सूर्य

पूजा विधि · सूर्य · रोज़ की पूजा

सूर्य को अर्घ्य देने की विधि

रोज़ सुबह सूर्य देव को जल देने की सरल विधि: लोटा, सूर्योदय का समय, गिरती धार, अर्घ्य का मंत्र और सूर्य के बारह नाम; सूर्य को सीधे न देखने की सावधानी के साथ।

इस पेज पर
  1. परिचय
  2. एक नज़र में
  3. कब करें
  4. सामग्री
  5. तैयारी
  6. चित्र या मूर्ति
  7. संकल्प
  8. चरण-दर-चरण विधि
  9. पाठ
  10. भोग
  11. समापन
  12. छोटी विधि
  13. परंपराओं में अंतर
  14. ये भी पढ़ें
  15. स्रोत
  16. सवाल-जवाब
  17. सुधार सुझाएँ
रोज़ की पूजा

यह रोज़ सुबह सूर्य देव को जल (अर्घ्य) देने की सबसे सरल घरेलू विधि है: लोटे से, सूर्योदय के समय, अर्घ्य के मंत्र और सूर्य के बारह नामों के साथ। संध्या-वंदन का वैदिक अर्घ्य, जो जनेऊ और दीक्षा की परंपरा से जुड़ा है, छठ पूजा का व्रत और घाट का अनुष्ठान, और रविवार या रथ सप्तमी की पूरी पूजा यहाँ नहीं हैं; संध्या-वंदन किसी जानकार से सीखें, और छठ की तारीख़ें छठ पूजा के पन्ने पर देखें।

परिचय

सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा जाता है, क्योंकि वे रोज़ आँखों के सामने हैं। उनकी उपासना की सबसे पुरानी और सबसे सरल रीत है सुबह उन्हें जल अर्पित करना, जिसे अर्घ्य कहते हैं। गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश में सूर्य-पूजा और सूर्य-नमस्कार को रोज़ के कर्म में गिना गया है: अंजलि में या ताँबे के पात्र में जल, लाल चंदन, अक्षत और फूल लेकर, हाथों को हृदय के पास लाकर, मंत्र के साथ अर्घ्य दिया जाता है।

यह सबसे सरल पूजा है: इसके लिए केवल जल चाहिए, और कुछ नहीं। फूल, रोली या मंत्र हों तो अच्छा, न हों तो एक लोटा जल और मन में धन्यवाद काफ़ी है। एक बात का ध्यान रखें: सूर्य को सीधे, देर तक न देखें; जल की धार में से या नीची नज़र से दर्शन करें।

एक नज़र में

समय
सूर्योदय के समय या उसके कुछ देर बाद, स्नान के बाद
अवधि
लगभग 5 मिनट
कौन कर सकता है
कोई भी: स्त्री, पुरुष, बच्चे, बुज़ुर्ग
मुख्य सामग्री
लोटा और जल; चाहें तो लाल फूल, रोली या लाल चंदन और अक्षत
आरती
रोज़ के अर्घ्य में आरती नहीं होती; रविवार या रथ सप्तमी की पूजा में 'ॐ जय सूर्य भगवान' गाई जाती है

पूजा कब करें

  • रोज़ सुबह स्नान के बाद, सूर्योदय के समय या उसके कुछ देर बाद, जब सूर्य की रोशनी अभी कोमल हो। गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश में प्रातःसंध्या के बाद सूर्य-पूजा का उल्लेख है।
  • रविवार सूर्य देव का दिन है; रविवार व्रत की बातें रविवार व्रत के पन्ने पर हैं। माघ शुक्ल सप्तमी की रथ सप्तमी सूर्य जयंती है, और मकर संक्रांति पर भी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
  • छठ पूजा में डूबते और उगते सूर्य, दोनों को अर्घ्य दिया जाता है; उसकी अपनी विधि और व्रत है, और तारीख़ें छठ पूजा के पन्ने पर हैं।

