दुर्गा

स्तोत्र · दुर्गा · स्तोत्र

कीलक स्तोत्रम्

दुर्गा सप्तशती से पहले पढ़ा जाने वाला कीलक स्तोत्र: "विशुद्धज्ञानदेहाय" से शुरू होने वाले चौदह श्लोक, विनियोग सहित, मूल पाठ और अर्थ।

इस पेज पर
  1. पूरा पाठ
  2. परिचय
  3. भावार्थ
  4. फलश्रुति
  5. कब पढ़ें
  6. विधि
  7. पाठ-भेद
  8. रचयिता और स्रोत
  9. ये भी पढ़ें
  10. सवाल-जवाब
  11. सुधार सुझाएँ

ॐ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य शिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,श्रीमहासरस्वती देवता,श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

oṃ asya śrīkīlakamantrasya śiva ṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ,
śrīmahāsarasvatī devatā,
śrījagadambāprītyarthaṃ saptaśatīpāṭhāṅgatvena jape viniyogaḥ |
oṃ namaścaṇḍikāyai ||

अर्थ: इस कीलक मन्त्र के ऋषि शिव हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता श्री महासरस्वती हैं। जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसका जप किया जाता है। ॐ, चण्डिका देवी को नमस्कार।

ऋषिः
जिस ऋषि ने मन्त्र देखा
छन्दः
जिस छन्द में मन्त्र है
देवता
मन्त्र के देवता
सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन
सप्तशती पाठ के अंग के रूप में
विनियोगः
उपयोग का संकल्प

मार्कण्डेय उवाच

ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे ॥१॥

oṃ viśuddhajñānadehāya trivedīdivyacakṣuṣe |
śreyaḥprāptinimittāya namaḥ somārdhadhāriṇe ||

अर्थ: मार्कण्डेय जी कहते हैं: विशुद्ध ज्ञान ही जिनका शरीर है, तीनों वेद ही जिनके दिव्य नेत्र हैं, जो कल्याण-प्राप्ति के कारण हैं और जो सिर पर अर्धचन्द्र धारण करते हैं, उन भगवान शिव को नमस्कार है।

विशुद्धज्ञानदेहाय
विशुद्ध ज्ञान ही जिनका शरीर है, उन्हें
त्रिवेदी
तीनों वेद
दिव्यचक्षुषे
दिव्य नेत्रों वाले को
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय
कल्याण-प्राप्ति के कारण को
सोमार्धधारिणे
अर्धचन्द्र धारण करने वाले शिव को

सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम् ।सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ॥२॥

sarvametadvijānīyānmantrāṇāmabhikīlakam |
so’pi kṣemamavāpnoti satataṃ jāpyatatparaḥ ||

अर्थ: मनुष्य यह सब जाने कि यह (सप्तशती) सब मन्त्रों का अभिकीलक है, यानी उनकी बाधा हटाने वाला है। जो दूसरे मन्त्रों के जप में निरंतर लगा रहता है, वह भी कल्याण पाता है।

विजानीयात्
जाने
अभिकीलकम्
कीलक को हटाने वाला, बाधा दूर करने वाला
क्षेमम्
कल्याण
अवाप्नोति
पाता है
जाप्यतत्परः
जप में लगा हुआ

सिद्ध्यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि ।एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्यति ॥३॥

siddhyantyuccāṭanādīni vastūni sakalānyapi |
etena stuvatāṃ devī stotramātreṇa siddhyati ||

अर्थ: उसके भी उच्चाटन आदि सब कर्म और सब वस्तुएँ सिद्ध होती हैं; पर जो इस (सप्तशती) से देवी की स्तुति करते हैं, उनके लिए केवल स्तोत्र-पाठ से ही देवी सिद्ध हो जाती हैं।

सिद्ध्यन्ति
सिद्ध होते हैं
उच्चाटनादीनि
उच्चाटन आदि (तन्त्र के कर्म)
सकलानि
सब
स्तुवताम्
स्तुति करने वालों के लिए
स्तोत्रमात्रेण
केवल स्तोत्र से

न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते ।विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम् ॥४॥

na mantro nauṣadhaṃ tatra na kiñcidapi vidyate |
vinā jāpyena siddhyeta sarvamuccāṭanādikam ||

अर्थ: उसके लिए न मन्त्र चाहिए, न औषधि, न कोई और साधन; बिना (दूसरे) जप के ही उच्चाटन आदि सब कर्म सिद्ध हो जाते हैं।

औषधम्
औषधि
न किञ्चित् अपि
कुछ भी नहीं
विद्यते
आवश्यक है
विना जाप्येन
बिना जप के
सिद्ध्येत
सिद्ध हो जाता है

