नवग्रह स्तोत्रम्
नवग्रह, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु · स्तोत्र · संस्कृत
जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः ।स्थिरासनो महाकायः सर्वकर्माविरोधकः ॥१॥
maṅgalo bhūmiputraśca ṛṇahartā dhanapradaḥ |
sthirāsano mahākāyaḥ sarvakarmāvirodhakaḥ ||
अर्थ: (मंगल के नाम:) मंगल, भूमिपुत्र (पृथ्वी के पुत्र), ऋणहर्ता (ऋण हरने वाले), धनप्रद (धन देने वाले), स्थिरासन (स्थिर आसन वाले), महाकाय (विशाल शरीर वाले) और सर्वकर्माविरोधक (किसी शुभ काम में बाधा न डालने वाले)।
लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः ।धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः ॥२॥
lohito lohitākṣaśca sāmagānāṃ kṛpākaraḥ |
dharātmajaḥ kujo bhaumo bhūtido bhūminandanaḥ ||
अर्थ: लोहित (लाल वर्ण वाले), लोहिताक्ष (लाल नेत्रों वाले), सामगानां कृपाकर (सामवेद गाने वालों पर कृपा करने वाले), धरात्मज (धरती के पुत्र), कुज, भौम, भूतिद (ऐश्वर्य देने वाले) और भूमिनन्दन (धरती के लाड़ले)।
अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः ।वृष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः ॥३॥
aṅgārako yamaścaiva sarvarogāpahārakaḥ |
vṛṣṭeḥ kartā’pahartā ca sarvakāmaphalapradaḥ ||
अर्थ: अंगारक (अंगारे जैसे लाल), यम (नियंत्रण करने वाले), सब रोगों को हरने वाले, वर्षा कराने वाले और उसे रोकने वाले, और सब कामनाओं का फल देने वाले।
एतानि कुजनामानि नित्यं यः श्रद्धया पठेत् ।ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात् ॥४॥
etāni kujanāmāni nityaṃ yaḥ śraddhayā paṭhet |
ṛṇaṃ na jāyate tasya dhanaṃ śīghramavāpnuyāt ||
अर्थ: जो मंगल के इन नामों को रोज़ श्रद्धा से पढ़ता है, उस पर ऋण नहीं चढ़ता और वह जल्दी धन पाता है, ऐसा यह श्लोक कहता है।
धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् ।कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥५॥
dharaṇīgarbhasambhūtaṃ vidyutkāntisamaprabham |
kumāraṃ śaktihastaṃ ca maṅgalaṃ praṇamāmyaham ||
अर्थ: पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न, बिजली जैसी चमक वाले, कुमार रूप और हाथ में शक्ति (भाला) धारण करने वाले मंगल को मैं प्रणाम करता हूँ।
स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः ।न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पापि भवति क्वचित् ॥६॥
stotramaṅgārakasyaitatpaṭhanīyaṃ sadā nṛbhiḥ |
na teṣāṃ bhaumajā pīḍā svalpāpi bhavati kvacit ||
अर्थ: मनुष्यों को अंगारक (मंगल) का यह स्तोत्र सदा पढ़ना चाहिए; ऐसा कहा गया है कि उन्हें मंगल से होने वाली थोड़ी-सी भी पीड़ा कभी नहीं होती।
अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल ।त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय ॥७॥
aṅgāraka mahābhāga bhagavanbhaktavatsala |
tvāṃ namāmi mamāśeṣamṛṇamāśu vināśaya ||
अर्थ: हे अंगारक, हे महाभाग, हे भक्तों से प्रेम करने वाले भगवान! मैं आपको नमस्कार करता हूँ; मेरे सारे ऋण को शीघ्र नष्ट कीजिए।
ऋणरोगादिदारिद्र्यं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः ।भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥८॥
ṛṇarogādidāridryaṃ ye cānye hyapamṛtyavaḥ |
bhayakleśamanastāpā naśyantu mama sarvadā ||
अर्थ: ऋण, रोग और दरिद्रता, और जो दूसरी अकाल-मृत्यु जैसी विपत्तियाँ हैं, तथा भय, क्लेश और मन का संताप, ये सब मेरे लिए सदा नष्ट हों।
अतिवक्र दुराराध्य भोगमुक्त जितात्मनः ।तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥९॥
ativakra durārādhya bhogamukta jitātmanaḥ |
tuṣṭo dadāsi sāmrājyaṃ ruṣṭo harasi tatkṣaṇāt ||
अर्थ: हे अत्यंत वक्र (टेढ़ी चाल वाले), कठिनाई से प्रसन्न होने वाले, भोगों से मुक्त और मन को जीते हुए देव! आप प्रसन्न हों तो साम्राज्य दे देते हैं और रुष्ट हों तो उसी क्षण छीन लेते हैं।