पूजा सामग्री

  • आवश्यक इसके बिना यह विधि नहीं होती
  • वैकल्पिक हो तो अच्छा; न हो तो विकल्प दिया है
  • परंपरा-विशेष कुछ परंपराओं में ही
सामग्रीउपयोगस्थितिविकल्प / टिप्पणी
शुद्ध जलअर्घ्य के लिएआवश्यकअर्घ्य का अर्थ ही जल अर्पित करना है। और कुछ न हो तो केवल साफ़ जल ही पूरा अर्घ्य है।
ताँबे का लोटाजल भरकर अर्पित करने के लिएपरंपरा-विशेषताँबे का लोटा परंपरा में प्रचलित है; न हो तो पीतल या कोई भी साफ़ लोटा, और वह भी न हो तो दोनों हाथों की अंजलि में जल लेकर अर्घ्य दें (गीताप्रेस में अंजलि का विकल्प दिया है)।
लाल फूल (जैसे गुड़हल)जल में डालने के लिएवैकल्पिककोई भी फूल या फूल की एक पंखुड़ी; न हो तो छोड़ दें।
रोली या लाल चंदनजल में थोड़ा-सा मिलाने के लिएवैकल्पिकन हो तो छोड़ दें।
अक्षतजल में कुछ दाने डालने के लिएवैकल्पिकन हो तो छोड़ दें।
नीचे रखने के लिए गमला या पात्रअर्घ्य का जल इकट्ठा करने के लिए, ताकि वह पैरों पर न गिरेवैकल्पिकआँगन या बगीचे में सीधे मिट्टी पर भी जल गिरा सकते हैं।

स्थान और अपनी तैयारी

  • सुबह स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। जहाँ से पूर्व दिशा या उगता सूर्य दिखे, वहाँ खड़े हों: छत, आँगन, छज्जा या खिड़की।
  • जहाँ जल गिरे, वह जगह साफ़ हो; नीचे गमला या कोई पात्र रख दें। कई लोग अर्घ्य नंगे पाँव देते हैं।
  • ऊँची जगह, जैसे छत की मुँडेर, पर खड़े होकर अर्घ्य देते समय फिसलने और संतुलन का ध्यान रखें।

चित्र या मूर्ति कैसे रखें

  • मुख पूर्व की ओर, उगते सूर्य की दिशा में रखें।
  • लोटा दोनों हाथों से पकड़ें। गीताप्रेस की विधि में हाथ हृदय के पास रखे जाते हैं; बहुत-से लोग लोटे को छाती या सिर की ऊँचाई तक उठाकर जल गिराते हैं। दोनों रीतें प्रचलित हैं।
  • नीचे गमला या पात्र ऐसे रखें कि जल की धार उसी में गिरे और छींटे पैरों पर न पड़ें।

संकल्प

अर्घ्य से पहले मन में एक पल ठहरकर याद करना कि यह जल किसे और किस भाव से दे रहे हैं। रोज़ के अर्घ्य में बड़ा संकल्प नहीं बोला जाता; मन का यह भाव ही संकल्प है।

हे सूर्य देव, आज मैं (अपना नाम) आपको यह जल अर्पित कर रहा/रही हूँ। आपके प्रकाश के लिए धन्यवाद; मेरा आज का दिन अच्छे कामों में बीते।

गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश में सूर्य के बारह नमस्कार से पहले संस्कृत संकल्प दिया है, जिसमें तिथि और स्थान जोड़े जाते हैं; रोज़ के सरल अर्घ्य के लिए अपनी भाषा का यह भाव काफ़ी है।

पूजा की विधि, चरण-दर-चरण

  1. १लोटे में जल भरना

    क्या करें
    स्नान के बाद लोटे में साफ़ जल भरें।
    कैसे करें
    चाहें तो जल में एक लाल फूल, थोड़ी रोली या लाल चंदन और कुछ अक्षत डाल दें। लोटा बहुत भरा न हो, ताकि आराम से उठ सके।
    भाव
    जिस सूर्य से जल, अन्न और जीवन है, उसी को आज का पहला जल।
    विकल्प
    कुछ न हो तो केवल साफ़ जल; लोटा न हो तो अंजलि।
  2. २पूर्व की ओर खड़े होना

