नवग्रह स्तोत्रम्
नवग्रह, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु · स्तोत्र · संस्कृत
प्रणाम का श्लोक इसी का पहला श्लोक है (चरण 6)

पूजा विधि · सूर्य · रोज़ की पूजा
रोज़ सुबह सूर्य देव को जल देने की सरल विधि: लोटा, सूर्योदय का समय, गिरती धार, अर्घ्य का मंत्र और सूर्य के बारह नाम; सूर्य को सीधे न देखने की सावधानी के साथ।
यह रोज़ सुबह सूर्य देव को जल (अर्घ्य) देने की सबसे सरल घरेलू विधि है: लोटे से, सूर्योदय के समय, अर्घ्य के मंत्र और सूर्य के बारह नामों के साथ। संध्या-वंदन का वैदिक अर्घ्य, जो जनेऊ और दीक्षा की परंपरा से जुड़ा है, छठ पूजा का व्रत और घाट का अनुष्ठान, और रविवार या रथ सप्तमी की पूरी पूजा यहाँ नहीं हैं; संध्या-वंदन किसी जानकार से सीखें, और छठ की तारीख़ें छठ पूजा के पन्ने पर देखें।
सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा जाता है, क्योंकि वे रोज़ आँखों के सामने हैं। उनकी उपासना की सबसे पुरानी और सबसे सरल रीत है सुबह उन्हें जल अर्पित करना, जिसे अर्घ्य कहते हैं। गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश में सूर्य-पूजा और सूर्य-नमस्कार को रोज़ के कर्म में गिना गया है: अंजलि में या ताँबे के पात्र में जल, लाल चंदन, अक्षत और फूल लेकर, हाथों को हृदय के पास लाकर, मंत्र के साथ अर्घ्य दिया जाता है।
यह सबसे सरल पूजा है: इसके लिए केवल जल चाहिए, और कुछ नहीं। फूल, रोली या मंत्र हों तो अच्छा, न हों तो एक लोटा जल और मन में धन्यवाद काफ़ी है। एक बात का ध्यान रखें: सूर्य को सीधे, देर तक न देखें; जल की धार में से या नीची नज़र से दर्शन करें।
| सामग्री | उपयोग | स्थिति | विकल्प / टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| शुद्ध जल | अर्घ्य के लिए | आवश्यक | अर्घ्य का अर्थ ही जल अर्पित करना है। और कुछ न हो तो केवल साफ़ जल ही पूरा अर्घ्य है। |
| ताँबे का लोटा | जल भरकर अर्पित करने के लिए | परंपरा-विशेष | ताँबे का लोटा परंपरा में प्रचलित है; न हो तो पीतल या कोई भी साफ़ लोटा, और वह भी न हो तो दोनों हाथों की अंजलि में जल लेकर अर्घ्य दें (गीताप्रेस में अंजलि का विकल्प दिया है)। |
| लाल फूल (जैसे गुड़हल) | जल में डालने के लिए | वैकल्पिक | कोई भी फूल या फूल की एक पंखुड़ी; न हो तो छोड़ दें। |
| रोली या लाल चंदन | जल में थोड़ा-सा मिलाने के लिए | वैकल्पिक | न हो तो छोड़ दें। |
| अक्षत | जल में कुछ दाने डालने के लिए | वैकल्पिक | न हो तो छोड़ दें। |
| नीचे रखने के लिए गमला या पात्र | अर्घ्य का जल इकट्ठा करने के लिए, ताकि वह पैरों पर न गिरे | वैकल्पिक | आँगन या बगीचे में सीधे मिट्टी पर भी जल गिरा सकते हैं। |
अर्घ्य से पहले मन में एक पल ठहरकर याद करना कि यह जल किसे और किस भाव से दे रहे हैं। रोज़ के अर्घ्य में बड़ा संकल्प नहीं बोला जाता; मन का यह भाव ही संकल्प है।
हे सूर्य देव, आज मैं (अपना नाम) आपको यह जल अर्पित कर रहा/रही हूँ। आपके प्रकाश के लिए धन्यवाद; मेरा आज का दिन अच्छे कामों में बीते।
गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश में सूर्य के बारह नमस्कार से पहले संस्कृत संकल्प दिया है, जिसमें तिथि और स्थान जोड़े जाते हैं; रोज़ के सरल अर्घ्य के लिए अपनी भाषा का यह भाव काफ़ी है।
एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
अर्थ: हे हज़ार किरणों वाले, तेज के भंडार, जगत के स्वामी सूर्य देव, पधारिए। मुझ पर कृपा करें; हे दिवाकर, भक्ति से दिया यह अर्घ्य स्वीकार करें।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: सूर्य के बारह नमस्कार (सूर्य को अर्घ्य)
ॐ मित्राय नमः। ॐ रवये नमः। ॐ सूर्याय नमः। ॐ भानवे नमः।
ॐ खगाय नमः। ॐ पूष्णे नमः। ॐ हिरण्यगर्भाय नमः। ॐ मरीचये नमः।
ॐ आदित्याय नमः। ॐ सवित्रे नमः। ॐ अर्काय नमः। ॐ भास्कराय नमो नमः।
अर्थ: मित्र (सबके मित्र), रवि, सूर्य, भानु (प्रकाशमान), खग (आकाश में चलने वाले), पूषा (पोषण करने वाले), हिरण्यगर्भ (सुनहरे तेज वाले), मरीचि (किरणों वाले), आदित्य (अदिति के पुत्र), सविता (प्रेरणा देने वाले), अर्क (पूजनीय तेज) और भास्कर (प्रकाश करने वाले): इन बारह नामों वाले सूर्य देव को नमस्कार।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: सूर्य के बारह नमस्कार
जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥
अर्थ: जो जपा (गुड़हल) के फूल जैसे लाल हैं, कश्यप के पुत्र और महान तेज वाले हैं, अंधकार के शत्रु और सब पापों का नाश करने वाले हैं, उन दिवाकर (सूर्य) को मैं प्रणाम करता हूँ।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम सविता देव के उस श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को सही राह पर प्रेरित करे।
नवग्रह, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु · स्तोत्र · संस्कृत
प्रणाम का श्लोक इसी का पहला श्लोक है (चरण 6)
सूर्य · स्तोत्र · संस्कृत
रविवार या रथ सप्तमी को अर्घ्य के बाद पाठ के लिए
सूर्य · आरती
रविवार या रथ सप्तमी की पूरी पूजा की आरती; रोज़ के अर्घ्य में आरती नहीं होती
भोग इस विधि का हिस्सा नहीं है। रविवार व्रत में परंपरा से दिन में एक बार, सूर्यास्त से पहले, बिना नमक का भोजन किया जाता है; यह अपनी सेहत देखकर करें।
हे सूर्य देव, आपके प्रकाश के लिए धन्यवाद। आज का दिन आलस के बिना, सच्चाई और सेवा में बीते, और जो भूल हो, उसे क्षमा करें।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अर्थ: हे परमेश्वर, मैं न आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न ठीक से पूजा करना; मुझे क्षमा करें। हे देवों के स्वामी, मेरी पूजा में मंत्र की, विधि की या भक्ति की जो कमी रही हो, उसके बावजूद मैंने जो पूजा की है, उसे पूरा मान लें।
स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश: पञ्चदेव-पूजा और देवपूजा के सामान्य विधान की क्षमा-याचना
सूर्य · आरती
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन
बृहस्पति · आरती
ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा
शनि · आरती
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी
समीक्षा (10 अक्टूबर 2026): अर्घ्य का मंत्र और बारह नाम गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश के 'सूर्यके बारह नमस्कार' अंश से (archive.org के दो स्कैन के OCR से मिलाकर; बारहवाँ नाम वहाँ 'ॐ भास्कराय नमो नमः' है, वैसा ही रखा); सूर्य का प्रणाम-श्लोक sanskritdocuments के नवग्रहस्तोत्र से; गायत्री साइट के मंत्र पन्ने से। आँखों की सावधानी Wikipedia (Photic retinopathy) के आधार पर लिखी गई। रोज़ के अर्घ्य में आरती नहीं होती, इसलिए aarti को null रखा और सूर्य की आरती को केवल related में रविवार की पूजा के लिए दिया। केवल जल को 'आवश्यक' कहा गया, क्योंकि अर्घ्य का अर्थ ही जल अर्पण है।
नहीं। सूर्य को सीधे, देर तक देखने से आँख के भीतरी पर्दे को नुक़सान हो सकता है, सुबह की रोशनी में भी। इसलिए अर्घ्य देते समय नज़र थोड़ी नीची रखें और गिरती धार में चमकती रोशनी की झलक भर लें। आँख में तकलीफ़ हो, आँख का इलाज चल रहा हो या दवा से पुतली फैली हो, तो आँखें बंद रखकर ही अर्घ्य दें; भाव उतना ही पूरा है।
सुबह के शुरुआती घंटों में जब भी उठें, स्नान के बाद अर्घ्य दे सकते हैं। सूर्योदय का समय सबसे अच्छा माना जाता है, पर नियमितता उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। देर हो जाए तो भी अर्घ्य छोड़ने के बजाय दे दें।
पूर्व दिशा की ओर मुख करके उसी तरह अर्घ्य दें। सूर्य बादलों के पीछे भी हैं; मन में उनका ध्यान करके जल अर्पित करें।
पीतल या कोई भी साफ़ लोटा लें। गीताप्रेस की नित्यकर्म-पूजाप्रकाश में दोनों हाथों की अंजलि में जल लेकर अर्घ्य देने का विकल्प भी दिया है।
छज्जे या खिड़की के पास कोई गमला या बड़ा पात्र रखें और अर्घ्य उसी में दें। बाद में वह जल पौधों में डाल दें। ध्यान रखें कि जल नीचे किसी के ऊपर न गिरे।
इस पर परिवारों में अलग-अलग रीत है। कुछ घरों में उन दिनों अर्घ्य नहीं दिया जाता, जबकि बहुत-से लोग इसे जारी रखते हैं, क्योंकि इसमें किसी मूर्ति या पूजा-स्थान को छूना नहीं होता। जो भी आपकी रीत हो, सुबह सूर्य को मन में प्रणाम और धन्यवाद हर दिन किया जा सकता है।
नहीं। अर्घ्य के लिए 'एहि सूर्य सहस्रांशो', सूर्य के बारह नाम या केवल 'ॐ सूर्याय नमः' काफ़ी है। गायत्री मंत्र के जप के बारे में परंपराओं के अलग मत हैं; अपनी परंपरा के अनुसार चलें।
इस विधि में कोई बात आपकी परंपरा से अलग हो, या कहीं गलती दिखे, तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को स्रोत से मिलाकर देखते हैं।