गणेश पूजा विधि
गणेश · पूजा विधि · रोज़ की पूजा
घर में गणेश जी की सरल पूजा: बारह नामों से स्मरण, दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या लड्डू का भोग, आरती और तीन परिक्रमा। बुधवार, चतुर्थी और हर शुभ काम से पहले।

स्तोत्र · कार्तिकेय · स्तोत्र
"हे स्वामिनाथ करुणाकर दीनबन्धो" से शुरू होने वाला भगवान सुब्रह्मण्य (कार्तिकेय, मुरुगन) का अष्टक, जिसके हर श्लोक में उनसे हाथ थामने की प्रार्थना है।
हे स्वामिनाथ करुणाकर दीनबन्धोश्रीपार्वतीशमुखपङ्कजपद्मबन्धो ।श्रीशादिदेवगणपूजितपादपद्मवल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥१॥
he svāminātha karuṇākara dīnabandho
śrīpārvatīśamukhapaṅkajapadmabandho |
śrīśādidevagaṇapūjitapādapadma
vallīsanātha mama dehi karāvalambam ||
अर्थ: हे स्वामिनाथ, हे करुणा करने वाले, दीनों के बंधु! पार्वतीपति शिव के मुख-कमल को खिलाने वाले सूर्य जैसे (उन्हें आनंद देने वाले)! जिनके चरण-कमल विष्णु आदि देवगण पूजते हैं, हे वल्ली के साथ विराजने वाले नाथ, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।
देवाधिदेवसुत देवगणाधिनाथदेवेन्द्रवन्द्यमृदुपङ्कजमञ्जुपाद ।देवर्षिनारदमुनीन्द्रसुगीतकीर्तेवल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥२॥
devādhidevasuta devagaṇādhinātha
devendravandyamṛdupaṅkajamañjupāda |
devarṣināradamunīndrasugītakīrte
vallīsanātha mama dehi karāvalambam ||
अर्थ: हे देवों के देव (शिव) के पुत्र, देवगणों के स्वामी! जिनके कोमल कमल जैसे सुंदर चरण इन्द्र के वंदनीय हैं, जिनकी कीर्ति देवर्षि नारद और श्रेष्ठ मुनि गाते हैं, हे वल्लीनाथ, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।
नित्यान्नदाननिरताखिलरोगहारिन्भाग्यप्रदानपरिपूरितभक्तकाम ।श्रुत्यागमप्रणववाच्यनिजस्वरूपवल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥३॥
nityānnadānaniratākhilarogahārin
bhāgyapradānaparipūritabhaktakāma |
śrutyāgamapraṇavavācyanijasvarūpa
vallīsanātha mama dehi karāvalambam ||
अर्थ: हे सदा अन्नदान में लगे रहने वाले, सब रोगों को हरने वाले! सौभाग्य देकर भक्तों की कामनाएँ पूरी करने वाले! जिनके स्वरूप का वर्णन वेद, आगम और प्रणव (ॐ) करते हैं, हे वल्लीनाथ, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।
क्रौञ्चासुरेन्द्रपरिखण्डन शक्तिशूल-चापादिशस्त्रपरिमण्डितदिव्यपाणे ।श्रीकुण्डलीशधरतुण्डशिखीन्द्रवाहवल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥४॥
krauñcāsurendraparikhaṇḍana śaktiśūla-
cāpādiśastraparimaṇḍitadivyapāṇe |
śrīkuṇḍalīśadharatuṇḍaśikhīndravāha
vallīsanātha mama dehi karāvalambam ||
अर्थ: हे क्रौञ्च पर्वत और असुरराज को भेदने वाले! जिनके दिव्य हाथ शक्ति (भाला), शूल, धनुष आदि शस्त्रों से सुशोभित हैं, जिनका वाहन वह श्रेष्ठ मोर है जिसकी चोंच में नागराज है, हे वल्लीनाथ, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।
देवाधिदेवरथमण्डलमध्यवेद्यदेवेन्द्रपीठनकरं दृढचापहस्तम् ।शूरं निहत्य सुरकोटिभिरीड्यमानवल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥५॥