विरिञ्चिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा ।तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः ॥१०॥
viriñciśakraviṣṇūnāṃ manuṣyāṇāṃ tu kā kathā |
tena tvaṃ sarvasattvena graharājo mahābalaḥ ||
अर्थ: जब ब्रह्मा, इन्द्र और विष्णु के लिए भी आपका प्रभाव है, तो मनुष्यों की क्या बात! इसी सामर्थ्य से आप ग्रहों के राजा और महाबली हैं।
पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः ।ऋणदारिद्र्यदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः ॥११॥
putrāndehi dhanaṃ dehi tvāmasmi śaraṇaṃ gataḥ |
ṛṇadāridryaduḥkhena śatrūṇāṃ ca bhayāttataḥ ||
अर्थ: मुझे संतान दीजिए, धन दीजिए; ऋण और दरिद्रता के दुःख से, और शत्रुओं के भय से घिरकर मैं आपकी शरण में आया हूँ।
एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम् ।महतीं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा ॥१२॥
ebhirdvādaśabhiḥ ślokairyaḥ stauti ca dharāsutam |
mahatīṃ śriyamāpnoti hyaparo dhanado yuvā ||
अर्थ: जो इन बारह श्लोकों से धरती-पुत्र मंगल की स्तुति करता है, वह बड़ी समृद्धि पाता है, मानो दूसरा युवा कुबेर हो, ऐसा यह श्लोक कहता है।
इति श्रीस्कन्दपुराणे भार्गवप्रोक्तं ऋणमोचकमङ्गलस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
iti śrīskandapurāṇe bhārgavaproktaṃ ṛṇamocakamaṅgalastotraṃ sampūrṇam |
अर्थ: इस प्रकार श्री स्कन्दपुराण में भार्गव का कहा हुआ ऋणमोचक मंगल स्तोत्र पूरा हुआ।
ऋणमोचन मंगल स्तोत्र मंगल देव (भौम, कुज, अंगारक) की स्तुति है। पहले तीन श्लोकों में मंगल के इक्कीस नाम हैं, जैसे भूमिपुत्र, ऋणहर्ता, लोहित, धरात्मज, कुज, भौम और अंगारक, फिर उनका ध्यान, प्रणाम और ऋण, रोग, दरिद्रता व भय से छुटकारे की प्रार्थना है।
मंगल को पृथ्वी का पुत्र माना जाता है, जो लाल वर्ण के, युवा और हाथ में शक्ति (भाला) लिए हैं। मंगलवार को इस स्तोत्र का पाठ प्रचलित है। स्तोत्र स्वयं कहता है कि इसमें बारह श्लोक हैं ("एभिर्द्वादशभिः श्लोकैः")।
स्तोत्र की शुरुआत मंगल देव के इक्कीस नामों से होती है। हर नाम उनकी किसी पहचान को बताता है: वे पृथ्वी के पुत्र हैं (भूमिपुत्र, धरात्मज, कुज, भौम), लाल वर्ण के हैं (लोहित, अंगारक), और ऋण हरने, धन देने, रोग दूर करने और वर्षा कराने वाले माने गए हैं। फिर उनके तेजस्वी रूप का ध्यान है: बिजली जैसी चमक, युवा रूप और हाथ में शक्ति।
अगले श्लोकों में भक्त अपनी बात सीधे कहता है: मेरे ऋण, रोग, दरिद्रता, भय और मन के संताप दूर कीजिए, मैं आपकी शरण में हूँ। वह मंगल देव की शक्ति को भी मानता है कि वे प्रसन्न हों तो बहुत कुछ दे सकते हैं। यह स्तोत्र चिंता में घिरे मन की प्रार्थना है, जिसमें भक्त अपनी परेशानी देवता के सामने रखकर हल्का होता है।
इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि मंगल के इन नामों को रोज़ श्रद्धा से पढ़ने वाले पर ऋण नहीं चढ़ता और उसे धन मिलता है, पढ़ने वालों को मंगल से पीड़ा नहीं होती, और बारह श्लोकों से स्तुति करने वाला बड़ी समृद्धि पाता है। ये स्तोत्र के अपने वचन हैं; यह पाठ प्रार्थना है, ऋण से निकलने के व्यावहारिक उपायों की जगह नहीं।
एतानि कुजनामानि नित्यं यः श्रद्धया पठेत् ।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात् ॥जो मंगल के इन नामों को रोज़ श्रद्धा से पढ़ता है, उस पर ऋण नहीं चढ़ता और वह जल्दी धन पाता है, ऐसा यह श्लोक कहता है।
स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः ।
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पापि भवति क्वचित् ॥मनुष्यों को अंगारक (मंगल) का यह स्तोत्र सदा पढ़ना चाहिए; ऐसा कहा गया है कि उन्हें मंगल से होने वाली थोड़ी-सी भी पीड़ा कभी नहीं होती।
एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम् ।