    क्या करें
    उगते सूर्य की ओर मुख करके खड़े हों और लोटा दोनों हाथों से पकड़ें।
    कैसे करें
    नीचे गमला या पात्र रख लें। हाथ हृदय के पास रखें, या लोटे को छाती या सिर की ऊँचाई तक उठाएँ। एक पल आँखें बंद करके मन शांत करें।
    भाव
    दिन की शुरुआत में प्रकाश के सामने विनम्र होकर खड़ा होना।
    विकल्प
    खड़े न हो सकें तो बैठकर, खिड़की के पास से भी अर्घ्य दिया जा सकता है।
  3. ३अर्घ्य देना

    क्या करें
    लोटे से जल की पतली धार धीरे-धीरे गिराते हुए अर्घ्य दें।
    कैसे करें
    लोटे को इस तरह झुकाएँ कि जल एक पतली धार में, या उँगलियों के बीच से होकर, धीरे-धीरे नीचे गिरे। जल गिराते समय नीचे का मंत्र बोलें। कई लोग तीन बार थोड़ा-थोड़ा करके जल गिराते हैं।
    भाव
    धन्यवाद के साथ अपना जल, अपना समय और अपना मन अर्पित करना।
    पाठ

    एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
    अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥

    अर्थ: हे हज़ार किरणों वाले, तेज के भंडार, जगत के स्वामी सूर्य देव, पधारिए। मुझ पर कृपा करें; हे दिवाकर, भक्ति से दिया यह अर्घ्य स्वीकार करें।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: सूर्य के बारह नमस्कार (सूर्य को अर्घ्य)

    विकल्प
    मंत्र याद न हो तो जल गिराते हुए 'ॐ सूर्याय नमः' कहें।
  4. ४धार में से दर्शन

    क्या करें
    गिरती जल-धार में से सूर्य की झलक लें।
    कैसे करें
    नज़र थोड़ी नीची रखें और गिरती धार में चमकती रोशनी को देखें। सूर्य को सीधे, देर तक बिल्कुल न देखें, सुबह के समय भी नहीं; तेज़ रोशनी आँख के भीतरी पर्दे को नुक़सान पहुँचा सकती है। चश्मा पहनते हों या आँख में कोई तकलीफ़ हो तो आँखें बंद रखकर ही अर्घ्य दें।
    भाव
    प्रकाश का आदर उसके सामने सिर झुकाकर किया जाता है, उसे घूरकर नहीं।
    विकल्प
    आँखें बंद रखकर मन में सूर्य का ध्यान करना भी पूरा दर्शन है।
  5. ५सूर्य के बारह नाम

    क्या करें
    सूर्य देव के बारह नाम लेते हुए हाथ जोड़कर नमस्कार करें।
    कैसे करें
    हर नाम के साथ हाथ जोड़कर सिर झुकाएँ। गीताप्रेस की विधि में हर नाम के साथ एक साष्टांग प्रणाम किया जाता है; शरीर साथ दे तो वैसा करें, न दे तो हाथ जोड़ना काफ़ी है।
    भाव
    सूर्य के अलग-अलग गुणों को याद करना: सबके मित्र, प्रकाश देने वाले, पालने वाले, प्रेरणा देने वाले।
    पाठ

    ॐ मित्राय नमः। ॐ रवये नमः। ॐ सूर्याय नमः। ॐ भानवे नमः।
    ॐ खगाय नमः। ॐ पूष्णे नमः। ॐ हिरण्यगर्भाय नमः। ॐ मरीचये नमः।
    ॐ आदित्याय नमः। ॐ सवित्रे नमः। ॐ अर्काय नमः। ॐ भास्कराय नमो नमः।