devādhidevarathamaṇḍalamadhyavedya
devendrapīṭhanakaraṃ dṛḍhacāpahastam |
śūraṃ nihatya surakoṭibhirīḍyamāna
vallīsanātha mama dehi karāvalambam ||
अर्थ: इस श्लोक के कुछ शब्द अलग-अलग छपे मिलते हैं; सामान्य अर्थ यह है: हे देवाधिदेव, रथ-मंडल के बीच में जानने योग्य (विराजमान)! इन्द्र को सताने वाले, दृढ़ धनुष धारण करने वाले शूर (सूरपद्म असुर) को मारकर करोड़ों देवताओं से स्तुति पाने वाले, हे वल्लीनाथ, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।
हारादिरत्नमणियुक्तकिरीटहारकेयूरकुण्डललसत्कवचाभिराम ।हे वीर तारकजयामरवृन्दवन्द्यवल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥६॥
hārādiratnamaṇiyuktakirīṭahāra
keyūrakuṇḍalalasatkavacābhirāma |
he vīra tārakajayāmaravṛndavandya
vallīsanātha mama dehi karāvalambam ||
अर्थ: जो रत्नों और मणियों से जड़े मुकुट, हार, बाजूबंद, कुण्डल और चमकते कवच से सुंदर लगते हैं; हे वीर, तारकासुर को जीतने वाले, देवताओं के समूह से वंदित, हे वल्लीनाथ, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।
पञ्चाक्षरादिमनुमन्त्रितगाङ्गतोयैःपञ्चामृतैः प्रमुदितेन्द्रमुखैर्मुनीन्द्रैः ।पट्टाभिषिक्तहरियुक्त परासनाथवल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥७॥
pañcākṣarādimanumantritagāṅgatoyaiḥ
pañcāmṛtaiḥ pramuditendramukhairmunīndraiḥ |
paṭṭābhiṣiktahariyukta parāsanātha
vallīsanātha mama dehi karāvalambam ||
अर्थ: पंचाक्षर आदि मंत्रों से अभिमंत्रित गंगाजल और पंचामृत से प्रसन्न इन्द्र आदि देवों और श्रेष्ठ मुनियों ने जिनका पट्टाभिषेक (देवसेनापति के रूप में अभिषेक) किया, जो श्रेष्ठ आसन के स्वामी हैं, हे वल्लीनाथ, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।
श्रीकार्तिकेय करुणामृतपूर्णदृष्ट्याकामादिरोगकलुषीकृतदुष्टचित्तम् ।सिक्त्वा तु मामव कलाधरकान्तिकान्त्यावल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥८॥
śrīkārtikeya karuṇāmṛtapūrṇadṛṣṭyā
kāmādirogakaluṣīkṛtaduṣṭacittam |
siktvā tu māmava kalādharakāntikāntyā
vallīsanātha mama dehi karāvalambam ||
अर्थ: हे श्री कार्तिकेय! काम आदि विकारों से मैला और दूषित हुआ मेरा मन है; अपनी करुणा के अमृत से भरी दृष्टि से और चंद्रमा जैसी शीतल कांति से उसे सींचकर मेरी रक्षा कीजिए। हे वल्लीनाथ, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।
सुब्रह्मण्याष्टकं पुण्यं ये पठन्ति द्विजोत्तमाः ।ते सर्वे मुक्तिमायान्ति सुब्रह्मण्यप्रसादतः ॥९॥
subrahmaṇyāṣṭakaṃ puṇyaṃ ye paṭhanti dvijottamāḥ |
te sarve muktimāyānti subrahmaṇyaprasādataḥ ||
अर्थ: जो श्रेष्ठ द्विज इस पवित्र सुब्रह्मण्याष्टक को पढ़ते हैं, वे सब सुब्रह्मण्य की कृपा से मुक्ति पाते हैं, ऐसा यह श्लोक कहता है।
सुब्रह्मण्याष्टकमिदं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।कोटिजन्मकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥१०॥
subrahmaṇyāṣṭakamidaṃ prātarutthāya yaḥ paṭhet |