समग्राण्यपि सिद्ध्यन्ति लोकशङ्कामिमां हरः ।कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ॥५॥

samagrāṇyapi siddhyanti lokaśaṅkāmimāṃ haraḥ |
kṛtvā nimantrayāmāsa sarvamevamidaṃ śubham ||

अर्थ: सब कुछ केवल इसी से सिद्ध हो जाता है, लोगों की इस शंका को ध्यान में रखकर भगवान शिव ने (सबको) बुलाकर बताया कि यह सारा (सप्तशती स्तोत्र) ही कल्याणकारी है।

समग्राणि
सब
लोकशङ्काम्
लोगों की शंका को
हरः
भगवान शिव
निमन्त्रयामास
बुलाकर कहा, बताया
शुभम्
कल्याणकारी

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः ।समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ॥६॥

stotraṃ vai caṇḍikāyāstu tacca guptaṃ cakāra saḥ |
samāptirna ca puṇyasya tāṃ yathāvanniyantraṇām ||

अर्थ: फिर शिव ने चण्डिका के उस स्तोत्र को गुप्त कर दिया। इसके पाठ से मिलने वाले पुण्य का कभी अंत नहीं होता, इसलिए उन्होंने उस पर विधिपूर्वक नियंत्रण (कीलन) कर दिया।

चण्डिकायाः
चण्डिका देवी का
गुप्तम्
छिपा हुआ
चकार
कर दिया
समाप्तिः न
अंत नहीं
नियन्त्रणाम्
नियंत्रण, बाँध

सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशयः ।कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ॥७॥

so’pi kṣemamavāpnoti sarvamevaṃ na saṃśayaḥ |
kṛṣṇāyāṃ vā caturdaśyāmaṣṭamyāṃ vā samāhitaḥ ||

अर्थ: वह मनुष्य भी पूरा कल्याण पाता है, इसमें संशय नहीं, जो कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी या अष्टमी को एकाग्र होकर (अगले श्लोक के अनुसार देवी को अपना सब कुछ अर्पित करता है)।

क्षेमम्
कल्याण
न संशयः
इसमें संशय नहीं
कृष्णायाम्
कृष्ण पक्ष में
चतुर्दश्याम्
चतुर्दशी तिथि को
अष्टम्याम्
अष्टमी तिथि को
समाहितः
एकाग्र होकर

ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति ।इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥८॥

dadāti pratigṛhṇāti nānyathaiṣā prasīdati |
itthaṃrūpeṇa kīlena mahādevena kīlitam ||

अर्थ: जो देवी को अर्पित करता है और फिर उसे (प्रसाद रूप में) ग्रहण करता है, उसी पर ये देवी प्रसन्न होती हैं, और किसी तरह नहीं। इस प्रकार की कील से महादेव ने इस स्तोत्र को कीलित (बाँध) कर रखा है।

ददाति
अर्पित करता है
प्रतिगृह्णाति
वापस प्रसाद रूप में ग्रहण करता है
अन्यथा
और किसी तरह
प्रसीदति
प्रसन्न होती हैं
कीलेन
कील से
कीलितम्
बाँधा हुआ

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम् ।स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः ॥९॥

yo niṣkīlāṃ vidhāyaināṃ nityaṃ japati saṃsphuṭam |
sa siddhaḥ sa gaṇaḥ so’pi gandharvo jāyate naraḥ ||

अर्थ: यह श्लोक कहता है: जो इस (सप्तशती) को निष्कील करके, यानी इस बाँध को खोलकर, रोज़ साफ़ उच्चारण से इसका जप करता है, वह मनुष्य सिद्ध होता है, देवी का गण (पार्षद) होता है और गन्धर्व भी होता है।

निष्कीलाम्
कील से मुक्त, बाँध खोलकर
विधाय
करके
संस्फुटम्
साफ़ उच्चारण से
सिद्धः
सिद्ध
गणः
देवी का पार्षद
गन्धर्वः
गन्धर्व

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते ।नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ॥१०॥

na caivāpyaṭatastasya bhayaṃ kvāpīha jāyate |
nāpamṛtyuvaśaṃ yāti mṛto mokṣamavāpnuyāt ||

अर्थ: यह श्लोक कहता है: कहीं भी विचरते हुए उसे इस संसार में भय नहीं होता, वह अकाल मृत्यु के वश में नहीं जाता और देह छूटने पर मोक्ष पाता है।

अटतः
विचरते हुए
क्वापि
कहीं भी
इह
यहाँ, इस संसार में
अपमृत्यु
अकाल मृत्यु
मृतः
देह छूटने पर
मोक्षम्
मोक्ष