    अर्थ: मित्र (सबके मित्र), रवि, सूर्य, भानु (प्रकाशमान), खग (आकाश में चलने वाले), पूषा (पोषण करने वाले), हिरण्यगर्भ (सुनहरे तेज वाले), मरीचि (किरणों वाले), आदित्य (अदिति के पुत्र), सविता (प्रेरणा देने वाले), अर्क (पूजनीय तेज) और भास्कर (प्रकाश करने वाले): इन बारह नामों वाले सूर्य देव को नमस्कार।

    स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: सूर्य के बारह नमस्कार

    विकल्प
    बारह नाम याद न हों तो केवल 'ॐ सूर्याय नमः' तीन बार कहें।
  6. ६परिक्रमा और प्रणाम

    क्या करें
    अपनी जगह पर एक परिक्रमा करें और सूर्य देव को प्रणाम करें।
    कैसे करें
    दाहिनी ओर से घूमते हुए अपनी जगह पर एक बार घूम जाएँ, फिर हाथ जोड़कर नीचे का श्लोक पढ़ें।
    भाव
    पूरे दिन के लिए धन्यवाद और विनम्रता।
    पाठ

    जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।
    तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥

    अर्थ: जो जपा (गुड़हल) के फूल जैसे लाल हैं, कश्यप के पुत्र और महान तेज वाले हैं, अंधकार के शत्रु और सब पापों का नाश करने वाले हैं, उन दिवाकर (सूर्य) को मैं प्रणाम करता हूँ।

    नवग्रह स्तोत्रम्: पूरा पाठ और अर्थ

    विकल्प
    परिक्रमा की जगह न हो तो केवल प्रणाम।
  7. ७जप (इच्छा हो तो)

    क्या करें
    समय हो तो कुछ देर गायत्री मंत्र या 'ॐ सूर्याय नमः' का जप करें।
    कैसे करें
    अर्घ्य के बाद वहीं खड़े या बैठकर 11 या 108 बार जपें।
    भाव
    सविता, यानी प्रेरणा देने वाले सूर्य देव से सद्बुद्धि की प्रार्थना।
    पाठ

    ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

    अर्थ: हम सविता देव के उस श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को सही राह पर प्रेरित करे।

    मंत्र का अर्थ और उच्चारण

    विकल्प
    गायत्री मंत्र के बारे में परंपराओं में अलग मत हैं (नीचे देखें); मन में शंका हो तो 'ॐ सूर्याय नमः' का जप करें।

पूजा में पढ़े जाने वाले पाठ

नवग्रह

नवग्रह स्तोत्रम्

नवग्रह, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु · स्तोत्र · संस्कृत

प्रणाम का श्लोक इसी का पहला श्लोक है (चरण 6)

सूर्य

आदित्य हृदयम्

सूर्य · स्तोत्र · संस्कृत

रविवार या रथ सप्तमी को अर्घ्य के बाद पाठ के लिए

सूर्य

ॐ जय सूर्य भगवान

सूर्य · आरती

रविवार या रथ सप्तमी की पूरी पूजा की आरती; रोज़ के अर्घ्य में आरती नहीं होती

भोग

  • रोज़ के अर्घ्य में भोग नहीं लगता; जल ही अर्घ्य है
  • रविवार या रथ सप्तमी की पूजा में कई घरों में गुड़, गेहूँ से बनी कोई चीज़ या मौसम का फल
  • छठ में ठेकुआ और मौसमी फल (छठ की अपनी विधि है)

भोग इस विधि का हिस्सा नहीं है। रविवार व्रत में परंपरा से दिन में एक बार, सूर्यास्त से पहले, बिना नमक का भोजन किया जाता है; यह अपनी सेहत देखकर करें।

प्रार्थना और समापन

हे सूर्य देव, आपके प्रकाश के लिए धन्यवाद। आज का दिन आलस के बिना, सच्चाई और सेवा में बीते, और जो भूल हो, उसे क्षमा करें।