koṭijanmakṛtaṃ pāpaṃ tatkṣaṇādeva naśyati ||
अर्थ: जो सुबह उठकर इस सुब्रह्मण्याष्टक को पढ़ता है, उसके करोड़ों जन्मों में किए पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं, ऐसा यह श्लोक कहता है।
सुब्रह्मण्य करावलम्ब स्तोत्र, जिसे सुब्रह्मण्याष्टकम् भी कहते हैं, भगवान कार्तिकेय की स्तुति है। दक्षिण भारत में इन्हें सुब्रह्मण्य, स्वामिनाथ और मुरुगन कहते हैं। हर श्लोक का अंत एक ही प्रार्थना से होता है: "वल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम्", यानी हे वल्ली के साथ विराजने वाले नाथ, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।
आठ श्लोकों में कार्तिकेय के रूप और लीलाएँ आती हैं: शिव-पार्वती के पुत्र, देवताओं के सेनापति, क्रौञ्च पर्वत को भेदने वाले, तारकासुर और शूर (सूरपद्म) को हराने वाले, और मोर पर सवार। अंत के दो श्लोक फलश्रुति हैं।
यह स्तोत्र एक भक्त की पुकार है। हर श्लोक में कार्तिकेय के किसी रूप या लीला का स्मरण है: वे शिव-पार्वती को आनंद देने वाले पुत्र हैं, देवताओं के सेनापति हैं, सब रोग हरने वाले और भक्तों की इच्छा पूरी करने वाले हैं, क्रौञ्च पर्वत को भेदने वाले, तारकासुर और शूर को हराने वाले वीर हैं, और मोर पर सवार हैं।
हर स्मरण के बाद एक ही बात कही जाती है: "मम देहि करावलम्बम्", मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए। आठवें श्लोक में यह प्रार्थना भीतर की ओर मुड़ती है: भक्त कहता है कि काम आदि विकारों से मेरा मन मैला है, आप अपनी करुणा भरी दृष्टि से उसे सींचकर शुद्ध कर दीजिए।
इस स्तोत्र की फलश्रुति कहती है कि इस अष्टक को पढ़ने वाले सुब्रह्मण्य की कृपा से मुक्ति पाते हैं, और सुबह उठकर इसे पढ़ने वाले के करोड़ों जन्मों के पाप उसी क्षण नष्ट होते हैं। ये स्तोत्र के अपने वचन हैं।
सुब्रह्मण्याष्टकं पुण्यं ये पठन्ति द्विजोत्तमाः ।
ते सर्वे मुक्तिमायान्ति सुब्रह्मण्यप्रसादतः ॥जो श्रेष्ठ द्विज इस पवित्र सुब्रह्मण्याष्टक को पढ़ते हैं, वे सब सुब्रह्मण्य की कृपा से मुक्ति पाते हैं, ऐसा यह श्लोक कहता है।
सुब्रह्मण्याष्टकमिदं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
कोटिजन्मकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥जो सुबह उठकर इस सुब्रह्मण्याष्टक को पढ़ता है, उसके करोड़ों जन्मों में किए पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं, ऐसा यह श्लोक कहता है।
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ जगह शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर का पाठ नीचे दिए स्रोत के अनुसार है; दूसरे पाठ ये हैं:
| कहाँ | दूसरा पाठ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| हर श्लोक की अंतिम पंक्ति | वल्लीशनाथ मम देहि करावलम्बम् | sanskritdocuments.org का पाठ। बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) और vignanam.org में "वल्लीसनाथ" है, जो यहाँ लिया गया है। |
| श्लोक 2 | देवादिदेवनुत | vignanam.org का पाठ: "देवों के आदिदेव द्वारा स्तुत"। |