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति ।ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ॥११॥

jñātvā prārabhya kurvīta na kurvāṇo vinaśyati |
tato jñātvaiva sampannamidaṃ prārabhyate budhaiḥ ||

अर्थ: इसलिए (कीलन और निष्कीलन को) जानकर ही पाठ आरम्भ करना चाहिए; ऐसा करने वाले का अनिष्ट नहीं होता। इसी कारण विद्वान इसे जानकर ही इस सम्पूर्ण (स्तोत्र) का पाठ आरम्भ करते हैं।

ज्ञात्वा
जानकर
प्रारभ्य
आरम्भ करके
कुर्वीत
करे
कुर्वाणः
ऐसा करने वाला
न विनश्यति
नष्ट नहीं होता
सम्पन्नम्
सम्पूर्ण, निर्दोष
बुधैः
विद्वानों द्वारा

सौभाग्यादि च यत्किञ्चिद् दृश्यते ललनाजने ।तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ॥१२॥

saubhāgyādi ca yatkiñcid dṛśyate lalanājane |
tatsarvaṃ tatprasādena tena jāpyamidaṃ śubham ||

अर्थ: स्त्रियों में जो कुछ सौभाग्य आदि दिखाई देता है, वह सब देवी की कृपा का ही फल है; इसलिए इस कल्याणकारी स्तोत्र का जप करना चाहिए।

सौभाग्यादि
सौभाग्य आदि
ललनाजने
स्त्रियों में
तत्प्रसादेन
उनकी (देवी की) कृपा से
जाप्यम्
जपने योग्य
शुभम्
कल्याणकारी

शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः ।भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत् ॥१३॥

śanaistu japyamāne’smin stotre sampattiruccakaiḥ |
bhavatyeva samagrāpi tataḥ prārabhyameva tat ||

अर्थ: यह श्लोक कहता है: इस स्तोत्र का धीरे-धीरे जप करने पर भी बड़ी और पूरी समृद्धि होती ही है, इसलिए इसका पाठ आरम्भ करना ही चाहिए। कुछ व्याख्याएँ "उच्चकैः" को ऊँचे स्वर में पाठ के अर्थ में भी लेती हैं।

शनैः
धीरे-धीरे
जप्यमाने
जपे जाने पर
सम्पत्तिः
समृद्धि
उच्चकैः
ऊँचे रूप में; ऊँचे स्वर से
समग्रा
पूरी
प्रारभ्यम्
आरम्भ करने योग्य

ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः ।शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः ॥१४॥

aiśvaryaṃ yatprasādena saubhāgyārogyasampadaḥ |
śatruhāniḥ paro mokṣaḥ stūyate sā na kiṃ janaiḥ ||

अर्थ: जिनकी कृपा से ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, संपत्ति, शत्रुओं का नाश और परम मोक्ष तक मिलता है, उन देवी की स्तुति लोग क्यों न करें?

ऐश्वर्यम्
वैभव
यत्प्रसादेन
जिनकी कृपा से
आरोग्य
स्वास्थ्य
सम्पदः
संपत्तियाँ
शत्रुहानिः
शत्रुओं का नाश
परः मोक्षः
परम मोक्ष
स्तूयते
स्तुति की जाती है

॥ इति देव्याः कीलकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

|| iti devyāḥ kīlakastotraṃ sampūrṇam ||

अर्थ: इस प्रकार देवी का कीलक स्तोत्र पूरा हुआ।

परिचय

कीलक दुर्गा सप्तशती के उन अंगों में से है जो मुख्य पाठ से पहले पढ़े जाते हैं। "कीलक" का अर्थ है कील, यानी बाँधने वाली चीज़। स्तोत्र कहता है कि भगवान शिव ने सप्तशती को एक कील से बाँध (कीलित कर) दिया था, और जो इस रहस्य को जानकर, उसे खोलकर (निष्कील करके) पाठ करता है, उसे पूरा फल मिलता है।

स्तोत्र की शुरुआत भगवान शिव को नमस्कार से होती है और अंत इस प्रश्न पर कि जिन देवी की कृपा से ऐश्वर्य, आरोग्य और मोक्ष तक मिलता है, लोग उनकी स्तुति क्यों न करें। यहाँ उत्तर भारत में प्रचलित चौदह श्लोकों वाला पाठ दिया गया है; सोलह श्लोकों वाला एक और पाठ भी मिलता है, जिसका भेद नीचे पाठ-भेद में है।