क्षमा प्रार्थना

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥

अर्थ: हे परमेश्वर, मैं न आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; मुझे क्षमा करें। हे देवों के स्वामी, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें।

स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: पञ्चदेव-पूजा और देवपूजा के सामान्य विधान की क्षमा-याचना

पूजा के बाद

  • गमले या पात्र में इकट्ठा हुआ जल पौधों में डाल दें। अर्घ्य का जल नाली में न बहाएँ और उस पर पैर न पड़ें।
  • कुछ लोग अर्घ्य के बाद गीली मिट्टी को उँगली से छूकर माथे से लगाते हैं; यह अपनी रीत के अनुसार।
  • लोटा धोकर अलग जगह रखें, ताकि वह रोज़ अर्घ्य के लिए ही काम आए।

समय कम हो तो: छोटी विधि

  1. स्नान के बाद लोटे में साफ़ जल भरें; चाहें तो फूल और रोली डालें।
  2. उगते सूर्य की ओर मुख करके खड़े हों, नीचे गमला रखें।
  3. 'एहि सूर्य सहस्रांशो' या 'ॐ सूर्याय नमः' कहते हुए धीरे-धीरे जल गिराएँ।
  4. धार में से नीची नज़र से दर्शन करें; सूर्य को सीधे न देखें।
  5. सूर्य के बारह नाम लेकर या हाथ जोड़कर नमस्कार करें।
  6. एक परिक्रमा करके प्रणाम करें और जल पौधों में डाल दें।

परंपराओं में अंतर

  • गीताप्रेस की विधि में जल में लाल चंदन, अक्षत और फूल डाले जाते हैं और हाथ हृदय के पास रहते हैं; बहुत-से लोग लोटा सिर तक उठाकर देते हैं, और कुछ लोग जल में थोड़ा गुड़ या मिश्री भी डालते हैं।
  • छठ पूजा में व्रती नदी या तालाब के पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को और अगली सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं; उसमें सूप में फल और ठेकुआ रखकर अर्घ्य दिया जाता है।
  • संध्या-वंदन में दिन में तीन बार गायत्री मंत्र के साथ अर्घ्य दिया जाता है; यह वैदिक कर्म है, जो जनेऊ और गुरु से सीखी विधि की परंपरा से जुड़ा है, और यहाँ की सरल घरेलू विधि से अलग है।
  • गायत्री मंत्र: कुछ परंपराओं में इसका जप उपनयन (जनेऊ) या गुरु-दीक्षा के बाद ही किया जाता है, जबकि बहुत-से परिवार और संस्थाएँ इसे सबके लिए खुला मानते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार चलें।
  • रथ सप्तमी पर कई जगह सूर्योदय के समय स्नान के साथ अर्घ्य की विशेष रीत है, और मकर संक्रांति पर भी सूर्य को अर्घ्य और दान का महत्व है।

ये भी पढ़ें

सूर्य देव के लिए और

स्रोत और समीक्षा

  • गीताप्रेस, गोरखपुर: नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, 'सूर्यके बारह नमस्कार' (archive.org पर स्कैन): अंजलि या ताम्रपात्र में लाल चंदन, अक्षत, फूल; हाथ हृदय के पास; 'एहि सूर्य सहस्रांशो' का मंत्र; बारह नाम; हर नाम पर साष्टांग प्रणाम; क्षमा-याचना। दो अलग स्कैन से मिलाया।
  • sanskritdocuments.org: नवग्रहस्तोत्र (अर्थ सहित): सूर्य का श्लोक (जपाकुसुमसंकाशं)
  • Wikipedia: Photic retinopathy: सूर्य को सीधे देखने से आँख के पर्दे को होने वाले नुक़सान की जानकारी
  • Wikipedia: Chhath: डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य की छठ की रीत
  • dailybhakti.app: रविवार व्रत, रथ सप्तमी, छठ और सूर्य के मंत्र: रविवार के एक समय बिना नमक के भोजन, रथ सप्तमी और छठ की बातें साइट के व्रत पन्नों से; गायत्री और 'ॐ सूर्याय नमः' साइट के मंत्र पन्नों से

समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): अर्घ्य का मंत्र और बारह नाम गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के 'सूर्यके बारह नमस्कार' अंश से (archive.org के दो स्कैन के OCR से मिलाकर; बारहवाँ नाम वहाँ 'ॐ भास्कराय नमो नमः' है, वैसा ही रखा); सूर्य का प्रणाम-श्लोक sanskritdocuments के नवग्रहस्तोत्र से; गायत्री साइट के मंत्र पन्ने से। आँखों की सावधानी Wikipedia (Photic retinopathy) के आधार पर लिखी गई। रोज़ के अर्घ्य में आरती नहीं होती, इसलिए aarti को null रखा और सूर्य की आरती को केवल related में रविवार की पूजा के लिए दिया। केवल जल को 'आवश्यक' कहा गया, क्योंकि अर्घ्य का अर्थ ही जल अर्पण है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या सूर्य को सीधे देखना ठीक है?

नहीं। सूर्य को सीधे, देर तक देखने से आँख के भीतरी पर्दे को नुक़सान हो सकता है, सुबह की रोशनी में भी। इसलिए अर्घ्य देते समय नज़र थोड़ी नीची रखें और गिरती धार में चमकती रोशनी की झलक भर लें। आँख में तकलीफ़ हो, आँख का इलाज चल रहा हो या दवा से पुतली फैली हो, तो आँखें बंद रखकर ही अर्घ्य दें; भाव उतना ही पूरा है।

सूर्योदय के समय नहीं उठ पाए, तो?

सुबह के शुरुआती घंटों में जब भी उठें, स्नान के बाद अर्घ्य दे सकते हैं। सूर्योदय का समय सबसे अच्छा माना जाता है, पर नियमितता उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। देर हो जाए तो भी अर्घ्य छोड़ने के बजाय दे दें।

बादल हों या सूर्य न दिखे, तो?

पूर्व दिशा की ओर मुख करके उसी तरह अर्घ्य दें। सूर्य बादलों के पीछे भी हैं; मन में उनका ध्यान करके जल अर्पित करें।

ताँबे का लोटा नहीं है, तो?

पीतल या कोई भी साफ़ लोटा लें। गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश में दोनों हाथों की अंजलि में जल लेकर अर्घ्य देने का विकल्प भी दिया है।

ऊपर की मंज़िल पर रहते हैं, नीचे मिट्टी नहीं है; जल कहाँ गिराएँ?

छज्जे या खिड़की के पास कोई गमला या बड़ा पात्र रखें और अर्घ्य उसी में दें। बाद में वह जल पौधों में डाल दें। ध्यान रखें कि जल नीचे किसी के ऊपर न गिरे।

क्या मासिक धर्म के दिनों में अर्घ्य दे सकते हैं?

इस पर परिवारों में अलग-अलग रीत है। कुछ घरों में उन दिनों अर्घ्य नहीं दिया जाता, जबकि बहुत-से लोग इसे जारी रखते हैं, क्योंकि इसमें किसी मूर्ति या पूजा-स्थान को छूना नहीं होता। जो भी आपकी रीत हो, सुबह सूर्य को मन में प्रणाम और धन्यवाद हर दिन किया जा सकता है।

क्या अर्घ्य के साथ गायत्री मंत्र ज़रूरी है?

नहीं। अर्घ्य के लिए 'एहि सूर्य सहस्रांशो', सूर्य के बारह नाम या केवल 'ॐ सूर्याय नमः' काफ़ी है। गायत्री मंत्र के जप के बारे में परंपराओं के अलग मत हैं; अपनी परंपरा के अनुसार चलें।

सुधार सुझाएँ

इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।

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