महतीं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा ॥जो इन बारह श्लोकों से धरती-पुत्र मंगल की स्तुति करता है, वह बड़ी समृद्धि पाता है, मानो दूसरा युवा कुबेर हो, ऐसा यह श्लोक कहता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| श्लोक 1 | सर्वकर्मविरोधकः | बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1912) का पाठ। sanskritdocuments.org का "सर्वकर्माविरोधकः" (किसी काम में बाधा न डालने वाले) यहाँ लिया गया है; शब्दकल्पद्रुम में भी नामों की सूची में यही "सर्व्वकर्म्माविरोधकः" मिलता है। |
| श्लोक 3 | वृष्टिकर्ता वृष्टिहर्ता सर्वकार्यार्थसिद्धिदः | नारदपुराण (पूर्वार्ध, अध्याय 69) में मंगल के इक्कीस नामों की सूची इसी तरह पूरी होती है। |
अंतिम वाक्य इसे "स्कन्दपुराणे भार्गवप्रोक्तं" यानी स्कन्दपुराण में भार्गव (भृगुवंशी ऋषि) का कहा हुआ बताता है। यह परंपरा का कथन है।
बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1912) में भी यही बारह श्लोक इसी अंतिम वाक्य के साथ छपे हैं। स्कन्दपुराण में इसका अध्याय और श्लोक-संख्या हमें प्रमाणित रूप से नहीं मिली। मंगल के लगभग यही इक्कीस नाम ("मंगलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः" से शुरू) नारदपुराण (पूर्वार्ध, अध्याय 69) में भी मिलते हैं। दक्षिण भारत में "ऋणविमोचन अङ्गारक स्तोत्र" नाम से एक दूसरा पाठ प्रचलित है, जिसमें ऋण-रेखा मिटाने की विधि है; वह अलग स्तोत्र है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org से लिया गया और विकिस्रोत पर बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1912) के पृष्ठ 363–364 (स्कैन से पढ़ा पाठ) से श्लोक-दर-श्लोक मिलाया गया; नामों की सूची नारदपुराण (पूर्वार्ध 69.77–80) से भी देखी गई। दोनों स्रोतों में बारह श्लोक, क्रम और अंतिम वाक्य एक-से हैं; बृहत्स्तोत्ररत्नाकर के स्कैन-पाठ में कुछ छपाई की गलतियाँ हैं (जैसे "अतिवक", "घरासुतम्"), जिन्हें पाठ-भेद नहीं माना गया। दक्षिण भारत का "ऋणविमोचन अङ्गारक स्तोत्र" अलग पाठ है और यहाँ शामिल नहीं है।
नवग्रह, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु · स्तोत्र · संस्कृत
जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्
शनि · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
शनिवार को शनि देव की सरल पूजा: सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द, पीपल की परंपरा, मंत्र, आरती, और सबसे बढ़कर सेवा और दान।
सूर्य · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
रोज़ सुबह सूर्य देव को जल देने की सरल विधि: लोटा, सूर्योदय का समय, गिरती धार, अर्घ्य का मंत्र और सूर्य के बारह नाम; सूर्य को सीधे न देखने की सावधानी के साथ।
सूर्य · आरती
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन
बृहस्पति · आरती
ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा
सूर्य · आरती
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान
स्तोत्र का अंतिम वाक्य इसे स्कन्दपुराण में भार्गव का कहा हुआ बताता है। मंगल के लगभग यही नाम नारदपुराण (पूर्वार्ध, अध्याय 69) में भी मिलते हैं।
स्तोत्र की फलश्रुति ऐसा कहती है, और यह भक्त की श्रद्धा का विषय है। हम इसे प्रार्थना के रूप में देते हैं; ऋण से निकलने के लिए खर्च की योजना और समय पर भुगतान जैसे व्यावहारिक कदम भी ज़रूरी हैं।
मंगलवार को इसका पाठ प्रचलित है। स्तोत्र स्वयं (श्लोक 4) रोज़ श्रद्धा से पढ़ने की बात कहता है।
परंपरा में मंगल को पृथ्वी (भूमि, धरा) का पुत्र माना जाता है। इसीलिए उनके नाम भौम, कुज, धरात्मज और भूमिनन्दन हैं।
नहीं, वह एक दूसरा पाठ है। उसमें भी यही नाम आते हैं, पर साथ में ध्यान, विनियोग और ऋण-रेखा मिटाने की विधि है। यहाँ बारह श्लोकों वाला ऋणमोचक मंगल स्तोत्र दिया गया है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।