भावार्थ

कीलक स्तोत्र दुर्गा सप्तशती की भूमिका जैसा है। यह बताता है कि सप्तशती अपने आप में पूर्ण साधना है: जो इससे देवी की स्तुति करते हैं, उन्हें दूसरे मन्त्र, औषधि या साधन की आवश्यकता नहीं। लोगों की इसी शंका पर भगवान शिव ने स्पष्ट किया कि यह स्तोत्र ही कल्याणकारी है, और फिर इसके असीम पुण्य के कारण इसे गुप्त करके "कीलित" कर दिया।

स्तोत्र कहता है कि यह कील समर्पण से खुलती है: जो एकाग्र होकर देवी को सब कुछ अर्पित करता है और उसे उनका प्रसाद मानकर ग्रहण करता है, उसी पर देवी प्रसन्न होती हैं। इस रहस्य को जानकर, साफ़ उच्चारण से रोज़ पाठ करने वाले के लिए स्तोत्र निर्भयता, अकाल मृत्यु से रक्षा और मोक्ष की बात कहता है।

अंत में स्तोत्र एक सीधा प्रश्न रखता है: जिन देवी की कृपा से ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, संपत्ति और मोक्ष तक मिलता है, लोग उनकी स्तुति क्यों न करें? यही प्रश्न सप्तशती पाठ का निमंत्रण है।

फलश्रुति

इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि जो इसके रहस्य को जानकर सप्तशती का साफ़ उच्चारण से रोज़ जप करता है, वह सिद्ध होता है, उसे कहीं भय नहीं होता, अकाल मृत्यु नहीं होती और अंत में मोक्ष मिलता है; और देवी की कृपा से ऐश्वर्य, आरोग्य और संपत्ति मिलती है। ये स्तोत्र के अपने शब्द हैं, जिन्हें यहाँ उसी रूप में बताया गया है।

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम् ।
स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः ॥

यह श्लोक कहता है: जो इस (सप्तशती) को निष्कील करके, यानी इस बाँध को खोलकर, रोज़ साफ़ उच्चारण से इसका जप करता है, वह मनुष्य सिद्ध होता है, देवी का गण (पार्षद) होता है और गन्धर्व भी होता है।

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते ।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ॥

यह श्लोक कहता है: कहीं भी विचरते हुए उसे इस संसार में भय नहीं होता, वह अकाल मृत्यु के वश में नहीं जाता और देह छूटने पर मोक्ष पाता है।

शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः ।
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत् ॥

यह श्लोक कहता है: इस स्तोत्र का धीरे-धीरे जप करने पर भी बड़ी और पूरी समृद्धि होती ही है, इसलिए इसका पाठ आरम्भ करना ही चाहिए। कुछ व्याख्याएँ "उच्चकैः" को ऊँचे स्वर में पाठ के अर्थ में भी लेती हैं।

ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः ।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः ॥

जिनकी कृपा से ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, संपत्ति, शत्रुओं का नाश और परम मोक्ष तक मिलता है, उन देवी की स्तुति लोग क्यों न करें?

यह स्तोत्र कब पढ़ा जाता है

  • नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले
  • जब भी सप्तशती का पाठ किया जाए, उसके आरम्भ में
  • स्तोत्र स्वयं कृष्ण पक्ष की अष्टमी और चतुर्दशी का उल्लेख करता है (श्लोक 7)

पढ़ने की विधि

  • प्रचलित उत्तर भारतीय परंपरा में सप्तशती से पहले देवी कवच, फिर अर्गला और फिर कीलक पढ़ा जाता है। कुछ परंपराओं में यह क्रम अलग भी है; अपनी पारिवारिक या गुरु-परंपरा का क्रम मानें।
  • पहले विनियोग पढ़ें, फिर "ॐ नमश्चण्डिकायै" कहकर चौदह श्लोक पढ़ें।
  • पाठ साफ़ उच्चारण से करें; स्तोत्र स्वयं स्पष्ट उच्चारण वाले पाठ की बात करता है (श्लोक 9)।
  • केवल कीलक भी पढ़ा जा सकता है, पर इसका भाव सप्तशती पाठ की भूमिका का है, इसलिए यह प्रायः उसी के साथ पढ़ा जाता है।
पूरी विधिदुर्गा पूजा विधिनवरात्रि में घर पर रोज़ माँ दुर्गा की पूजा: दीपक या अखंड ज्योति, कलश, लाल चुनरी, लाल फूल, कुमकुम, दिन की देवी का स्मरण, पाठ, आरती और कन्या पूजन।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:

