती धार, अर्घ्य का मंत्र और सूर्य के बारह नाम; सूर्य को सीधे न देखने की सावधानी के साथ।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
श्लोक 2उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदाsa.wikisource.org के रामायण-पाठ में यह है; बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) में भी "उपगम्य" है।
श्लोक 4जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्रामायण-पाठ (sa.wikisource.org)। बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) में "अक्षय्यं परमं शुभम्" और vignanam.org में "अक्षय्यं परमं शिवम्" है।
श्लोक 11मार्तण्डकोंऽशुमान्रामायण-पाठ (sa.wikisource.org) और vignanam.org ("मार्ताण्डकोंऽशुमान्")।
श्लोक 12तपनोऽहस्करो रविःरामायण-पाठ (sa.wikisource.org): "अहस्कर" यानी दिन करने वाले।
श्लोक 16पश्चिमे गिरये नमःबृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) का पाठ।
श्लोक 18नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु तेरामायण-पाठ (sa.wikisource.org)।
श्लोक 21हरये विश्वकर्मणेरामायण-पाठ (sa.wikisource.org); sanskritdocuments.org भी इसे दूसरे पाठ के रूप में बताता है।
श्लोक 23एष चैवाग्निहोत्रं चरामायण-पाठ (sa.wikisource.org) और बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953)।
श्लोक 24देवाश्च क्रतवश्चैव ... सर्वेषु परमप्रभुःरामायण-पाठ (sa.wikisource.org)।
श्लोक 27रावणं त्वं जहिष्यसि । एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्रामायण-पाठ (sa.wikisource.org)।
श्लोक 30जयार्थं समुपागमत् । सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्रामायण-पाठ (sa.wikisource.org)।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
अगस्त्य मुनि (रामायण में वक्ता)
ग्रंथ / स्रोत
वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड, सर्ग 105
भाषा
संस्कृत

वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में यह स्तोत्र अगस्त्य मुनि श्री राम को सुनाते हैं। रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि की मानी जाती है।

सर्ग 105 की गिनती sa.wikisource.org पर दिए रामायण के पाठ और vignanam.org के अनुसार है; कुछ संस्करणों में सर्ग की संख्या अलग है। स्तोत्र के रूप में छपे पाठ (sanskritdocuments.org, बृहत्स्तोत्ररत्नाकर) और sa.wikisource.org के रामायण-पाठ में कुछ शब्दों का अंतर है; यहाँ स्तोत्र-पाठ दिया गया है और रामायण-पाठ के शब्द पाठ-भेद में।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और sa.wikisource.org पर वाल्मीकि रामायण (युद्धकाण्ड, सर्ग 105) के पाठ, बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) और vignanam.org से श्लोक-दर-श्लोक मिलाया गया। स्तोत्र के रूप में छपे तीनों पाठ (sanskritdocuments.org, बृहत्स्तोत्ररत्नाकर, vignanam.org) ज़्यादातर जगह एक-से हैं और रामायण-पाठ से लगभग दस जगह अलग हैं। यहाँ स्तोत्र-पाठ रखा गया, क्योंकि यही पढ़ा जाता है; रामायण-पाठ के शब्द पाठ-भेद में हैं। sanskritdocuments.org का विनियोग और न्यास शामिल नहीं किया गया, क्योंकि वे रामायण के श्लोक नहीं हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

आदित्य हृदयम् किस ग्रंथ में है?

वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में, sa.wikisource.org और vignanam.org की गिनती के अनुसार सर्ग 105 में। कुछ संस्करणों में सर्ग की संख्या अलग है।

इसे किसने किसको सुनाया?

अगस्त्य मुनि ने श्री राम को, रावण से अंतिम युद्ध से ठीक पहले, जब राम थके और चिंतित थे।

"आदित्य हृदय" का क्या अर्थ है?

आदित्य यानी सूर्य और हृदय यानी सार। यह सूर्य की स्तुति का सार है, जिसमें सूर्य को सब देवताओं का स्वरूप माना गया है।

इसे कब पढ़ना चाहिए?

बहुत से लोग इसे रोज़ सुबह सूर्य को अर्घ्य देने के बाद या रविवार को पढ़ते हैं। इसका कोई कठिन नियम नहीं है।

क्या सब किताबों में इसका पाठ एक-सा है?

नहीं। स्तोत्र के रूप में छपा पाठ और रामायण के कुछ संस्करणों का पाठ कुछ शब्दों में अलग है, जैसे श्लोक 18 में "मार्ताण्डाय नमो नमः" और "प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते"। यहाँ स्तोत्र-पाठ दिया गया है और अंतर पाठ-भेद में।

क्या विनियोग और न्यास ज़रूरी हैं?

नहीं। विनियोग और न्यास बाद की पाठ-परंपरा में जोड़े गए हैं; रामायण में केवल ये 31 श्लोक हैं। जो चाहें वे इन्हें बोल सकते हैं।

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