| श्लोक 3 | तस्मात्प्रदानपरिपूरितभक्तकाम | vignanam.org का पाठ; बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) में "भाग्यप्रदात" है। |
| श्लोक 3 | शृत्यागमप्रणववाच्यनिजस्वरूप | sanskritdocuments.org और vignanam.org में यही वर्तनी है; बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) का "श्रुत्यागम" (श्रुति और आगम) यहाँ लिया गया है। |
| श्लोक 4 | पाशादिशस्त्र ... श्रीकुण्डलीश धृततुण्ड | vignanam.org का पाठ; sanskritdocuments.org भी इन्हें दूसरे पाठ के रूप में बताता है। |
| श्लोक 5 | देवादिदेव रथमण्डल मध्य वेद्य, देवेन्द्र पीठनगरं | vignanam.org का पाठ; sanskritdocuments.org में "मध्यवेऽद्य" छपा है। |
| श्लोक 8 | भक्त्वा तु मामव | vignanam.org का पाठ। |
| श्लोक 9 | सुब्रह्मण्य करावलम्बं पुण्यं | vignanam.org का पाठ। |
sanskritdocuments.org का पाठ बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (मद्रास, 1927) से लिया गया है और विकिस्रोत पर बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) में भी यही स्तोत्र है। बहुत से लोग इसे आदि शंकराचार्य की रचना बताते हैं, पर इन छपे संग्रहों में रचयिता का नाम नहीं है (विकिस्रोत इसे "अज्ञात" लिखता है), इसलिए रचयिता अज्ञात रखा गया है।
पाठ की जाँच (10 अक्टूबर 2026): पाठ sanskritdocuments.org (जो बृहत्स्तोत्ररत्नाकर, मद्रास 1927 से है) से लिया गया और विकिस्रोत पर बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) तथा vignanam.org से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया। इस स्तोत्र के पाठ में बहुत अंतर मिलते हैं। जहाँ sanskritdocuments.org अकेला अलग था, वहाँ बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (1953) का पाठ लिया गया: "वल्लीसनाथ", "श्रुत्यागम", "मध्यवेद्य", "कवचाभिराम"। vignanam.org के अलग शब्द पाठ-भेद में हैं। श्लोक 5 का अर्थ कठिन है, इसलिए उसका सामान्य अर्थ दिया गया है।
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वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ
कर यानी हाथ और अवलम्ब यानी सहारा। "मम देहि करावलम्बम्" का अर्थ है: मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए, जैसे डूबते को कोई हाथ पकड़कर उबार ले।
दक्षिण भारत की परंपरा में वल्ली भगवान सुब्रह्मण्य (मुरुगन) की पत्नी हैं। "वल्लीसनाथ" का अर्थ है वल्ली के साथ विराजने वाले नाथ।
बहुत से लोग ऐसा मानते हैं, पर पुराने छपे संग्रहों (बृहत्स्तोत्ररत्नाकर) में रचयिता का नाम नहीं है। इसलिए यहाँ रचयिता अज्ञात लिखा गया है।
स्कन्द षष्ठी, शुक्ल षष्ठी और मंगलवार को इसका पाठ प्रचलित है। फलश्रुति सुबह पढ़ने की बात कहती है, पर इसे किसी भी समय श्रद्धा से पढ़ सकते हैं।
आठ मुख्य श्लोक होने से यह अष्टक है, और हर श्लोक "करावलम्बम्" पर खत्म होता है, इसलिए करावलम्ब स्तोत्र भी कहलाता है। यह एक ही स्तोत्र है।
पाठ की किसी पंक्ति, शब्द या अर्थ में गलती दिखे तो हमें बताइए। हम हर सुझाव को प्रामाणिक स्रोत से मिलाकर ही बदलते हैं, और मूल पाठ में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ते।