कहाँदूसरा पाठटिप्पणी
पूरा स्तोत्रसोलह श्लोकों वाला पाठsanskritdocuments.org पर कीलक का एक दूसरा पाठ है जिसमें सोलह श्लोक हैं और कई शब्द अलग हैं; उसके मुख्य भेद नीचे हैं। ऊपर का चौदह श्लोकों वाला पाठ drikpanchang.com, sa.wikisource.org और (थोड़े भेद के साथ) stotranidhi.com से मेल खाता है।
श्लोक 2मन्त्राणामपि कीलकम्sanskritdocuments.org और stotranidhi.com का पाठ।
श्लोक 3सिद्ध्यन्त्युच्चाटनादीनि कर्माणि सकलान्यपि । एतेन स्तुवतां देवीं स्तोत्रवृन्देन भक्तितः ॥sanskritdocuments.org का पाठ।
श्लोक 6तच्च गुह्यं चकार सः । समाप्नोति स पुण्येन तां यथावन्निमन्त्रणाम् ॥sanskritdocuments.org का पाठ।
श्लोक 9चण्डीं जपति नित्यशः … गन्धर्वो जायते ध्रुवम्sanskritdocuments.org का पाठ; stotranidhi.com पर "जायते वने"।
श्लोक 10न चैवापाटवं तस्य भयं क्वापि न जायते । … मृते च मोक्षमाप्नुयात्sanskritdocuments.org का पाठ; stotranidhi.com पर "भयं क्वापि हि जायते"।
श्लोक 11ह्यकुर्वाणो विनश्यति … सम्पूर्णमिदंsanskritdocuments.org और stotranidhi.com का पाठ।
श्लोक 14 के बाद"चण्डिकां हृदयेनापि" और "अग्रतोऽमुं महादेवकृतं कीलकवारणम्" वाले दो श्लोककेवल sanskritdocuments.org के सोलह श्लोकों वाले पाठ में।

रचयिता और स्रोत

रचयिता
ज्ञात नहीं
ग्रंथ / स्रोत
दुर्गा सप्तशती के आरम्भिक अंग (कवच, अर्गला, कीलक)
भाषा
संस्कृत

कीलक मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य (सप्तशती के तेरह अध्याय) से बाहर का अंग है, जो परंपरा से सप्तशती पाठ के साथ पढ़ा जाता है। स्तोत्र मार्कण्डेय मुनि के वचन के रूप में है।

पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): चौदह श्लोकों वाला पाठ drikpanchang.com से लिया गया और sa.wikisource.org, bhaktibharat.com तथा stotranidhi.com से पंक्ति-पंक्ति मिलाया गया; sanskritdocuments.org का सोलह श्लोकों वाला दूसरा पाठ भी पूरा मिलाया गया और उसके भेद पाठ-भेद में दिए गए। चौदह श्लोकों वाला पाठ उत्तर भारत की प्रचलित सप्तशती (जैसे गीता प्रेस वाली परंपरा) का पाठ है; किसी छपी गीता प्रेस प्रति से सीधे नहीं मिलाया गया। श्लोक 8 में "इत्थंरूपेण" का शुद्ध रूप stotranidhi.com से लिया गया है, क्योंकि दो स्रोतों में "रुपेण" छपा है।

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माँ दुर्गा के लिए और

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कीलक का क्या अर्थ है?

कीलक का अर्थ है कील, यानी किसी चीज़ को बाँधकर रोकने वाली वस्तु। स्तोत्र के अनुसार भगवान शिव ने सप्तशती को कीलित कर दिया था, और जो इसका रहस्य जानकर पाठ करता है, उसके लिए यह बाँध खुल जाता है।

कवच, अर्गला और कीलक किस क्रम में पढ़े जाते हैं?

उत्तर भारत में प्रचलित क्रम यह है: पहले देवी कवच, फिर अर्गला, फिर कीलक, और उसके बाद सप्तशती। कुछ परंपराएँ अलग क्रम मानती हैं; अपनी परंपरा के अनुसार चलें।

कीलक में कितने श्लोक हैं?

यहाँ दिए प्रचलित पाठ में चौदह श्लोक हैं। एक दूसरे पाठ में सोलह श्लोक हैं और कई शब्द अलग हैं।

"निष्कीलां विधाय" का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है: कील को हटाकर, यानी बाँध खोलकर। स्तोत्र के आठवें श्लोक के अनुसार यह बाँध देवी को सब कुछ अर्पित करके उसे उनका प्रसाद मानकर ग्रहण करने से खुलता है।

क्या कीलक अकेले पढ़ा जा सकता है?

पढ़ा जा सकता है, पर इसका विषय सप्तशती पाठ की भूमिका है, इसलिए परंपरा में यह प्रायः सप्तशती के साथ ही पढ़ा जाता है।

सुधार सुझाएँ

पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।

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